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    Homeसाहित्‍यकविताश्री अनुपम मिश्र : सबसे लम्बी रात का सुपना नया

    श्री अनुपम मिश्र : सबसे लम्बी रात का सुपना नया

    अरुण तिवारी

    सबसे लम्बी रात का सुपना नया
    देह अनुपम बन उजाला कर गया।
    रम गया, रचता गया
    रमते-रमते रच गया वह कंडीलों को
    दूर ठिठकी दृष्टि थी जो
    पता उसका लिख गया
    सबसे लम्बी रात का सुपना नया…

    रमता जोगी, बहता पानी
    रच गया कुछ पूर्णिमा सी
    कुछ हिमालय सा रचा औ
    हैं रची कुछ रजत बूंदें
    शिलालेखों में रचीं कुछ सावधानी
    वह खरे तालाब सा मन बस गया
    सबसे लम्बी रात का सुपना नया…

    अकाल के भी काल में
    अच्छे विचारों की कलम सा
    वह चतुर बन कह गया।
    रच गया मुहावरे कुछ
    साफ माथे की सामाजिक सादगी से
    भाषा का वह मार्ग गांधी लिख गया
    सबसे लम्बी रात का सुपना नया…

    अर्थमय जीवन में है जीवन का अर्थ
    एक झोले में बसी खुश ज़िदगी
    व्यवहार के त्यौहार सी वह जी गया
    जब गया, नम्र सद्भावना सा
    मृत्यु से भी दोस्ती सी कर गया
    सबसे लम्बी रात का सुपना नया…

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