लेखक परिचय

पंकज झा

पंकज झा

मधुबनी (बिहार) में जन्म। माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर की उपाधि। अनेक प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में राजनीतिक व सामाजिक मुद्दों पर सतत् लेखन से विशिष्‍ट पहचान। कुलदीप निगम पत्रकारिता पुरस्‍कार से सम्‍मानित। संप्रति रायपुर (छत्तीसगढ़) में 'दीपकमल' मासिक पत्रिका के समाचार संपादक।

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-पंकज झा

जब पंजाब में आतंक चरम पर था तब एक अखबार की काफी आलोचना हुई थी. उस पत्र में बिना कोई भूमिका दिए सीधा शीर्षक इस तरह होता था पंजाब 20, पंजाब 30. मतलब पाठक खुद समझ जाते थे कि आज आतंकी हमले में इतने लोग मारे गए हैं. तब भले ही कुछ लोगों के अनुसार ऐसा संपादन संवेदनहीनता माना गया हो लेकिन बात महज़ इतनी है कि आक्रोश को भी विभिन्न रचनात्मक तरीके से व्यक्त करने की ज़रूरत होती है.

छत्तीसगढ़ के नक्सल समस्या पर भी अलग-अलग तरह से ऐसी ही प्रतिक्रया व्यक्त किये जाने की ज़रूरत है. अभी फिर जब दांतेवाडा से सुकमा जा रही बस को उड़ा कर स्थानीय एसपीओ समेत लगभग पचास लोगों को मौत के घात उतारा गया है तब भी वही घिसे-पिटे शब्दों से पाठकों का साबका पड़ा. खास कर सरकारी बयानों में पिछले सभी बयानों की तरह ही कम्प्युटर में सुरक्षित प्रिंट-आउट को निकाल कर दिनांक, जगह एवं शहीदों की संख्या बदल कर विज्ञप्ति जारी की हुई. नक्सलियों की बौखलाहट, उनका कायराना हरकत, हमले की निंदा, आर-पार के लड़ाई का आश्वासन आदि ऐसे ही शब्दों की पीड़ा नागरिकों को झेलनी पड़ी. खैर. सरकारें तो अपनी ही राह चलेगी, कुछ बंधे-बंधाए लीकों से अलग हटकर चलने की उम्मीद आप बयान लेखक नौकरशाहों से तो बिलकुल नहीं कर सकते. मगर हां, देशभक्त बुद्धिजीवियों और लेखकों से ज़रूर यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह आगे आ कर अपनी सम्पूर्ण उर्जा से, अपने पूर्वाग्रह-दुराग्रह को अलग रख इस विभीषण समस्या पर मतैक्य स्थापित करें. शायद यही एक रास्ता हो सकता है लोकतंत्र को बचाने की.

इस मुद्दे पर हाल के दिनों में प्रदेश के प्रख्यात एवं वरिष्टतम पत्रकार श्री ललित सुरजन जी का आह्वान रेखांकित करने लायक हैं. उन्होंने सीरीज में लिखे अपने आलेखों में बुद्धिजीवियों से यह अपेक्षा की है कि कम से कम इस मुद्दे पर न्यूनतम सहमति कायम की जाय. अलग-अलग अपने-अपने दरबे में सोचने के बदले सामूहिक रूप से एकत्रित होकर समस्या के समाधान हेतु तरीकों पर विमर्श की जाय. लीक से अलग हटकर. निंदा-भर्त्सनाओं के जाल से मुक्त होने का प्रयास कर समाधानमूलक चिंतन प्रस्तुत किया जाय.

तो अव्वल यह कि अब सबसे पहले सभी बुद्धिजीवीगण यह तय कर लें कि नक्सल मामले पर ‘कब’ और ‘क्या’ की बात कर अपना और पाठकों का समय एवं अखबारों का संसाधन बर्बाद नहीं करेंगे. मोटे तौर पर नागरिकों को अब यह बार-बार बताने की ज़रूरत नहीं है कि आदिवासी इलाकों में नक्सलवाद को पनपने के लिए सरकार की कमी, विकास का न होना, वनवासी क्षेत्रों का शोषण आदि कारक रहे हैं. इसका कौन दोषी है कौन नहीं इस पर भी विमर्श करने का यह समय नहीं है. निश्चित ही कुछ चीज़ें इतिहासकारों के लिए भी छोड़ देनी चाहिए. हमें तो अभी ‘वर्तमान’ लिखने का दायित्व नियति ने दिया है. सामान्यतया पत्रकार-गण वर्तमान के ही इतिहास-कार होते हैं. बात अब केवल ‘कैसे’ की होनी चाहिए. यानी दुनिया के इस सबसे बड़े, सबसे सफल एवं सबसे कम बुरे लोकतंत्र को बचाया कैसे जाय? अब किसी भी देशभक्त के विचार का एक मात्र बिंदु यही होना चाहिए कि नक्सली समस्या से त्राण कैसे पाया जाय? और इससे अलग मुद्दे को भटकाने वालों का बहिष्कार भी ज़रूरी है.

सबसे पहले यह कि केंद्र सरकार यह घोषित करे कि हम विदेशी मदद से थोपे गए आंतरिक युद्ध से गुजर रहे हैं. चुकि नक्सलियों ने पहले ही अपने अभियान को युद्ध और सरकारी अमले को दुश्मन घोषित किया हुआ है. तो सरकारों को भी चाहिए कि इसी तरह की भाषा का उपयोग कर उन्हें अपना दुश्मन घोषित करें. निश्चित ही उनमे से अधिकांश भारत के नागरिक हैं. अपने ही नागरिकों को दुश्मन घोषित किया जाना इतना आसान नहीं होता. लेकिन अब आसान उपायों को अपनाने का समय भी नहीं है. महाभारत समेत कई कथानक इस बात की गवाही देते हैं कि युग-सत्य की रक्षा में आपको कई बार अपने भाइयों से भी लड़ना होता है. दूसरा यह कि भारतीय नागरिकों को मिली तमाम नागरिक सहूलियत केवल भारतीय संविधान में घोषित तौर पर आस्था रखने वाले व्यक्ति को ही मिले. सीधे तौर पर या तो आप लोकतंत्र के पक्ष में हैं या उसके दुश्मन, यही मानदंड अपनाने का समय है. बुद्धिजीवियों से आग्रह कि भले ही उनकी भावना कुछ भी हो लेकिन कभी भी लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गयी सरकारों और नक्सलियों दोनों को एक सामान महत्व नहीं दें. भूल कर भी उसको ‘पक्ष’ नहीं कहें. यानी बातचीत की बात करते हुए कभी भी ‘दोनों पक्षों’ ऐसा संबोधन नहीं दें. कभी भी पुलिस कारवाई और नक्सली हिंसा दोनों को भी एक जैसा नहीं ठहराए. सामन्यतया पुलिस विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों के अधीन एवं ढेर सारे विधि-निषेध का पालन करते हुए कोई कारवाई करती है. उसके अलावे मानवा-धिकार संगठनों से लेकर प्रेस, न्यायालय आदि सबक बंधन भी होता है. तो नक्सलियों की बे-लगाम हत्याएं और सरकारी कारवाई को एक सामान नहीं ठहराया जाना चाहिए.

सरकारों के लिए यह भी तय करने का समय है कि वह अब विकास के द्वारा नक्सलवाद खतम करने का प्रयास करना चाहती है या नक्सलवाद को खतम कर विकास करना उचित होगा. ज़ाहिर तौर पर विकास के तय मानकों यानी पुल-पुलिया-सड़क आदि के लिए किये जाने वाले ठेकेदारी में एक निश्चित प्रतिशत राशि नक्सलियों के पास पहुच ही जाया करती है. यह कोई रहस्य नहीं है कि इस तरह के वसूली का आंकडा दो हज़ार करोड़ तक पहुच गया है. तो बिना उनके लिए संजीवनी का काम करने वाले लेवी पर रोक लगाये, उनके आपूर्ति लाइन को काटे आप उनपर नियंत्रण नहीं कर सकते. तो अगर साठ साल वहां कोई कथित विकास नहीं हुआ तो इन चार-पांच सालों में कोई पहाड़ टूट पड़ने वाला नहीं है. उचित तो यही होगा कि पहले नक्सल उन्मूलन हो फिर विकास की बात की जाय. चावल, नमक जैसी मूलभूत ज़रूरतों के अलावा कुछ दिनों के लिए किसी भी तरह के विकास कार्यों को तरजीह ना दी जाय. साथ ही सरकार, घोषित तौर पर किये गए सभी एमओयू को निलंबित-निरस्त करते हुए, अगर ज़रूरी हो तो हर तरह के उत्खनन पर भी तात्कालिक रूप से रोक लगाए. ज़मीन के अंदर में छुपा हुआ खनिज भी कही भागा नहीं जा रहा है. सुस्पष्ट रूप से सरकार यह तय करे कि बस्तर में शांति के बाद नए तरह से औद्योगिक कार्यों को अंजाम दिया जाएगा. और हर तरह का उद्यम करते हुए सरकार की यह घोषित नीति रहेगी कि बाद में किये जाने वाले किसी भी एमओयू में माटी पुत्रों के हित की पहले चिंता की जायेगी. हर तरह के विकास कार्यों का पहला लाभार्थी स्थानीय लोगों को बनाना सरकार अपनी घोषित नीति तय करे. दुनिया कही भागी नहीं जा रही है. अनावश्यक दौर लगाने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है.

इसके अलावा बयानवीरों के बारे में भी सोचने की ज़रूरत है. मीडिया को भले ही मसाला चाहिए लेकिन पुलिस को या अन्य सम्बंधित लोगों को अपने अखबारी कटिंग को मोटे करते जाने की कोई ज़रूरत नहीं है. पुलिस, अर्धसैनिक वलों आदि के प्रवक्ता की सफलता अखबार में छपे ढेर से नहीं मापी जानी चाहिए बल्कि वह कितनी सूचनाओं को गोपनीय रख पाया इससे उसकी सफलता मापनी चाहिए. सम्बंधित अधिकारियों को चाहिए कि वह सभी समाचार माध्यमों को आमंत्रित कर उनसे यह निवेदन करें कि कृपया युद्ध की इस घड़ी में अपने पेशे से भी ऊपर लोकतंत्र को रखें. युद्ध रिपोर्टिंग की कुशलता इसमें नहीं है कि आप कितनी सूचनाएं दे पाए, कुशलता यह है कि आप गोपनीय नीतियों को उजागर ना कर किस तरह सैनिकों के मददगार हो सकें. यह भरोसा करने का पर्याप्त कारण है कि कम से कम प्रदेश का मीडिया कभी असहयोग नहीं करेगा. लेकिन आपको अपने छपास की भूख पर लगाम ज़रूर रखना होगा.

और अंतिम बात सेना का इस्तेमाल करने के पक्ष में. निश्चित ही अब सेना का उपयोग करने का समय आ गया है. किसी भी देश के लिए अपने आंतरिक क्षेत्रों में सेना का उपयोग वास्तव में अंतिम उपाय ही होता है. लेकिन मोटे तौर पर सेना का काम ही होता है देश को सुरक्षित रखना. देश के दुश्मन सांपो का सफाया करना. इससे कोई फर्क नहीं पडना चाहिये कि वह सांप बिलों में छुपे हैं या आपके आस्तीनों में. आज पंजाब इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि उतनी बड़ी बाहरी चुनौतियों, पाकिस्तान जैसे सरहदी देश के प्रत्यक्ष मदद के बावजूद हम लोकतंत्र को बचाने में कामयाब रहे थे, अपने प्रधान मंत्री और मुख्यमंत्री के जान की कीमत चुकाकर भी. तो यहाँ भी अब इसी तरह के बलिदान का समय है. श्रीलंका का उदाहरण अभी भी सामने है जब टेंक आदि से सुसज्जित एवं अपार जन-समर्थन वाले लिट्टे को भी वहां दृढ इच्छशक्ति और सेना की बदौलत मटियामेट कर दिया गया था. कम से कम नक्सली उतनी ताकतवर तो नहीं ही हैं. और भारत भी श्रीलंका से कई गुना ज्यादा ताकतवर तो है ही. बस ज़रूरत निर्णय लेने और उस पर अटल रहने की है. इस चुनौती से भी लोकतंत्र पार ज़रूर पायेगा इसमें कोई संदेह नहीं है.

23 Responses to “नक्सलवाद: समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध”

  1. रंजना.

    आपके बताये गए सभी उपायों से पूर्णतः सहमत हूँ….जबतक सरकार इस रास्ते नहीं चलेगी,समस्या का हल नहीं निकलेगा…यह एकदम पक्का है…

    पंकज जी, मैं पूर्व में भी कह चुकी हूँ….आपकी यह भावना केवल व्यक्तिगत भावना नहीं है,बल्कि आज यह करोड़ों लोगों की भावना है जिसे आप शब्द दे रहे हैं…आपके हमारे पास जो सामर्थ्य है,उसमे हम यही कर सकते हैं…गलत के खिलाफ कलम उठाकर विरोध दर्ज कराना कलमकार का कर्तब्य होता है…और इस क्रम में यदि कोई उल जूलूल बोल उग्र या हतोत्साहित करने का प्रयत्न करे तो कृपया उसपर एक क्षण को भी ध्यान न दें…अपने विवेक को सतत जागरूक रख सही गलत की निर्णायक क्षमता कायम रखें और अपने कर्तब्य पथ पर अग्रेसित रहें…
    वाकजाल में फंसने की कोई आवश्यकता नहीं…

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  2. Jitendra Dave

    भारत के बुद्धीजीवियों की समस्या ये है कि वह किसके हित में अपनी बुद्धि का इस्तेमाल कर रहे हैं. उनको संतुलित नजरिया रखना चाहिए और किसी भी प्रकार के अतिवाद से बचना चाहिए. दूसरी और असल बुद्धीजीवी इसा लफड़े में पड़ने से डरते हैं और मौन धारण कर रखते हैं.

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  3. गिरीश पंकज

    girish

    पंकज झा का यह लेख पढ़ कर मुझे इसलिए संतोष हुआ कि उन्होंने पीड़ा से भर कर लिखा. नक्सलियों से निपटने केलिए सेना का इस्तेमाल हो या न हो, इस बारे में मैं अभी कुछ नहीं कह सकता, लेकिन इतना कहा जा सकता है, की बस्तर में पुलिस और दूसरी बटालियने ईमानदारी और होशियारी के साथ अपना फ़र्ज़ अदा नहीं कर पा रही है. वे असफल हो रही है वे जुझारू तरीके से मोर्चा लें तो नक्सलियों से मुकाबला किया जा सकता है. सेनाकी ज़रुरत ही नहीं पड़ेगी. पंकज की इस बात से सहमत हूँ की पुलिस कारवाई और नक्सली हिंसा दोनों को भी एक जैसा नहीं ठहराए. लेकिन यह भी ठीक है की दोनों मूल आदिवासियों को लूट रहे है, बलात्कार कर रहे है. फर्जी मुठभेडे भी हो रही है. बस्तर की समस्या सिर्फ नक्सलवाद नहीं है, हमारी असफलता भी है. वहां तैनात पुलिस और जवानो को शहादत से डरे बिना भीतर तक जाना होगा. बहार से हम नक्सलियों से लोहा नहीं ले सकते. ये नहीं हो सकता कि हम दंतेवाड़ा या कहीं और शिविर बनाये और जंगल भ्रमण कर लौट आये.ऐसे में हो चुका खत्म. जवानो को जंगल में ही रहना होगा. और जूझना होगा. मरना भी होगा. चाँद बलिदानों से विचलित हो कर सेना को बुलाने का मतलब यही है कि नक्सली हमपर भरी पड़ गए. वे हम पर भरी नहीं पड़ सकते. अगर ईमानदारी के साथ मुकाबला किया जाये तो उनका सफाया हो सकता है. नक्सलियों से निपटने से पहले हमें भ्रष्टाचार से भी निपटना है. नक्सलियों से जूझ रहे जवानो के लिए जो फंड आता है, पता तो किया जाये, कि वो कितनी ईमानदारी से वहां तक पहुच रहा है. सेना अंतिम उपाय है. मणिपुर में हम देख रहे है कि क्या हो रहा है. नंगा नाच कर रही है सेना और समस्या जस की तस है. दस साल से ज्यादा हो गए. आम लोग अब आतंकियों से ज्यादा सेनासे आतंकित है. शर्मिला दस सालसे आमरण अनशन पर बैठी हुई है. इसलिए मुझे लगता है कि हमारी पुलिस और अर्ध सैनिक बलों के सहारे ही नक्सलियों से निपटा जा सकता है. और हाँ, नक्सलियों और लोकतांत्रिक सरकार को एक तराजू में नहीं रखा जा सकता . पंकज का लेख ठीक है. उनकी चिंता है बस्तर नक्सलियों से मुक्त हो. इसलिए उन्होंने सेनाकासुझाव दिया है. लेकिन संजीव पांडे जैसे टिप्पणीकारो को यह सोचना चाहिए कि वे किसी के लिए किस भाषा का इस्तेमाल कर रहे है. पंकज के लेख का उसकी नौकरी से क्या सम्बन्ध है भाई? ये हल्कापन है. आप केवल विचार पर बहस करे, उसकी नौकरी के पीछे क्यों पड़े है? हद है. पंकज का यह सुझाव ठीक है कि हर पत्र सम्पादित होना चाहिए. वरना घटिया बातें भी सामने आ जाती है, जिससे लोग आहत हो सकते है. विचारोंमे केवल चिंतन दिखाना चाहिए, विद्वेष नहीं. खैर, यह तो प्रतिक्रया है. ज्यादा लम्बी न हो जाये इसलिए यही रुकता हूँ. इस विषय पर अलग से लेख लिखूंगा तब आप उसे अलग से पढ़े, तो ठीक रहेगा. अंत में मै पंकज की पीड़ा के साथ हूँ और यह कहना चाहता हूँ कि नक्सलियों से निपटने के लिए अभी पुलिस और अर्ध सैनिक बल ही सक्षम है उनकी क्षमता पर हमें शक नहीं करनाचाहिये, वरनाउनका मनोबल गिरेगा. हाँ, जब ये हाथ खडा कर दे, कि भाई हम केवल शहरी क्षेत्र में ही केवल सुरक्षित नौकरी सकते है, वे अपनी पराजय स्वीकार कर ले, फिर सेनासे आग्रह किया जाये. पंकज को विचारोत्तेजक लेख के लिए बधाई.

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  4. फ़िरदौस ख़ान

    Firdaus Khan

    आतंकवाद सरकार की ग़लत नीतियों का नतीजा है… आतंकवाद के ख़ात्मे के लिए प्रशासनिक व्यवस्था को सुधारना होगा…

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  5. डॉ. महेश सिन्‍हा

    महेश सिन्हा

    ये श्रीमान panday पता नहीं हिन्दी में क्या उच्चारण होगा इनके उपनाम का बहुत बड़े नक्सली समर्थक हैं . नक्सली याने देशद्रोही . क्यों इन नक्सलइयों का सीमा क्षेत्र जंगलों तक सीमित है . विकास तो पूरे देश में अवरूद्ध है ये कहते हैं सरकार की नजर वन सम्पदा पर है तो इनकी नजर किस पर है .
    सब स्वमभू ठेकेदार हो गए हैं आदिवासियों के ? इतना बड़ा माल असबाब और छुपने की जगह मैदानो में तो नहीं मिल सकती . सर्वहारा के समर्थक इतने विदेशी हथियार कहाँ से जुटा रहे हैं ?
    सरकार तो जब संसद तक आतंकवादी पहुँच गए तो नहीं जागी .
    सोनिया, राहुल और दिग्विजय एक साथ हैं . काँग्रेस में ही विवाद है .
    अब तो यही लगता है तीन सदस्यों की अकाल मृत्यु से गांधी परिवार भयग्रस्त है और कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहता जिससे उनपर कोई आँच आए . हर व्यक्ति को अपनी सुरक्षा का अधिकार है लेकिन देश की बागडोर सम्हले व्यक्ति को अगर डर लगता है तो देश का क्या होगा ? इन्हे अपना नियंत्रण छोड़ कर किसी सक्षम व्यक्ति को काँग्रेस की बागडोर दे देनी चाहिए . चिदंबरम ने हिम्मत दिखायी है . लेकिन आंतरिक दबाव के कारण एक कदम आगे तो दो कदम पीछे .

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  6. अनिल सौमित्र

    अनिल सौमित्र

    भाई, मुझे तो लगता है कि ये पंकज झा और संजीव पाण्डेय मे कोइ सांठगांठ हो गई है, नही तो लेखक कोई दो टके के कमेंटेटर पर अपनी टिप्पणी भला क्यो देगा. और आतंकियो-माओवादियो के खिलाफ सेना के इस्तेमाल मे बुराई क्या है, क्षेत्रफल या भूगोल की भी चिता सेना ही कर लेगी, जरूरत हुई तो और सेना की बहाली की जाये, लेकिन संजीव पांडेय की सलाह पर भला नक्स्ली समस्या का समाधान कैसे होगा.

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  7. पंकज झा

    पंकज झा.

    क्या कुंठा का कोई अंत होता है या नहीं समझ नहीं आ रहा है. पता नहीं क्या समस्या है आ. संजीव पाण्डेय को मुझसे. पहली टिप्पणी में लिखते हैं कि…. “पंकज जी क्या लिख रहे है। सेना का इस्तेमाल करे भारत सरकार। आप भाजपा के पत्रिका में नौकरी करते है। आज नरेंद्र मोदी ने नक्सल समस्या पर राय दी है। कहा है नक्सली अपने है। बातचीत की जानी चाहिए। कहीं आपकी नौकरी न चली जाए।” और फिर दुसरी टिप्पणी में अपनी ही बात को बदल देते हैं. बकौल पांडे जी मैं ” सिर्फ अपनी नौकरी बचाने के लिए और भाजपा के आकाओं को खुश करने के लिए सेना का इस्तेमाल की सलाह दे रहा हूं।” अब पहले तो यह तय कर लें कि मुझे अपनी नौकरी को सुरक्षित रखने के लिए आखिर करना क्या चाहिए? सबसे बड़ी बात यह कि बिना लेख के सभी सन्दर्भों पर विचार किये किसी एक बात की पूंछ पकड़ कर गरिय्याते रहना इन्होने अपनी नियति बना ली है. इस लेख में खनिजों के दोहन, आदिवासियों से शोषण, लोगों के बयान आदि पर इतना कुछ कहा गया है यह इन्हें नहीं दिखता बस कोई एक कड़ी पकड़ लों और जितना अचाहो भड़ास निकला लों. भाई साहब ठीक है आपकी विशेसज्ञता होगी पंजाब मामले में, छत्तीसगढ़ में पुलिस वाले भी आपसे पूछ-पूछ कर ही पैसा खाते होंगे, तो इन सब पर लिखने से आपको किसने मना किया है? आप मुझे ही क्यू निर्देशित कर रहे हैं कि सब मामले पर मैं ही लिखू?
    कृपया पाठकगण संजीव पांडे के कुछ और बातों पर गौर करें…1) दरअसल भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों ने मीडिया में एजेंट पाल रखे है। 2) फिर राज्य पुलिस क्या करेगी। सिर्फ माल खाएगी। फिर आप जैसे लेखकों को कुछ हिस्सा देगी। 3) बिना सोचे समझे कोई लेख न लिखे। पहले अपने दिमाग का इस्तेमाल करे। और समान्नीय पाठकों एवं टिप्पणीकारों के लिए 4) बाकी कुछ दो टकिया कमेंटेंटरों से कमेंट करवा अपने गलत लेख को सही मत ठहराए। इससे कोई फायदा नहीं होगा।” आखिर इस तरह की वाहियात टिप्पणी कर, बिना किसी सबोत के इस तरह की बातें करना, लेखक के साथ-साथ पाठकों का इस तरह से अपमान किया जाना, आखिर कहाँ तक उचित है? एक बार और पांडे जी से निवेदन कि जितनी जानकारी हो उसपर जम कर लिखें.लेकिन निराधार और व्यक्तिगत आरोप लगाने के अपने हरकतों पर नियंत्रण करें. मोडरेटर साहब भी यह ध्यान ज़रूर रखें कि इस तरह से व्यक्तिगत रूप से लांछित करने वाले टिप्पणी को अप्प्रुव करना कही से भी लोकतांत्रिक नहीं है. अपने सभी टिप्पणीकारों एवं सम्मानित पाठकों के अनन्य-अशेष आभार.

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  8. संजीव पांडेय

    sanjiv panday

    दरअसल भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों ने मीडिया में एजेंट पाल रखे है। जो अति उत्साह में नक्सलियों के खिलाफ सेना इस्तेमाल का सुझाव दे रहे है। क्या सेना खुद इसके लिए तैयार है। सेना का इस्तेमाल का मतलब है यह मान लेना कि नक्सली राज्य पुलिस और केंद्रीय पुलिस बल पर भारी पड़ गए है। कुल मिलाकर पूरे उतर पूर्व में सेना का इस्तेमाल पहले से हो रहा है। पंजाब में इस्तेमाल आप कर चुके है। लिट्टे के खिलाफ भी आप अपनी सेना को भेज कर भद्द पिटवा चुके है। सेना को अब पाकिस्तान और बांग्लादेश की सीमा सुरक्षा से हटाकर नक्सलियों से निपटने में लगा दे।
    पंकज जी झा का त्रिंकोमाली और छतीसगढ़ का क्षेत्रफल पता नहीं है। पता नहीं कहां से लिखते है और क्या इनकी जानकारी है। पूरे श्रीलंका का क्षेत्रफल और छतीसगढ़ का क्षेत्रफल का आकलन पहले पंकज जी झा करें। बस्तर ही नहीं छतीसगढ़ के अन्य जिलों में भी नक्सली है। दरसअल कई लेखक है जो बिना जानकारी के अपना बखान करते है जिसमे पंकज झा एक है। पंजाब में सेना के बजाए आईआरबी बटालियन ने आतंकियों का खात्मा किया। ये आईआरबी बटालियन पहले पंजाब में बनाए गए प्रयोग के तौर पर। इसमें स्थानीय पुलिस और कैट(सरेंडर आतंकियों) को रखा गया। फिर उसके बाद पाकिस्तान को अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारत ने खालिस्तान आंदोलन को दबाया गया। बेचारे झा जी छतीसगढ़ से बाहर निकलते तो है नहीं। खालिस्तान आंदोलन के बारे में क्या जानेंगे। जिस समय भारत का कुटनीतिक दबाव पाकिस्तान पर पड़ा, उस समय लाहौर स्थित एकमात्र गुरुद्वारे में शामिल कई प्रमुख आतंकियों को आईएसआई ने उठा लिया और उन्हें गायब कर दिया। शायद वे मारे गए। जो कुछ भी खालिस्तानी आतंकी वहां बचे वे या तो जर्मनी भागे या इंग्लैंड भागे। एक दो ननकाना साहिब गुरुद्वारे में है लेकिन अब उनकी गतिविधि शांत है। पाकिस्तान अब खालिस्तान मसले पर पूरा चुप है। बेचारे पंकज झा को यह नहीं पता कि जिस दिन सेना ने आपरेशन ब्लू स्टार किया उसके कुछ दिन पहले जरनैल सिंह भिंडरावाले को पाकिस्तान ने अमृतसर तक कार्रवाई का आश्वासन दिया था। पर बाद में पाकिस्तान मुकर गया। आपरेशन शुरू होने के दो दिन पहले भिंडरावाले के माध्यम से एक खबर चलायी गई कि भिंडरावाले खुद स्वर्ण मंदिर छोड़ रहे है, और लाहौर जा रहे है। वहां पर वे एग्जाइल गवर्नमेंट बनाएंगे। कुल मिलाकर इस खबर के माध्यम से पाकिस्तान के अंदर की गतिविधि देखी जा रही थी। शाम तक खुद भिंडरावाले इस खबर से मुकर गए। उन्होंने पत्रकारों को कहा कि यह खबर पूरी तरह से गलत है। इसके बाद सेना स्वर्ण मंदिर में गई। सेना का इस्तेमाल माननीय पंकज जी झा उस तरह से नहीं हो सकता है जिस तरह से आप बोल रहे है। सेना के इस्तेमाल से पहले सारे इफ एंड बट देखने होंगे। आपकी सलाह से अगर सेना इस्तेमाल होने लगा तो भला हो इस देश का।
    समस्या की मूल में जाने की बजाए पंकज झा जैसे अति उत्साही लेखक कुछ भी लिख देते है। समस्या की मूल में जाने की बजाए कहेंगे सेना का इस्तेमाल कर दो। पूरा झारखंड, बंगाल, बिहार और छतीसगढ़ सेना के हवाले कर दो। दस लाख की फौज में से दो लाख फौज नक्सलियों के लिए लगा दो। फिर राज्य पुलिस क्या करेगी। सिर्फ माल खाएगी। फिर आप जैसे लेखकों को कुछ हिस्सा देगी। छतीसगढ़ में राज्य पुलिस की भर्ती में जो भ्रष्टाचार हुआ है उसपर क्यों नहीं माननीय झा जी लिखते है। भर्ती में हुए घपले के कारण केपीएस गिल का विवाद वहां के स्थानीय राज्य सरकार से हुआ था। इस पर जरा केपीएस गिल से बात कर एक खबर लिखिए न। सिर्फ अपनी नौकरी बचाने के लिए और भाजपा के आकाओं को खुश करने के लिए सेना का इस्तेमाल की सलाह दे रहे है। आंध्र प्रदेश में तेलंगाना रीजन में बिना सेना के इस्तेमाल के नक्सलियों पर नियंत्रण पाया गया। जबकि बिहार में भी काफी हद तक नक्सलियों की गतिविधियों को पिछले पांच सालों में नियंत्रित किया गया है। झारखंड और छतीसगढ़ जैसी स्थिति नहीं है। बिना सोचे समझे कोई लेख न लिखे। पहले अपने दिमाग का इस्तेमाल करे। बाकी कुछ दो टकिया कमेंटेंटरों से कमेंट करवा अपने गलत लेख को सही मत ठहराए। इससे कोई फायदा नहीं होगा।

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    • Rajesh Kumar

      लगता है, संजीव पांडे जी बराबर कमेंटेटर खरीदते रहते हैं, क्योंकि इन्हें “दो टकिया कमेंटेंटर” मील जाते हैं.
      संजीव जी आपने अपनी सचाई बता ही दी की आतंकियों को मारो तो आपकी दुखती है . पर संजीव पांडे अब तुम जैसे देशद्रोही नहीं बच सकते. सेना क्या इन्हें और आपके जैसे क्षद्म समर्थकों को परमाणु बम से मारना चाहिए. रही बात ‘दो टकिया कमेंटेंटर’ की तो कम कम से कम आपके जैसे १० पत्रकारों को रोजी रोटी दे रखी है आज के डेट में . और मुझे यह भी पता है आपके जैसे पत्रकार कितने पैसे में किसी के चाटुकारिता में लिखते हैं. डोंट टेल मोर, आई नो योर रेट? पोल मत खुलवा अपनी संजीव पांडे…

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      • Mirtunjay Joshi

        प्रिय राजेश जी, मुझे लगता है संजीव पांडे जी को प्रसिद्धि की भूख भर है जो वो पूरा कर रहे हैं, कोई उनके लेख तो पढ़ता नहीं तो बस ज्यादा पढ़े जाने वाले किसी लेखक के पीछे पर गए, चलो ऐसे नहीं तो कम से कम कमेन्ट के बहाने ही तो लोग मुझे जानेंगें. और जैसा की उनहोने कहा वो बस दो टकिया वाले कमेंटेटर भर हैं. और जो आदमी कमेन्ट के भी दो टका ले वो इतना आतंकवाद का समर्थन फ्री तो नहीं कर सकता. अब समय आ गया है भाई जब तम्हारे जैसे लोगों का जांच होना ही चाहिए आखिर क्यों आतंकवाद का समर्थन कर रहे हो. निर्दोष मर रहे हैं , फिर इन दोषियों पर रहम क्यों ! और सेना आतंकवादीयों को मारेगी तो तुम्हारी क्यों फट रही है ?

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      • Vivek Kumar

        i’m agreed with Sanjeev Pandey………. and i think people over here shud show some decency in their expressions.

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    • Chandra Bhushan

      लेकीन आप तो खुद मोवादियों के पाले हुए पिल्लै की तरह बोलते हैं. कम से कम भाजपा और कांग्रेस के मीडिया एजेंट देशद्रोही तो नहीं, बेवकूफ संजीव पांडे ये कोई तर्क है की छत्तीसगढ़ में रोड ठीक नहीं है इसलिए उग्रवादियों से शान्ति वार्ता करें.
      भाई अगर छत्तीसगढ़ विश्व का विकटतम जगह भी हो तो आतंकवादी हैं ही मारने के लिए मरने के लिए.

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  9. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    पंकज झा के समसामयिक आलेख की शल्यक्रिया करने के बरक्श इसे एक जटिल समस्या पर मूलगामी चिंतन का udaghosh samajhna chahiye.

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  10. डॉ. सौरभ मालवीय

    sourabh malviya

    पंकज जी आप बधाई के पत्र है
    लगता है की सरस्वती जी की अपार
    कृपा आप पर है जरुरत है समाज को आप जैसे कलम के
    योद्दा की जो नक्सल को नसना बुत करदे

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  11. Rajesh Singh

    पंकज जी आपने अपने लेख में नक्सलियों के लेवी की बात करते नक्सली जंगलों में लेवी वसूल कर रहे है यह सभी जानते है कि वह एक हिंसक गुट है उसके लिए कोई नियम, कानून या संविधान मायने नहीं रखता किन्तु पुलिस के लिए तो मायने रखता है पुलिस महानगरों में लेवी ले रही है, दिल्ली में नहीं लेती, कोलकाता में नहीं लेती, चेन्नई में नहीं लेती, या मुंबई में नहीं लेती, ऐसा लिख कर नक्सलियों की लेवी जायज नहीं ठहरा रहा हूँ नक्सलियों की लेवी बिलकुल बंद होनी चाहिए, किन्तु क्या पुलिस की लेवी (हप्ता ) बंद होगी ? बस्तर में पूंजीवादी व्यवस्था का भी अपना एक ‘नक्सलवाद’ है। वह बस्तर से बस्तरिहा आदिवासियों को बेदखल कर अपने कारखाने लगाना चाहता है। वह दम भरता है कि लौह अयस्क को इस्पात में तब्दील कर देश-प्रदेश का विकास करेगा। इस बिंदु पर नक्सली आदिवासियों को अपने शिकंजे में लेते हैं।

    बस्तर को चूस लेने वाले कुछ पूंजीपति समाज-प्रवक्ता और बस्तर-रक्षक, दंतेवाडा-रक्षक की भूमिका से खुद को लैस किए हुए हैं। वे लोकतंत्र की हर आवाज को कुचलने का दुस्साहस करते हैं। यहां तक कि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और पत्रकारों को भी। आदिवासी नेताओं ने औसत वनवासी का जीवन सुधारने के बदले खुद अपना मलाईदार तबका तैयार कर लिया है। बस्तर के आवाम पर हो रहे पूंजीवादी हमले, नौकरशाही के जुल्म, ठेकेदारों के शोषण, पुलिसिया अत्याचार और नक्सली कत्लेआम के खिलाफ कोई आदिवासी मंत्री या नेता सार्थक, संगठित आवाज कहां उठा रहा है! सेवानिवृत्त आदिवासी नौकरशाहों का भी कोई संगठन नहीं है जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए सरोकार दिखाए।

    नक्सलवाद को सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किए बिना आतंकवाद विरोधी ढांचे का निर्माण नहीं किया जा सकता। क्योंकि इसे आर्थिक,सामाजिक और राजनीतिक समस्या मानने के दृष्टिकोण के रहते ऐसा करना संभव नहीं हो सकता था। इस नजरिये के बिना विभिन्न तरह के राजनीतिक पर्दों में छिपे लोकतंत्र विरोधी तमाम शक्तियों को एकजूट नहीं किया जा सकता था। इसके बिना उस छोटे से बौद्धिक वर्ग पर भी हमले की स्थितियां तैयार नहीं की जा सकती है जो भूमंडलीकरण के तमाम दबावों के बावजूद अपनी संवेदनशीलता और सरोकारों को बचाए हुए है।

    मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री के रूप में अपने प्रथम कार्यकाल में आर्थिक नीतियों के विस्तार की जो योजना तैयार की उसे नक्सलवाद की समस्या से जोड़े बिना आगे बढ़ाना संभव नहीं था। देश के जिन अमीर इलाकों में कब्जा जमाने से उसका विस्तार हो सकता था वो बदकिस्मती से दुनिया के सबसे बदहाल आबादी आदिवासियों के पैर के नीचे था।लेकिन यह संभव नहीं था कि आदिवासियों को विकास के बाधक के रूप में खड़ा करके उनके खिलाफ अभियान चलाया जा सकें। उसे एक नए वैचारिक शक्ल में पेश करना जरूरी था। माओवाद इसका चेहरा बना और उसे सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किया जाने लगा। दुनिया भर में भूमंडलीकरण के दौर में सत्ता का चरित्र बदला हैं और उसके तदानुरूप उसकी भाषा के अर्थ भी बदले हैं।

    मनमोहन सिंह ने जब नक्सलवाद को सबसे बड़े खतरे के रूप में पेश किया तो यह दमन के लिए प्रशिक्षित नौकरशाही के लिए संदेश के रूप में सामने आया। एक लंबा सिलसिला देखा जा सकता है इस समय सत्ता अपनी प्रशिक्षित मशीनरी के सामने अपने एजेंडे को पेश करने का इस तरह का तरीका विकसित किया है। प्रधानमंत्री के खतरे वाले बयान से पहले संसद में देशभर में हथियार बंद नक्सलियों की संख्या लगभग नौ सौ बतायी गई थी। दंतेवाडा में 75 केन्द्रीय पुलिस के जवानों के मारे जाने के बाद पी चिंदबरम उस संख्या के बढ़कर 14-15 हजार होने की बात कह रहे हैं।

    यह ठीक उसी तरह है जैसे जब शरद पवार मंहगाई के संदर्भ में इस तरह का बयान देते है कि वह कितने महीने तक बनी रह सकती है तो वह आकलन नहीं संदेश के रूप में होता है। संदेश उन आर्थिक वर्ग के लिए जो मंहगाई की व्यवस्था को सुदृढ़ कर और लाभ उठा सकें। इस तरह से संदेश देने की रणनीति का विकास हुआ है।

    विकास के नाम पर बस्तर, दंतेवाडा, बीजापुर की मिट्टी में पले-बढ़े लोग यहाँ के चीर-हरण से खुश और उसे नग्न देखने के अभिलाषी तथा सरकारी कौरव की सभा के हिमायती है बस्तर, दंतेवाडा, बीजापुर, चीर-हरण के मुद्दे पर सभी चुप हैं। न्यायपालिका ने अपनी भूमिका को खुद संकुचित कर लिया है। वहां कोई कृष्ण अय्यर, भगवती, मैथ्यू, खन्ना, कुलदीप सिंह नहीं हैं। अब तो समाचार पत्रों में संपादक की ही गौण भूमिका है। अब सब कुछ मैनेजमेंट फंडा है। गणेश शंकर विद्यार्थी, चेलापतिराव, नानपोरिया, पराड़कर, प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर, फ्रैंक मोरेस, करंजिया अपने इतने कम वंशज क्यों छोड़ गए?

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  12. keshav patel

    teek hi to hai shuravat to asi hi karni padegi hamne bghi bahut kuchh khoya hai in dino ab is par ya us par

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  13. पंकज झा

    पंकज झा.

    संजीव जी…आभारी हूं आपका जो आपने चिंता की मेरी. कम से कम आपने यह तो स्वीकार किया न कि मुझे अपनी नौकरी से भी प्यारी कई अन्य चीज़ भी है. हम आपको यह भरोसा दिलाना चाहते हैं कि मेरी पत्रिका जिसमें मैं नौकरी करता हूं, उसके अलावा अपने किसी भी विचार के लिए बीजेपी के प्रति जिम्मेदार नहीं हूं. मेरा कोई छुपा एजेंडा नहीं है.यह जानते हुए भी कि मेरी इस टिप्पणी को बीजेपी के बड़े लोग भी पढेंगे इस खुले मंच से मैं यह कहता हूं कि मैं भाजपा की विचारधारा का बंधक नहीं हूं और ना ही संघ से अपना कोई सम्बन्ध है. हमारा मानना यह है कि मेरी आस्था उस विचारधारा में है जिसे बीजेपी ने भी अपनाया हुआ है. जिसका झंडाबरदार संघ भी है. इसीलिए थोड़ी दोस्ती और थोड़ा ‘रोटी’ का सम्बन्ध भी है अपना. लेकिन जब भी कहीं मुझे यह लगता है कि मेरे राष्ट्र के हित के साथ कोई खिलवाड हो रहा है चाहे वो मेरे ‘मालिक’ द्वारा ही क्यू ना किया जा रहा हो तो मैं विभिन्न खुले मंच के द्वारा अपनी बात रखने से गुरेज़ नहीं करता हूं. और हमें इस बात का गर्व भी है. बिना आत्मश्लाघा के, भरपूर विनम्रता के साथ आपसे निवेदन की ‘प्रवक्ता’ पर ही मेरे, नक्सलवाद से सम्बंधित अन्य लेख और हाल के झारखण्ड प्रकरण पर दो लेख, या भाजपा पर ही लिखे कई लेख देखेंगे तो उपरोक्त बातें समझ में आ जायेगी. मेरा तो निवेदन ही यह है कि मेरे लिखे को किसी पार्टी के चश्मे से ना पढ़ा जाय. मुझसे रोटी की इतनी भी कीमत चुकाने को न कहा जाय. राष्ट्रवाद में निर्विवाद आस्था रखने के कारण/ बावजूद अपने को प्रोफेशनल पत्रकार ही समझता हूं, अपनी बिरादरी में शामिल करेंगे तो खुशी होगी मुझे. हां इतना तय है कि संघ से सम्बन्ध ना होने पर भी उसके राष्ट्र के प्रति निष्ठा में अब-तक मुझे रत्ती भर संदेह नहीं है.
    अब मुद्दे की बात…..नरेन्द्र मोदी ने क्या कहा यह वो जानें और उनका काम जाने. रमण सिंह ने हार माना है या नहीं इसपर भी मैं कुछ नहीं जानता. पिछले कई महीने से अपनी बात नहीं हुई है. पंजाब में केवल सेना का इस्तेमाल हुआ था स्वर्ण मंदिर की घेराबंदी में, बिल्कुल दुरुस्त. हम भी केवल अबूझमार की घेराबंदी में ही सेना का इस्तेमाल चाहते हैं,वह भी अत्यधिक सावधानी से. पंजाब का भूगोल निश्चय ही छत्तीसगढ़ से अलग है. लेकिन शायद जाफना (श्रीलंका का उदाहरण इस लेख में दिया गया है) का भूगोल बस्तर के जैसा ही है. और लिट्टे की ताकत के आगे नक्सली कही नहीं लगते जबकि श्रीलंका छत्तीसगढ़ से भी छोटा है शायद. तो इस अर्थ में सेना का इस्तेमाल किया जा सकता है. रमण सिंह को कुर्बानी देने को तैयार रहना ही चाहिए अपनी जानकारी के अनुसार वो नक्सलियों के हिट-लिस्ट में हैं भी शायद. बेअंत सिंह और इंदिरा गांधी के कोंग्रेस की सदस्यता पर अपनी कोई आपत्ति नहीं है. लिखते समय भी यह तथ्य इस लेखक के दिमाग में था कि वह दोनो महान बलिदानी कांग्रेसी ही थे. अगर वो वामपंथी या मुस्लिम लीग के भी सदस्य होते तब भी उनके इस महान बलिदान के प्रति अपनी ऐसी ही निष्ठा रहती….राजेश जी एवं सुनील जी की भावनाओं पर भी गौर करने का निवेदन…सहकार बनाए रखें….धन्यवाद.

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  14. संजीव पांडेय

    sanjiv panday

    पंकज जी क्या लिख रहे है। सेना का इस्तेमाल करे भारत सरकार। आप भाजपा के पत्रिका में नौकरी करते है। आज नरेंद्र मोदी ने नक्सल समस्या पर राय दी है। कहा है नक्सली अपने है। बातचीत की जानी चाहिए। कहीं आपकी नौकरी न चली जाए। फिर रमण सिंह क्या एकदम ही हार मान गए। पंजाब में सेना का इस्तेमाल हुआ था। सिर्फ स्वर्ण मंदिर के घेरेबंदी में। पंजाब का भूगोल छतीसगढ़ के भूगोल से अलग है। पंजाब में किसी भी जिला मुख्यालय से उस जिले के किसी भी गांव में आप आधे से एक घंटे में पहुंच सकते है। सड़क का नेटवर्क काफी अच्छा है। छतीसगढ़ में यह संभव नहीं है। फिर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की जान देने की बात आपने की है। जरा भाजपा वालों से पूछे। क्या रमण सिंह कुरबानी देने को तैयार है। क्योंकि इंदिरा कांग्रेसी थी और बेअंत सिंह भी कांग्रेसी थे।

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    • Rajesh Kumar

      आप के जैसे संजीव पांडे उस समय भी थे. जो चाहते थे. पंजाब कभी शांत ना हो.
      शांत न हो इसके लिए वे बस यही जतन करते रहते थे सरकार कहीं सेना ना भेज दे.
      तो बस वे मीडिया के द्वारा ये चर्चा चलाते रहते थे और सरकार पर ये दबाव बनाते थे की सिर्फ शांती वार्ता ही हल है, न की सेना भेजना.
      वही काम तो आप आज भी कर रहें हैं ?????

      मिस्टर संजीव पांडे कुछ भी लिखने से पहले ये मान लें की संजीव पांडे उस बहन का भाई है जिसकी बहन की इज्जत लुटी जा चुकी है माओवादियों द्वारा. जिसकी माँ को ज़िंदा जलाया है माओवादियों ने, जिसके भाई को जो आर्मी में था बेरहमी से मारा जा चुका है. जब तक यह करेक्टेर न आये आपके अन्दर तब तक ना लीखें आतंकवाद पर?

      आज उग्रवाद मजबूरी से नहीं डर से (माओवादियों के बन्दुक के नोक पर होने से) लोभ से (माओवादियों से मिलने से फायदा) थ्रुस्ट फॉर पॉवर के कारण से ना की गरीबी से भूख से है, अगर भूख होता कारण तब जे.एन.यु से पढ़ के कोई माओवादी नहीं होता?

      प्रायोजित सेना के बारे में कभी भी राय सैनिक को देख के नहीं उसके कमांडर को देख के लगाना चाहिए? आज के माओवादियों के कमांडर कोई भूखा, दरिद्र नहीं है बल्की संजीव पांडे जैसे सभ्य, पढ़े लिखे लोग हैं जो, अपनी सवार्थ की लड़ाई में गरीब आदिवासियों को मोहरा बना रहें है

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      • Vivek Kumar

        बहिनों कि इज्जत केवल नक्सल ही नहीं नेता, पुलिस, BSF, Army… के लोग भी लूटते रहे हैं…. उन्हें क्यों बख्श दिया भाई. भारत में रुचिका जैसों के अनेक भाई पुलिस के अत्याचार से मुजरिम बना दिये गये… अब वही नेता, पुलिस, Army के लोग न्याय देने आयेंगे.

        अच्छी योजना है.

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        • Chandra Bhushan

          बहिनों कि इज्जत अगर नेता, पुलिस, BSF, Army लूटे तो क्या इसका मतलब ये तो नहीं न की माओवादी भी लूटे तो कोई बात नहीं!
          अगर कोई भी माँ, बहन की इज्जत लूटे तो उसको फांसी पे चढ़ाना होगा भाई न की उससे शान्ति वार्ता करनी है, जैसा की संजीव पांडे ने कहा.
          आज माओवाद / नक्सलवाद सिर्फ कुच्छ लोग अपने पॉवर थ्रुस्ट और पैसा कमाने का जरिया होने के कारण से चला रहे हैं उनका कोई वैचारिक आधार नहीं है, वे विदेशों से पैसे लेकर देश में अशांति फैला रहे हैं, स्टेट वार के नाम पर निर्दोष लोगों को मार रहें हैं, माँ बहन की इज्जत लुट रहे हैं, भोले भाले आदिवासियों को बन्दुक के नोक पर आतंकवादी बना रहे हैं.

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  15. sunil patel

    मजबूर इक्षाशक्ति से है पंजाब खालिस्तान समस्या पर काबू पाया जा सका है.

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