लेखक परिचय

तनवीर जाफरी

तनवीर जाफरी

पत्र-पत्रिकाओं व वेब पत्रिकाओं में बहुत ही सक्रिय लेखन,

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-तनवीर जाफ़री

भारत वर्ष जैसे विशाल देश के कई क्षेत्रों से वैसे तो कभी अलगाववाद कभी पूर्ण स्वायत्तता तो कभी आंतरिक स्वायत्तता की आवाज आती ही रहती है। परंतु इनमें कश्मीरी अलगाववाद की समस्या एक ऐसी राजनैतिक समस्या का रूप ले चुकी है जिसे हम देश की जटिलतम राजनैतिक समस्या का नाम दे सकते हैं। बावजूद इसके कि भारतवर्ष कश्मीर को अखंड भारत का एक प्रमुख अंग मानता है। परंतु कश्मीर में बैठी कुछ अलगाववादी शक्तियां ऐसी भी हैं जो भारत के इस दावे को स्वीकार करने को हरगिज तैयार नहीं हैं। और इन अलगाववादी ताकतों को सीमा पार के देश पाकिस्तान से पूरा नैतिक व राजनैतिक समर्थन प्राप्त हो रहा है। कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन को हवा देना तथा इसका समर्थन करना पाकिस्तान के शासकों की आंतरिक मजबूरी भी बन चुका है। ज़ाहिर है कि यदि हम इसकी पृष्ठभूमि में झांके तो हमें 1971 में भारत द्वारा पाकिस्तान का विभाजन कराने में बंगला देश को दिया गया समर्थन दिखाई देता है। 1971 के घटनाक्रम से आहत पाक सैन्य अधिकारी तथा पाक राजनेता निश्चित रूप से अपने उसी ‘अपमान’ का बदला लेने के सशक्त एवं प्रबल हथियार के रूप में कश्मीर समस्या को प्रयोग में ला रहे हैं।

बहरहाल, सवाल यह उठता है कि ऐसे में क्या पाकिस्तान की इस नापाक मंशा को इतनी आसानी से पूरा होने दिया जा सकता है? क्या कश्मीर के चंद अलगाववादी नेताओं को पाकिस्तान के हाथ की कठपुतली बनकर कश्मीर घाटी में अलगाववाद का जहर फैलाने की अब और अधिक आजादी दी जानी चाहिए? क्या वास्तव में पूरी कश्मीर घाटी के आम लोग कश्मीर की आजादी के पक्षधर हैं? कश्मीर की आजादी की विस्तृत परिभाषा क्या हो सकती है? कश्मीरी अलगाववादीकेवल भारतीय शासन वाले क्षेत्र से ही आजादी हासिल करना चाहते हैं या वह अपने साथ पाक अधिकृत कश्मीर के क्षेत्र को भी शामिल कर एक वृहद कश्मीर के नक्शे की परिकल्पना कर रहे हैं? चंद अलगाववादी नेताओं की सोच के अनुसार क्या भारतीय कश्मीर का पाकिस्तान में विलय हो जाना चाहिए? कश्मीर के काफी बड़े क्षेत्र पर चीन ने अतिक्रमण कर रखा है। उसका क्या समाधान होना चाहिए? और क्या इन चंद अलगाववादियों से भय खाकर अथवा इनके द्वारा धर्म के नाम पर गुमराह कश्मीरी युवकों के सामयिक प्रदर्शनों से डर कर कश्मीर की आजादी की बात न करने तथा भारत के साथ ही सहर्ष रहने की बात करने वाले कश्मीरियों की आवाज को क्या बिल्कुल ही नज़र अंदाज कर दिया जाना चाहिए? इस प्रकार दरअसल मसल-आजादी-ए-कश्मीर की परिभाषा क्या होनी चाहिए तथा इसे परिभाषित करने का अधिकार किसे होना चाहिए? आदि ऐसे ढेरों सवाल हैं जो वास्तव में बहुत पेचीदा परंतु कशमीर समस्या से जुड़े व इसका समाधान निकालने में सार्थक सिध्द होने वाले सवाल जरूर हैं।

गत तीन दशकों से कश्मीर में अलगाववाद आंदोलन के अंतर्गत हिंसा का व्यापक तांडव जारी है। कश्मीरी सभ्‍यता तथा कश्मीरियत का दम भरने वाले अलगाववादी आतंकवादियों द्वारा लाखों कश्मीरियों को घाटी से विस्थापित होने के लिए मजबूर किया जा चुका है। जम्‍मू से लेकर कर दिल्ली तक तमाम कश्मीरी जिनमें गैर मुस्लिम कश्मीरियों की सं या सर्वाधिक है, को दरबदर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। अलगाववादियों की इन नापाक एवं गैर इंसानी हरकतों से यह बात तो बिल्कुल साफ हो जाती है कि इन्हें कश्मीरियत या कश्मीरी सभ्‍यता की कोई फिक्र या परवाह नहीं बल्कि यह कश्मीर में संप्रदाय आधारित हिंसक आंदोलन चला रहे हैं। और कश्मीर में मुस्लिम समुदाय से संबंध रखने वाला जो उदारवादी वर्ग इनकी तथाकथित आजादी का समर्थन नहीं करता उसे भी या तो यह अलगाववादी समर्थक मौत की नींद सुला देते हैं या फिर उसे भी अन्य विस्थापितों की ही तरह घाटी छोड़ने पर मजबूर कर देते हैं। जाहिर है ऐसे में यही सवाल उभरकर सामने आता है कि क्या चंद अलगाववादी मुसलमानों को आजाद कश्मीर के रूप में कोई नया इस्लामी देश चाहिए? पाक अधिकृत कश्मीर तथा पाकिस्तान में भारतीय कश्मीर को लेकर चलाए जा रहे आंदोलनों, इस संबंध में वहां आयोजित होने वाली जनसभाओं तथा रैलियों और इन सब में सीमापार बैठे कश्मीरी अलगाववादियों को हवा देने वाले भड़काऊ भाषणकर्ताओके जहरीले भाषणों से भी यही विश्वास होता है। उधर एक ताजातरीन घटनाक्रम में इन अलगाववादियों के सुर से अपना सुर मिलाते हुए पाकिस्तान ने अमेरिकी राष्ट्रपति से एक बार फिर यह आग्रह किया है कि कश्मीर को संयुक्त राष्ट्र संघ के हवाले कर दिया जाए। गौरतलब है कि पाकिस्तान ने ओबामा से यह निवेदन ऐसे समय में किया है जबकि वे शीघ्र ही भारत के दौरे पर आने वाले हैं। गोया पाकिस्तान अमेरिका को बार-बार यह जताना चाह रहा है कि कश्मीर भारत के दावे के अनुसार उसका अभिन्न अंग नहीं बल्कि एक विवादित क्षेत्र है।

बहरहाल, आजादी-ए-कश्मीर के प्रश्न को लेकर यहां कुछ सवाल और भी जरूरी हैं जो कम से कम उन चंद नेताओं से तो जरूर पूछे जा सकते हैं जो घाटी को धर्म के आधार पर भारत से अलग करने तथा उनके अनुसार ‘आजाद’ किए जाने का सपना देख रहे हैं। सर्वप्रथम तो इन कश्मीरी अलगाववादी नेताओं को यही गौर करना चाहिए कि आज जो पाकिस्तान धर्म के नाम पर कश्मीर के अलगाववादी आंदोलन को उकसा व भड़का रहा है तथा इन चंद नेताओं को अपनी भारत विरोधी कठपुतली के रूप में इस्तेमाल कर रहा है स्वयं उसी पाकिस्तान की वर्तमान भीतरी स्थिति व अंतर्राष्ट्रीय छवि क्या है? 1947 में धर्म के नाम पर भारत से अलग हुआ पाकिस्तान क्या अब तक धर्म के नाम पर उसी प्रकार संगठित रह पाया है? यदि हां तो 1971 में बंगला देश उदय का कारण क्या था? इसके अलावा पाकिस्तान के भीतरी हालात जिसे कि आज सारी दुनिया देख रही है जिसके विस्तार से उल्लेख करने की यहां आवश्यकता भी नहीं है। आंखिर ऐसे धर्म आधारित नए राष्ट्र के निर्माण से पाकिस्तान को स्वयं क्या हासिल हो सका है? क्या कश्मीरी अलगाववाद की बातें करने वाले चंद नेता तथाकथित ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान’ में लगभग प्रतिदिन मुसलमानों द्वारा ही मुसलमानों की हत्याएं किए जाने तथा वहां इस्लाम के नाम पर सड़कों पर आमतौर पर आत्मघाती बमों के रूप में अपनी जान गंवाने वाले युवाओं की हालत से बेंखबर हैं। आंखिर कश्मीर में अलगाववाद की बात करने वाले नेताओं को इतिहास की तथा पाक में प्रतिदिन घटने वाली इन गैर इस्लामी व गैर इंसानी हिंसक घटनाओं से सबंक लेने की जरूरत है भी या नहीं? एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि पाकिस्तानी अवाम, शासक या पाक सेना कश्मीर मुद्दे को लेकर अपना जो चाहे नारिया क्यों न रखते हों, यहां उनकी सोच व उनके नारिये की परवाह करना न तो भारत के लिए जरूरी है न ही यह भारत सरकार की मजबूरी है। परंतु भारतवर्ष में चाहे केंद्र में किसी भी दल की सरकार रही हो या आम भारतीय नागरिकों की बात हो या फिर आम भारतीय मुसलमानों के नारिए की बात की जाए तो पूरा देश इस बात को लेकर एकमत है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और भविष्य में भी रहना चाहिए। तथा अलगाववादी नेताओं को भी यही समझना चाहिए कि कश्मीरियों व कश्मीरियत का भी कल्याण इसी में है कि वे भारत के साथ बने रहें।

बावजूद इसके कि भारत की कुछ राजनैतिक पार्टियां ज मू-कश्मीर से उस धारा 370 को हटाए जाने की पक्षधर हैं जिसके तहत कश्मीरी अवाम को अन्य भारतीय नागरिकों की अपेक्षा तमाम प्रकार के विशेषाधिकार दिए गए हैं। परंतु इसके बावजूद देश के अधिकांश राजनैतिक दल कश्मीर में धारा 370 को कायम रखने तथा कश्मीरियों को विशेषाधिकार दिए जाने के पक्षधर हैं। यहां तक कि सन् 2000 में कश्मीर में पूर्ण स्वायत्तता विधेयक भी पारित हो चुका था। जिसे तत्कालीन केंद्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने मंजूरी नहीं दी। समाचारों के अनुसार कश्मीर के दौरे पर गया केंद्र सरकार के मध्यस्थताकारों का दल अब उन कारणों का पता करेगा जिस की वजह से पूर्ण स्वायत्तता विधेयक को मंजूरी नहीं मिल सकी थी। गोया केंद्र सरकार की कोशिश है कि कश्मीरी अवाम किसी अन्य देश विशेषकर पाकिस्तान के बहकावे में आने के बजाए कश्मीरी अवाम अथवा कश्मीर के विकास संबंधी प्रत्येक संभव सहायता केंद्र सरकार से ले। परंतु वे अलगाववादि शक्तियों के हाथों का खिलौना कतई न बनें।

कुछ कश्मीरी अलगाववादी नेताओं का यह तर्क है कि आजादी के बाद कश्मीर पर्यटन के क्षेत्र में इतना आगे बढ़ जाएगा कि पूरी दुनिया स्वयं कश्मीर की ओर आकर्षित होगी। यदि भारत के अभिन्न अंग के रूप में एक शांतिपूर्ण कश्मीर को देखा जाए फिर तो यह तर्क काफी हद तक मुनासिब समझा जा सकता है। परंतु यदि आजाद कश्मीर के पैमाने पर इस तर्क को तौला जाए तो यह तर्क बिल्कुल बेमानी प्रतीत होता है। इसकी वजह यह है कि पाक अधिकृत कश्मीर जिसे पाकिस्तान अपनी भाषा में दुनिया को आजाद कश्मीर बताता है, की पर्यटन के क्षेत्र में आखिर क्या हालत है? सीमापार के उस कश्मीर में जहां आम कश्मीरी स्वयं को सुरक्षित न महसूस कर पा रहा हो तथा जिसके बारे में दुनिया यह भी जानती हो कि आतंकवादियों के कितने प्रशिक्षण केंद्र उस कश्मीर में चलाए जा रहे हैं, सशस्त्र आतंकियों के जुलूस व रैलियां जिस मुजफ्फराबाद की सड़कों पर सरेआम निकलते रहते हों उस कश्मीर में विदेशी सैलानियों के आने की बात सोचना भी महा एक मजाक़ है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि मसल-ए-कश्मीर सुलगते सवालों से घिरा हुआ एक ऐसा मसअला है जिसका समाधान आजादी से भी संभव नहीं। अत: कश्मीरियों व कश्मीरियत सभी का कल्याण इसी में निहित है कि वह भारत जैसे विश्व के विशालतम लोकतंत्र का एक मस्तक रूपी स मानित क्षेत्र बना रहे। जिसपर कश्मीरियत व कश्मीरी भी गर्व कर सकें तथा भारत भी फिरदौस-ए-हिंद रूपी प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण इस विशाल भूभाग को अपने प्रतिष्ठित राज्‍य के रूप में स्वीकार कर गौरवान्वित महसूस कर सके।

2 Responses to “सुलगते सवालों के बीच मसल-ए-कश्मीर”

  1. एल. आर गान्धी

    l.r.gandhi

    शैलेन्द्र जी ने बिलकुल ठीक कहा- वास्तव में कश्मीर में इस्लामिक जेहाद के बल पर निज़ामे मुस्तफा -शरीअत का राज कायम करने का षड्यंत्र हो रहा है, जिसे हमारे सेकुलर शैतान अल्पसंख्यक वोट के मोह में समझते तो हैं मगर मानते नहीं !

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  2. शैलेन्‍द्र कुमार

    शैलेन्द्र कुमार

    तनवीर साहब सब कुछ तो ठीक है लेकिन
    १.”ज़ाहिर है कि यदि हम इसकी पृष्ठभूमि में झांके तो हमें 1971 में भारत द्वारा पाकिस्तान का विभाजन कराने में बंगला देश को दिया गया समर्थन दिखाई देता है।” अगर ऐसा है तो १९६५ और १९७१ में पाकिस्तान के हमले का कारन क्या था
    २. “बावजूद इसके कि भारत की कुछ राजनैतिक पार्टियां ज मू-कश्मीर से उस धारा 370 को हटाए जाने की पक्षधर हैं जिसके तहत कश्मीरी अवाम को अन्य भारतीय नागरिकों की अपेक्षा तमाम प्रकार के विशेषाधिकार दिए गए हैं।” ये विशेषाधिकार नहीं शोषणाधिकार दिलाये गए है कश्मीर के शासकों को जब तक ये शोषणाधिकार नहीं हटेंगे कश्मीर का सर्वांगीण विकास नहीं होगा और केंद्र से मिलने वाली सहायता को इसके नेता विदेशों में जमाँ करके यहाँ के लोगों को भरमाते रहेंगे

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