लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने उत्तर प्रदेश उच्चन्यायालय के फैसले के आने के पहले ही अपनी राय जाहिर कर दी है वे अपने अनुरूप फैसला चाहते हैं । उन्हें बाबरी मस्जिद गिराने का कोई दुख और अफसोस नहीं है। वे अपने मुँह से बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण की बात तक नहीं करना चाहते। उनके इस बयान ने अल्पसंख्यकों में आतंक और भय के संदेश का काम किया है। इन दिनों उत्तर प्रदेश साम्प्रदायिक भावनाओं को लेकर शांत है लेकिन अदालत के फैसले के बाद भी शांत रहेगा कहना मुश्किल है। राममंदिर को लेकर संघ परिवार का जो जिद्दी रूख रहा है उसकी तुलना राजनीति में सिर्फ हिटलर के जिद्दीभाव से कर सकते हैं।

आरएसएस ने राममंदिर आंदोलन के माध्यम से देश की जो हानि की है उसकी भरपाई शब्दों से नहीं हो सकती। राम के नाम पर उन्होंने समस्त हिन्दुओं की सहिष्णुता को साम्प्रदायिक राजनीति के हाथों गिरवी रख दिया। राम हमारे देवता हैं उनके मार्ग का अनुसरण करने की बजाय संघ परिवार ने शैतान का मार्ग अपनाया । बाबरी मस्जिद तोड़कर सारी दुनिया में भारत की धर्मनिरपेक्ष छबि को कलंकित किया।

राममंदिर आंदोलन ने धर्मनिरपेक्ष भारत को साम्प्रदायिक भारत का मुकुट पहनाया है। भारत में सभी धर्मों के लोग शांति,सदभाव और सुरक्षा के वातावरण में रहते थे लेकिन इस आंदोलन ने इन तीनों ही चीजों को सामाजिक अशांति,असुरक्षा और अविश्वास में बदल दिया है। खासकर मुसलमानों के प्रति तीव्र घृणा को आम लोगों के जेहन में उतारा है। राममंदिर आंदोलन के द्वारा पैदा की गई घृणा की तुलना सिर्फ दक्षिण अफ्रीका की गोरों की नस्लभेदीय घृणा से की जा सकती है। आज भी समय है संघ अपना जिद्दी रूख त्याग दे। संघ की जिद है हम मंदिर वहीं बनाएंगे। इस नारे का राजनीतिक और सांस्कृतिक रूपान्तरण हो चुका है। भारत के दिल को इस नारे ने पीड़ा पहुँचायी है। भारत के दिल में गरीब बसते हैं। मंदिर वहीं बनाएंगे का नारा गरीब विरोधी साम्प्रदायिक नारा है।

राममंदिर की जिद करके मोहन भागवत ने भारत के गरीबों को एकबार फिर से आहत किया है। वे हिन्दू होकर आज तक नहीं समझ पाए हैं कि धर्म गरीबों की आह है। वह राजनीति का मुकुट नहीं है। वह मंदिर की अभिव्यक्ति नहीं है। वह कोई इमारत नहीं है। मूर्ति नहीं है। वह तो गरीबों की आह है। हिन्दू धर्म का किसी भी अन्य धर्म के साथ कोई द्वेष नहीं है,प्रतिस्पर्धा नहीं है। हिन्दू धर्म की आत्मा मूर्ति, इमारत, मंदिर, संघ परिवार, भाजपा आदि में नहीं बसती। हिन्दू धर्म की आत्मा भारत के गरीबों की झोपड़ियों में बसती है। राम मंदिर आंदोलन गरीबों का आंदोलन नहीं था बल्कि कारपोरेट फंडिंग से चला कारपोरेट धर्म का आंदोलन था। यही वजह है कि कारपोरेट घरानों ने करोड़ों रूपये का चंदा इस आंदोलन को दिया। राममंदिर के नाम पर चंदा वसूली का फायदा हिन्दू धर्म को नहीं मिला, बल्कि संघ परिवार को मिला। संघ परिवार ने करोड़ों रूपये का चंदा बाजार से उठाया है और इसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों से लेकर देशी कारपोरेट घरानों ने दिल खोलकर मदद की। लेकिन सारा पैसा कहां गया कोई नहीं जानता लेकिन इन्कमटैक्स विभाग के पास इसके प्रमाण हैं कि विश्वहिन्दू परिषद ने राममंदिर आंदोलन के नाम पर करोड़ों की वसूली की।

राममंदिर आंदोलन का उत्तर प्रदेश और देश के अन्य इलाकों में एक असर हुआ है भाजपा अचानक कारपोरेट घरानों, धर्म के सिंडीकेट चलाने वालों, बाहुबलियों ,बमबाजों की पार्टी बन गयी। अपराधियों और कारपोरेट धर्मगुरूओं की बड़ी -बड़ी टोलियां संघ परिवार के विभिन्न संगठनों में घुस आयीं और संघ परिवार और उसकी राजनीति का उसने चरित्र ही बदल दिया।

राममंदिर आंदोलन के पहले भाजपा का जनाधार छोटे दुकानदार,व्यापारी और मध्यवर्ग के दब्बू और सभ्य किस्म के लोग हुआ करते थे,लेकिन राममंदिर आंदोलन ने भाजपा और संघ परिवार के संगठनों के इस सामाजिक चरित्र को गुणात्मक तौर पर बदल दिया। अब भाजपा बाहुबलियों और आक्रामक लोगों की पार्टी बन गयी। पहले भाजपा और संघ के लोग छिपकर दंगे करते थे। लेकिन इस आंदोलन के बाद दंगा करना, समूह बनाकर हमले करना,आम बातचीत में हिंसक और घृणा की भाषा बोलना। खासकर मुसलमानों के खिलाफ संघ परिवार ने अहर्निश हिंसाचार का रूख अख्तियार कर लिया। मुसलमानों के खिलाफ वाचिक हिंसा के जरिए माहौल बनाया और उन पर शारीरिक हमले किए।

राममंदिर आंदोलन के पहले भाजपा और संघ परिवार की जो राजनीतिक इमेज थी वही इमेज इस आंदोलन के बाद नहीं रही। राममंदिर आंदोलन के पहले भाजपा ने भय की भाषा का इस्तेमाल न्यूनतम किया था लेकिन राममंदिर आंदोलन के बाद भय और आतंक की भाषा ने भाजपा के नेताओं और समूचे संगठन पर कब्जा जमा लिया।

संघ परिवार की ‘जी’ लगाकर बोलने की शैली खत्म हो गयी और अब संघ के नेता लगातार आक्रामक भाषा, माफिया सरदारों की भाषा बोलने लगे। इनका नया बाहुबली नारा था ‘जयश्रीराम’। ‘जयश्रीराम’ के नारे और राममंदिर आंदोलन के बहाने संघ परिवार ने अपना कायाकल्प किया। अपने को उग्र मुस्लिम विरोधी बनाया। इतिहास को विकृत किया। कानून की अवमानना की। लोकतंत्र का अपमान किया। लोकतंत्र के अपमान की भाषा को राजनीति और मीडिया की आमभाषा बना दिया।

आरएसएस प्रधान मोहन भागवत का ताजा बयान नए खतरे के संकेतों से भरा है। उन्होंने कहा है कि वे उपलब्ध कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल करेंगे। आश्चर्य की बात है कि संघ परिवार का अभी तक यही मानता रहा है कि मंदिर के मसले पर अदालत की राय नहीं मानेंगे। सिर्फ वही फैसला मानेंगे जो उनके पक्ष में आएगा। सवाल यह है कि कानून के प्रति यह नजरिया क्या सभ्यता का प्रतीक है ?

6 Responses to “सभ्यता के राममार्ग से भटके मोहन भागवत”

  1. raj singh

    श्री राम जी पूरा आंदोलन ही आपके नाम पर चल रहा है और आप ही ऐसी बातें कर रहे हैं। सत्य को समर्थन देने के लिए आपको भी बधाई। हम भी यही कामना करते हैं कि राम मंदिर बने और भव्य राम मंदिर बने लेकिन इन पाखंड़ियों के तरीके से नहीं। जिन्होने भगवा आतंकवाद का नाम हिंदुओं के साथ जाड़ कर हिंदू धर्म को ही कलंकित कर दिया। और उस पर ये कहते हैं कि हिंदू धर्म इन ठेकेदारों की ही वजह से बचा हुआ है।

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  2. raj singh

    जगदीश्वर चतुर्वेदी जी का लेख सच्चाई को दशार्ता है और उनाकी हिम्मत की प्रशंसा करनी पड़ेगी कि सच को लिखने में तनिक भी नहीं झिझके। आजकल ऐसा सत्य लिखना और सत्य को समर्थन देना दोनों ही घेर पाप हैं। चतुर्वेदी जी को इस पाप के लिए बधाई और आगे भी ऐसे घोर पाप करते रहेंगे इसकी कामना करता हूं। शब्दों को समझें तो आगे आपके ‘महा पापी’ बनने की कामना करता हूं।

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  3. J P Sharma

    चतुर्वेदीजी वामपंथी विचारधारा का ध्वज दृढ़तापूर्वक संभाले हुए हैं.वामपंथ का विश्वास है की तथ्य,सत्य, अथवा इतिहास केवल पार्टी के उद्देश्यों की प्राप्ति के साधन होते हैं और उन्हें समय समय पर तोडा मरोड़ा या बदला जा सकता है. वामपंथी सोच का एक ध्रुव हिन्दुओं को असभ्य बर्बर कट्टरपंथी सिद्ध करना करना है और मुसलमानों को सभ्य उदार एवं सहिष्णु . जवाहरलाल नेहरु के समय से ही यह कार्यक्रम जारी है. प्रोफ आर एस शर्मा इरफ़ान हबीब ,रोमिला थापर इत्यादि भारतीय इतिहासकार इस के अग्रदूत रहे हैं और स्वतंत्रता के पश्चात भारत के सत्तारूर्हा पार्टिओं का प्रश्रय संरक्षण इन्ही लोगों को निरंतर प्राप्त होता रहा है.चतुर्वेदीजी हिन्दुओं के स्वाभिमान अथवा इतिहास की ओर ध्यान देना नहीं चाहते .बाबरी मस्जिद प्रकरण पर उनकी लेखनी निर्बाध प्रवाहित रहती है परन्तु बंगलादेशी मुसलमान घुसपैठिये वहीँ पश्चिमी बंगाल में क्या कर रहे हैं वह उनको नज़र नहीं आता. हिन्दू बहुल भारत में हिन्दुओं का उत्पीरन चर्चा का विषय नहीं है. चतुर्वेदीजी कदाचित मथुरा /ब्रजभूमि से सम्बंधित हों .भले ही उन्हें बरेली मऊ इत्यादि की चिंता न हो ,पर कोल्कता के पास गंगासागर,देगंगा की घटनाएँ उन्हें नहीं दिखती यह स्वयं उनकी आँख पर चढ़े चश्मे का प्रमाण है

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  4. ashutosh verma

    सामयिक मुद्दा है . इसमें उठाये गए प्रश्नों पर विचार करना चाहिए राजनेतिक दलों को ऐसी रणनीति बनाना चाहिए.इस बात की सावधनी बरतना चैये की एक बार फिर सरयू नदी का पानी मानव रकत से लाल न हो जाये

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  5. nand kashyap

    24 ke faisle par abhi se arop pratyarop ki jagah ram ke us charitra ko jan manas ke samne lana hoga jaha we samaj ke sabse nichle hisse ko lekar ahankar se ladkar vijayee hote hain jo priti se sabka man jeet lete hain.nafrat faila apni rajneeti sekne walo se janta nipat legi.paise wale kathit kuleen aur corporate yadi in tatvo ko paisa aur prachar de rahe hain to wo log atmahattya ki taraf badh rahe hain .janta ne gaya ki khal odhe adamkhoro ko pahichan liya hai .kanoon yadi janta ke sath nahi hoga to is bar bhut kuchh gadbad ho jayega isliye kanoon ke palan par sabse adhik jor ho.

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  6. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    आज -कल व्यक्तिगत तौर पर तो सरसंघ चालक श्री मोहन भागवत जीबहुत मर्यादित ,संतुलित और सम्वैधानिक दायरे में बात कर रहे हैं .किन्तु संघ की आड़ में कतिपय ढपोरशंखी मीडिया के मार्फ़त लगातार भयानक अफवाहों का बाज़ार गर्म कर रहे हैं .ये तत्व भले ही गिनती के हैं -इनके साथ देश का मजदूर वर्ग नहीं ,इनके साथ देश का किसान नहीं ,इनके साथ देश की ७० प्रतिशत अनुसूचित जनजाति /आदिवासी नहीं ,इनके साथ नरमपंथी उदारवादी हिन्दुओं का बहुमत नहीं ,फिर भी उन्हें देश के भृष्ट पूंजीपतियों ,दलालों और धर्मान्धता में आकंठ डूबे मुट्ठी भर मर- जीवड़ोंका प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन है .उधर अधिकांस मुस्लिम तो न्याय पालिका के सम्मान की बात कर रहें हैं लेकिन इकदम निचले स्तर पर गरीबी ,मंगाई ,बेरोजगारी और कट्टर धार्मिक तकरीरों से प्ररित लम्पट सर्वहारा के रूप में अमन के विध्वंशक काफी हैं .एक ही रास्ता है दोनों पक्ष कानून की हद्द में रहें .केन्द्रीय मंत्री मंडल के प्रस्ताव और अपील का सम्मान ही देश की आवाज है .

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