मुस्लिम शासक भारत के लिए धब्बा या गौरव ? भाग – 1

अक्टूबर 2017 में बीबीसी ने उपरोक्त शीर्षक से एक समीक्षा भारत के इतिहास के संबंध में प्रस्तुत की थी । जिसमें उसने यह स्थापित करने का प्रयास किया था कि भारत में मुगलों से पहले ऐसा कोई शासक नहीं हुआ जिसने देश की जीडीपी को बढ़ाने के लिए और लोगों के आर्थिक स्तर को ऊंचा उठाने के लिए इतना गंभीर प्रयास किया हो । उस समय ताजमहल की ऐतिहासिकता को लेकर भारतवर्ष में गंभीर चर्चा चल रही थी कि इसका वास्तविक निर्माता कोई हिंदू शासक है या फिर तथाकथित रूप से शाहजहां ही इसका वास्तविक निर्माता है ? तब भाजपा विधायक संगीत सोम ने ताजमहल को भारतीय संस्कृति पर धब्बा बताया था तो केंद्रीय मंत्री वीके सिंह ने अकबर रोड का नाम महाराणा प्रताप करने की मांग कर डाली थी । तब औरंगज़ेब रोड का नाम अब्दुल कलाम रोड किया जा चुका था ।
उसी वर्ष मई में बीजेपी नेता शायना एनसी ने मुग़ल शासक अकबर की तुलना हिटलर से की थी । शायना ने ट्वीट कर कहा था, ”अकबर रोड का नाम महाराणा प्रताप मार्ग कर देना चाहिए । कल्पना कीजिए कि इसराइल में किसी सड़क का नाम हिटलर पर रहे ! हम लोगों की तरह कोई भी देश दमनकारियों को सम्मान नहीं देता है।”
वास्तव में भारत के इतिहास के तथ्यों को बहुत अधिक तोडा मरोड़ा गया है । पिछले 70 – 72 वर्ष के काल में हमारी दूसरी तीसरी पीढ़ी इस इतिहास को पढ़ते – पढ़ते अत्यधिक भ्रमित कर दी गई है। प्रचलित इतिहास को पढ़कर वास्तव में ऐसा लगता है जैसे भारत में अंग्रेजों और मुसलमानों के आने से पहले ऐसा कुछ भी नहीं था जिस पर भारत गर्व और गौरव कर सके।
हमें भ्रमित करने के लिए विदेशी विद्वानों के लेख और उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं। जबकि समकालीन भारतीय विद्वानों , लेखकों या कवियों के संदर्भों को सांप्रदायिक कहकर या पूर्वाग्रह ग्रस्त मानकर छोड़ दिया जाता है । पता नहीं यह कौन सी कसौटी है कि हमारे विद्वानों के साथ इतना अन्याय कर उनके तथ्यों को उपेक्षित कर दिया जाता है और विदेशी विद्वानों की मिथ्या धारणाओं को सत्य के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है ।
बीबीसी ने अपनी उपरोक्त समीक्षा में एक विदेशी विद्वान को उदधृत कर ऐसे ही भ्रामक तथ्यों को हम पर थोपने का प्रयास करते हुए लिखा था कि जर्मन-अमरीकी इतिहासकार एंड्रे गंडर फ्रैंक ने ‘रीओरिएंट: ग्लोबल इकॉनमी इन द एशियन एज’ नाम की किताब 1998 में लिखी थी । फ्रैंक का कहना था कि अठारहवीं शताब्दी के दूसरे हिस्से तक भारत और चीन का आर्थिक रूप से दबदबा था । स्पष्ट है इसी दौर में सारे मुस्लिम शासक भी हुए।”
उन्होंने इस किताब में लिखा है कि पूरे संसार पर दोनों देश हावी थे । यहीं से कई इतिहासकारों ने इस बात को आगे बढ़ाया । ज़्यादातर इतिहासकारों का यही मत है कि 18वीं शताब्दी के दूसरे हिस्से तक भारत और चीन हावी रहे । स्थिति तब बदली जब यूरोप का विस्तार आरम्भ हुआ और कई देशों में उपनिवेश बने । इसी दौरान अंग्रेज़ों का भारत पर क़ब्ज़ा हुआ।”
हमारा मानना है कि 1998 में जिस लेखक ने उपरोक्त पुस्तक लिखी उस पुस्तक को अकबर के समकालीन इतिहासकार और कवियों की अपेक्षा प्राथमिकता देना मूर्खता है। यदि उपरोक्त लेखक बात इतिहास का एक अंग है तो अकबर के विषय में इतिहासकार विंसेंट स्मिथ का यह कथन इतिहास का एक अंग क्यों नहीं हो सकता कि – “अकबर भारत में एक विदेशी शासक था । उसकी धमनियों में भारतीय रक्त की एक बूंद भी नहीं थी।”
अकबर के चरित्र के बारे में स्मिथ हमें बताता है कि “पुनीत ईसाई धर्म प्रचारक अक्वाबीबा ने अकबर को स्त्रियों से उसके कामुक संबंधों के लिए बुरी तरह फटकार लगाने का साहस किया था।”
जो लोग यह मानते हैं कि भारत में राजा के लिए कोई नियमावली या आचार धर्म नहीं था । उन्हें “याज्ञवल्क्य स्मृति” को पढ़ना चाहिए । जिसमें राजा के बारे में लिखा गया है कि – ”राजा को शक्ति संपन्न, दयावान, दानी , दूसरों के कर्मों को जानने वाला, तपस्वी , ज्ञानी एवं अनुभवी लोगों के विचारों को सुनकर निर्णय देने वाला , मन एवं इंद्रियों को अनुशासित रखने वाला , अच्छे एवं बुरे भाग्य में समान स्वभाव रखने वाला, कुलीन , सत्यवादी , मनसा वाचा , कर्मणा पवित्र , शासन कार्य में दक्ष, शारीरिक , मानसिक एवं बौद्धिक दृष्टि से सबल , व्यवहार एवं वाणी में मृदुल , आचार्य आदि प्रतिपादित वर्ण एवं आश्रम धर्मों का पोषक , अकृत्य कर्मों से अलग रहने वाला , मेधावी , साहसी , गंभीर , गुप्त बातों तथा दूतों के संदेशों एवं अपनी कमी की गोपनीयता की रक्षा करने वाला , शत्रुओं पर दृष्टि रखने वाला , भेदनीति का ज्ञाता , दुर्गुणों का रक्षक, तर्क शास्त्र , अर्थशास्त्र एवं शासन शास्त्र में प्रवीण होना चाहिए।”
इसके अतिरिक्त वेदों व अन्य आर्षग्रंथों सहित विदुर नीति , विष्णु नीति , आचार्य चाणक्य का अर्थशास्त्र जैसे अन्य कई ग्रंथ भी राजा के बारे में उसका धर्म निर्धारित करने की बात करते हैं । हमारा मानना है कि भारतवर्ष में मुगलों , अंग्रेजों या किसी भी विदेशी आक्रमणकारी शासक के शासनकाल में राजा के लिए इस प्रकार का एक भी नियम या उसके आचार व्यवहार को निर्धारित करने वाला उसका धर्म प्रतिपादित नहीं किया गया , जैसा भारतवर्ष में किया गया था ।
अकबर सहित प्रत्येक विदेशी आक्रमणकारी शासक के शासनकाल में हिंदुओं पर लगाया जाने वाला जजिया कर ही एक ऐसा प्रमाणिक साक्ष्य है जो इन सारे शासकों को पक्षपाती , अन्यायी और अत्याचारी सिद्ध कर देता है।
अत्याचारी शासकों से मुक्ति प्राप्त करना भारत के लोगों का प्रथम कर्तव्य था और ऐसा होना भी चाहिए कि विदेशी शासकों के शासन से कोई भी देश अपनी मुक्ति की योजना पर काम करे। अकबर भारत के लिए कभी महान नहीं था । पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में उसे महान कह कर संबोधित किया है । जबकि अकबर के बारे में बदायूंनी हमें बहुत अच्छे ढंग से बताता है अकबर में वे सारी कमजोरियां थीं जो इस्लाम को मानने वाले शासक में होनी चाहिए । बदायूनी के उन विवरणों को कहीं पर भी उल्लेखित नहीं किया जाता। हमारे लिए अकबर के बारे में प्रमाणित सूचना देने वाला केवल अबुलफजल जैसा चाटुकार दरबारी ही पर्याप्त है। उसी चाटुकार के विवरणों के आधार पर वर्तमान इतिहास हमें पढ़ाया जाता है और विदेशी विद्वान भी उसी के आधार पर अपनी विद्वता झाड़ लेते हैं।
जब अकबर ने चित्तौड़ को जीता तो उसकी विजय को उसने विशेष महत्व दिया । इस बात का पता इससे चलता है कि अकबर की इस विजय के लिए एक पुस्तक अलग से तैयार की गई थी । जिसका नाम ‘फतेहनामा ए चित्तौड़’ दिया गया था । इस पुस्तक के अवलोकन से स्पष्ट हो जाता है कि अकबर ने चित्तौड़ को किस प्रकार ‘जिहादी भावना’ से प्रेरित होकर जीता था ? ‘फतहनामा’ में लिखा गया था – अल्लाह की ख्याति बढ़े , जिसने अपने वचन को पूरा किया। अकेले ही संयुक्त शक्ति को पराजित करा दिया और जिसके पश्चात कहीं भी कुछ भी नहीं है , सर्वशक्तिमान जिसने कर्तव्य परायण मुजाहिदों को बदमाश अविश्वासियों को अर्थात हिंदुओं को अपनी बिजली की भांति चमकीली कड़कड़ाती तलवारों द्वारा वध कर देने की आज्ञा दी थी । उसने बताया था कि उनसे युद्ध करो । अल्लाह उन्हें तुम्हारे हाथों में दंड देगा और वह नीचे गिरा देगा । वध कर धराशाई कर देगा और तुम्हें उनके ऊपर विजय दिला देगा। (कुरान सूरा 9 आयत 14 ) हमने अपना बहुमूल्य समय अपनी शक्ति से सर्वोत्तम ढंग से जिहाद में ही लगा दिया है और अमर अल्लाह के सहयोग से जो हमारे सदैव बढ़ते जाने वाले साम्राज्य का सहायक है, अविश्वासियों के अधीन बस्तियों , निवासियों , दुर्गों व शहरों को विजय कर अपने अधीन करने में लिप्त हैं । कृपालु अल्लाह उन्हें त्याग दे और तलवार के प्रयोग द्वारा इस्लाम के स्तर को सर्वत्र बढ़ाते हुए और बहुदेवतावाद के अंधकार और हिंसक पापों को समाप्त करते हुए उन सभी का विनाश कर दे । हमने पूजा स्थलों को उन स्थानों में मूर्तियों को और भारत के अन्य भागों में विध्वंस कर दिया है। अल्लाह की ख्याति बढ़े जिसने हमें इस उद्देश्य के लिए मार्ग न दिखाया होता तो हमें इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए मार्ग ही न मिला होता – – -।”
इस तथाकथित महान बादशाह की मृत्यु के पश्चात जब इसका बेटा सलीम जहांगीर के नाम से बादशाह बना तो उसने अपने बाप की महानता को स्पष्ट करते हुए अपनी खुद की किताब में लिखवाया – “अकबर और जहांगीर के शासनकाल में 5 से 6 लाख तक की संख्या में हिंदुओं का वध हुआ था।” ( तारीखे – सलीमशाही अनु. प्राइस – 225 – 226 )
जिसके शासनकाल में लाखों हिंदुओं का वध किया गया हो उसे एक दयालु शासक के रूप में महान कैसे माना जा सकता है ?
देश के हिंदू समाज को जागना पड़ेगा । यदि नहीं जागे तो इन पर विदेशी शासकों के इतिहास को इस प्रकार थोप दिया जाएगा की फिर उसे ये चाह कर भी अपने कंधे से उतार नहीं पाएंगे। एक समय ऐसा आएगा जब हमें अपने महान क्रांतिकारियों के आजादी मांगने के विचार तक से भी घृणा हो जाएगी। यह लगेगा कि जब यहां पर सब कुछ अंग्रेजों व मुगलों ने ही किया है तो फिर उनसे आजादी लेने के लिए हमारे क्रांतिकारियों ने मूर्खतापूर्ण कार्य क्यों किया ?

डॉ राकेश कुमार आर्य

3 thoughts on “मुस्लिम शासक भारत के लिए धब्बा या गौरव ? भाग – 1

  1. बीबीसी सवांददाता रजनीश कुमार द्वारा बीबीसी.कॉम हिंदी समाचार (२३ अक्तूबर २०१७) पर प्रस्तुत “मुस्लिम शासक भारत के लिए धब्बा या गौरव?” और परवेज़ महमूद द्वारा पाकिस्तान में लाहोर स्थित स्वतन्त्र समाचारपत्र द फ्राईडे टाइम्स में प्रस्तुत सैकिंग द सबकॉंटीनेनट – श्रृंखला १-४ (दिसंबर १५, २२, २९, २०१७; जनवरी ५, २०१८) को पढ़ें तो अवश्य ही साधारण भारतीय नागरिक आक्रमणकारियों द्वारा बर्बरता और लूटपाट पर क्रमशः बीबीसी.कॉम द्वारा पर्दा डालते और परवेज़ महमूद द्वारा पर्दा उठाते देख पायेगा|

    ऐसे में केवल भारत में ही क्यों, संसार में किसी भी सभ्य देश में कोई बर्बरता और लूटपाट में लिप्त मुस्लिम शासक को कौन अपने लिए गौरव कह पाएगा?

  2. मुस्लिम शासक भारत के लिए धब्बा या गौरव ? पर चिंतन से पहले अन्यत्र प्रवक्ता.कॉम पर प्रस्तुत नवीन समाचार के प्रतिउत्तर में अपनी निम्नलिखित टिप्पणी को मैं यहाँ दोहरा रहा हूँ|

    “कैसी विडंबना है इंडिया में रहते कोई इतिहास शोध संस्थान स्थापित किये जाने की बात करे! जब रक्तरंजित इंडिया-विभाजन के पश्चात अलग पाकिस्तान बन गया और समय बीतते मुक्ति युद्ध के उपरान्त मार्च २६, १९७१ को पूर्वी पाकिस्तान स्वतंत्र बांग्लादेश भी बना तो आज ज्यों के त्यों अपनाए अंग्रेजों द्वारा दिए विधिक ग्रंथों में अंग्रेजी भाषा व कार्यशैली-आधारित शेष रह गए इंडिया में किस प्रकार के शोधकार्य की अपेक्षा की जा रही है? इस बीच हमारे पड़ोसी देश, बर्मा से म्यान्मार व सीलोन से श्री लंका बन गए| उन्नीस सौ सैंतालीस में स्वतन्त्र देश को भारतवर्ष के नाम से यदि परिभाषित किया गया होता तो जिस प्रकार इंडिया में हिंदू समाज की उपेक्षा कर समाज में जब कभी विसंगतियां उत्पन्न की गई हैं, भारतवर्ष में सनातन धर्म के प्रचलन अथवा धर्म के पालन हेतु आचरण व अनुशासन द्वारा वे स्वतः दूर हो चुकी होतीं| |

    आज सकारात्मक राजनीतिक वातावरण में क्यों न हम पहले इंडिया को भारतवर्ष के नाम में परिवर्तित करने की मांग करें ताकि उपयुक्त आधार पर आधारित समाज के सभी क्षेत्रों में राष्ट्र हित विकास-उन्मुख कार्यकलाप में न केवल इतिहास शोध संस्थान ही नहीं अन्य प्राथमिकताओं पर भी बात की जा सके|”
    क्रमशः

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