लेखक परिचय

कुमार सुशांत

कुमार सुशांत

भागलपुर, बिहार से शिक्षा-दीक्षा, दिल्ली में MASSCO MEDIA INSTITUTE से जर्नलिज्म, CNEB न्यूज़ चैनल में बतौर पत्रकार करियर की शुरुआत, बाद में चौथी दुनिया (दिल्ली), कैनविज टाइम्स, श्री टाइम्स के उत्तर प्रदेश संस्करण में कार्य का अनुभव हासिल किया। वर्तमान में सिटी टाइम्स (दैनिक) के दिल्ली एडिशन में स्थानीय संपादक हैं और प्रवक्ता.कॉम में सलाहकार-सम्पादक हैं.

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-कुमार सुशांत-
Narendra_Modi

बहुत सारे लोग ये पूछते हैं- ‘अच्छे दिन आएंगे, क्या हुआ, अच्छे दिन तो आए नहीं, महंगाई बढ़ गई, राजग सरकार द्वारा घोषित पहले रेल बजट में कोई राहत भी नहीं मिली’। ठीक है उनका सवाल जायज है। लेकिन सवाल है कि अच्छे दिन का मापदंड क्या हो ? केवल चीजों के दाम को अनायास घटाना ही अच्छे दिन की परिभाषा है ? क्या सब्सिडी देकर राजकोष पर वजन बढ़ाकर राष्ट्र को वित्तीय रूप से खोखला बनाकर राज करना ही अच्छे दिन हैं ? असल में, 2014 जितने राजनीतिक परिवर्तन का गवाह बना, उसकी उपज बने मौजूदा भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कांग्रेस के लंबे शासन से जब जनता ठगा महसूस करने लगी तो इंदिरा गांधी के शासन में देश ने इमरजेंसी देखा। 1977 में देश ने पहले बदलाव को लाकर जनता पार्टी की सरकार बनाई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। लेकिन उसके बाद से एक लंबे अंतराल तक देश नेतृत्व को लेकर असमंजस के हालत में था। सत्ता को यहां हासिल करने के लिए नए-नए मार्केटिंग स्ट्रेटीज बनाए जाने लगे। कभी जनता को लगा कि ये सही है, लेकिन जब परीक्षण की बारी आई तो नेतृत्व फेल। जनता ने कई विकल्पों को तलाशा। चरण सिंह, राजीव गांधी, वीपी सिंह कई विकल्पों को देश ने सिर-आंखों पर बिठाया। लेकिन फिर भी कुछ कमी थी। कांग्रेस व कुछ अन्य शासन में देश को ऐसे ख्वाब भी दिखाए गए जिसे जनता बस अखबारों, टीवी चैनलों व चर्चाओं तक ही सुनकर मन ही मन देश के आगे बढ़ने के सपने संजोती गई, गर्व महसूस करती गई, लेकिन नतीजा सिफर।

नरेंद्र मोदी को स्पष्ट जनादेश मिला। बहुत सारे काम ऐतिहासिक हुए। उन ऐतिहासिक घोषणाओं में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी के सपने को परवान दिया गया जिसमें बुलेट ट्रेन को देश में लाकर क्रांति फैलाने की बात कही गई थी। लेकिन स्व. राजीव गांधी और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणाओं में एक फर्क दिखा कि सपना दोनों ने देखा। लेकिन एक (स्व. राजीव गांधी) का सपना इन्हीं सवालों में उलझकर रह गया कि बुलेट ट्रेन की रफ्तार या हाई स्पीड की खोज भारतीय रेल की कितनी जरूरत है। या फिर ठसाठस भरे लोगों को रेलगाड़ी में बैठने भर के लिये सीट मुहैया कराना भारतीय रेल की पहली जरूरत है। इन सवालों के बीच बुलेट ट्रेन भारत के लिये एक सपना बनकर रह गयी और ठसाठस लदे लोगों को भारत का सच मान लिया गया। फिर इसे सुधारने का सपना किसी ने देखा ही नहीं। वहीं दूसरे (नरेंद्र मोदी) ने इन सपनों को पंख दे दिया और ऐलान कर दिया कि 60 हजार करोड़ की एक बुलेट ट्रेन मुंब्ई-अहमदाबाद के बीच अगले आम चुनाव से पहले यानी 2019 तक जरूर चल जायेगी। और यह तब हो रहा है जब अहमदाबाद से मंबुई तक के बुलेट ट्रेन की डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट 3 बरस पहले ही तैयार हो चुकी है। बता दें कि 19 जुलाई 2011 में फ्रेंच रेल ट्रांसपोर्ट कंपनी ने 634 किलोमीटर की इस यात्रा को दो घंटे में पूरा करने की बात कही थी और डीपीआर में 56 हजार करोड़ का बजट बताया गया था। इसी तर्ज पर दिसबंर 2012 में ही केरल में कसराडोह और थिरुअंनतपुरम के बीच बुलेट ट्रेन की डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट सरकार को सौंपी जा चुकी है। सवाल है कि ऐसा यूपीए सरकार ने क्यों नहीं करवाया, जबकि सबसे खुले बाजार, उपभोक्ताओं को राहत दिलाने, महंगाई पर अंकुश लाने, अर्थव्यवस्था पर काबू पाने, पर तो सबसे ज्यादा कसमें मनमोहन सिंह और उनके नुमाइंदों ने ही खाई होंगी।

जिस बुलेट को चलाने की बात हो रही है, वो क्या अच्छे दिनों में शुमार नहीं होता ? 9 कोच की बुलेट ट्रेन की कीमत है 60 हजार करोड़ और 17 कोच की राजधानी एक्स प्रेस का खर्च है 75 करोड़। यानी एक बुलेट ट्रेन के बजट में 800 राजधानी एक्सप्रेस चल सकती हैं। बुलेट केवल तेज रफ्तार ही नहीं है, बल्कि एक दूरदर्शी प्लान है जिसमें विदेशी निवेश हमारे देश आएंगे, निवेश करेंगे। रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। देश के कई शहरों को मॉडल टाउन बनाया जाएगा। ऐसा हुआ तो भारत में निवेश किस सीमा तक संभव है, इसका अंदाजा अपने आप में सुखद है। लेकिन सवाल है कि एक हजार करोड़ के रेल बजट में सिर्फ बुलेट ट्रेन के लिये बाकि 59 हजार करोड़ रुपये कहां से आयेंगे। पिछली सरकार में रेल मंत्रालय टिकटों को कालाबाजारी करने वाले दलालों से ही छुटकारा नहीं मिल सका कि ट्रेन की व्यवस्था पर ध्यान दिया जाता। ट्रैक ठीक करने और नये रेलवे ट्रैक के जरिये रेलवे को विस्तार देने के लिये बीते तीस साल से सरकारों के पास 20 हजार करोड़ से लेकर 50 हजार करोड़ रुपये कभी नहीं रहे। नतीजा है कि हर दिन 95 लाख लोग बिना सीट मिले ही रेलगाड़ी में सफर करते हैं और वे इसे ही देश का फॉर्मेट मान चुके थे कि ठसाठस भीड़ में, लटक कर अव्यवस्थाओं के बीच धक्के खा-खाकर घर पहुंचो और फिर अगले दिन धक्के खाने के लिए तैयार हो जाए। आज 30 हजार किलोमीटर ट्रैक सुधारने की जरूरत है और 40 हजार किलोमीटर नया रेलवे ट्रैक बीते 10 बरस से ऐलान तले ही दबा हुआ है। आजादी के बाद से ही रेल इन्फ्रास्ट्क्चर को देश के विकास के साथ जोड़ने की दिशा में किसी ने सोचा ही नहीं।

अब अगर देश को बुलेट ट्रेन मिल रही है तो समझिए उसके बदले रेल मंत्री सैकड़ों राजधानी एक्सप्रेस को चलवा कर सहानुभूति समेट लेते तो क्या वो होती असली सरकार ? या कोई दूरदर्शी सोचकर कदम उठा रहा है- वो है असली सरकार। अगर सरकार का सचमुच रेल किराया बढ़ाना ही मकसद होता तो 59 हज़ार करोड़ कहां से आएंगे, और पिछली सरकार से जो सौगात में रेलवे को कई हज़ार करोड़ का घाटा हुआ है, उन सबको जोड़कर किराया सीधे दोगुना कर दिया जाता। दिग्भ्रमित अलापों पर न जाइए, अच्छे दिन आए हैं, धीरज रखिए।

11 Responses to “अच्छे दिन की छाप, दिग्भ्रमित वाला विलाप”

  1. आर. सिंह

    आर. सिंह

    कुमार सुशांत जी, आप युवा हैं. अत्यंत उत्साही भी लग रहे हैं, पर आप कहना क्या चाहते हैं, यह मेरी समझ से परे है.आपने कहा कि बुलेट ट्रेन का सपना राजीव गांधी ने देखा था.अच्छी बात है,वह सपना यू.पी.ए टू तक तो पूरा नहीं हुआ,अब यू.पी.ए. थ्री में उसको पूरा करने का वादा किया जा रहा है. रेल का किराया बढ़ाने का प्रस्ताव भी यू.पी.ए. टू का था, अब यू.पी.ए. थ्री में पूरा किया जा रहा है.
    अब बात आती है बुलेट ट्रेन पर खर्चे की,तो आपने लिखा कि एक बुलेट ट्रेन के पैसे में ८०० राजधानी जैसी प्रतिष्ठित ट्रेने चलाई जा सकती है. इसका मतलब की मोटा मोटी बुलेट ट्रेनमें सफर करने का भाड़ा राजधानी ट्रेन से आठ सौ गुना अधिक होनी चाहिए. अगर ऐसा नहीं होता इसका मतलब यह होगा कि बुलेट ट्रेन के यात्रियों को भाड़े में सब्सिडी दी जाएगी. ये अच्छे दिन तब किसके लिए होंगे?
    पुनश्च : यह एन.डी.ए. शासन अभी तक के कारनामों से तो यू.पी.ए की ही अगली कड़ी लग रही है, अतः इसको मैंने यू.पी.ए. थ्री लिखा है.

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    • कुमार सुशांत

      कुमार सुशांत

      परम आदरणीय व प्रवक्ता परिवार के वरिष्ठ सदस्य आर. सिंह साहब, नमस्कार।
      लेख में मैंने अपनी समझ के अनुसार, वो चीजें समझाने की कोशिश की हैं जो आज ‘अच्छे दिन’ और ‘बुलेट ट्रेन’ जैसे मुद्दों पर जगह-जगह आम परिचर्चाएं होती हैं। आप वरिष्ठ हैं, हमें बहुत कुछ आपसे सीखने को भी मिल सकता है, लेकिन यहां मैं आपकी प्रतिक्रिया के माध्यम से जो समझ पा रहा हूं, वो यह कि आप राजग सरकार के निर्णयों से पहले ही, सकारात्मक परिणाम जाने बिना ही हर देशवासी की उम्मीद के प्रतीक नरेंद्र मोदी पर तुरंत फैसला कर बैठे हैं… या यूं कहें कि पूर्वानुमान कर बैठे हैं। सर, देश के साथ यही बड़ी त्रासदी है कि हम लोकतंत्र और विचारधारा जैसी ढोल को इस सुर के साथ पीटते हैं, जहां अच्छे को अच्छा नहीं कह सकते, बुरे को बुरा नहीं। अपने हित से हर कुछ जोड़कर चलते हैं। सर, उस भीड़ का हिस्सा मैं भी हूं। लेकिन इस मामले पर निष्पक्ष होकर बात करूं तो छोड़ दीजिए कांग्रेस, भाजपा और आप या दूसरा अन्य… क्या इन महान दलों के नेता अपनी सोच और विचारधारा को पार्टी आलाकमान के यहां गिरवी रख देते हैं जिसमें हर विरोधी अपने विरोधी का अच्छे पर अच्छे नहीं कह सकते, उस पर खामियां ढूंढ़ते हैं और हर बुरे पर कभी-कभी अपने स्वार्थ के अनुसार समर्थन देते नज़र आते हैं…
      सर, मैं भी इस विचारधारा से ग्रसित हूं और आप भी… हमें अपनी मानसिकता को अच्छे और बुरे के खांकों पर बिठाना होगा… अपनी सुविधा और नीति के मुताबिक किसी खास को अच्छा और किसी खास को बुरा समझ लेना, खुद को समाज के लिए सुसाइड बॉम्बर बनाने के लायक है…
      बाकी रही बात कि बुलेट ट्रेन के किराए का क्या होगा, मैं अगर इस पर कुछ बताऊंगा तो शायद खुद को मूर्ख बनाऊंगा… मुझसे ज्यादा अनुभवी लोग मंत्रालय में अनुभव के साथ बैठे हैं… वो जब बुलेट ट्रेन ला सकते हैं, पूरे देश में नीति-निर्धारण तय कर सकते हैं तो इसका समाधान भी वही करेंगे… कयास लगाना बेकार है… जहां तक रही सब्सिडी देने की बात तो जाहिर है, बुलेट ट्रेन का किराया इतना तो होगा नहीं कि लोग इस पर चढ़ेंगे ही नहीं। वो चाहे कांग्रेस या आप पार्टी भी होती तो किराए के मुद्दे पर समाधान तो निकालती ही, फिर अगर भाजपा इसका समाधान सब्सिडी के माध्यम से निकालेगी तो बहुत बड़ा अपराध तो होगा नहीं…
      आपका स्नेह बना रहे… इन्हीं कामनाओं के साथ…

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      • आर. सिंह

        आर. सिंह

        सुशांत जी,आपने अपनी प्रतिक्रिया में बहुत कुछ लिखने का प्रयत्न किया है,पर इस गोल मटोल उत्तर से कुछ समाधान नहीं नहीं निकल पा रहा है.मैंने आपका ही आंकड़ा लेकर बुलेट ट्रेन के लिए किराया निश्चित करना चाहा था.हो सकता है की थोड़ा इधर उधर हो,पर उतना किराया तो कोई देगा नहीं ,तो बात फिर सब्सिडी पर आकर रूकती है.बुलेट ट्रेन का किराया अगर सब्सिडी के माध्यम से कम किया जाएगा ,तो इसका बोझ किसपर पडेगा?रही बात विचार धारा की,तो मैं एक इंजीनियर हूँ आंकड़ों के मामले में भावनात्मकता नहीं आने देता.अगर आम जनता की सुविधा को दर किनार करते हुए ख़ास लोगों की सुविधा का ख्याल रखा जाएगा ,तो मेरे जैसे लोग आवाज उठाएंगे ही.अभी सबसे ज्यादा जरूरत है,प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में गुणवत्ता की जिससे हम समाज को शिक्षित बौर अपराध मुक्त बना सके.फिर आवश्यकता है,आम आदमी को बीमारी से मुक्ति दिलाने की ,जिसके लिए सरकारी अस्पतालों और अन्य स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने की ,पर उस सुधार के लिए आवश्यकता है ,भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान की.अभी तक मेरे दृष्टिकोण से ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया है,जिससे पता चले क़ि वर्तमान सरकार इन मामलों को गंभीरता से ले रही है.

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        • कुमार सुशांत

          कुमार सुशांत

          सर, अगर कांग्रेस या आप जैसी पार्टी सब्सिडी की घोषणा कर दे तो कोई नहीं बोलता, भाजपा देगी तो कौन सा बड़ा अपराध होगा ? खैर, मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूं कि जो – जो आप मुद्दे गिनाए हैं, उन मुद्दों पर भी सरकार को ध्यान देना चाहिए। बहुत सारी समस्याओं पर सुधार की जरूरत है। लेकिन सर, यह भी मानिए कि देश को आधुनिकीकरण और सुरक्षित किए जाने की भी जरूरत है। यह भी देखना होगा कि चीन या पाकिस्तान जैसा देश कभी आप पर हमला कर दे, तो आपको उसके लिए भी तैयार रहना होगा। दूसरे देश हमारे यहां और गंभीरता से निवेश करें, ऐसा भी भारत बनाना होगा। कहां से पैदा होंगे रोजगार ? अभी की स्थिति ठीक नहीं है। देश के कई राज्यों में आज भी निवेशक पैसा लगाने को तैयार नहीं हैं… आखिर, कब सुधरेगी हालत। तो सारी समस्याओं का समाधान हो, इस पर भी आवाज़ उठानी है, इसका मतलब यह नहीं कि बुलेट ट्रेन का विरोध शुरू कर दें…

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          • आर. सिंह

            आर. सिंह

            मोदी भक्तों से एक ही निवेदन है कि कभी कभी तो अपने दिमाग का इस्तेमाल करें.बुलेट ट्रेन के निर्णय को सही ठहराने के लिए आपलोग उसमे भी सब्सिडी देने को तैयार हैं.आखिर आपलोगों ने कभी सोचा कि इसका बोझ किस पर पडेगाऔर इस सब्सिडी का लाभ किसे होगा?मैंने जो मुद्दे उठायें हैं ,वे किसी पार्टी या दल के मुद्दे नहीं हैं,बल्कि वे उस आम आदमी के मुद्दे हैं,जो आज भी अशिक्षित है ,बीमार है और भूखा है .पहले उसकी समस्या का हल तो ढूँढिये,फिर चला लीजियेगा बुलेट ट्रेन.रही बात देश की सुरक्षा की ,तो इसमें बुलेट ट्रेन कौन भूमिका निभाएगा?

      • narendrasinh

        sushantji

        r.r.sinh khajur ka ped hai is liye inke bare me sochna galat hai aage bhi kejri ko leke apani kir kiri karva chuke hai ——bade huve to kya huve jaise ped khajur panchi ko chhaya nahi fal lage ati dur—-chinta ki bat nahi ye log desh ke bare me bahot ki kam sochne vale hai —

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        • कुमार सुशांत

          कुमार सुशांत

          आर सिंह साहब,
          किरकिरी किसने कराई है, ये भी सबको पता है, दिल्ली में टुच्चे नेताओं का जो हाल हुआ, लोकसभा में सारे के सारे टांय टांय फिस्स हो गए… उन्हें किसी और ने नहीं पूरी जनता ने नकारा है, तो क्या इसमें उन बेसुर नेताओं की किरकिरी हुई, या उनकी- जो उनके लिए दिन-रात ढोल पीटने का काम करते थे, यह भी विचार करने लायक है…

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          • आर. सिंह

            आर. सिंह

            कुमार शुशांत जी,आखिर आप भी आ गए न वहीँ ,जहां जाकर नमो भक्तों के तर्क की गाडी रूक जाती है.मैंने लिखा है कि मैंने जो मुद्दे उठायें हैं वे आम आदमी की समस्याओं से सम्बंधित हैं,उनको किसी पार्टी विशेष से नहीं बाँधा जा सकता,अतः सबका कर्तव्य है उनका समाधान ढूंढने की. उसका तो समोचित उत्तर आप से बना नहीं,क्योंकि आपलोगों के पास वैसा कोई विजन ही नहीं है.आप जो कह रहे हैं उसे भोजपुरी में ‘गल थेथरई’ कहा जाता है.हिंदी का कुतर्क भी उसका सामान अर्थ वाला शब्द नहीं है.

  2. mahendra gupta

    हर व्यक्ति की जेब भर दी जाये,टैक्स देना न पड़े , सब सुविधाएँ सरकार जुटाए , हर चीज सस्ती से सस्ती मिले ,या मुफ्त मिले ,अगर कोई काम न करना पड़े तो और भी अच्छा हो , है यह है ‘अच्छे दिन’ की व्याख्या , जो इस शब्द से हर व्यक्ति अपेक्षा कर रहा है
    अंदाज लगा लीजिये कि बात बात में इसका जिक्र करने वाले लोगों का मानसिक स्तर क्या है ?

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    • आर. सिंह

      आर. सिंह

      महेंद्र गुप्ता जी,आप ठीक कह रहे हैं.यह हमारी संकीर्ण मानसिकता का द्योतक है,पर यह न भूलिए कि ये सब सपने चुनावी अभियान में तो कम,पर बाबा रामदेव के बाहरी देशों में जमा काले धन के विरुद्ध अभियान में बड़े जोर शोर से दिखाए गए थे.यही तो कहा गया था कि विदेशों में जमा काला धन वापस आने पर कम से कम बीस वर्षों तक न तो कोई टैक्स देना पड़ेगा और न किसी योजना के लिए सरकार को अलग से पूँजी जुटाने की आवश्यकता होगी.

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