विश्व के कंेद्र बिंदु पर नटराज-नृत्य

प्रमोद भार्गव

भगवान शिव का विश्व के केंद्र बिंदु पर तांंडव नृत्य करना ही इस तथ्य का ठोस प्रतीक है कि नटराज-प्रतिमा का संबंध प्रकृति और उसके भूगोल से है। शिव ने यह नृत्य केरल के चिदंबरम् नामक स्थल पर किया था। इस स्थान को विश्व का केंद्र बिंदु माना जाता है। इस क्षेत्र में शिव के पांच मंदिर हैं, जो पंच तत्वों के प्रतीक हैं। यहीं पल्लव व चोल राजाओं द्वारा निर्मित यह विशाल मंदिर है। यह आकाश तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें श्ौव व वैष्णव दोनों ही मतों के देवता प्रतिष्ठित हैं।

शिव के ‘नटराज’ रूप की प्राचीन कथा स्कंद पुराण मिलती है। यह शिव के थिलाई-वन में घूमने और इसी वन में ऋषियों के एक समूह के रहने से जुड़ी है। थिलाई वृक्ष की एक प्रजाति है, जिसका चित्रण मंदिर की प्राचीरांे पर भी है। परिवार सहित रहने वाले ये ऋषि मानते थे कि मंत्रों की शक्ति से देवताओं को वश में किया जा सकता है। एक दिन शिव दिगंबर रूप में आलौकिक सौंदर्य और आभा के साथ इस वन से गुजरे। शिव के इस मोहक रूप से ऋषि पत्नियां मोहित हो उठीं और यज्ञ एवं साधना से विचलित होकर शिव के पीछे दौड़ पड़ीं। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम से साधुगण क्रोधित हो उठे और उन्होंने मंत्रों का आवाहन कर शिव के पीछे विषैले सर्प छोड़ दिए। शिव ने सर्पों को गहना मानकर एक को गले में, एक को शिखा पर और एक को कमर में धारण कर लिया। शिव का यह उपक्रम वन्य जीवों के संरक्षण द्योतक है।

ऋषि और अधिक क्रोधित हुए। उन्होंने मंत्रसिद्धी से एक बाघ उत्पन्न कर शिव के पीछे दौड़ा दिया। शिव ने बाघ को मारकर उसकी चमड़ी उधेड़ी और कमर में वस्त्र के रूप में पहन ली। यह प्राकृतिक रूप से सभ्यता की ओर बढ़ने वाला पहला कदम था। अंत में ऋषियों ने अपनी सभी तांत्रिक शक्तियों का प्रयोग कर एक शक्तिशाली अपस्मरा नामक राक्षस सृजित किया। यह राक्षस अज्ञानता और अभिमान का प्रतीक है। शिव सरल मुस्कान के साथ इसकी पीठ पर चढ़ जाते हैं और नृत्य करने लगते हैं। शाश्वत आनंद का यह नृत्य कुछ और नहीं अहंकार त्यागकर सहज रूप में जीवन जीने का संदेश है, जो ऋषियों के तप-अनुष्ठान से भिन्न मार्ग है। कलात्मक ढंग से जीने का सत्य-चित्त आनंद अर्थात सच्चिदानंद के साथ जीना ही श्रेस्यकर है। इन सब को शिव के वशीभूत देखा ऋषि ईश्वर को ही सत्य मानते हुए शिव के समक्ष समर्पण कर देते हैं।

इस घटना के परिप्रेक्ष्य में ही माना गया कि मानव सभ्यता का विकास मंत्रसिद्धी (जादू) धर्म और विज्ञान के मार्ग से हुआ है। हम जानते हैं कि एक समय भौतिक रूप में पाषण-युग था। सभ्यता के सांस्कृतिक विकास की दृष्टि से यही मंत्रसिद्धी या जादुई (तिलिस्म) युग था। हालांकि मंत्रसिद्धी परोक्ष रूप से प्रकृति की सत्ता के रहस्यों को उद्घाटन करने का उपक्रम भी है। इसीलिए मंत्रों के बूते प्रकृति को नियंत्रित करने के उपाय निरंतर होते रहे हैं। जादुई युग के बाद धर्म के आगमन के साथ समाज में साझा जीवन का आरंभ हुआ। यहीं से सृष्टि और मानव को बड़े परिप्रेक्ष्य में जानने-समझने की शुरूआत हुई। लेकिन कुछ जड़ताएं भी समानांतर पनपीं और चलीं। विज्ञान के आगमन ने अनेक जड़ताओं को तोड़ा और जीवन को सहज व सरल बानाने में अहम् भागीदारी की। बावजूद हम देखते हैं कि चमत्कार और अंधविश्वास भी अपनी जगह बने हुए हंै। क्योंकि विज्ञान सामाजिक चेतना का हिस्सा अभी तक नहीं बन पाया है।

अब नटराज मूर्ति में प्रकृति के रूप को देखते हैं। मूर्ति में शिव की उलझी हुई खुली जटाएं, नेत्रों में आक्रोश और दानव की पीठ पर सधे हुए नृत्य के प्रगटीकरण की मुद्रा को शिव के तांडव नृत्य के रूप में देखा जाता है। परंतु जब इसी मुद्रा को मूर्त रूप दिया जाता है, तब यह नटराज की मुद्रा में नृत्य कहलाता है। भारतीय मूर्तिकला का एक समृद्ध इतिहास रहा है और इस इतिहास की परंपरा में सबसे महत्वपूर्ण नटराज की मूर्ति को ही माना जाता है। नटराज की महिमा भारत से लेकर चीन, जापान और यूरोपीय देशों में भी है। बौद्ध धर्मावलंबियों द्वारा मान्यता दिए जाने से बौद्ध-बहुल देशों में भी मूर्ति का महत्व प्रचलन मंे है।

    नटराज प्रतिमा के वृत्ताकर घेरे में चारों तरफ अलंकृत अग्नि व मछली जैसे चिन्ह प्रस्तुुत हैं। ये निशान पृथ्वी पर जीवन और विनाश को प्रदर्शित करने के प्रतीक हैं। नटराज के ऊपर अद्र्धचंद्र व जटाओं में गंगा, ब्रह्मांड व पृथ्वी की सृजन कथा बयान करते हैं। नटराज के दाहिने हाथ में डमरू अभय मुद्रा का प्रदर्शन है। यह विश्व में घटित होने वाले घटनाचक्रों का भी प्रतीक है। यहां एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य है कि जब शिव नटराज की मुद्रा में होते है, तब उनके हाथ में त्रिशूल नहीं होता है। बाईं भुजा में आधृत अग्नि शिव के रौद्र रूप के साथ, जीवन की आवश्यकता की प्रतीक है। अर्थात र्अिग्न के जीवन से जुड़े महत्व को प्रगट करती है।

आमतौर से नटराज की मूर्ति को एक बालक पर खड़े होकर नृत्य करते दिखाया गया है, यह बालक के रूप में अपस्मरा नामक दानव का वध है। दरअसल, शिव की खुली जटाएं, नेत्रों से झलकता आवेग, बालक की पीठ पर सधे हुए एक पैर से नृत्य का संयोजन और स्थिर मुद्रा भाव, वैसे तो तांडव नृत्य है, लेकिन जब इसी मुद्रा को मूर्त रूप दिया जाता है तो ये कहलाते हैं, नटराज ! नटराज का शाब्दिक अर्थ है, ‘नृत्य करते देवता’ या ‘देवता का नृत्य’। पत्थर पर उत्कीर्ण ये कलाकृतियां प्राचीनतम रूप में अजंता और एलोरा की गुफाओं में मिलती है। धातु और लकड़ी की भी ये मूर्तियां बनाई जाती हैं।

    मूर्ति के इस स्वरूप वर्णन से स्पष्ट होता है कि शिव की यह नटराज प्रतिमा एक तरह से प्रकृति का अव्यक्त रूप भी है। अर्थात अव्यक्त  प्रकृति से महत्तत्व और महत्तत्व से अहंकार उत्पन्न होता है। इस अहंकार तत्व के अधिष्ठाता शिव है। अवतारवाद की सभी कथाओं में विष्णु के नाभि-कमल से ब्रह्मा तथा ब्रह्मा के क्रोध से रुद्र अर्थात शिव की उत्पत्ति का वर्णन है। त्रिदेवों के इस प्रादुर्भाव के क्रम में विष्णु प्रथम, ब्रह्मा द्वितीय और महेश यानी शिव तृतीय स्थान पर अपने-अपने जन्म की वरिष्ठता के अनुसार हैं। अतएव त्रिदेववाद की कल्पना में ब्रह्मा सृष्टि की रचना, विष्णु सृष्टि के पालन और शिव संहार अर्थात प्रलय करने करने वाले देवता माने गए हैं।

प्रमोद भार्गव

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