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    योगी जी ! व्यवस्था में बैठे अपराधियों पर भी लगाम कसो , तो कोई बात बने

    यह अच्छा ही रहा कि खूंखार अपराधी विकास दुबे का अंत होने की सूचना हम सबको मिली है। हम इस बात का समर्थन करते हैं कि एक अपराधी , समाज विरोधी और व्यवस्था के साथ-साथ अपनी व्यवस्था खड़ी करने की हिमाकत करने वाले व्यक्ति का अंत करना सरकार का कार्य है । शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह नितांत आवश्यक है कि पूरी व्यवस्था को चुनौती देने वाले ऐसे लोगों का सरकार अंत कर दे । विकास दुबे और उसके साथियों को जिस जगह जाना चाहिए था उस जगह वे चले गए हैं । इस घटनाक्रम में शहीद हुए पुलिसकर्मियों को भी हम अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं ,जिन्होंने अपने कर्तव्य कर्म को निभाते हुए शहादत प्राप्त की ।
    पर जितनी ईमानदारी से हम सरकार के इस कार्य की सराहना और समर्थन कर रहे हैं कि उसने जैसे भी किया जो भी किया , एक अपराधी को समाप्त कर अच्छा कार्य किया। उतनी ही ईमानदारी से हम यह भी कहना चाहेंगे कि सरकार के कार्य में पूरी ईमानदारी दिखाई नहीं देती। जिस प्रकार का कार्य योगी सरकार ने विकास दुबे के साथ किया है ऐसा वही सरकार कर सकती है जो या तो अपने कार्यों में पूर्ण ईमानदार हो और व्यवस्था में बैठे लोगों के विरुद्ध भी व्यवस्था उससे भी अधिक कठोर हो जितनी कठोर वह अपराधी के प्रति है या फिर वह सरकार कर सकती है जो केवल वाहवाही लेने के लिए या किसी सीमा तक अपनी ‘तानाशाही’ दिखाने के लिए ऐसा कार्य करने को आतुर हो ।
    योगी सरकार को यदि इस कसौटी पर कस कर देखा जाए तो एक बात बिल्कुल सच्चाई के साथ सामने आती है कि व्यवस्था में बैठे लोग पूरी तरह ईमानदार नहीं हैं । यदि बात खाकी वर्दी की की जाए तो इसमें ऐसे लोगों की बड़ी सूची है जो खाकी को अपमानित करते हुए अपराधियों को प्रोत्साहित करते हैं । उन्हें संरक्षण देते हैं और अपना समर्थन देकर उनसे अपराध करते करवाते हैं । यह एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि योगी जी के रहते उनकी नाक तले ऐसे बहुत से लोग हैं जो व्यवस्था में बैठे होकर व्यवस्था को डुबोने का काम कर रहे हैं।
    यदि विकास दुबे के मामले को ही लें तो इसमें भी निश्चित रूप से खाकी का विशेष योगदान रहा है। जिसने उसे यहां तक बढ़ने दिया । ऐसे एक नहीं अनेकों पुलिसकर्मी, अधिकारी और राजनेता इसमें संलिप्त रहे हैं जिनके चेहरे दागदार हैं और जिनके जेहन में गहरे राज छिपे हैं । योगी जी की सरकार इन दागदार और राज भरे चेहरों के लिए क्या नीति बना सकी है ? यह भी स्पष्ट होना चाहिए ।
    खाकी के भीतर ऐसे अनेकों चेहरे हैं जो मीडिया कर्मियों या उनके अपराध और भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले लोगों के विरुद्ध झूठे केस दर्ज करते हैं। समाज के भले लोगों को कानून के शिकंजे में जकड़ने का काम करते हैं और अपराधियों को प्रोत्साहन देते है । योगी जी ऐसे भ्रष्ट , निकृष्ट , व्यवस्थाद्रोही , समाजद्रोही , राष्ट्रद्रोही और धर्मद्रोही खाकी वर्दीधारियों को भी क्या ‘ठोकने’ की कोई कार्यवाही कर सकते हैं ? यदि ऐसी नीति उनकी सरकार बना सकती है तो कहा जाएगा कि वह निश्चित रूप से एक सुयोग्य प्रशासक के साथ-साथ एक ‘आदर्श राजा’ भी हैं । योगी जी का सम्मान करते हुए मैं कहना चाहूंगा कि राजा दार्शनिक और दार्शनिक राजा होना चाहिए। ऐसा दिखाने के लिए उन्हें यह भी स्पष्ट करना होगा कि व्यवस्था के भीतर बैठे व्यवस्थाद्रोही लोगों के खिलाफ भी वह कठोर हैं । यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि उनके शासनकाल में प्रदेश में ब्यूरोक्रेसी अधिक बेलगाम हो चुकी है । इसके चलते उनके अपने विधायक भी असहाय होकर रह गए हैं । ब्यूरोक्रेसी अपने स्वेच्छाचारी और तानाशाही स्वरूप में आकर ‘कुछ भी करने के लिए’ स्वतंत्र होने का संदेश दे रही है।
    व्यवस्था में दिख रहे भारी छेदों का एक उदाहरण देकर मैं अपनी बात को समाप्त कर रहा हूं । आरोप है कि अभी हाल ही में सम्भल के रजपुरा थाने में एक घटना में विगत 1 जून को हुई एक प्राथमिकी में पुलिस एसपी यमुना प्रसाद की मिलीभगत से एक पत्रकार वेद वसु यादव और उनके पैरालाइसिस मारे पिता दयाशंकर आर्य को हत्या के आरोप में फंसाने का काम किया गया है । जिसकी शिकायत सरकार के लगभग हर संबंधित विभाग को पीड़ित पत्रकार के परिवार ने की है । उस शिकायत में यह मांग की गई है कि मामले की सीबीसीआईडी से जांच कराई जाए ।
    आरोप है कि एसपी यमुना प्रसाद पत्रकार की निर्भीकता से जल भुनकर व जानबूझकर उसे और उसके पिता को इस मामले में फंसा रहे हैं । शासन स्तर से और डीजीपी के द्वारा भी संबंधित एसपी से इस विषय में रिपोर्ट मांगी गई है , लेकिन सारी व्यवस्था को चुनौती देता हुआ एक अधिकारी कोई भी रिपोर्ट लखनऊ नहीं भेजता है। उल्टे झूठे फ़ंसाए गए पत्रकार परिवार को नेस्तनाबूद करने की खुली धमकी देता है।
    जिससे स्पष्ट होता है कि सारी व्यवस्था एक व्यक्ति के कारण या तो बदनाम हो रही है या एक जगह स्थिर होकर खड़ी हो गई है । कैसे मिलेगा सही व्यक्ति को न्याय ? जब पीड़ित परिवार केवल यह कह रहा है कि इसमें निष्पक्ष जांच सीबीसीआईडी के माध्यम से कराई जाए और जांच उपरोक्त अधिकारी से अन्यत्र किसी दूसरे अधिकारी को स्थानांतरित कर दी जाए तब भी उसे न्याय नहीं मिल रहा है तो व्यवस्था के लिए क्या कहा जाएगा ?
    एक व्यक्ति एक अधिकारी के रूप में सारी व्यवस्था को दूषित प्रदूषित कर रहा है और चुनौती दे रहा है। इसके बावजूद योगीजी और उनकी सरकार सारे घटनाक्रम की ओर से मुंह फेरे खड़ी हैं । यदि आरोप उपरोक्त एसपी यमुना प्रसाद पर है तो नैतिकता के आधार पर स्वयं ही उक्त मामले की जांच अन्यत्र किसी सक्षम अधिकारी से कराने की आख्या अपनी ओर से भेजनी चाहिए और शासन को व प्रशासन को दूध का दूध और पानी का पानी करते हुए उचित कार्यवाही करनी चाहिए । यदि निर्दोष लोगों को पुलिस दोषी बनाकर झूठे मामलों में फंसाएगी तो याद रखना योगी जी ‘विकास दुबे’ कभी मर नहीं पाएगा , क्योंकि अन्याय से अन्यायी लोगों का निर्माण होता रहता है ।
    आशा है सरकार वर्दी के भीतर बैठे ‘गुंडा तत्वों’ पर भी लगाम कसेगी जो जनता का खून पी रहे हैं और रक्षक ना होकर भक्षक बने बैठे हैं । विकास दुबे से हमारी कोई सहानुभूति नहीं , न्याय सबको मिलना चाहिए , पर जो कानून में विश्वास रखते हैं उन्हें न्याय सर्वप्रथम मिलना चाहिए । दोषियों के विरुद्ध कार्यवाही होनी चाहिए पर निर्दोष कहीं पर भी उत्पीड़ित ना हो , यह भी ध्यान रखना चाहिए । केवल इस ओर सरकार का ध्यान आकृष्ट करना हमारा उद्देश्य है।

    डॉ राकेश कुमार आर्य

    राकेश कुमार आर्य
    राकेश कुमार आर्यhttps://www.pravakta.com/author/rakesharyaprawakta-com
    उगता भारत’ साप्ताहिक / दैनिक समाचारपत्र के संपादक; बी.ए. ,एलएल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता। राकेश आर्य जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक चालीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में ' 'राष्ट्रीय प्रेस महासंघ ' के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं । उत्कृष्ट लेखन के लिए राजस्थान के राज्यपाल श्री कल्याण सिंह जी सहित कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किए जा चुके हैं । सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। ग्रेटर नोएडा , जनपद गौतमबुध नगर दादरी, उ.प्र. के निवासी हैं।

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