लेखक परिचय

डॉ. सुभाष राय

डॉ. सुभाष राय

जन्म जनवरी 1957 में उत्तर प्रदेश में स्थित मऊ नाथ भंजन जनपद के गांव बड़ागांव में। शिक्षा काशी, प्रयाग और आगरा में। आगरा विश्वविद्यालय के ख्यातिप्राप्त संस्थान के. एम. आई. से हिंदी साहित्य और भाषा में स्रातकोत्तर की उपाधि। उत्तर भारत के प्रख्यात संत कवि दादू दयाल की कविताओं के मर्म पर शोध के लिए डाक्टरेट की उपाधि। कविता, कहानी, व्यंग्य और आलोचना में निरंतर सक्रियता। देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं, वर्तमान साहित्य, अभिनव कदम,अभिनव प्रसंगवश, लोकगंगा, आजकल, मधुमती, समन्वय, वसुधा, शोध-दिशा में रचनाओं का प्रकाशन। ई-पत्रिका अनुभूति, रचनाकार, कृत्या और सृजनगाथा में कविताएं। अंजोरिया वेब पत्रिका पर भोजपुरी में रचनाएं। फिलहाल पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय।

Posted On by &filed under राजनीति.


-डा सुभाष राय

आजादी एक और साल बूढ़ी हो गयी। होना तो यह चाहिए था कि समय के साथ देश की सत्ता संभालने वाले और ज्यादा परिपक्व होते, जनता की समस्याएं कम होती, हम एक विशाल देश की तरह साहस और संकल्प के साथ खड़े दिखायी देते, पर दुर्भाग्य से इतने सालों बाद भी ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। आगे बढ़कर समस्याओं से निपटने का संकल्प देश ने खोया है, देश के भीतर या बाहर अपने दुश्मनों के साथ सख्त और कठोर रुख अपनाने का साहस घटा है, भ्रष्टाचार की बढ़ियायी नदी ने लगभग समूचे देश को अपने भीतर आकंठ डुबो दिया है, अपराधियों ने राजनेताओं की शरणागति छोड़कर राजनीति में खुद के पांव अंगद की तरह जमा लिये हैं। फिर भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कहते हैं कि देश ने निरंतर विकास किया है, हमारा दुनिया में सम्मान बढ़ा है, विश्व बिरादरी में भारत की आवाज ज्यादा महत्वपूर्ण होकर उभरी है तो यह कम आश्चर्य की बात नहीं है। सारी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान भारत में सुनियोजित ढंग से आतंकवाद फैला रहा है, भारत ने अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, चीन समेत दुनिया भर के देशों को बार-बार बताया, पाकिस्तान से सैकड़ों बार कहा कि वह सीमापार आतंकवाद की हरकतें बंद करे पर क्या हुआ, किसने सुना भारत की यह आवाज? अरुणाचल प्रदेश, लद्दाख और तिब्बत को लेकर चीन के हठधर्मी रवैये के बारे में भारत की आवाज क्यों बीजिंग के नक्कारखाने में गुम हो गयी? कई सालों से संयुक्त राष्ट्र की स्थायी सीट के लिए भारत ने अपना सारा जोर लगा दिया, अक्सर जो विदेशी मेहमान दिल्ली आते हैं, उनको कहते हुए सुना जाता है कि भारत इसका हकदार है, पर क्यों नहीं मिल पाया यह सम्मान?
आजादी की वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भाषण में पुनरावृत्ति तो है, पिछले भाषणों की बातें दुहरायी तो गयी हैं लेकिन किसी भी मोर्चे पर साहसिक पहल का संकेत लगभग अनुपस्थित है, भारत जैसे विशाल देश के भीतर जो संकल्प होना चाहिए, वह भी उनके स्वर में कहीं परिलक्षित नहीं हुआ और देश को आगे ले जाने का कोई बड़ा सपना भी दिखायी नहीं पड़ा। बल्कि कई मामलों पर वे सरकार की नीतियों से उत्पन्न जटिलताओं का जवाब देते दिखायी पड़े, अपना और अपनी सरकार का बचाव करते नजर आये। कांग्रेस की सरकार केंन्द्र में फिर से सत्तासीन होने के बाद आम आदमी की तकलीफें बहुत बढ़ीं हैं। सभी जानते हैं कि महंगाई और मूल्य-वृद्धि की चक्की में किस तरह आम आदमी पिस रहा है। जीवन के लिए जरूरी चीजों मसलन मोटा अनाज, दाल, सब्जी, तेल और कपड़े की कीमतों में जिस गति से इजाफा हुआ है, उसने लोगों को भयानक मुश्किलों में डाल दिया है। पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाकर सरकार ने सब्सिडी का बोझ कम करने को जो प्रयास किया, उसका खामियाजा गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को भुगतना पड़ रहा है। इस मामले पर सरकार के मंत्रियों ने जिस तरह गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजियां की, वह जले पर नमक छिड़कने जैसा ही था। प्रधानमंत्री के पास इसका क्या समाधान है? उन्होंने सिर्फ अपनी मजबूरियां जतायीं और महंगाई की मार से पीड़ित लोगों के प्रति दया और सहानुभूति का प्रदर्शन किया। प्रधानमंत्री को यह शोभा नहीं देता।
पिछले दिनों खुले में रखे सरकारी अनाज के विशाल भंडारों के सड़ने की बात उठी थी। जिस देश में लाखों लोगों को भर पेट भोजन नसीब नहीं हो रहा हो, सैकड़ों लोग भूख से मर रहे हों, जिस देश का बहुसंख्य किसान कड़ी मेहनत के बाद भी अपने परिवार का पेट पालने में कठिनाई का अनुभव कर रहा हो, उस देश का प्रधानमंत्री कहे कि कृषि क्षेत्र में आशातीत प्रगति हुई है पर अभी इसे चार प्रतिशत की विकास दर तक ले जाने का लक्ष्य पूरा करना बाकी है, तो इस शेखचिल्लीपन पर मुग्ध हुआ जाय या हंसा जाय, समझ में नहीं आता। दरअसल संगठित फार्मिंग में लगे कुछ प्रतिशत लोगों की प्रगति को हम समूचे किसान की प्रगति मानकर अपने को भ्रम में रखने के अलावा कुछ और नहीं करेंगे। उन लाखों लोगों के भाग्य के बारे में चिंतन की आवश्यकता है, जो खेतों में मजदूर की तरह काम करते हैं और दयनीय जिंदगी जीते हैं, उन लोगों की बात की जानी चाहिए, जिनके पास खेत के छोटे टुकड़े हैं और जो अपनी फसल के लिए महाजन और बादल के आसरे हैं। इस सरकार के पास उन लोगों की मुक्ति के लिए क्या योजनाएं हैं? प्रधानमंत्री ने इस बारे में कोई चर्चा नहीं की। कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए आधुनिक तौर-तरीके इस्तेमाल करने या दक्षिण एशिया का नार्मन बोरलाग संस्थान भारत में स्थापित होने से उन गरीबों के भाग्य में क्या परिवर्तन होने वाला है?
हाल में नक्सल समस्या की ओर पूरे देश का ध्यान गया है। दांतेवाड़ा में बड़ी तादात में जवानों के क्रूर संहार के बाद नक्सल हिंसा पर देश भर में बहस छिड़ गयी है। कश्मीर में भी लगातार नाकाम होते चले आ रहे अलगाववादी तत्व सरकार और सुरक्षा बलों के खिलाफ आम जनता को भड़काकर सड़क पर उतारने और उन्हें उपद्रवी मानसिकता में ढालने में कामयाब हो गये हैं। अभी कुछ ही समय पहले एक लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर उनके सुरक्षा घेरे के भीतर से ही जूते चलने की नौबत आ गयी है। एक प्रगतिशील और समझदार युवा नेता अचानक जनता की नजर में खलनायक बन गया है। यह सब अचानक नहीं हुआ। अरसे से इस तरह की परिस्थिति बनाने के ताने-बाने बुने जा रहे थे, अलगाववादी तत्वों को पाकिस्तान की भी परोक्ष मदद हासिल थी। पर समय से हमारे हुक्मरान इस साजिश को पहचान नहीं पाये। अब परिस्थिति काबू से बाहर हो गयी है। इन दोनों मसलों पर प्रधानमंत्री से किसी साहसिक पहल की उम्मीद थी पर उन्होंने वही पुराना राग अलापा। सभी लोग बार-बार सुनते आ रहे हैं कि किसी भी समस्या का समाधान बातचीत से ही हो सकता है। हम कश्मीर के उन सभी गुटों से बातचीत के लिए तैयार हैं, जो हिंसा में यकीन नहीं रखते। नक्सलवादियों को भी हथियार डालकर मुख्य धारा में आना चाहिए, बात करनी चाहिए और सरकार के साथ मिलकर विकास की प्रक्रिया में हाथ बंटाना चाहिए। मनमोहन सिंह जी, यह कौन सी नयी बात है, यह अपील तो सालों से की जा रही है पर इसका कोई परिणाम नहीं दिखायी पड़ता। सत्ता में बहुत ताकत होती है, कानून का मखौल उड़ाने वालों को, निर्दोष लोगों की हत्याएं करने वालों को उसका कोई डर नहीं रह गया हो तो इसका दोष किस पर जाना चाहिए। हिंसा से निपटने की चुनौती के आगे सरकार क्यों लाचार है? नक्सली हिंसा हम क्यों नहीं रोक पा रहे? कश्मीर में साजिश करने वाले हाथों में हथकड़ियां हम क्यों नहीं डाल पाते? इतनी जड़ता और उदासीनता कोई सकारात्मक परिणाम आखिर कैसे दे सकेगी?
अपने लंबे भाषण में प्रधानमंत्री ने शिक्षा और सूचना के अधिकार मुहैया कराने, गरीबों, अल्पसंख्यकों, महिलाओँ और बच्चों के लिए सरकार द्वारा प्रयास किये जाने, स्वास्थ्य और शिक्षा पर विशेष ध्यान दिये जाने और आर्थिक विकास की गति और तेज करने के लिए सड़क, बंदरगाह और हवाई अड्डों के विस्तार की भी बात की। अपनी चमकती अर्थव्यवस्था का बखान किया, नदी, जंगल और पहाड़ के प्रति सबसे संवेदनशील होने का आग्रह किया और लंबे समय से उपेक्षित आदिवासियों के कल्याण के लिए योजनाएं बनाने की बात कही। ये बातें कोई नयी नहीं हैं, बार-बार ऐसी अच्छी, मीठी बातें हमारे शासक करते रहे हैं। कुछ अच्छी योजनाएं बनती भी हैं तो नेता, अफसर और ठेकेदारों की तिकड़ी उनके धन को बीच में ही निगल जाती है। भ्रष्टाचार की पतितसलिला बाकी बचा-खुचा अपने भीतर समा लेने को मुंह बाये खड़ी दिखती है। ऐसे में केवल भाषणों से आगे जाने की जरूरत है, सख्त पहल की आवश्यकता है। केवल बातों से बात बनने वाली नहीं है। ये सब अगर सिर्फ बातें हैं तो इन बातों का क्या?

5 Responses to “मनमोहनी बातें हैं, बातों का क्या”

  1. मदन मोहन शर्मा ‘अरविन्द’

    Madan Mohan Arvind

    एक दम सही बात. पता नहीं देशवासी कब तक सोये रहेंगे और ये बडबोले नेता देश को खाते रहेंगे.

    Reply
  2. deepak.mystical

    दीपक डुडेजा

    इतने बड़े देश को चलने के लिए माननिये मनमोहन सिंह जी की प्रधानमंत्री बनाने के लिए एकमात्र योग्यता ये है की वो सीधे है और सोनिया के कृपापात्र है . अत: इनको प्रधानमंत्री का पद पुरूस्कार स्वरुप दिया गया है. इस मामले में ज्यादा क्या सोचना.

    Reply
  3. Anil Sehgal

    मनमोहन जी को न तो राज करना आता है और न ही राज करने की कोई इच्छा ही बची है.
    निकम्मा.
    सब राम भरोसे.

    Reply
  4. सुमित कर्ण

    सुमित कर्ण

    काश ये लेख प्रधानमंत्री साहब पढ़ पाते..

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *