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    Homeसमाजनमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे ही जीवन का लक्ष्य रहा: राजवन्ती सिंह 

    नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे ही जीवन का लक्ष्य रहा: राजवन्ती सिंह 

    lajwanti singhमां क्या होती है ? इस सवाल को अगर संसदीय प्रणाली के हिसाब से जबाब दिया जाय तो तमाम शहीदों के नाम पर जुमले सुना दिये जायेगें और जब बारी सरकार की आती है तो वह मौन खडे होकर अपनी असमर्थता दिखाने लगते है। पाकिस्तान के सीमांत गांधी उर्फ अब्दुल गफफार खां को भारत रत्न दिया जा सकता है लेकिन भगत सिंह ,राजगुरू व सुखदेव को नही । क्या वह भारत मां के लाल नही थे। जिन नेताओं ने पाकिस्तान बनाया उन्होने भगतसिंह समेत कई शहीदों को पाकिस्तानी बना दिया। क्या यह सही है। भारत की सरकार इस मामले पर खामोश क्यांे है। पहले की सरकारों की बात मै नही करती लेकिन अब तो हिन्दू सरकार में है फिर खामोशी क्यों ? उन्हें भी न्याय मिलना चाहिये जिनके परिवार ने अपना सबकुछ खोया और देश ने उन्हें क्या दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चाहिये उन्हें उनका सम्मान दिखाये, वास्तव में यह वही मां कह सकती है जिसने देश के लिये कुछ किया हो,यह बात आज की जीजाबाई कही जाने वाली राजवन्ती सिंह ने प्रवक्ता डाट काम के सहसंपादक अरूण पाण्डेय से एक बातचीत के दौरान अपने दिल्ली के घेवरा गांव में स्थित निवास पर कही।

    हरियाणा की जमीन पर राजवन्ती का नाम किसी गौरव से कम नही है। उनके पिता ब्रिगेडियर होशियार सिंह का जीवित परमवीर चक्र मिला था। हलाकि यह पुरस्कार मरणोपरांत ही मिलता है लेकिन उन्हें जीवित मिला और वह पहले एैसे बहादुर सिपाही भी रहे। इसके बाद राजवन्ती के दो भाई कर्नल राजेन्द्र सिंह व कर्नल गजेन्द्र सिंह थलसेना में व बलराज सिंह वायुसेना में बडे पद पर कार्यरत है । जिन्होने देश के लिये कई लडाईयां लडी और अब भी संघर्ष कर रहें है। इसके बाद उनके दो बेटे देश के लिये सेना में शामिल है। बडा बेटा प्रदीप सिंह थल सेना में ही कर्नल है और आज कल भिवानी में है। उन्होने देश के दुर्लभ जगहों जैसे लेह , कारगिल , पठानकोट , आसाम, इम्फाल , श्रीनगर व सियाचिन में सेवायें दी। दूसरे बेटे कुलदीप सिंह ने पांच साल तक आर्मी में नौकरी की और उसके बाद उन्हें बीएसएफ में स्थानान्तिरित कर दिया गया। वह सुंदरवती बार्डर कश्मीर में रहे , उसके बाद राजस्थान में बार्डर पर काम किया , त्रिपुरा व आसाम में काम किया और आजकल अगरतला में अपनी सेवायें दे रहें है।

    राजवन्ती सिंह की बात की जाय तो उनका जन्म गुलामी के दौर में हुआ । उन्होने अंग्र्रेजों को साझात देखा , कि वह किस तरह से उनके गांव के लोगों को बंदी बनाकर ले जाते थे। बाद में खबर आती थी कि जिसे बंदी बनाकर ले जा रहे थे वह अब उनके बीच नही रहे। बचपन में शादी हो गयी और थोडा बडी होने के बाद वह ससुराल आ गयी। ससुराल भी देशभक्तों का घराना था। उस समय जो पढे लिखे लोग थे उनमें एक घराना उनका भी था। तभी उन्होने तय कर लिया था कि देश के लिये ही अपना सबकुछ न्यौछावर करना है। पिता की गैरमौजूदगी में भाइयों को सेना में जाने के लिये अपना जीवन समर्पित किया और ससुराल आने के बाद अपने बेटों को अपने से दूर रखा और हास्टल में पढाई इसलिये रखकर करायी कि उनके अंदर परिवार की भावना जो आये उसमें देश प्रधान है इसकी आये। हुआ भी एैसा ही। उनकी तपस्या रंग लायी और दोनों बेटे सेना में अधिकारी बने, इतने बडे कि आम लोग उसकी कल्पना भी न कर पाये।

    वास्तव में देखा जाय तो राजवन्ती सिंह का पूरा जीवन आज वह जीवन के ढलान पर है लेकिन गौरव से भरा है । उन्होने अपने मां होने का गौरव अपने बेटों से हासिल कर लिया और बेटी कैसी होनी चाहिये, बहन कैसी होनी चाहिये , मां कैसी होनी चाहिये । इन तीनों विघाओं में सबको पीछे पछाड दिया है। एक एैसा स्थान प्राप्त किया है जिससे हरियाणा की उन सभी मां को गर्व है जिनके बेटे आज सेना में अपना अमूल्य समय देकर अपनी मां को गौरवान्वित कर रहें है। राजवन्ती सिंह को देश के उन सभी बेटों का ख्याल रहता है जो कि मातृभूमि की रक्षा के लिये लड रहें है। वह राजनीति से घृणा करती है लेकिन राजनेताओं केा इस बात का अहसास जरूर कराना चाहती है कि उन्हें समय रहते देश के इन जवानों के लिये वह सबकुछ करना चाहिये जिससे संख्या कम न हो बल्कि बढती जाय। जवानों के मामले में राजनीति न हो ।

    गांव के परिवेश में अपना जीवन बिताने वाली व अपने परिवार केा देश के शिखर पर पहुंचाने वाली , बेबाक अंग्रेजी बोलने वाली राजवन्ती सिह यह जरूर सरकार से चाहती है कि जिन मां ने अपने बेटों को देश के लिये कुर्बान किया , उन मां को वह बेटा तो नही दे सकती लेकिन उसके अधिकारी सम्मान की निगाह से जरूर देखें । हरियाणा  में तमाम ऐसी मातायें है तो सरकार के रवेये से नाखुश है , उन्हें हर हाल में सम्मान मिले सरकार की यही कोशिश होनी चाहिये। उनके बच्चों व परिवार को भी तत्काल राहत मिलनी चाहिये । जबकि अमूनन एैसा नही होता।

    अपनी बात को विराम देते हुए राजवन्ती ने कहा कि यह पहली बार है कि हम दिल से कह सकते है कि जो प्रधानमंत्री इस बार हमारे देश को मिला है , वह अतुल्नीय है , उसकी सोच अतुल्नीय है और वह जो काम कर रहें है वह देश के पूर्वती सरकारों को करना चाहिये था। जिससे हमारा देश और आगे जाता। लेकिन एैसा हुआ नही , अब ही सही मेरे जीते जी यही एक स्वप्न है जिसे पूरा होते देखना चाहती हूं। यहां यह बता देना उचित होगा कि आगामी 8मार्च को इन्ही राजवन्ती सिंह भारतीय जनता पार्टी के कदावर नेता व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के राष्ट्रीय प्रचारक संजय विनायक जोशी , जिन्द जिले के सफीदों ंमें एक कार्यक्रम के दौरान सम्मानित करेगें। उस दौरान उनका सारा कुनबा उनके साथ होगा।

     

    अरूण पाण्डेय
    अरूण पाण्डेय
    मूलत: इलाहाबाद के रहने वाले श्री अरुण पाण्डेय अपनी पत्रकारिता की शुरुआत ‘दैनिक आज’ अखबार से की उसके बाद ‘यूनाइटेड भारत’, ‘राष्ट्रीय सहारा’, ‘देशबंधु’, ‘दैनिक जागरण’, ‘हरियाणा हरिटेज’ व ‘सच कहूँ’ जैसे तमाम प्रतिष्ठित एवं राष्ट्रीय अखबारों में बतौर संवाददाता व समाचार संपादक काम किया। वर्तमान में प्रवक्ता.कॉम में सम्पादन का कार्य देख रहे हैं।

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