लेखक परिचय

सुरेश चिपलूनकर

सुरेश चिपलूनकर

लेखक चर्चित ब्‍लॉगर एवं सुप्रसिद्ध राष्‍ट्रवादी लेखक हैं।

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-सुरेश चिपलूनकर

प्रधानमंत्री जी ने कश्मीर मुद्दे पर सभी दलों की जो बैठक बुलाई थी, उसमें उन्होंने एक बड़ी गम्भीर और व्यापक बहस छेड़ने वाली बात कह दी कि “यदि सभी दल चाहें तो कश्मीर को स्वायत्तता दी जा सकती है…”, लेकिन आश्चर्य की बात है कि भाजपा को छोड़कर किसी भी दल ने इस बयान पर आपत्ति दर्ज करना तो दूर स्पष्टीकरण माँगना भी उचित नहीं समझा। प्रधानमंत्री द्वारा ऑफ़र की गई “स्वायत्तता” का क्या मतलब है? क्या प्रधानमंत्री या कांग्रेस खुद भी इस बारे में स्पष्ट है? या ऐसे ही हवा में कुछ बयान उछाल दिया? कांग्रेस वाले स्वायत्तता किसे देंगे? उन लोगों को जो बरसों से भारतीय टुकड़ों पर पल रहे हैं फ़िर भी अमरनाथ में यात्रियों की सुविधा के लिये अस्थाई रुप से ज़मीन का एक टुकड़ा देने में उन्हें खतरा नज़र आने लगता है और विरोध में सड़कों पर आ जाते हैं… या स्वायत्तता उन्हें देंगे जो सरेआम भारत का तिरंगा जला रहे हैं, 15 अगस्त को “काला दिवस” मना रहे हैं? किस स्वायत्तता की बात हो रही है मनमोहन जी, थोड़ा हमें भी तो बतायें।

इतने गम्भीर मुद्दे पर राष्ट्रीय मीडिया, अखबारों और चैनलों की ठण्डी प्रतिक्रिया और शून्य कवरेज भी आश्चर्य पैदा करने वाला है। प्रधानमंत्री के इस बयान के बावजूद, मीडिया क्या दिखा रहा है? 1) शाहरुख खान ने KKR के लिये पाकिस्तानी खिलाड़ी को खरीदा और पाकिस्तान के खिलाड़ियों का समर्थन किया… 2) राहुल गाँधी की लोकप्रियता में भारी उछाल…, 3) पीपली लाइव की लॉंचिंग… आदि-आदि-आदि। आप कहेंगे कि मीडिया तो बार-बार कश्मीर की हिंसा की खबरें दिखा रहा है… जी हाँ ज़रूर दिखा रहा है, लेकिन हेडलाइन, बाइलाइन, टिकर और स्क्रीन में नीचे चलने वाले स्क्रोल में अधिकतर आपको “कश्मीर में गुस्सा…”, “कश्मीर का युवा आक्रोशित…”, “कश्मीर में सुरक्षा बलों पर आक्रोशित युवाओं की पत्थरबाजी…” जैसी खबरें दिखाई देंगी। सवाल उठता है कि क्या मीडिया और चैनलों में राष्ट्रबोध नाम की चीज़ एकदम खत्म हो गई है? या ये किसी के इशारे पर इस प्रकार की हेडलाइनें दिखाते हैं?

कश्मीर में गुस्सा, आक्रोश? किस बात पर आक्रोश? और किस पर गुस्सा? भारत की सरकार पर? लेकिन भारत सरकार (यानी प्रकारान्तर से करोड़ों टैक्स भरने वाले) तो इन कश्मीरियों को 60 साल से पाल-पोस रहे हैं, फ़िर किस बात का आक्रोश? भारत की सरकार के कई कानून वहाँ चलते नहीं, कुछ को वे मानते नहीं, उनका झण्डा अलग है, उनका संविधान अलग है, भारत का नागरिक वहाँ ज़मीन खरीद नहीं सकता, धारा 370 के तहत विशेषाधिकार मिला हुआ है, हिन्दुओं (कश्मीरी पण्डितों) को बाकायदा “धार्मिक सफ़ाये” के तहत कश्मीर से बाहर किया जा चुका है… फ़िर किस बात का गुस्सा है भई? कहीं यह हरामखोरी की चर्बी तो नहीं? लगता तो यही है। वरना क्या कारण है कि 14-15 साल के लड़के से लेकर यासीन मलिक, गिलानी और अब्दुल गनी लोन जैसे बुज़ुर्ग भी भारत सरकार से, जब देखो तब खफ़ा रहते हैं।

जबकि दूसरी तरफ़ देखें तो भारत के नागरिक, हिन्दू संगठन, तमाम टैक्स देने वाले और भारत को अखण्ड देखने की चाह रखने वाले देशप्रेमी… जिनको असल में गुस्सा आना चाहिये, आक्रोशित होना चाहिये, नाराज़ी जताना चाहिये… वे नपुंसक की तरह चुपचाप बैठे हैं और “स्वायत्तता” का राग सुन रहे हैं? कोई भी उठकर ये सवाल नहीं करता कि कश्मीर के पत्थरबाजों को पालने, यासीन मलिक जैसे देशद्रोहियों को दिल्ली लाकर पाँच सितारा होटलों में रुकवाने और भाषण करवाने के लिये हम टैक्स क्यों दें? किसी राजदीप या बरखा दत्त ने कभी किसी कश्मीरी पण्डित का इंटरव्यू लिया कि उसमें कितना आक्रोश है? लाखों हिन्दू लूटे गये, बलात्कार किये गये, उनके मन्दिर तोड़े गये, क्योंकि गिलानी के पाकिस्तानी आका ऐसा चाहते थे, तो जिन्हें गुस्सा आया होगा कभी उन्हें किसी चैनल पर दिखाया? नहीं दिखाया, क्यों? क्या आक्रोशित होने और गुस्सा होने का हक सिर्फ़ कश्मीर के हुल्लड़बाजों को ही है, राष्ट्रवादियों को नहीं?

लेकिन जैसे ही “राष्ट्रवाद” की बात की जाती है, मीडिया को हुड़हुड़ी का बुखार आ जाता है, राष्ट्रवाद की बात करना, हिन्दू हितों की बात करना तो मानो वर्जित ही है… किसी टीवी एंकर की औकात नहीं है कि वह कश्मीरी पण्डितों की दुर्गति और नारकीय परिस्थितियों पर कोई कार्यक्रम बनाये और उसे हेडलाइन बनाकर जोर-शोर से प्रचारित कर सके, कोई चैनल देश को यह नहीं बताता कि आज तक कश्मीर के लिये भारत सरकार ने कितना-कुछ किया है, क्योंकि उनके मालिकों को “पोलिटिकली करेक्ट” रहना है, उन्हें कांग्रेस को नाराज़ नहीं करना है… स्वाभाविक सी बात है कि तब जनता पूछेगी कि इतना पैसा खर्च करने के बावजूद कश्मीर में बेरोज़गारी क्यों है? पिछले 60 साल से कश्मीर में किसकी हुकूमत चल रही थी? दिल्ली में बैठे सूरमा, खरबों रुपये खर्च करने बावजूद कश्मीर में शान्ति क्यों नहीं ला सके? ऐसे असुविधाजनक सवालों से “सेकुलरिज़्म” बचना चाहता है, इसलिये हमें समझाया जा रहा है कि “कश्मीरी युवाओं में आक्रोश और गुस्सा” है।

इधर अपने देश में गद्दार किस्म का मीडिया है, प्रस्तुत चित्र में देखिये “नवभारत टाइम्स अखबार” फ़ोटो के कैप्शन में लिखता है “कश्मीरी मुसलमान महिला” और “भारतीय पुलिसवाला”, क्या मतलब है इसका? क्या नवभारत टाइम्स इशारा करना चाहता है कि कश्मीर भारत से अलग हो चुका है और भारतीय पुलिस(?) कश्मीरी मुस्लिमों पर अत्याचार कर रही है? यही तो पाकिस्तानी और अलगाववादी कश्मीरी भी कहते हैं… मजे की बात तो यह कि यही मीडिया संस्थान “अमन की आशा” टाइप के आलतू-फ़ालतू कार्यक्रम भी आयोजित कर लेते हैं। जबकि उधर पाकिस्तान में उच्च स्तर पर सभी के सभी लोग कश्मीर को भारत से अलग करने में जी-जान से जुटे हैं, इसका सबूत यह है कि हाल ही में जब संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान किं मून ने कश्मीर के सन्दर्भ में अपना विवादास्पद बयान पढ़ा था (बाद में उन्होंने कहा कि यह उनका मूल बयान नहीं है)… असल में बान के बयान का मजमून बदलने वाला व्यक्ति संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान का प्रवक्ता फ़रहान हक है, जिसने मूल बयान में हेराफ़ेरी करके उसमें “कश्मीर” जोड़ दिया। फ़रहान हक ने तो अपने देश के प्रति देशभक्ति दिखाई, लेकिन भारत के तथाकथित सेकुलरिज़्म के पैरोकार क्यों अपना मुँह सिले बैठे रहते हैं? जमाने भर में दाऊद इब्राहीम का पता लेकर घूमते रहते हैं… दाऊद यहाँ है, दाऊद वहाँ है, दाऊद ने आज खाना खाया, दाऊद ने आज पानी पिया… अरे भाई, देश की जनता को इससे क्या मतलब? देश की जनता तो तब खुश होगी, जब सरकार “रॉ” जैसी संस्था के आदमियों की मदद से दाऊद को पाकिस्तान में घुसकर निपटा दें… और फ़िर मीडिया भारत की सरकार का अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर गुणगान करे… यह तो मीडिया और सरकार से बनेगा नहीं… इसलिये “अमन की आशा” का राग अलापते हैं…।

दिल्ली और विभिन्न राज्यों में एक “अल्पसंख्यक आयोग” और “मानवाधिकार आयोग” नाम के दो “बिजूके” बैठे हैं, लेकिन इनकी निगाह में कश्मीरी हिन्दुओं का कोई मानवाधिकार नहीं है, गलियों से आकर पत्थर मारने वाले, गोलियाँ चलाने वालों से सहानुभूति है, लेकिन अपने घर-परिवार से दूर रहकर 24 घण्टे अपनी ड्यूटी निभाने वाले सैनिक के लिये कोई मानवाधिकार नहीं? मार-मारकर भगाये गये कश्मीरी पण्डित इनकी निगाह में “अल्पसंख्यक” नहीं हैं, क्योंकि “अल्पसंख्यक” की परिभाषा भी तो इन्हीं कांग्रेसियों द्वारा गढ़ी गई है। मनमोहन सिंह जी को यह कहना तो याद रहता है कि “देश के संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों का है…”, लेकिन कश्मीरी पंडितों के दर्द और लाखों अमरनाथ यात्रियों के वाजिब हक के मुद्दे पर उनके मुँह में दही जम जाता है। वाकई में गाँधीवादियों, सेकुलरों और मीडिया ने मिलकर एकदम “बधियाकरण” ही कर डाला है देश का देशहित से जुड़े किसी मुद्दे पर कोई सार्थक बहस नहीं, भारत के हितों से जुड़े मुद्दों पर देश का पक्ष लेने की बजाय, या तो विदेशी ताकतों का गुणगान या फ़िर देशविरोधी ताकतों के प्रति सहानुभूति पैदा करना… आखिर कितना गिरेगा हमारा मीडिया?

अब जबकि खरबों रुपये खर्च करने के बावजूद कश्मीर की स्थिति 20 साल पहले जैसी ही है, तो समय आ गया है कि हमें गिलानी-यासीन जैसों से दो-टूक बात करनी चाहिये कि आखिर किस प्रकार की आज़ादी चाहते हैं वे? कैसी स्वायत्तता चाहिये उन्हें? क्या स्वायत्तता का मतलब यही है कि भारत उन लोगों को अपने आर्थिक संसाधनों से पाले-पोसे, वहाँ बिजली परियोजनाएं लगाये, बाँध बनाये… यहाँ तक कि डल झील की सफ़ाई भी केन्द्र सरकार करवाये? उनसे पूछना चाहिये कि 60 साल में भारत सरकार ने जो खरबों रुपया दिया, उसका क्या हुआ? उसके बदले में पत्थरबाजों और उनके आकाओं ने भारत को एक पैसा भी लौटाया? क्या वे सिर्फ़ फ़ोकट का खाना ही जानते हैं, चुकाना नहीं?

गलती पूरी तरह से उनकी भी नहीं है, नेहरु ने अपनी गलतियों से जिस कश्मीर को हमारी छाती पर बोझ बना दिया था, उसे ढोने में सभी सरकारें लगी हुई हैं… जो वर्ग विशेष को खुश करने के चक्कर में कश्मीरियों की परवाह करती रहती हैं। ये जो बार-बार मीडियाई भाण्ड, कश्मीरियों का गुस्सा, युवाओं का आक्रोश जैसी बात कर रहे हैं, यह आक्रोश और गुस्सा सिर्फ़ “पाकिस्तानी” भावना रखने वालों के दिल में ही है, बाकियों के दिल में नहीं, और यह लोग मशीनगनों से गोलियों की बौछार खाने की औकात ही रखते हैं जो कि उन्हें दिखाई भी जानी चाहिये…, उलटे यहाँ तो सेना पूरी तरह से हटाने की बात हो रही है। अलगाववादियों से सहानुभूति रखने वाला देशभक्त हो ही नहीं सकता, उन्हें जो भी सहानुभूति मिलेगी वह विदेश से…। चीन ने जैसे थ्येन-आनमन चौक में विद्रोह को कुचलकर रख दिया था… अब तो वैसा ही करना पड़ेगा। कश्मीर को 5 साल के लिये पूरी तरह सेना के हवाले करो, अलगाववादी नेताओं को गिरफ़्तार करके जेल में सड़ाओ या उड़ाओ, धारा 370 खत्म करके जम्मू से हिन्दुओं को कश्मीर में बसाना शुरु करो और उधर का जनसंख्या सन्तुलन बदलो…विभिन्न प्रचार माध्यमों से मूर्ख कश्मीरी उग्रवादी नेताओं और “भटके हुए नौजवानों”(?) को समझाओ कि भारत के बिना उनकी औकात दो कौड़ी की भी नहीं है… क्योंकि यदि वे पाकिस्तान में जा मिले तो नर्क मिलेगा और उनकी बदकिस्मती से “आज़ाद कश्मीर”(?) बन भी गया तो अमेरिका वहाँ किसी न किसी बहाने कदम जमायेगा…, अन्तर्राष्ट्रीय बिरादरी की परवाह मत करो… पाकिस्तान जब भी कश्मीर राग अलापे, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर का मुद्दा जोरशोर से उठाओ…ऐसे कई-कई कदम हैं, जो तभी उठ पायेंगे, जब मीडिया सरकार का साथ दे और “अमन की आशा” जैसी नॉस्टैल्जिक उलटबाँसियां न करे…।

लेकिन अमेरिका क्या कहेगा, पाकिस्तान क्या सोचेगा, संयुक्त राष्ट्र क्या करेगा, चीन से सम्बन्ध खराब तो नहीं होंगे जैसी “मूर्खतापूर्ण और डरपोक सोचों” की वजह से ही हमने इस देश और कश्मीर का ये हाल कर रखा है… कांग्रेस आज कश्मीर को स्वायत्तता देगी, कल असम को, परसों पश्चिम बंगाल को, फ़िर मणिपुर और केरल को…? इज़राइल तो बहुत दूर है… हमारे पड़ोस में श्रीलंका जैसे छोटे से देश ने तमिल आंदोलन को कुचलकर दिखा दिया कि यदि नेताओं में “रीढ़ की हड्डी” मजबूत हो, जनता में देशभक्ति का जज़्बा हो और मीडिया सकारात्मक रुप से देशहित में सोचे तो बहुत कुछ किया जा सकता है…

36 Responses to “राष्ट्रीय मीडिया में “देशद्रोही” भरे पड़े हैं… सन्दर्भ – कश्मीर स्वायत्तता प्रस्ताव”

  1. Kaitlin Goshay

    56. Hey very cool blog!! Man .. Excellent .. Amazing .. I’ll bookmark your blog and take the feeds also…I am happy to find numerous useful information here in the post, we need work out more strategies in this regard, thanks for sharing. . . . . .

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  2. निरंकुश आवाज़

    आदरणीय सम्पादक जी,
    नमस्कार।

    यह बात ठीक है कि श्री सुरेश चिपलूनकर जी प्रवक्ता के प्रिय एवं सम्मानित लेखक हैं और दीपा शर्मा प्रवक्ता पर विवादास्पद लेखिका हैं। पाठकों के अनुसार उनकी पहचान भी संदिग्ध है। इसके उपरान्त भी असंसदीय एवं धमकीभरी भाषा का प्रयोग करने की किसी पाठक को इजाजत देना, किसी भी दृष्टि से न तो सम्पादकीय धर्म है और न हीं न्याय संगत। कृपया पाठक श्री अजीत भोसले की 10.10.2010० की टिप्पणी का अवलोकन करें :-

    “……………….सुरेश जी के विचारों को आइन्दा ज़हार्खुरानी मत कहना वरना अंजाम ठीक नहीं होगा.”

    शुभाकांक्षी
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

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  3. Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

    !! प्रवक्ता.कॉम के पाठकों से पाठकों से विनम्र अपील !!

    आदरणीय सम्पादक जी,

    आपके माध्यम से प्रवक्ता.कॉम के सभी पाठकों से विनम्रतापूर्वक अनुरोध/अपील करना चाहता हूँ कि-

    1- इस मंच पर हम में से अनेक मित्र अपनी टिप्पणियों में कटु, अप्रिय, व्यक्तिगत आक्षेपकारी और चुभने वाली भाषा का उपयोग करके, एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं।

    2- केवल इतना ही नहीं, बल्कि हम में से कुछ ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सम्पादक की नीयत पर भी सन्देह किया है। लेकिन जैसा कि मैंने पूर्व में भी लिखा है, फिर से दौहरा रहा हूँ कि प्रवक्ता. कॉम पर, स्वयं सम्पादक के विपरीत भी टिप्पणियाँ प्रकाशित हो रही हैं, जबकि अन्य अनेक पोर्टल पर ऐसा कम ही होता है। जो सम्पादक की नीयत पर सन्देह करने वालों के लिये करार जवाब है।

    3- सम्पादक जी ने बीच में हस्तक्षेप भी किया है, लेकिन अब ऐसा लगने लगा है कि हम में से कुछ मित्र चर्चा के इस प्रतिष्ठित मंच को खाप पंचायतों जैसा बनाने का प्रयास कर रहे हैं। मैं उनके नाम लेकर मामले को बढाना/तूल नहीं देना चाहता, क्योंकि पहले से ही बहुत कुछ मामला बढाया जा चुका है। हर आलेख पर गैर-जरूरी टिप्पणियाँ करना शौभा नहीं देता है।

    4- कितना अच्छा हो कि हम आदरणीय डॉ. प्रो. मधुसूदन जी, श्री आर सिंह जी, श्री श्रीराम जिवारी जी आदि की भांति सारगर्भित और शालीन टिप्पणियाँ करें, और व्यक्तिगत टिप्पणी करने से बचें, इससे कुछ भी हासिल नहीं हो सकता। कम से कम हम लेखन से जुडे लोगों का उद्देश्य तो पूरा नहीं हो सकता है। हमें इस बात को समझना होगा कि कोई हमसे सहमत या असहमत हो सकता है, यह उसका अपना मौलिक अधिकार है।

    5- समाज एवं व्यवस्था पर उठाये गये सवालों में सच्चाई प्रतीत नहीं हो या सवाल पूर्वाग्रह से उठाये गये प्रतीत हों तो भी हम संयमित भाषा में जवाब दे सकते हैं। मंच की मर्यादा एवं पत्रकारिता की गरिमा को बनाये रखने के लिये एकदम से लठ्ठमार भाषा का उपयोग करने से बचें तो ठीक रहेगा।

    6- मैं माननीय सम्पादक जी के विश्वास पर इस टिप्पणी को उन सभी लेखों पर डाल रहा हूँ, जहाँ पर मेरी जानकारी के अनुसार असंयमित भाषा का उपयोग हो रहा है। आशा है, इसे प्रदर्शित किया जायेगा।

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  4. suresh

    Lekhak ko bahut bahut badhai or jinhe isme kuchh apatti ho we pl. idhar udhar ki baten na karke kewal lekh me uthai gaye muddon ka satik utter den to zyada behtar hoga. wese desh me gaddar itne zyad ho gaye hen ki sahi baat per sahi log pratikriya nahin dete or ye badi tadad me samne nikalkar muddon ko bhatkane ki koshish me lag jaate hen.
    suresh

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  5. sunil patel

    धन्यवाद सुरेश जी.

    सरकार ने कभी भी काश्मीर समस्या को गम्भीरता से नही लिया बल्कि हमेशा राजनॆतिक फ़ायदे के लिये उपयोग किया. काश्मीर का साजिश पूरी दुनिया जानती है.

    स्वायत्त्यात्ता हास्यापद प्रश्न है. हर राज्य अलग रास्ट्र की मांग करेगा.
    सामान्य नियम है – कुते का बच्चा भोकता है, बिल्ली क बच्चा म्याउ बोलता है, मेरा बच्चा हिन्दी बोलता है, अन्य बच्चे वही भाषा बोलेगे जो उनके माता पिता बोलेगे क्योकि वे जन्म से यही देखते सुनते आ रहे है. अगर प्रथक काश्मीर की मांग होती है तो कोइ अचरज नही है क्योंकी सरकार ने खुद हालात बनाए है.
    अगर राजनेतिक इच्छाशक्ति हो तो कुछ भी असम्भव नही. हमें पजाब आतन्कवाद नही भूलना चाहिय जिसे पूर्ण समाप्त कर दिया गया है. वोह भी कुछ समय में. जरूरत है ठोस कदम उठाने की.

    जरूरत है पकिस्तान से पूरी तरह से सम्बन्ध समाप्त करने कि क्योंकी पाकिस्तान ही समस्या की जड है. क्यो हम पुराने प्रेमी की तरह उससे मिलने की आस लगा कर अपना घर बर्बाद कर रहे है.

    रही बात हमारी सरकार की तो दोषी तो खुद हम है क्योंकि सरकार तो हम खुद चुनते है. आज सरकार कैसे चल रही है, कौन चला रहा है, लगाम किसकी है, नकेल कौन कास रहा है किसी से छिपा नहीं है.

    भगवान् सरकार और नेताओं को सध्बुधि दे.
    जय हिंद.

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  6. दीपा शर्मा

    deepa sharma

    महोदय/ महोदया(?)
    चर्चित(?) और सुप्रसिद्ध(?) राष्ट्रवादी (?) लेखक/ लेखिका(?) चिपलूनकर जी
    (या आप जो भी हैं)………..
    आपके द्वारा मुझे लेखन की एक नयी शैली मिली है जिसका आभार में व्यक्त करती हूँ आपने मुझे रहा (रही) की जो नयी और अद्भुत शैली दी है उसका में एक बार फिर ह्रदय से आभार व्यक्त का रही हूँ
    आपके लेखो का यदि शुरू से अवलोकन किया जाये तो पता चल जाता है की किस प्रकार आप लोग धीरे धीरे ज़ेहर्खुरानी करते हैं,
    महोदय,
    देश todne का काम करना बंद करो , विदेशियों का क्या करे जब यहाँ अपने ही इस काम में लग गए हैं , कई लेकख हैं यहाँ आपके जेसे, जो सिर्फ आपकी ही तरह likhkar khoob प्रशंसा और वफादारी ? कर रहें हैं
    दीपा शर्मा देहरादून

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    • Vinay Dewan

      महोदया, एक बात तो है आप मैं अंदर तक ईर्ष्या भरी है . आपके इतने ज्यादा नेगेटिव कमेंट्स हैं की यह प्रतीत होता है की आप पेड टिप्पणीकार है.

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      • दीपा शर्मा

        Deepa sharma

        Mahoday. Ye koe nae baat nahe ki aapne. 2 mahene se apke lekakh mahoday yahe gungan kar rahe hain. Mene wahe bhasha likhi he jo inke dwara purv me istemal ki gae he. Agar ye rashtrvadita he to pareshani kya he. Apke suprisdh blogger aur rashtrvadi lekakh bhi to yahee karte aa rahe hain

        Reply
        • Vinay Dewan

          आप जिस प्रकार की भाषा का उपयोग कर रही हैं वह किसी पाकिस्तानी नेट यूजर की तरह दिखती है.
          मैं ११० प्रतिशत दावे के साथ कह सकता हूँ, मैंने याहू पर कॉमन चाट रूम मैं उनको इस प्रकार की भाषा लिखते देखा है.

          जैसे – koi —- koe
          maine —– mene
          wahi —- wahe
          Nahi —- Nahe
          Main —- Me

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        • AJIT BHOSLE

          दीपा जी (या आप जो भी हैं) पहले तो ढंग से हिंदी लिखना सीख ले, तुम्हारे जैसी बुद्धी वालों से बात करना भी मै समझता हूँ सुरेश जी का अपमान होगा, सुरेश जी के विचारों को आइन्दा ज़हार्खुरानी मत कहना वरना अंजाम ठीक नहीं होगा .

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    • Pandit Sachin

      jehar ka asar samajh aa jayega ek bar “azad kashmir” ja k dekh. aur haan desh jodne walo k jo camp wahan chal rahe haen, unko kuch upkrit kar. ja dehradun bharat hae pak nahee…..

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  7. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    kashmeer ki smasya pr hm 63 varsh se aise hi apne hi bhai bandhuon ko kosh rahe hain . yh aalekh na to pahla hai or na hi antim .or bhi bhut se badbole kalamveer hain ;kashmeer men pahle to bache khuche panditon ko hadkakar marva diya ab kashmeer ke bahaane saare desh men saamprdaayikta ki jwala bhadkane ko utawlapn dikha rahe hain . aap bade shoorma hain to jaaiye na whan jahan manavta ke hatyare khoon ki holi khel rahe hain .yahan pravakta .com pr gussa kisko dikhya ja raha hai .
    sbko sb maaloom hai kashmeer men kya ho raha hai ;paakistan kya kar raha hai? kendr ki vartmaan or poorv bhajpaa sarkaar koi doodh ka dhula nahin . pahle to raja harisingh ne hi dhoka diya tha .wad men pt nehru sardar patel ek doosre par jimmedari dholte rahe .ab unki vartmaan peedhee wahi itihas duhara rahi hai .
    ab snkhya bal ka bhi sahara nahin hai kyon ki udhar bhi bom hai idhar bhi bom .ab to ek hi rasta hai ki kchh paana hai to kuchh khona padega shayad mananeey p .m. ki yahi mazboori rahi .hogi.iseeliye unhone swaayttata ki baat ki hai .

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    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

      श्री तिवारी जी नमस्कार।आप कहते हैं।—–
      aap bade shoorma hain to jaaiye na whan jahan manavta ke hatyare khoon ki holi khel rahe hain .yahan pravakta .com pr gussa kisko dikhya ja raha hai .
      क्या, निम्न तथ्यों पर सोचने का अनुरोध कर सकता हूं?
      (१) सुरक्षा का दायित्व क्या किसी संदेश वाहक का होता है? एक डाकिया आपको कोई दूरका संदेश ला कर देता है, तो क्या आप उसे ही कहेंगे? कि जा बे “कुत्ते बिल्लीको मार”।
      हर घटकको अपना अपना हिस्सा निर्वाह करना होता है। उसीमें एक लेखक भी होता है। समाचार भी होता है।
      आपके इसी तर्क का विस्तार करें, तो आपको भी पूछा जा सकता है, कि आपने इस विषयमें कुछ किया क्या? आप भी तो उसी नियमके अंतर्गत आते हैं।और टिप्पणी भी तो आप फिर क्यों कर रहे हैं?
      तिवारी जी- (२) सुरक्षाका दायित्व तो सबसे पहले,(क)राज्य और राष्ट्रके शासनका होता है, जिसकी आज्ञापर दंड (पुलिस) व्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था (सेनाएं) क्रियान्वयित होती है।

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      • आदिवासी विचारक

        डॉ. मधुसूदन जी,
        आपके तर्क, कुतर्क नहीं हैं।

        सवाल यह है कि राष्ट्रवादी लेखक का तमगा हासिल करके लिखने वाले लेखक श्री सुरेश चिपलूनकर जी को कश्मीरी पण्डितों का दुःख दिखता है, इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन क्या इन्होंने लेखक धर्म का निर्वाह करते हुए आदिवासियों के साथ हो रहे अत्याचार, अन्याय और शोषण के खिलाफ भी कुछ लिखने का प्रयास किया है?

        क्या श्री सुरेश चिपलूनकर जी को ठाकरे कम्पनी का अत्याचार एवं देशद्रोही कार्यों का खजाना कभी लिखने को प्रेरित करता है?

        यदि आपको जानकारी हो तो अवगत करायें, जिससे हमें भी श्री सुरेश चिपलूनकर जी को राष्ट्रवादी लेखक कहने में फक्र का अनुभव हो।

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        • Vinay Dewan

          आप भी अपने आप को आदिवासी विचारक कह रहे हैं…ये शुभ काम आपके हांथों से भी हो सकता है…कृपया दूसरों को क्या लिखना चाहिए और नहीं इस सलाह से ज्यादा जरूरी है की आप खुद पहल करें….कमेन्ट से ज्यादा परिवर्तन लेख लिखने से आएगा. आप भी तथ्यात्मक लेख लिख सकते हैं.

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          • aam aadmi

            deewan ji
            aapne aadiwasi vichark ke kisi bhi prasna ka jawab nahi diya. ulta unpar iljam laga diya . yadi aisa hi karana hai to aap apne khud likhkar khud hi padh liya kare. ya phir prashno ka jawab diya kare ulta prashn na kare.

          • Vinay Dewan

            जी श्रीमान आम आदमी… पहले तो आप अपने नाम को बदले, एस देश का आम आदमी २० रूपये प्रतिदिन मैं अपना गुजर बसर करता है , आपकी २०० रूपये प्रतिदिन से ऊपर आमदनी होनी चाहिए, तभी आप ब्लौगिंग कर सकते हैं.

            या फिर २०० रूपये प्रतिदिन आप इन्टरनेट पर मजदूरी करते हैं. मेरा मतलब है, आजकल एक विचारधारा के लोगो को गलत साबित करने की मजदूरी का काम भी इन्टरनेट पर फलफूल रहा है.

            मेरे ख्याल से आप इन्टरनेट वाले आम आदमी हैं. चलिए आपके गुजर बसर की व्यवस्था तो हो गयी.

        • डॉ. मधुसूदन

          डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

          आदिवासी विचारक जी। (मेरे उत्तर)
          पहले २ बिंदू ध्यानमें ले।
          (१) किस विषयका चुनाव करना यह लेखक का अपना स्वातंत्र्य है।
          (२) यह लेखककी जानकारी पर भी निर्भर करता है।
          (जिस विषयकी मुझे कुछ भी जानकारी नहीं,
          उसपर मैं टिप्पणी भी नहीं करता।हां, प्रश्न पूछ सकता हूं)
          जानकारी मुझे या तो पढकर प्राप्त हो, या प्रत्यक्ष अनुभव से।
          दूसरे व्यक्तिगत चुनाव की निम्न सीमाएं ध्यानमें ले।
          (क) मैं यदि, इंजियर हूं, तो आप मुझसे यह
          पूछ सकते हैं, कि मैं इंजिनियर क्यों बना?
          (ख) आप यह पूछे कि मैं क्यों नेता, अभिनेता,
          गायक, कार चालक, गणितज्ञ, इत्यादि इत्यादि ना बना?–
          -ऐसे तो सैंकडो व्यवसाय है, जो मैं ने चुने नहीं है।
          तो उसका उत्तर देते देते ही सारा समय लग जाएगा।
          (ग) अर्थात्‌:आप भी जीवनमें जो चुनाव करते हैं,
          उसका समर्थन अपेक्षित होता है।
          जैसे आप आदिवासी विचारक है, तो मैं पूछ सकता हूं,
          कि आप आदिवासी विचारक क्यों बने? मैं आपको जो
          आपने नहीं चुना वह क्यों नहीं (सामान्यतः) चुना?
          यह नहीं पूछ सकता।क्यों कि वैसे विषय तो अन-गिनत हैं।
          इसके कुछ अपवाद ज़रूर है।
          आज कुछ समय की मर्यादा है। कल यदि
          प्रश्न हो तो उत्तर देने का प्रयास करूंगा।
          अंतमें, वैसेही तो सुरेश जी ने भी, नहीं चुने वैसे
          राष्ट्रीय विषय क्या एक दो थोडेही है?
          फिर भी आप उनसे पूछ सकते हैं। उनके उत्तर
          मेरे उत्तरों से भी अधिक अर्थ और अधिकार रखते हैं।
          चुनाव आप नहीं कर सकते, वैसे तो चिपलूनकर जी चुनाव करेंगे।
          उनको आप बिनती कर सकते हैं, कि आप के चुने
          हुए विषय पर भी लिखे।
          मैं राष्ट्रीय को, समस्त जानकारी से नहीं पर, एक मानसिकता से जोडता हूं।

          Reply
          • Vinay Dewan

            मधुसूदन जी, सादर प्रणाम, आप की बिंदु आधारित सवालों का जवाब देने की क्षमता अद्भुत है, आपके लेख इस देश के आनेवाली कई पीढ़ियों का मार्गदर्शन करेंगे.

          • shishir chandra

            मधुसुदन जी आप ने तो क्या लाजवाब जवाब दिया है? ऐसी उच्सृन्ख्लता को बहुत ही अच्छा जवाब मिला. ये आदिवासी विचारक महोदय सोचते हैं कि कोई भी लेखक इनकी विचारों का गुलाम होगा, जिसे उँगलियों पर नचा सकेंगे. क्यों सुरेश किसी विषय पर जबरदस्ती लेख लिखेंगे? गोया लेखक नहीं बंधुआ मजदूर हो. ये महोदय सिर्फ उनसे विनती कर सकते हैं. लेकिन इन्होने पहले ही मान लिया है कि सुरेश जी आदिवासी विरोधी हैं. फिर इनका लिखना उन्हें पसंद आएगा? मैं दावे से कह सकता हूँ सुरेश जी वनवासियों से जुड़े हुए मुद्दे परे गहन पकड़ रखते हैं, और समय आने पर इस विषय पर भी अपने विचार रखेंगे. लेकिन श्रीमान आदिवासी महोदय के कहने पर बिलकुल नहीं

  8. neelesh

    respected sir,

    ther are very few people like you who daringly speak the truth the people of india require your kind of journalism as we can see today generation who have completly forgetton history of Kasmiri pandits and our secular Media which always talk about Gujurat riots but never ever speak of kasmiri pandit massacre and how hindu were thrown out of kashmir. our so called Literate people falls prey to this media beliving all what ther are showing. the only hope for india now Swami Ramdev ji who save the nation through his Bharath Swabhiman Mission. vande mataram

    Reply
  9. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

    सुरेशजी किन शब्दोंमें आपको धन्यवाद दें ?
    मिडीया वास्तवमें बिका हुआ है। इस लिए मिडीया राष्ट्र विरोधी है। और शासन बिना रीढका वोट बॅंक का गुलाम है। भारतको कल पछताना पडेगा।

    मिडीया की मालिकी देखनेसे पता चलता है।

    समाचार माध्यम के मालिक कौन हैं?
    NDTV :====>Gospels of Charity स्पैनकी साम्यवाद का पुरस्कार करने वाली संस्था।
    India Today==> BJP का पुरस्कार करता था, अब इसको ==>NDTV ने खरिद लिया है, तबसे हिंदु विरोधी हो चुका है।
    CNN-IBN:=====> १०० % फंडिंग Southern Baptist Church करता है।
    टाईम्स गुट की सूचिमें :==> Times Of India,=> Mid-Day,=> Nav-Bharth Times,=> Stardust ,=> Femina,
    =>Vijaya Times,=> Vijaya Karnataka,=> Times now (24- hour news channel) और बहुत सारे अन्य माध्यम है।इसके मालिक ====>World Christian Council इसकी ८० % फ़ंडिंग करती है।
    Star TV:====>एक ऑस्ट्रेलियन चलाता है, जिसका फंडींग St. Peters Pontificial Church, Melbourne से आता है।
    The Hindu:===>१२५ सालसे चला हुआ, अंग्रेजी दैनिक Joshua Society, Berne, Switzerland.के स्वामित्व में है। N रामकी पत्नीभी स्विस देशकी नागरिक है।
    Indian Express: :दो गुटोंने बांटा हुआ है।The Indian Express और The New Indian Express (दक्षिण की आवृत्ति): ACTS Christian Ministriesबडा हिस्सा कंट्रोल करते हैं।
    आंध्र ज्योति:===> मुस्लिम पार्टी ऑफ हैदराबाद ने इसे खरिदा है।
    The Statesman:====>कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया कंट्रोल करती है।
    Kairali TV:====>कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया(मार्क्सिस्ट) कंट्रोल करती है।
    मातृभूमि ====>मुस्लिम लिग और कम्य़ुनिस्ट लिडर के निवेशसे चला है।
    .Asian Age and Deccan Chronicle:====> यह दोनो सौदी अरेबियन कंपनी की मालिकी में है, जिसके संपादक हैं, M J अकबर।
    संक्षेपमें भारतका सारा मिडिया परदेसी इसाई संस्थाएं, मुस्लिम, सौदी, स्विस, और कम्य़ुनिस्ट मार्क्सिस्ट, इत्यादि कंट्रोल करते हैं।
    २००५ या २००६ में ३९९ मिलियन डॉलर NGO ने अमरिकासे भेजे थे। (अभीका आंकडा पता नहीं) अब सोचिए इतना धन भारतको खोखला करनेमें ही लगा हुआ है।

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    • Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

      आदरणीय डॉ. प्रो. श्री मधुसूदन जी,
      आपने महत्वपर्ण जानकारी प्रदान की है। कृपया इसका स्रोत भी बतला दें, जिससे कहीं उल्लेख करते समय दृढता कायम रहे।

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        • Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

          आरदणीय आपकी ओर से जो लिंक दिया गया है, उसमें आपके द्वारा दी गयी जानकारी अंग्रेजी में हैं, इसके अलावा कुछ भी प्राधिकृत नहीं है। मैं ऐसा कोई आधार चाह रहा था जो अपने आप में कानूनी सबूत हो या किसी निष्पक्ष स्रोत से प्राप्त आंकडे हों! हो सके तो उपलब्ध करायें। अन्यथा जितनी जानकारी प्रदान की है, उसके लिये धन्यवाद स्वीकार करें।

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          • डॉ. मधुसूदन

            डॉ. प्रो. मधुसूदन उवाच

            आदरणीय मीणा जी– यदि ऐसा बना बनाया डेटा होता, तो आप को, मुझे और अन्य बंधुओं को यह काम क्यों करना पडता?
            वैसे एक विधि है, कि हरेक समाचार पत्र का भी वेब साईट होता है। जिस पर जाने पर कुछ और इंगित होता रहता है। हमारे कुछ कार्यकर्ता ओं ने काम भी किया है। कुछ ठोस सामग्री एक सारणी के रूपमें बन सकती है।
            एक प्रश्न तो फिर भी उठ सकता हैं। कि प्राधिकरण किसने किया है?
            आप तो जानते ही होंगे, प्रक्रिया प्रारंभ ऐसे ही होती है। आज कुछ समय था, तो कुछ ठीक उत्तर दे पाया।
            अलग अलग वेब साइट पर जाकर यदि कोई इस कामको कर सके, तो यह बन जायगा। आप अपने स्वतंत्र विचारसे लिखते रहे, जन तंत्र को सफल बनाते रहिए।

          • Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

            आदरणीय डॉ. मधुसूदन जी,

            जानकारी एवं मार्गदर्शन के लिये एक बार फिर से आपका आभार।

            मुझे लगता है कि इस चर्चा से हम एक महत्वपूर्ण मोड/चरण पर आ गये हैं।

            इस स्तर पर मेरा विनम्र सुझाव या निवेदन है कि हम सूचना अधिकार पर कुछ काम कर रहे हैं। आपके पास भी समर्पित लोगों की टीम हो सकती है।

            यदि हम इस अधिकार के तहत प्रत्येक समाचार-पत्र के सम्बन्ध में, समाचार-पत्र के स्वामी/स्वामियों की ओर से दाखिल घोषणा-पत्र की प्रमाणित प्रतिलिपियाँ आरएनआई कार्यालय से प्राप्त करना चाहें तो आधिकारिक रूप से हमें प्राधिकृत जानकारी आसानी से मिल सकती है।

            यदि आप स्वयं या आपका कोई परिचित नयी दिल्ली में आर के पुरम (जहाँ आरएनआई कार्यालय स्थित है) के आसपास रहता हो तो आप इस विषय में आसानी से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

            मैं तो जयपुर में रहता हँू, फिर भी मेरी ओर से भी इस बारे में प्रयास प्रारम्भ करूँगा।

            शुभकामनाओं सहित।

  10. shishir chandra

    chiplunkar ji most appreciating thought! i congrates you for your article. now Kashmir in just burden for India. only your ideas can help India on Kashmir. this is the time to give reply the stone pelters by bullet. there is no option. the secular parties must be scrapped else india will face and still facing severe consequences. I think this country is now irrelevent for most of indians. there is no self respect in this country not only in media but also our political fabric.

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  11. Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

    हमेशा की तरह शानदार अभिव्यक्ति। काश इस बात को समझने में कोई पार्टी सक्षम होती? केवल काँग्रेस ही क्यों, छह वर्ष तक एनडीए की सरकार भी देश में रही है। इसके अलावा भी अनेक गठबन्धन सराकारें भी रही हैं, लेकिन किसी ने भी उन बातों पर ध्यान नहीं दिया, जिनकी ओर श्री चिपलूनकर जी खुलकर ध्यान दिला रहे हैं। क्या श्री चिपलूनकर जी से पहले कोई भी लेखक ऐसी बातें करने वाला नहीं था?

    Reply
  12. jai kumar jha

    भाई चिपलूनकर जी ये सब मिडिया के नाम को बेचकर अपनी तिजौरी भरने वाले हैं ,असल मिडिया तो ब्लॉग है इस पर आप जैसे सच्चे सोच वाले लोग लिखते हैं ,लेकिन अफ़सोस की इस ब्लॉग मिडिया की पहुँच अभी गांवों तक नहीं हुयी है ,कुछ लोग इसे मोबाईल के जरिये लोगों तक पहुंचा रहे हैं ,हम सबको भी असल सोच को जन-जन तक पहुँचाना होगा क्या करें साधन और संसाधन भी गद्दारों के पास है |

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