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    Homeसाहित्‍यकवितानयन विच निहारिका !

    नयन विच निहारिका !

    नयन विच निहारिका, दिखाती अपनी छटा;
    अधर अमृत की वर्षा, हर्ष ज्योतिर्मय घटा !

    छिटकती छवि की आभा, नज़र की विपुल विधा;
    रिझाती ऋतम्भरा, हुए शिशु स्वयम्वरा !
    पिंगला इड़ा क्रीड़ा, सुषुम्ना स्मित मना;
    झाँकती विश्व लहरियाँ, झूल कर माँ की बहियाँ !

    श्वाँस हर आहट पा के, प्राण की चाहत ताके;
    खोल नैनन वो झाँके, समाधि से जग ताके !
    चला फिर बापस जाए, आत्म गति डूबे डुबा;
    वत्स ‘मधु’ मौनन भाषा, प्रभु संग देखी देखा !

    गोपाल बघेल ‘मधु’

    गोपाल बघेल 'मधु'
    गोपाल बघेल 'मधु'
    गोपाल बघेल ‘मधु’ अध्यक्ष अखिल विश्व हिन्दी समिति आध्यात्मिक प्रबंध पीठ मधु प्रकाशन टोरोंटो, ओन्टारियो, कनाडा www.GopalBaghelMadhu.com

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