नर-सिंह अवतार का व्यावहारिक पक्ष

प्रमोद भार्गव

भारत का आदिकालीन इतिहास दुनिया का प्राचीनतम इतिहास है। उन दिनों इतिहास लेखन की नियमित परंपरा नहीं थी। अतएव जो भी राज्यों के शासक और शूरवीर थे, उनकी गाथाएँ रूपकों और अलंकरणों में गढ़कर सुनाए जाने की लोक-परंपरा अवश्य आरंभ हो गई। इस दृष्टि से विष्णु के नरसिंह अवतार से जुड़ी दो घटनाओं, एक ‘होलिका-दहन‘ और दूसरी ‘नर-सिंह’ के विलक्षण रूप का व्यावहारिक पक्ष कुछ इस तरह संभव है। वराह अवतार में विवरण है कि हिरण्याक्ष नाम का दैत्य, ब्रह्मा सो रहे थे तब पृथ्वी को चुरा ले जाकर समुद्र की तलहटी में कहीं छिप गया था। जिसे विष्णु ने वराह अवतार के रूप में अवतरित होकर मौत के मुंह में धकेला और पृथ्वी को मुक्ति दिलाई। इससे विष्णु की लोक में प्रसिद्धि बढ़ने के साथ उनके अनुयायी भी बढ़ गए।हिरण्याक्ष की मौत की जब हिरण्यकशिपु को सूचना मिली तो वह व्याकुल हो उठा। विरक्ति और अवसाद से हिण्यकशिपु घिर गया। इस मानसिक व्याधि से मुक्ति के लिए कैलाश मानसरोवर की ओर कूच कर गया। देवताओं ने इसे उचित अवसर माना और अपनी बिखरी सांगठनिक शक्तियों को एकजुट कर दैत्य-राज्य पर अचानक हमला बोल दिया। हिरण्यकशिपु की अनुपस्थिति में देवता जीत गए। किंतु इस जीत से उन्मादित होकर देवों ने वही भूलें की जो अकसर दैत्य करते रहे। विजय मद में चूर देव हिरण्यकशिपु की गर्भवती पत्नी कयाधु को बंदी बनाकर ले गए। किंतु देवलोक पहुँचने पर देवताओं के इस कृत्य को ऋषियों ने अनैतिक व युद्ध के नियमों के विपरीत ठहरा दिया और देवों की निंदा की। विष्णु ने भी इस कार्य को घृणित करार दिया। इस निंदा से देवों को अपनी गलती का अनुभव हुआ। फलस्वरूप उन्होंने कयाधु को असुर-राज्य भेजने का निर्णय लिया। लेकिन कयाधु का अपने ही साम्राज्य में प्रत्यागमन असंभव हो गया क्योंकि देवों से हुए इस युद्ध में हिरण्यकशिपु के अनेक निकटतम सभासद् व सेना-नायक हताहत हो चुके थे। स्वयं हिरणकशिपु अज्ञातवास पर थे। गोया, कयाधु को ऋषियों के आश्रम में ऋषि-पत्नियों के संग छोड़ दिया।कयाधु गर्भवती थी। नौ माह पूरे होने पर उसने पुत्र को जन्म दिया। ऋषियों ने इस सद्यजात शिशु का नाम प्रहलाद रखा। जैसे-जैसे प्रहलाद बड़ा हुआ व उसकी समझ व संस्कार ग्रहण करने योग्य उम्र हुई तो उसके बाल-मन पर देव संस्कृति और विष्णु भक्ति का प्रभाव पड़ता चला गया। प्रहलाद को विष्णु-भक्त बनाने के उपाय यत्नपूर्वक भी किए गए क्योंकि आश्रम में रहने वाले ऋषि-मुनि भी हिरण्यकशिपु और असुर संस्कृति के विरोधी थे। कुछ वर्षों पश्चात हिरण्यकशिपु को जब अपने दूतों से देवों के आक्रमण और कयाधु के अपहरण की जानकारी मिली तो उसका आक्रोशित होना स्वाभाविक था। वह इस सूचना के मिलते ही अपने नष्ट-भ्रष्ट कर दिए गए राज्य लौटा। उसने दौड़-धूप करके छिन्न-भिन्न हो गई सैन्य-शक्ति का फिर से पुनर्गठन किया और देव सत्ता से लड़ने के लिए उद्यत हो गया। हालांकि हिरण्यकशिपु के राज्य में लौटने की खबर मिलते ही देवों ने कयाधु और प्रहलाद को सम्मानपूर्वक वापस भेज दिया था लेकिन आहत हिरण्यकशिपु का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ।सैन्य-शक्ति का पुर्नगठन होने के साथ ही हिरण्यकशिपु ने देवलोक पर आक्रमण कर दिया। मद और भोग में डूबे देव पराजित हुए और इंद्रलोक पर हिरण्यकशिपु का अधिकार हो गया। विजयश्री प्राप्त करने के बाद रक्षसराज लौटा नहीं बल्कि देवराज इंद्र के महल में रहकर समस्त देव शक्तियों को अपने नियंत्रण में तो लिया ही, उनपर निर्ममता बरतना भी शुरू कर दिया। देवों ने हिरण्यकशिपु पर आक्रमण तो नहीं किया लेकिन संधि के बहाने हिरण्यकशिपु के इंद्रलोक से विस्थापन का उपाय जरूर कर दिया। क्योंकि वे जानते थे कि दैत्यराज से टकराव नुकसानदेह सिद्ध होगा। गोया, ब्रह्मा के सभापतित्व में ब्रह्म-सभा हुई। सभा में दोनों पक्षों ने समझौते की दृष्टि से अपनी-अपनी शर्तें रखीं। देवों ने हिरण्यकशिपु की शक्ति, श्रेष्ठता और इंद्रलोक पर विजयश्री को स्वीकारा। साथ ही वचन दिया की भविष्य में कोई देव और न ही उनकी मित्र जातियां, जनपद व उपनिवेश, दैत्य साम्राज्य पर आक्रमण नहीं करेंगे। देवों के मित्र मानव, गरूड़ और समुदाय के लोग हिरण्यकशिपु के राज्य और राज्य-भवनों पर दिन हो या रात, अस्त्र या शस्त्र से हमला नहीं बोलेंगे। हाथी या घोड़े पर सवार होकर भी राज्य और राज्य प्रासादों पर आक्रमण नहीं करेंगे। आकाशगमन करते हुए भी आक्रमण नहीं किया जाएगा। देवों द्वारा ब्रह्मा के समक्ष इन वचनों के पालन की सौगंध लेने पर हिरण्यकशिपु ने देवलोक का परित्याग कर दिया।हिरण्यकशिपु के लिए यह निर्णय लेना इसलिए भी जरूरी हो गया था, क्योंकि इस ब्रह्म-सभा की अध्यक्षता वही ब्रह्मा कर रहे थे, जिस ब्रह्मा ने उसे देव-दानव, दिन-रात, आग-पानी, हवा, किसी भी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र और नरभक्षी प्राणी से नहीं मरने का वरदान दिया था। इस वरदान में यह भी शामिल था कि वह न घर के भीतर मरेगा और न बाहर। यह वरदान और कुछ नहीं ब्रह्म-सभा में ब्रह्मा को साक्ष्य मानते हुए देवों द्वारा दी गई वचनबद्धता थी।इस वचनबद्धता के उपरांत देवों की तरफ से निश्चिंत हुआ हिरण्यकशिपु अपने राजकाज और परिवार पर ध्यान केंद्रित करने लग गया। किंतु पुत्र प्रहलाद की विष्णु-भक्ति और देव-संस्कृति के प्रति उसकी आसक्ति देख पिता हिरण्यकशिपु अचंभित रह गया। अपने ही घर में अपने ही संतति से मिल रही चुनौती ने दैत्यराज को मानसिक रूप से परेशान कर दिया। हिरण्यकशिपु समझ गया कि ऋषियों के आश्रम में पलने के दौर में प्रहलाद के अपरिक्व अवचेतन में विष्णु के स्थापित मूल्यों की यह प्रतिच्छाया नियोजित ढंग से प्रक्षेपित की है। हिरण्यकशिपु ने प्रहलाद के मन-मस्तिष्क से इस छाया को मिटाने के कई प्रयत्न किए। उसे धमकाया, राज्योचित सुविधाओं से पृथक कर देने की चेतावनी दी। माँ कयाधु समेत कई लोगों ने उसे समझाया लेकिन प्रहलाद की मनःस्थिति कभी नहीं बदलने वाली नियति बनी रही। तत्पश्चात प्रहलाद को मौत की नींद सुला देने का निर्णय लिया गया। इस हेतु उसके शयन-कक्ष में सर्प छोड़े गए। उसे पर्वत-चोटियों से फेंका गया लेकिन प्रहलाद मरा नहीं। इतने उपायों के बाद भी जब प्रहलाद नहीं मरा तो जन-मानस में यह भाव जागने लगा कि प्रहलाद की अदृश्य रूप में रक्षा श्रीहरि विष्णु कर रहे हैं और वह उनकी अनुकंपा से मृत्युन्जयी हो गया है। मृत्यु के इन प्रयासों ने प्रहलाद के मन में विपरीत असर डाला। परिणामस्वरूप वह देव-संस्कृति का मुखर प्रवक्ता बन गया।एक स्वतंत्र राज्य-सत्ता का अधिपति और पृथक अनार्य संस्कृति का उपासक हिरण्यकशिपु यह कैसे बरदाश्त करता कि उसका अपना खून ही देश की मान्यताओं और मूल्यों पर कुठाराघात करे? गोया, हिरण्यकशिपु की सहनशाीलता जवाब दे गई। अंत में उसने अपनी बहन होलिका पर प्रहलाद को मृत्यु के हवाले कर देने का कठिन दायित्व सौंप दिया। होलिका आग से खेलने में सिद्धहस्त थी। अर्थात वह ऐसे तकनीकी उपाय जानती थी, जिनका प्रयोग कर आग, गर्म तेल व पानी का उसपर कोई असर नहीं होता था। अग्निरोधी वस्त्रों के निर्माण और उन्हें पहनकर आग की लपटों से खेलने और खौलते तेल अथवा पानी में उतर जाने में भी वह दक्ष थी। हालांकि होलिका ने बालक प्रहलाद के साथ इस तरह का धत-कर्म करने में आनाकानी की लेकिन जब शासक हिरणकशिपु ने ऐसा ही करने का आदेश दिया तो होलिका मजबूर हो गई।आखिरकार प्रहलाद उसका भतीजा था। गोया, उसका हृदय हाहाकार कर उठा। उसका मातृत्व जाग उठा। फलस्वरूप उसने जो अग्निरोधक रसायन थे, उनका लेप स्वयं के शरीर पर करने की बजाय अपने सलोने नादान भतीजे के शरीर पर कर दिया। जिस चुनरी को ओढ़कर उसे खौलते तेल में प्रहलाद को लेकर उतरना था, उसे प्रहलाद के अंगवस्त्र बनाकर पहना दिया और स्वयं वैसी ही साधारण चुनरी ओढ़ ली। नतीजतन जब वह तेल के खौलते कहाड़े में प्रहलाद को गोदी में लेकर उतरी तो स्वयं तो जल मरी किंतु प्रहलाद बच गया। बुआ थी, अपने भतीजे को अपने ही हाथों कैसे मार देती?युग-परिवर्तन से पहले जो संक्रमणकाल आता है, उस कालखंड में सर्वस्व न्यौछावर की बानगियां आम हो जाती हैं। होलिका का यह आत्मघाती बालिदानी स्वरूप हमारी लोक-परंपरा में आज भी बदस्तूर है। हम होली के अवसर पर होलिका के दहन के उपरांत उसकी भस्म को भभूत के रूप में सेवन करते हैं। हमारे यहां अग्नि-दहन के अवशेष का पूजन व सेवन त्यागी और तपस्वियों का ही किया जाता है। इस दृष्टि से होलिका पुण्यात्मा है, जिसने आत्मघाती पहल करके, बदलाव के वाहक प्रहलाद को अभयदान दिया।अब इस कथा के अंतिम पड़ाव पर आते हैं। अग्नि-नियंत्रण में दक्ष होलिका की अग्नि से ही हुई मौत और प्रह्लाद के आश्चर्यजनक ढंग से जीवित बच जाने के संदेश से जहां हिरण्यकशिपु का क्रोध चरम पर पहुंच गया, वहीं जनता ने इसे विष्णु-भक्ति का चमत्कार माना। फलस्वरूप अनेक जन-समुदाय प्रहलाद के पक्ष में आकर खड़े हो गए। इसी दौरान जन-समूहों को सूचना मिली कि क्रोध की ज्वाला के वशीभूत हुआ हिरण्यकशिपु, प्रहलाद को मारने के लिए राज-प्रासाद में प्रयत्नशील है। इस संदेश के मिलते ही जनसमूह सभी मर्यादाओं और बाधाओं का उल्लंघन करते हुए महल में प्रवेश कर गए। हिरण्यकशिपु प्रहलाद की इस लोकप्रियता और उससे उपजे जन-विद्रोह से लगभग अनभिज्ञ था। अलबत्ता हिरण्यकशिपु तलवार से जब प्रहलाद की गर्दन धड़ से अलग करने के लिए आगे बढ़ा, वैसे की आक्रोशित और अराजक हुए नरों (मनुष्यों) के सिंहक समूह ने निर्दयी होकर हिरण्यकशिपु पर चारों ओर से हमला बोल दिया। इस प्रकार नरसिंह ने हिरण्यकशिपु को मौत के घाट उतार दिया।

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