बिजनौर मदरसे व चांदनी चौक के आईने में मुस्लिमों का विश्वास

अपने दुसरे प्रधानमंत्रित्व में नरेंद्र जी मोदी ने अपने नारे “सबका साथ सबका विकास” में एक नया शब्द जोड़ा है, वह है, सबका विश्वास। वस्तुतः कांग्रेस मुस्लिमों को वोट बैंक बनाया और उन्हें छदम तुष्टिकरण करके राष्ट्र की मुख्य धारा में आने से सदैव रोके रखा; यह “विश्वास” उस कांग्रेसी प्रवृत्ति पर विराम का राष्ट्रीय  प्रतीक है। मुस्लिम समाज यह जान ले कि मुस्लिम आतंकवादियों व कट्टरपंथियों व आनुपातिक रूप से अधिक अपराधियों के कारण उन पर मोदी की पहल को सिद्ध करने की जवाबदेही अधिक है। यदि मोदी ने मुस्लिम समाज का विश्वास जीतने का बीड़ा उठाया है तो मुस्लिम समाज को भी मुस्लिम आतंकियों, पृथकता वादियों, कट्टर पंथियों व विभाजन कारियों की सतत आलोचना, लानत मलामत व बहिष्कार करते रहना पड़ेगा। मोदी जी की यह पहल मुस्लिमों के साथ किये गए कांग्रेसी छलावे के विरुद्ध एक अत्यंत सटीक व संवेदनशील पहल है। “विश्वास” की यह पहल मुस्लिम समाज की आगामी पीढ़ी हेतु एक पूँजी है।

         “सबका विश्वास जीतेंगे” के  नारे संग एक टीका लगाना आवश्यक है कि “हमने कभी भी किसी का विश्वास तोड़ा ही नहीं है”; हां, विश्वास करके हम छले अवश्य गए हैं, इस बात का इतिहास गवाह है। इस देश के हिन्दुओं पर मुस्लिमों द्वारा सदियों से अविश्वास करने के अभिनय से दबाव अवश्य बनाया जाता रहा है। मुस्लिमों का यही नाजायज दबाव भारत में द्विराष्ट्र की संकल्पना का कारक बना, इसी कथित अविश्वास की एक्टिंग से अल्लामा इकबाल जैसा शायर भी एक मजहबी विभाजकारी बना, इसी काल्पनिक अविश्वास से खिलाफत आंदोलन को जन्म दिया गया, इसी षड्यंत्री अविश्वास से भारत में “डायरेक्ट एक्शन डे” जैसा हिंदू कत्लेआम कराया गया, इसी आभासी अविश्वास से कश्मीर घाटी को हिंदू विहीन कर दिया गया, अविश्वास के नाम पर मुस्लिम लीग ने जाने कितने विभाजनकारी अध्याय रचे, इसी अविश्वास के नाम पर पूर्व में कितने ही गौरी, गजनवी, और बिन कासिमों ने अनेकों राजा दाहिरों, महाराणा प्रतापों व शिवाजी जैसों का क़त्ल किया। मुस्लिमों का भारत पर यह अविश्वास न तो असल है न नया है, यह एक पुराना और झूठा अभिनय मात्र है! मुस्लिम समाज का कट्टरपंथी और सियासती तत्व समाज में अविश्वास के अभिनय का ताना बाना बुनकर अपने लिए एक नया भूगोल रचना चाहता है यही असल कहानी है। अविश्वास उपजने के कुछ तो कारण होते हैं, आप अविश्वास उपजने के कारण बताइए; आप नही बता पायेंगे। आप  किसी भी कालखंड में में किसी भी भारतीय राजा द्वारा तोड़े  गए विश्वास की घटना बता दीजिये, आप न बता पायेंगे। आप यह भी नहीं बता पायेंगे कि भारत के विभिन्न राज्यों में जो अनेक प्रतापी राजे, रजवाड़े और चक्रवर्ती सम्राट हुए उनमें से किसने किसी मस्जिद को तोड़ा, किसी मुस्लिम महिला को जबरन अपनी रानी बनाया या किसी मुस्लिम राजा के राज्य पर पहले हमला बोला हो। वर्ष ७१२ के राजा दाहिर पर बिन कासिम के आक्रमण और उसके भय से हिंदू महिलाओं के बड़ी संख्या में हुए जौहर से लेकर आज तिथि तक एक भी हिंदू राजा ने मुस्लिम समाज का विश्वास नहीं तोड़ा है। यह एक अकाट्य तथ्य और सिद्ध इतिहास है। हमारे पिछले हजार वर्षों के इतिहास में चारों दिशाओं में हिंदू राजाओं के शासन में मुस्लिमों की नई बसाहटें हुई हैं, अनेकों मस्जिदों का निर्माण हिंदू राजाओं के दिए दान से कराया गया है। मोदीजी आज “सबका विश्वास” जैसा बड़प्पन भरा नारा दे रहें हैं तो इसे समृद्ध हिंदू  परम्पराओं का पालन ही मानना चाहिए, यह नहीं माना जाना चाहिए कि हमने किसी तोड़े गए विश्वास के पुनर्निमाण के लिए यह नारा लाया है!! “सबका विश्वास” मुस्लिमों को दिया गया वह अवसर है जो उसे उसके पूर्वजों द्वारा किये गए तमाम पापों, कुकर्मों व अत्याचारों को भूल कर दिया गया है। यह अवसर यदि देश के पुनर्निर्माण की दृष्टि से प्रम ने मुस्लिमों को दिया है और उन पर विश्वास करने का आग्रह देश के बहुसंख्यक समाज से किया है तो इसके प्रत्युत्तर में देश के मुस्लिम समाज को भी अपना सौ प्रतिशत इस देश को देना होगा। प्रम की पहल के बदले में मुस्लिम समाज को लव जिहाद, लैंड जिहाद, आतंकवाद, तीन तलाक, मदरसों में हथियार, जहां तहां मजारों का अवैध निर्माण, बहु विवाह-अधिक संताने, जनसंख्या में अतिरिक्त वृद्धि, सड़क पर नमाज की दादागिरी, गौहत्या जैसी गतिविधियों की सख्त आलोचना का व इन गतिविधियों को रोके जाने का वातावरण भी बनाना होगा। ये सब करके ही “विश्वास” बढ़ेगा अन्यथा मोदी जी की इस एतिहासिक पहल को मुस्लिम समाज खो बैठेगा।  

           अभी दो माह भी नहीं हुए हैं मोदी जी को “सबका विश्वास” का नारा दिए हुए कि इस देश को “चांदनी चौक में मंदिर ध्वंस” का घाव दे दिया गया और उसके पंद्रह दिन में ही “बिजनौर मदरसे” का नासूर दे दिया गया, आखिर ऐसे में सबका विश्वास का नारा कैसे सफल होगा; यह मुस्लिम समाज को सोचना है। एक बड़े जनादेश  के साथ दुबारा सत्ता में आये मोदीजी की तो स्पष्ट सोच है कि मुस्लिमों को देश की मुख्य धारा में येन केन प्रकारेण लाना ही है, देश की जनता भी अभी मोदी जी के निर्णय में ही अपनी सहमति दे रही है, किंतु स्मरण रखें; यह “सबका विश्वास” एक पक्षीय प्रक्रिया नहीं है श्रीमान!! मुस्लिम समाज को इस दिशा में बड़ी सकारात्मकता दिखाकर आगे बढ़ना होगा। उसे अपनी मनसा, वाचा, कर्मणा से यह सिद्ध करना होगा कि वह मुस्लिम आतंकियों के साथ नहीं है, यह दिखाना होगा कि वह विभाजन कारियों को पनाह नहीं दे रहा है, मदरसों में शिक्षा चल रही है हथियारों का संग्रह व देशद्रोहियों का जन्म नहीं हो रहा है, गौहत्या रोकने हेतु उसे सामने आना होगा। चांदनी चौक और बिजनौर मदरसा की घटनाएं दूध में नीबूं की बूंद की तरह होंगी यह सहज बात किसी समाज शास्त्री से सीखने की नहीं है।

             “सबका विश्वास” के लिए मुस्लिम वातावरण का निर्माण किस प्रकार करे यह कोई बड़ा गणितीय प्रश्न नहीं है। मुस्लिम समाज केवल यह देख ले कि जब देश के प्रधानमंत्री ने इतनी बड़ी बात कह दी हो तब “चांदनी चौक” और “बिजनौर मदरसे” के बाद इस देश के मुस्लिम सज्जनों, बुद्धिजीवियों, मुस्लिम धनाड्यों, फिल्म कलाकारों, शिक्षाविदों या धार्मिक नेताओं ने अपराधियों के प्रति क्या कोई तीखी आलोचना का वातावरण बनाया है?! क्या एक भी बड़ा मुस्लिम नाम देश में इस बात के साथ सामने आया की चांदनी चौक व बिजनौर हमारी भूल है और इसकी पुनरावृत्ति नहीं होगी?!  

          समय आ गया है कि अब देश का मुस्लिम  समाज मथुरा, काशी, अयोध्या पर अपनी पहल को स्पष्ट करे। वह इन स्थानों को तश्तरी में रखकर भगवान श्रीराम के सम्मुख पेश करे और समन्वय की एक ठोस मिसाल प्रस्तुत करे। भारतीय मुस्लिम यह बात नई पीढ़ी को बताये कि उनके पुरखे बाहरी मुस्लिम आक्रमणकारियों के भयवश धर्मान्तरित होकर हिंदू से मुस्लिम बने हैं। उन्हें आभास होना चाहिए कि जिन मुग़ल आक्रान्ताओं ने हिंदू मंदिरों को तोड़ा था वे उनके आदर्श नहीं है बल्कि इन ध्वस्त धर्म स्थानों को देखकर या श्रीराम को तिरपाल में बैठे देखकर दुखी होने वाला हिंदू उसका अपना भाई है। मोदी जी ने पहल की है तो इस पहल को आधार और नीवं बनाकर देने का कार्य हम देशवासियों का है जो हिंदू मुस्लिम में बंटे हुए हैं। इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक रहे प्रो. राजेंद्र सिंह, रज्जू भैया का एक कथन बड़ा ही सामयिक है – “चाहे महाराजा रणजीत सिंह का राज हो या शिवाजी का, किसी के भी राज में कहीं भी कोई मस्जिद नहीं तोड़ी गई। परंतु इस देश का मुसलमान जो अरबी नहीं, ईरानी-तूरानी नहीं है बल्कि मत परिवर्तन करके मुसलमान बना, यही का मुसलमान है; वह हिंदुस्तान के तीन अति महत्व के श्रद्धा केंद्र हिंदुओं को क्यों नहीं दे सकता? अयोध्या,मथुरा व काशी का मुसलमानों के लिए कोई मतलब नहीं है। जब तक अयोध्या मथुरा और काशी इसी रूप में रहेंगे हिंदू समाज के हृदय में मुसलमानों के प्रति प्रेम का भाव जागृत नहीं हो सकता । हर वर्ष करोड़ों हिंदू दर्शन करने के लिए यहाँ आते हैं, और जब धवस्त मंदिर देखते हैं तो उन्हें ठेस पहुंचती है। इन मंदिरों को छोड़ने के लिए आज भी मुसलमान तैयार नहीं है; क्योंकि आक्रमणकारी मुसलमान थे। भला आक्रमणकारी से आप का क्या रिश्ता है? औरंगजेब और मुगल बादशाहों से आपका क्या रिश्ता है?      

           इस देश के प्रधानमंत्री ने कहा है कि “वोट बैंक की राजनीति में भरोसा रखने वालों ने अल्पसंख्यकों को डर में जीने पर मजबूर किया, हमें इस छल को समाप्त कर सबको साथ लेकर चलना होगा, हमें इस छल में छेद करना होगा तो यह एक एतिहासिक अवसर है, इस अवसर को सिद्ध करना है हम सभी को मिलकर! वंदे मातरम्!!   

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