लेखक परिचय

अलकनंदा सिंह

अलकनंदा सिंह

मैं, अलकनंदा जो अभी सिर्फ शब्‍दनाम है, पिता का दिया ये नाम है स्वच्‍छता का...निर्मलता ...सहजता...सुन्दरता...प्रवाह...पवित्रता और गति की भावनाओं के संगम का।।। इन सात शब्‍दों के संगमों वाली यह सरिता मुझे निरंतरता बनाये रखने की हिदायत देती है वहीं पाकीज़गी से रिश्तों को बनाने और उसे निभाने की प्रेरणा भी देती है। बस यही है अलकनंदा...और ऐसी ही हूं मैं भी।

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sadhvi-prachiहिन्दुओं की आबादी बढ़ाने के नाम पर कभी अति उत्साह में तो कभी व्यक्तिगत कुंठा का शिकार होकर सीमाएं लांघने का जो काम कुछ अतिवादी संत और साध्वी कर रहे हैं, वह दरअसल देश की फिजा में ज़हर घोल रहे हैं ।
सच तो  यह है क‍ि ऐसी सोच उनकी अपनी- अपनी राजनैतिक, सामाजिक व शारीरिक कुठाओं  से उपजी है जिन्हें वे पिछले काफी समय से हिंदुओं पर थोपने का प्रयास कर रहे हैं। थोक में बच्चे पैदा करने की नसीहत वाला ये आंकड़ा दोनों ही धर्म के लोगों के लिए खासी परेशानी खड़ी कर सकता है ।
ये नसीहतें कुछ यूं परोसी जा रही हैं जैसे हिन्दू धर्मावलंबी इनके जड़ खरीद गुलाम हों और इन्हें  उनके निजी जीवन में भी दखल देने का अधि‍कार प्राप्त हो। आश्चर्य की बात तो यह है क‍ि बच्चे पैदा करने की संख्या ऐसे कथ‍ित संत व साध्वी बता रहे हैं जो घर-परिवार को त्यागने के बावजूद न तो गृहस्थाश्रम में दखल देने से बाज आते हैं और न पद व कुर्सी का लोभ छोड़ पाते हैं लिहाजा गेरुआ वस्त्रों के साथ राजनीत‍ि करते पाये जाते हैं।
कुंठाएं किस-किस रूप में आदमी के बाहर निकलती हैं, यह कोई इन साधु संतों के आचार-व्यवहार से जान सकता है। पहले धर्म की आड़ में और फिर हिन्दुत्व को एक करने के नाम पर जो ये सीन इनके द्वारा रचा जा रहा है, उससे किसी प्रकार हिंदुओं का हित होने वाला नहीं है। यदि शास्त्रों की भी बात करें तो सभी जगह योग्य संतान पैदा करने की मंशा पर जोर दिया गया है, न कि संख्याबल पर। राजनीति में आकर धर्म का पाठ पढ़ाने वाले इन पोंगापंथियों को  समझना होगा क‍ि जिस युवा पीढ़ी ने केंद्र में सरकार बनाने का रिकॉर्ड कायम कराया है और उन्हें भी संसद में बैठने योग्य बनाया है, वही युवा पीढ़ी इनको दर-बदर करने में देर नहीं लगायेगी।
जिनकी शक्लो-सूरत में कहीं से भी संतत्व नज़र नहीं आता, वो सनातन धर्म का झंडा हाथ में लेकर उसकी धज्ज‍ियां उड़ा रहे हैं।
…साध्वी का तमगा लगाकर राजनीति करने वाली सांसद प्राची को ही देखि‍ए जो कुछ दिन पहले हर हिंदू महिला को चार बच्चे पैदा करने की सलाह देने वाले विवादास्पद बयान की सफाई में  कहती हैं कि ‘मैंने चार बच्‍चे पैदा करने के लिए कहा था, 40 पिल्‍ले नहीं।
गौरतलब है कि प्राची ने विश्व हिन्दू परिषद के सम्मेलन में ये बात कही। प्राची ने किसी समुदाय विशेष का नाम लिए बिना कहा, ‘ये लोग जो 35-40 पिल्ले पैदा करते हैं, फिर लव जेहाद फैलाते हैं। उस पर कोई बात नहीं करता है लेकिन मेरे बयान के बाद इतना बवाल मच गया।
लोगों ने मुझसे कहा कि ज्यादा बच्चे पैदा करने से विकास रुक जाएगा पर मैं अपने बयान पर कायम रही।’ प्राची ने मंच से ऐलान करते हुए कहा कि अगर किसी के पास 5 से 10 बच्चे हैं तो वो मेरे पास आएं,  मैं उन्हें सम्मानित करुंगी।
इतना ही नहीं शनिवार को बदायूं के हिंदू कार्यकर्ता सम्‍मेलन में साध्‍वी प्राची ने कहा, ‘1400 साल पहले सभी हिंदू थे तो आजम खान, परवेज मुशर्रफ, गिलानी और शाही इमाम बुखारी को घर वापसी करनी चाहिए। उनके लिए घर वापसी के दरवाजे खुले हुए हैं।’…
ये एक सतत प्रक्रिया हो गई है कि पहले ऐसे ऐसे बयान दे डालो कि फिर कहते फिरो कि बयान को पूरी तरह समझा नहीं गया। या जो हिन्दू नहीं है क्या उनके बच्चे…  बच्चे नहीं कहलाऐंगे….वे पिल्ले हो जाऐंगे…  हद होती है बदजुबानी की भी। बोलने से पहले इतना तो सोच लिया होता कि जिस धर्म का हवाला देकर वह दूसरे धर्म के बच्चों को पिल्ले बता रही हैं, वह धर्म तो हर बच्चे में भगवान का रूप देखने की सीख देता है।
हिंदुत्व को बलशाली बनाने का ये कौन सा पैंतरा है जो सिवाय कटुता फैलाने के और कुछ नहीं कर सकता। हिंदू धर्म इतना कमजोर नहीं है कि उसे एसे जाहिलों से मदद की दरकार हो ।
कौन नहीं जानता कि हिन्दू धर्म की अच्छाइयों को सामने लाने, उसकी कुरीतियों का उन्मूलन करने तथा गरीबों के लिए कुछ कल्याणकारी कार्य करने की बजाय ये कथि‍त संत व साध्वियां सिर्फ अपनी ओर ध्यान आकर्षण हेतु ऐसे विध्वंसकारी बयान देते हैं। रही बात ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों को सम्मानित करने की तो सम्मान से किसी का पेट नहीं भरने वाला। आज भी रेलवे स्टेशनों सहित दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर फटेहाल घूमने वाले बच्चों की तादाद कम नहीं है। करना है तो पहले उनका इंजताम करके उस भारत का सम्मान विश्व में करवाएं जिसे हर राष्ट्रवादी मां का दर्जा देता आया है।
कोरे गाल बजाने के लिए पाकिस्तान, कश्मीर, लव जिहाद और 40 पिल्ले की बात करने वाला मंच पर नहीं, किसी पागलखाने में होना चाहिए। चोला बदलने भर से कोई साध्वी या संत नहीं हो जाता, ये वो लोग हैं जो जिम्मेदारियों से भागकर गेरुए वस्त्रों में अपनी कुंठाओं को छुपा बैठे हैं और ” फायर ब्रांड” की खाल ओढ़कर देश को गर्त में ले जाना चाहते हैं।
किन्हीं मायनों में इन्हें देशद्रोही भी माना जा सकता है क्योंक‍ि निजी राजनीति अथवा व्यक्तिगत कुंठाओं को थोपने वाला शख्स किसी देशद्रोही से कम नहीं होता, फिर चाहे वह कोई साधु-संत हो या मुल्ला-मौलवी।

6 Responses to “सांसद प्राची के बोल बच्चन”

  1. मानव गर्ग

    मैंने यह लेख और इस पर आयीं अभी तक की सारी टिप्पणियाँ बहुत सूक्ष्मता से पढ़े, और पढ़ पर अत्यन्त हर्ष का अनुभव किया । क्यूँकि सभी के विचारों में मुझे एक तत्त्व जो समान दिखा, वह है हिन्दुत्व की महानता का अभिज्ञान व उस महानता की रक्षा की इच्छा । लेखिका की ये पङ्क्तियाँ ध्यानपूर्वक पढ़िये –
    १. पहले धर्म की आड़ में और फिर हिन्दुत्व को एक करने के नाम पर जो ये सीन इनके द्वारा रचा जा रहा है, उससे किसी प्रकार हिंदुओं का हित होने वाला नहीं है। (हिन्दुओं की हितैषी !)
    २. वह धर्म तो हर बच्चे में भगवान का रूप देखने की सीख देता है। (हिन्दुत्व की ज्ञानी !)
    ३. निजी राजनीति अथवा व्यक्तिगत कुंठाओं को थोपने वाला शख्स किसी देशद्रोही से कम नहीं होता, फिर चाहे वह कोई साधु-संत हो या मुल्ला-मौलवी। (मुल्ले-मौलवियों की भी बात की है !)

    यह स्पष्ट है कि लेखिका हिन्दुविरोधी नहीं हैं । महेन्द्रगुप्ता जी की टिप्पणी भी पढ़ें ।

    भेद केवल इस पर है, कि हिन्दुत्वरक्षा का मार्ग क्या हो । मेरे भाइयों और बहनों, जब हमारा ध्येय एक ही है, तो हम सब स्वाभाविकतया मित्र ही तो हुए ! फिर क्यूँ न हम अपनी स्वाभाविक मित्रता के सत्य को मन में रख कर, एक दूसरे के सहयोग से, एक दूसरे का सम्मान करते हुए, विचार विमर्श करते हुए, बुद्धि के साथ साथ विवेक का भी उपयोग करते हुए, उत्तेजित हुए बिना, अपना आगे का पथ निर्धारित करें ? एक ऐसा पथ जिस पर हम साथ साथ चलें ?

    मेरे मत में यह बहुत सरल है ! केवल हम में से हर कोई अपने विचारों में से नकारात्मकता को निकाल बाहर फेंक दे । फिर जो बचेगा, वह सहजता से ही रचनात्मक होगा, नाशात्मक नहीं । थोड़ा वैराग्य का भी सहारा ले लें । उन पितामह भीष्म के समान, जिन्होंने केवल अपनी प्रतिज्ञा और अपने प्रजाधर्म को निभाने के लिए कौरवों का साथ दिया, यह जानते हुए कि दुर्योधन अधर्मी है । उन मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम के समान, जिनसे कोई भी सत्य छिपा नहीं है, फिर भी जिन्होंने अपने राजधर्म का पालन करते हुए सीता माँ को अयोध्या से निष्कासित कर दिया था ।

    हमारा हिन्दुधर्म किसी भी आपत् में नहीं है, क्यूँकि ये आपत् में हो ही नहीं सकता, क्यूँकि यह सनातन धर्म है । तो ऐसे में हम विचलित क्यूँ हों ? हाँ, हमें धर्म की रक्षा के लिए प्रयास तो करते ही रहना होगा । परन्तु यदि मोह से नहीं बचे, तो अपने ही मित्रों को शत्रु मान बैठेंगे, और शत्रुओं को मित्र ! हाहाहा, सरल है न ! गीता में स्पष्ट कहा है –

    कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
    मा कर्मफलहेतुर्भू मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

    श्लोक में स्पष्ट है, कि फल की इच्छा बिना कर्म करें, फल-हेतु से नहीं । साथ ये भी कहा है, कि कर्म न करना भी अनुचित है !

    अध्यात्म का इस भौतिक संसार में प्रयोग किया जा सकता है । और उससे जो बल प्राप्त होता है, उसके समान बल कहीं और से प्राप्त हो ही नहीं सकता । आप अपने हिन्दुधर्म पर, जिसका आधार अध्यात्म है, पूर्ण विश्वास रखिए । सुखी रहेंगे !

    सभी को, सादर प्रणाम !

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  2. रवि श्रीवास्तव

    ravi srivastava

    माफ करना, अलकनंदा सिंह जी मैं आप का ध्यान उस पर दिलाना चाहता हूं जो कि अभी तक सम्भव नही रहा हैं।

    आप की हेड़िग और लेख में प्रयोग किए गया शब्द सांसद प्राची के बोल बच्चन से बिल्कुल सहमत नही हूं।
    क्या आप हमें ये बता सकती है कि साध्वी प्राची कहा से चुनाव लड़कर सांसद बनी हैं।

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  3. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    (१) लेखक ऐसे लिख रहे हैं, जैसे सारे हिंदुओं ने इतने सारे बच्चे पैदा ही कर दिए हो।महाराज, जिस समाज में अधिक बच्चे पैदा किए जाते हो, उनपर भी तो कुछ स्पष्ट कहिए। उनपर भी विचार किया जाना चाहिए।क्यों नहीं? सारेआलेख में उनपर एक परिच्छेद भी नहीं। वाह!

    (२) मैं साध्वी जी के, कहने का तात्पर्य अलग अर्थ में लेता हूँ। वे अप्रत्यक्ष रूपसे कोई समान कानून बनाने के लिए, कह रही है।

    (३) डॉ. धनाकर ठाकुर की बात पर भी विचार किया जाए।

    (४) सोचिए भारत-हिंदुत्व= ?
    (प्रश्न काल्पनिक है, कुछ प्रमाणित करने के लिए)
    मैं ने जब ऐसा प्रश्न पूछा, तो विश्वविद्यालयीन भारतीय छात्रों की सभामें २ उत्तर आये थे।

    (क) भारत-हिन्दू = पाकिस्थान
    (ख) भारत- हिन्दू= ० (शुन्य)

    फिर आगे पूछा था कि-
    (ग) भारत – मुसलमान= उत्तर था शान्ति।
    जहाँ जहाँ मुसलमान रहता है, वहाँ अशान्ति ही है। हिंसा है। सर कलम हो रहा है।

    किसी का द्वेष नहीं करता। न मुझे ऐसा सिखाया गया है। Think and discard कहते हैं, इसे। सोचने के स्तरपर सच्चाई समझ में आती हैं।

    पर सच्चाई से मुख मोडना दूसरा विभाजन हो सकता है।
    क्यों?
    (५) आज भी क्या आप कश्मिर से सारे हिंदु पण्डितों को निष्कासित नहीं किया गया? क्यों ऐसा हुआ? हिन्दू लघुमति हो गया।
    यदि वहाँ, हिंदुओं की ही संख्या ८५% होती, तो ऐसा हो ही नहीं सकता था।
    सहमत नहीं है आप?

    तर्क समझने की यह विधा है।
    (६) डॉ. धनाकर ठाकुर जी से मैं सहमत हूँ।

    (७)अन्य मित्रों को इन बिन्दुओं पर विचार करने का अनुरोध करता हूँ।
    लेखक को धन्यवाद, कि, आपने आलेख लिखनेपर, हमें विचार रखने के लिए अवसर प्रदान किया।

    प्रश्न:(A) भारत-हिंदू = ? (B) कश्मिर-हिंदू =?
    (C) क्या लेखक उत्तर देंगे?
    (D)अफगानीस्तान, (E)पाकिस्तान, (F) बंगलादेश, (G)कश्मिर इन देशों में क्या हुआ?

    लेखक को अनुरोध कि आप अपनी दृष्टि से प्रमाणिक उत्तर दे। सभी बिन्दुओं पर क्रम बद्ध विचार रखें।
    मैं, आप का धन्यवाद करूंगा।
    डॉ. मधुसूदन

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  4. sureshchandra.karmarkar

    अलकनंदा बहिन एक नारी होने के बावजूद आपने बेबाक लेख लिखा है. आजकल के संत माया मोह से दूर रहने,परिवार के मोह में न पड़ने की सलाह और उपदेश देते हैं किन्तु ये स्वयं करोंडो के मकानो में रहते हैं,महंगी गाड़ियों में घूमते हैं।,इनमे से कुछ तो उजागर हो चुके हैं. रही बात ४य ५ बच्चे पैदा करने की। तो इसका सबसे अधिक ंबोझ महिला पर पड़ता है. मैं एक महिला के बारे में आपको बताऊँ जो ५-६ घर बर्तन मांजकर अपना पेट पालती है। उसका पति केवल पुताई का कार्य करता है ,पिता (ससुर) कैंसर रोगी है ,सास दमे की मरीज है। उसने किसी की सलाह मान ली आज उसे ५ बच्चे हैं. इस महंगाई के युग में कोई कल्पना कर सकता है की परिवार अपना जीवन कैसे जीता होगा?बच्चों को क्या सुविधा होगी?विद्यालयों में इनकी पढ़ाई को कौन देखता होगा?क्या ये साध्वियां और उपदेशक ऐसी एक नहीं अनेक महिलाओं की मदद करेंगे?अपने मठों /महंगी गाड़ियों /पद से मिलने वाले लाभों को इनमे वितरित करेंगे?यदि हैं तो ये ऐसा एक संघटन बनाएं जो देश के इन ४-५ बच्चों वाले परिवार को मदद देक़ेवल उन्हें पुरस्कार न दे.इन नेताओं के पास वोटर सूचि है,सत्ता है ये सर्वेक्षण कराएं ,और उन्हें मदद दे.ये केवल बातें करना जानते हैं.

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  5. mahendra gupta

    यह लोग सब ज्यादा नुक्सान हिंदुत्व व भा ज पा को पहुंचा रहे हैं ,यदि मोदी सरकार ने इन को नहीं रोका तो यह इनकी सरकार के लिए ही घातक होगा और अब यदि सरकार गयी तो फिर कभी आसानी से भा ज पा को मौका नहीं मिलेगा विकास के जिस मुद्दे मोदी आएं हैं उसे पटरी से उतारने के लिए विपक्ष ही बहुत है पर ये भी पीछे नहीं हैं इस प्रकार के भाषणों से हिंदुत्व की रक्षा नहीं होती उसके सिद्धांत व आदर्शों को अपनाने से रक्षा होती है ,आर एस एस भी इस बात को नही समझ रहा है जिस बात से कांग्रेस अब तक लोगों को डरा कर वोट लेती रही है व मतदाता को भा ज पा से दूर रखती रही है ,वह सिद्ध हो जाएगी और फिर अगले चुनाव में इसे सत्ता से हाथ धोना पड़ेगा मोदी का जादू काम करने से चलेगा न कि धार्मिक भावनाओं को भड़का कर , इन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि अब जनता 1952 वाली जनता नहीं रही है ,उसमें चेतना आ गयी है ,व समझ भी।

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  6. dr dhanakar thakur

    is lekh ke lekhak ke shabd prayog vilkul hee galat hain. Kisiko Prachee ke mat se virodh ho sakataa hai par is kathor satya ko nahe ejhutlayaa ja sakataa hai ki janhaa Hindu ghataa vah bhart se alag ho gayaa. Hinndu 4 bachhe paida karen ya Mumtaz kee tarh 14 unhe usase nibatne deejiye, yadi meri koi patnee hotee to use Prachee ki salaah manane ki salah jaroor detaa jabardastee nahi karta. Main swaym apne mata- pita ka chauthaa bachhaa hun, Ambedkar aaur Rabindra 14ven the, Jo pal sakte hain ve bachhe palen- kuttee yaa kutiya ke bajay.

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