लेखक परिचय

प्रतिमा शुक्ला

प्रतिमा शुक्ला

मूलत: लखनऊ से हूं। पत्रकारिता जगत में कार्यरत हूं। कविताएं, जनसरोकार के विषयों पर महिला और बाल कल्याण पर स्वतंत्र लेखन कार्य पिछले कई वर्षों से कर रही हूं। वर्तमान कार्यक्षेत्र नई दिल्ली हैं।

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छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में एक, सुमित्रानंदन पंत का साहित्य को योगदान अविस्मरणीय है। आपका जन्म 20 मई 1900 को अल्मोड़ा जिले के कौसानी ग्राम में हुआ। आप स्वीकार करते हैं कि जन्म-भूमि के नैसर्गिक सौन्दर्य नें ही आपके भीतर के कवि को बाहर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। यही कारण है कि छायावाद की वृहत्रयी में सम्मिलित रह आपनें हिन्दी कविता को इतने सुन्दर प्रकृति चित्र प्रदान किये हैं कि आपको हिन्दी का ‘वर्डवर्थ’ कहा जाता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर के अलावा शैली, कीट्स, टेनिसन आदि अंग्रेजी कवियों की कृतियों नें भी आपको प्रभावित किया है।

sumitran_pantसंघर्षपूर्ण जीवन की परिणति होता है एक भावुक मन और शायद इसी तरह अंजान कविता बही आती है। जन्म के केवल छ घंटे बाद ही आपकी माता का देहावसान हो गया। आप सात भाई-बहने में सबसे छोटे थे तथा आपका नाम गुसाई दत्त रखा गया था आपको यह नाम प्रिय नहीं था अत आपने बाद में अपना नाम सुमित्रानंदन पंत रख लिया। आपका आरंभिक लालन-पालन आपकी दादी नें किया। 1918 में आप काशी आ गये तथा क्वींस कॉलेज में अध्ययन करने लगे। 1921 में गाँधी जी के असहयोग आंदोलन के आह्वाहन पर आपने कॉलेज छोड़दिया और घर पर रह कर ही हिन्दी, संस्कृत, बंगला और अंग्रेजी का अध्ययन करने लगे। सन 1926-27 में आपकी पहली पुस्तक ‘पल्लव’ नाम से प्रकाशित हुई।

कुछ समय पश्चात आप अपने भाई देवीदत्त के साथ अल्मोडा आ गये और इसी दौरान वे मार्क्स व फ्रायड तथा उनकी विचारधारा के प्रभाव में आये। 1938 में आपनें ‘रूपाभ” नामक प्रगतिशील मासिक पत्र निकाला। शमशेर, रघुपति सहाय आदि के सान्निध्य में आप प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुडे रहे। आप 1955 से 1962 तक आकाशवाणी से जुडे रहे व मुख्य-प्रोड्यूसर के पद पर कार्य किया। आपकी विचारधारा योगी अरविन्द से प्रभावित भी हुई जो बाद की आपकी रचनाओं में दृष्टिगोचर होता है। 28 दिसंबर 1977 को आपका देहावसान हिन्दी जगत को साहित्य को अपूर्णीय क्षति था।

“युगांत” की रचनाओं के लेखन तक आप प्रगतिशील विचारधारा से जुडते प्रतीत होते हैं। “युगांत” से “ग्राम्या” तक आपकी काव्ययात्रा निस्संदेह प्रगतिवाद के निश्चित व प्रखरस्वरोंकी उदघोषणा करती है।

सुनता हूँ, मैंने भी देखा,
काले बादल में रहती चाँदी की रेखा!

काले बादल जाति द्वेष के,
काले बादल विश्‍व क्‍लेश के,
काले बादल उठते पथ पर
नव स्‍वतंत्रता के प्रवेश के!

आपका संपूर्ण कृतीत्व हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि है। आपकी महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं दृ वीणा, ग्रंथी, पल्लव, गुंजन, युगांत, युगवाणी, ग्राम्या, स्वर्ण किरण, उत्तरा, कला और बूढा चाँद, चिदंबरा तथा लोकायतन। काव्य के अलावा आपनें आलोचना, कहानी, आत्मकथा आदि गद्य विधाओं में भी रचनायें कीं। आपको पद्मभूषण(1961), ज्ञानपीठ(1968), साहित्य अकादमी , सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार जैसे सम्मानों से अलंकृत किया गया है। आधी शताब्दी से भी लम्बे आपके रचना-कर्म में आधुनिक हिन्दी कविता का एक पूरा युग समाया हुआ है।
आज आपकी पुण्यतिथि पर आपको कोटि नमन।

 

One Response to “प्रकृति एवं सौन्दर्य के रमणीय चित्रण में माहिर सुमित्रानंदन पंत”

  1. आर.सिंह

    कविवर सुमित्रानंदन पंत की ये पंक्तियाँ बरबस याद आ जाती हैं,
    “छोड़ द्रुमों की शीतल छाया,
    तोड़ प्रकृति से भी माया,
    बाले तेरे बाल जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन?”
    उन्होंने इसे निभाया भी बखूबी. जीवन भर अविवाहित रहे.पल्लव से ग्राम्या तक की लम्बी यात्रा में उनके कवि जीवन का पूर्ण इतिहास छिपा हुआ है.डाक्टर हरिवंश राय बच्चन और सुमित्रा नंदन पंत बहुत अच्छे मित्र थे.उन्होंने एक पुस्तक भी साथ साथ लिखी थी,.खादी के फूल. महाकवि को शत शत नमन

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