लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

Posted On by &filed under राजनीति.


डॉ. मयंक चतुर्वेदी

आंध्र, छत्तीसगढ, झारखण्ड, बिहार, पश्चिमबंगाल, महाराष्टन् आदि राज्यों में माओवादी नक्सलियों का हिंसात्मक ताण्डव रूक-रूककर जिस तरह चल रहा है, उसने हमारे लोकतंत्रात्मक देश के सामने अनेक प्रश्न खडे कर दिये हैं। भारत के संविधान में स्पष्ट उल्लेख है कि यह गणराज्य जनता के लिए जनता द्वारा शासित है, जिसमें भारतीय जनता सर्वोपरि है। फिर किसी भी लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली में उस राज्य की शक्तियाँ लोक (जन) में निहित होती हैं, निश्चित ही भारत भी इससे अछूता नहीं। यहाँ लोकतंत्र की शक्तिशाली जन आधारित राज्य व्यवस्था में जनता जिसे अपने सिर-माथे बैठाती है, जरूरत पडने पर उसे धूल चटाने में भी देरी नहीं करती।

आपातकाल के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी की हार, चहुँ ओर से कांग्रेस का सफाया लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली में जनशक्ति का एक सबसे बडा उदाहरण माना जा सकता है, किंतु इतनी सहज और सर्वसुलभ व्यवस्था के प्रति आक्रोश के नाम पर देश के अनेक राज्यों में निरीह और निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार देने वाली नक्सली वारदातें आज भारत जैसे देश में सफल लोकतंत्र के लिए चुनौती बनकर उभरी हैं। केन्द्र सरकार की इनके स्थायी दमन की नीति के अभाव में माओवादी इन नक्सलियों के प्रभाव क्षेत्र में निरंतर विस्तार हो रहा है।

माक्र्स लेनिन माओत्सेतुंग को अपना आदर्श मानने वाले यह नक्सली सख्त कानून और सजा के अभाव में आज देश के 14 राज्यों के 200 से अधिक जिलों में अपना सघन विस्तार कर चुके हैं। दु:ख इस बात का है कि स्वयं को समाजवाद और गरीब, पिछडों का हमदर्द बताने वाले तथाकथित बौध्दिाक वर्ग का सहयोग इन्हें यह कहकर प्राप्त होता रहा है कि भारत में नक्सली अपने हक की लडाई लड रहे हैं, किन्तु सच्चाई इसके विपरीत है। एक अनुमान के अनुसार देश के 30 प्रतिशत हिस्से पर इनका कब्जा है। पिछले 40 वर्षों में यह माओवादी नक्सली एक लाख से अधिक बेगुनाह लोगों की हत्या कर चुके हैं और देश के 16 लाख लोग इनकी हिंसात्मक गतिविधियों के शिकार हुए हैं। जिस समाजवाद की स्थापना का यह स्वप्न देखते हैं और आगामी 50 वर्षों में भारत की सत्ता पर कब्जा करना चाहते हैं तो इनसे यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि यदि यह समाजवाद इतना ही अच्छा है तो इस विचार के जनक कार्ल हाइनरिख माक्र्स और उसके देश जर्मनी में यह क्यों नहीं आज तक पनप सका ? आखिर चीन क्यों आज, अमेरिका के पूंजीवादी रास्ते पर चल रहा है ? और फिर रूस इस साम्यवादी मॉडल को अपनाकर छिन्न-भिन्न क्यों हो गया ? यह नेपाल में क्यों नहीं अपनी सत्ता बना कर रख पाये ? आखिर क्यों भारत में भी पश्चिम बंगाल जनता ने सत्ता से इनका सफाया कर दिया। ऐसे अनेक प्रश्न हैं जिनके जबाव शायद ही कोई माक्र्स लेकिन और माओ जैसे समाजवादी प्रेमियों के पास हों।

भारत में यह माओवादी समाजवाद की कोरी स्थापना का जो स्वप्न दिखाते हैं, वस्तुत: उसका यथार्थ यह है कि इस स्वर्ग की सबसे पहले स्थापना कम्बोडिया, सोवियत संघ और चीन में की गई। इस कोरे स्वप्न को सकार करने के उद्देश्य से समाजवाद का घोर शत्रु मानकर अकेले सोवियत संघ में स्टालीन ने 30 करोड लोगों को मौत दे दी थी । यही काम माओत्सेतुंग ने चीन में किया उसने भी अपने विरोधियों तथा स्वतंत्र मत रखने वालों को राज्य विरोधी बताया और 4 करोड से अधिक चीनियों को मौत के घाट उतार दिया था। कम्बोडिया की स्थिति चीन तथा रूस से कम खराब नहीं थी। इस समाजवाद के तूफान ने वहाँ कि 30 प्रतिशत आबादी का लहू सडकों पर बहा दिया।

वास्तव में यहीं है इस माओवादी विचारधारा का असली चेहरा, जो अपने शत्रुओं को तो बहुत दूर की बात है अपनी तथ्य परक आलोचना करने वालों को भी बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं। इस व्यवस्था में आलोचना एवं विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार किसी को नहीं, जिसने ऐसा किया भी तो उसे बदले में सिर्फ मौत मिली है। यही है इस विचार का सच ! जिसे कोई नहीं नकार सकता है।

वस्तुत: इन माओवादी नक्सलियों के शिकार आज वह राज्य हो रहे हैं जो विकास में कहीं पिछडे हैं, जहाँ अधिकांश आबादी आदिवासी है। भारत में इनके निशाने पर जो राज्य हैं वह आदिवासी बहुल्य ही हैं। एक तरफ यह भोले आदिवासियों और ग्रामवासियों को राज्य सरकारों पर यह आरोप लगा कर भडकाते हैं कि राज्य को तुम्हारे विकास की चिंता नहीं, वहीं दूसरी ओर सडक, स्कूल, व्यापारिक केन्द्रों के निर्माण जैसे राज्य सरकारों द्वारा कराए जाने वाले विकास का विरोध करते हैं। राज्य यदि आज इनके कब्जे वाले क्षेत्रों में विकास योजनायें लेकर जाता है तो यह बारूदी सुरंग बिछाकर उसे उडा देते हैं। राज्य की जनकल्याणकारी योजनायें इनसे प्रभावित जिलों में आज इसलिए असफल हो रही हैं क्योंकि माओवादी यह नक्सली नहीं चाहते कि यहाँ अन्य जिलों की तरह विकास हो और आम आदमी सीधा राज्य से जुडे। इन्होंने आंध्र-उडीसा, छत्तीसगढ, महाराष्टन्, झारखण्ड, बिहार, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश राज्यों के जंगलों में अपना कब्जा जमाया है वहाँ प्राकृतिक संपदा की भरकार है, सोना-चाँदी, अयस्क, हीरे, जवाहरात की बेश कीमती खदाने मौजूद हैं। देश की नेपाल सीमा तक खूनी खेल खेल रहे यह नक्सली अपने प्रभाव क्षेत्र से प्रतिवर्ष 25 से 30 अरब रूपये वसूल रहे हैं, जिससे न केवल इनकी असामाजिक गतिविधियाँ चलती है। बल्कि देशी-विदेशी हथियार खरीदने के साथ बुध्दिा जीवियों में यह धन का अत्यधिक उपयोग करते हुए अपनी पैठ जमाने में भी सफल हो जाते हैं।

प्रश्न सीधा सा है यदि यह नक्सलवादी अपनी जारी इस शासन विरोधी लडाई को सही मानते हैं और इसके पीछे तर्क देते हैं कि यह आदिवासियों तथा गरीबों के हक में लड रहे हैं तो यह कैसी लडाई और हक है। जिसमें यह नक्सली अपने प्रभाव क्षेत्र में विकास के विरोधी हैं। यह जो इनके द्वारा करोडों-अरबों रूपए की वसूली अधिकरियों, कर्मचारियों, व्यापारियों तथा ठेकेदारों से की जा रही है यह वसूली किसके लिए और क्यों ? क्योंकि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तो कोई गरीबों का भला होते इस वसूली के धन से अब तक देखा नहीं गयाहै । वास्तव में नक्सलियों को गरीबों से कोई लेनादेना नहीं, गरीबों का तो केवल नाम है, जिनके नाम का इस्तेमाल कर यह स्यापा करते हैं और मीडिया की सुर्खियाँ बटोरते हैं। माओवादी इन नक्सलियों का उद्देश्य भारत को टुकडों-टुकडों में बांट देना है, इनका मुख्य कार्य केवल इतना ही है कि तत्कालीन शासन व्यवस्था के विरोध में आमजन में जहर भरा जाए ताकि वह हथियार थामकर सत्ता प्राप्ति के उनके स्वप्न को साकार करने में मददगार साबित हो सके।

आज देश में नक्सलियों की संख्या हजारों में है, जिनके लिए मानवता की कोई कीमत नहीं, अब यह कुछ राज्यों तक ही सीमित नहीं रहना चाहते इनके संगठन पीपुल्सवार और एमसीसीआई आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ, मध्यप्रदेश, महाराष्टन्, उडीसा, झारखण्ड और पश्चिमबंगाल से निकलकर उत्तरप्रदेश , कर्नाटक और केरल में भी अपने कार्य के विस्तार में लगे हुए हैं।

वस्तव में आज देश को घोर अशान्ति की ओर ले जाने वाले इस साम्यवाद विचार पोषित नक्सलवाद की नकेल शीघ्र कसे जाने की जरूरत है। यदि नक्सलवाद को अभी ठोस कदम उठाकर नहीं रोका गया तो वह दिन दूर नहीं जब भारत भी सोवियत रूस की तरह अनेक भागों में विभक्त हो जाए।

आज जरूरत इस चुनौती से राज्य और केंद्र सरकार को एकजुट होकर लडने की है न कि एक दूसरे पर संसाधनों की कमी का रोना रोने और आरोप-प्रत्यारोप की। नक्सलवाद के खात्मे के लिए जिस संघीय व्यवस्था के निर्माण की बात वर्षों से केवल कागजों में चल रही है जरूरत अब उसे शीघ्र व्यवहार में लाने की है। इसके लिए सभी नक्सल प्रभावित राज्यों में जितनी जल्द सहमति बने उतना ही एक सम्प्रभू लोकतंत्रात्मक गणराज्य भारत के हित में होगा।

One Response to “नक्सली हिंसा, उभरते प्रश्न ?”

  1. jangra bgagat singh vir

    यह वेबसाइट इंडिया के लोगो के लिए १ अछा मंच तयार करती है और इनिया के लोगो को अनपी पर्तिकिरिया कने का १ संग मंच प्रदान करता hai

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *