खेल के लिए ईमानदार नीति की जरुरत

अरविंद जयतिलक

किसी भी राष्ट्र की प्रतिभा खेलों में उसकी उत्कृष्टता से बहुत कुछ जुड़ी होती है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलों में अच्छा प्रदर्शन केवल पदक जीतने तक सीमित नहीं होता बल्कि राष्ट्र के स्वास्थ्य, मानसिक अवस्था एवं लक्ष्य के प्रति सतर्कता व जागरुकता को भी निरुपित करता है। साथ ही मानव के समग्र विकास में भी खेलों की अहम भूमिका होती है। खेल मनोरंजन के साधन और शारीरिक दक्षता पाने के एक माध्यम के साथ-साथ लोगों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित करने और उनके बीच के संबंधों को बेहतर बनाने में भी सहायता करता है। दो राय नहीं कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेल के क्षेत्र में प्राप्त उपलब्ध्यिों ने हमेशा ही देश को गौरान्वित किया है। लेकिन सच्चाई यह है कि सवा अरब की आबादी वाले देश में उत्कृष्ट खिलाड़ियों, अकादमियों और प्रशिक्षकों की भारी कमी है और उसका नतीजा यह है कि देश खेल के क्षेत्र में अभी भी बहुत पीछे है। एक आंकड़े के मुताबिक देश में सिर्फ पंद्रह प्रतिशत लोग ही खेलों में अभिरुचि रखते हैं। गौर करें तो इसके लिए समाज का नजरिया और सरकार की नीतियां दोनों जिम्मेदार हैं। समाज में अभी भी वहीं पुरानी धारणा स्थापित है कि खेल के बजाए पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए। दरअसल समाज को लगता है कि खेलकूद के जरिए नौकरी या रोजी-रोजगार हासिल नहीं किया जा सकता। यह सच्चाई भी है। गौर करें तो सरकार का ध्यान भी खेलों के आधारभूत ढांचे में परिवर्तन और उससे रोजगार को जोड़ने के प्रति नहीं है। उसका पूरा ध्यान इस बात पर होता है कि राष्ट्रीय खेल अकादमियों को अध्यक्ष व सदस्य कौन होगा। देखा भी जाता है कि जब भी सरकारें बदलती हैं तो खेल में खेल होना शुरु हो जाता है। यहां तक कि मामला न्यायालय की चैखट तक पहुंच जाता है और उसे दखल देना पड़ता है। दुर्भाग्यपूर्ण यह कि खेल संगठनों के नियंता भी ऐसे लोग हैं जिन्हें खेल का एबीसीडी भी मालूम नहीं लेकिन उन्हीं के हाथों में खेल का भविष्य है। भला ऐसे माहौल में खेल का विकास कैसे होगा। खेलों के विकास के लिए जरुरी है कि सरकार स्पष्ट नीति के साथ स्कूलों, काॅलेजों, विश्वविद्यालयों व खेल अकादमियों में धनराशि बढ़ाकर बुनियादी ढांचे के विकास की गति तेज करे ताकि खेल की क्षमता बढ़ सके। उचित होगा कि सरकारें स्कूल स्तर से ही खेल को बढ़ावा देने का काम शुरु करें। स्कूलों में बच्चों की प्रतिभा एवं विभिन्न खेलों में उनकी अभिरुचित का ध्यान रखकर उन्हें विभिन्न वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। इसके बाद उन्हें उचित प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध होना चाहिए। लेकिन सच्चाई है कि स्कूलों में खेल के प्रति उदासीनता है और उसका मूल कारण खेल संबंधी संसाधनों की भारी कमी और खेल से जुड़े योग्य अध्यापकों का अभाव है। कमोवेश स्कूलों जैसे ही हालात माध्यमिक विद्यालयों की भी है। यहां खेल का केवल औपचारिकता निभाया जाता है। दूसरी ओर काॅलेजों और विश्वविद्यालयों की बात करें तो यहां संसाधन तो हैं लेकिन इच्छाशक्ति के अभाव में खेलों के प्रति छात्रों की अनासक्ति बनी हुई है। उचित होगा कि केंद्र व राज्य सरकारें खेलों में सुधार के लिए पटियाला में स्थापित खेल संस्थान की तरह देश के अन्य स्थानों पर भी संस्थान खोलें। ऐसा इसलिए कि उचित प्रशिक्षण के जरिए देश में खेलों का स्तर ऊंचा उठाया जा सकता है। यहां यह भी ध्यान देना होगा कि जब तक खेलों को रोजगार से नहीं जोड़ा जाएगा तब तक देश में खेलों की दशा सुधरने वाली नहीं है। अगर खेलों में नौजवानों को अपना भविष्य सुनिश्चित नजर आएगा तभी वे बढ़-चढ़कर हिस्सा लेंगे। खेलों में भविष्य सुरक्षित न होने के कारण ही नौजवानों में उदासीनता है और खेल के क्षेत्र में देश की गिनती फिसड्डी देशों में होती है। यहां यह भी ध्यान देना होगा कि खेल में स्थिति न सुधरने का एकमात्र कारण सरकार की उदासीनता भर नहीं है। बल्कि खेल से विमुखता के लिए काफी हद तक समाज का नजरिया भी जिम्मेदार है। आज भी देश में एक कहावत खूब प्रचलित है कि ‘पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे होगे खराब’। देखा जाता है कि अकसर माता-पिता के माथे पर चिंता की लकीरें खींच आती हैं जब उनका बच्चा आवश्यकता से कुछ ज्यादा खेलने लगता है। उन्हें डर सताने लगता है कि उनका बच्चा खेलेगा तो पढ़ेगा ही नहीं। स्कूलों में भी गुरुजनों द्वारा बच्चों को डांटते हुए सुना जाता है कि दिन भर खेलोगे तो पढ़ोगे कब। अगर सरकार की नीतियों में खेल से रोजगार का जुड़ाव हो तो फिर माता-पिता के मन में बच्चे के भविष्य को लेकर किसी तरह की चिंता नहीं होगी। सच तो यह है कि देश में खेल के प्रति उत्साहजनक वातावरण निर्मित नहीं हो पा रहा है और उसी का नतीजा है कि आज देश अंतर्राष्ट्रीय खेलपदकों से महरुम रह जाता है। हां, यह सही है कि अब पहले के मुकाबले ओलंपिक और एशियाड खेलों में भारत के खिलाड़ी उत्तम प्रदर्शन कर रहे हैं और वे पदक जीतकर देश का मान बढ़ा रहे हैं। लेकिन सच यह भी है कि देश में खेल का मतलब क्रिकेट बनकर रह गया है और बाकी खेलों को दरकिनार कर दिया गया है। फुटबाल, कबड्डी, तीरंदाजी, जिमनास्टिक जैसे खेल के खिलाड़ियों को उस तरह का सम्मान नहीं मिलता जितना कि क्रिकेटरों को। यहां तक कि विज्ञापनों में भी क्रिकेटर ही छाए रहते हैं। यहीं वजह है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलों में भारत की दशा चिंतनीय और शोचनीय है। खेल प्रदर्शनों पर गौर करें तो ब्राजील के रियो ओलंपिक 2016 में भारत का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक व लचर रहा। रियो में 119 खिलाड़ियों का दल भेजा गया था लेकिन भारत को सिर्फ दो मेडल मिले। रियो में सिर्फ पीवी सिंधु (सिल्वर) और साक्षी मलिक (कांस्य) ही मेडल जीत पायी। किसी भी भारतीय पुरुष को मेडल नहीं मिला। दो मेडल के साथ भारत को मेडल लिस्ट में 67 वां स्थान मिला। इस दयनीय स्थिति से समझा जा सकता है कि भारत में खेलों की क्या स्थिति है। यह सच्चाई है कि दुनिया के दूसरे सर्वाधिक जनसंख्या वाले हमारे देश में खेलों का जो स्तर होना चाहिए वह नहीं है। भारत को अपने पड़ोसी देश चीन से सीखना चाहिए कि 1949 में आजाद होने के बाद 1952 के ओलंपिक में एक भी पदक नहीं जीता लेकिन 32 वर्ष बाद 1984 के ओलंपिक में 15 स्वर्ण पदक झटक लिया। आज चीन हर ओलंपिक खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर दुनिया को अचंभित कर रहा है। उसके ओलंपिक पदकधारकों में महिलाओं की तादाद भी अच्छी होती है। अच्छी बात यह है कि अब भारत में भी महिला खिलाड़ी कीर्तिमान रच रही हैं। दरअसल चीन ने खेल को प्राथमिकता में शामिल कर अपनी नीतियों को उसी अनुरुप ढाला है जिसके अपेक्षित परिणाम सामने आ रहे हैं। अगर भारत भी नई प्र्रतिभाओं को खेल के प्रति आकर्षित करना चाहता है तो उसे गांवों से लेकर नगरों तक के खेल की बुनियादी ढांचे में आमुलचूल परिवर्तन करना होगा। उसे खेल प्रशिक्षण की आधुनिक अकादमियों की स्थापना के साथ-साथ समुचित प्रशिक्षण, खेल धनराशि में वृद्धि तथा प्रतियोगिताओं का आयोजन करना होगा। उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों एवं प्रशिक्षकों को सम्मानित करना होगा। यही नहीं मेजर ध्यानचंद जैसे अन्य महान खिलाड़ी को भी भारत रत्न की उपाधि से विभुषित करना होगा। गौरतलब है कि आज भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मन पद्मभूषण से सम्मानित मेजर ध्यानचंद  का जन्मदिन है। खेल में उनके महत्वपूर्ण योगदान के सम्मान में उनके जन्मदिन को भारत में खेल दिवस के रुप में मनाया जाता है। मेजर ध्यानचंद विश्व हाॅकी में शुमार महानतम खिलाड़ियों में से एक अद्भुत खिलाड़ी रहे हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा व लगन से देश का मस्तक गौरान्वित किया। दो राय नहीं कि अब खेलों के प्रति बदलते नजरिए से भारत खेल के क्षेत्र में प्रगति कर रहा है लेकिन सच तो यही है कि अभी भी चुनौती जस की तस बरकरार है। यहां समझना होगा कि जब तक खेल के विकास के लिए ईमानदार नीतियों को आकार नहीं दिया जाएगा और खेल को रोजगार से जोड़ा नहीं जाएगा तब तक भारत में खेल के विकास की गति धीमी ही रहेगी।

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