गांधी और गोड्से पर विमर्श की आवश्यकता

                                             मनोज ज्वाला
       किसी की हत्या कर देना ‘राष्ट्रद्रोह’ का पर्याय नहीं हो सकता,
अपरिहार्य राष्ट्रीय कारणों से किये जाने पर तो कतई नहीं । नत्थुराम
गोड्से के सम्बन्ध में यह तथ्य एक बहुत बडा सत्य है । महात्मा गांधी की
हत्या करने का अपयश मोल लेने के बावजूद गोड्से के मन में गांधी जी के
प्रति अनुराग-सम्मान युक्त सद्भाव सर्वाधिक था, किसी गांधीवादी से भी
ज्यादा ! अतएव गोड्से के प्रति नफरत गांधीवाद की खिलाफत है ।  नत्थूराम
गोड्से ने गांधीजी को गोली मार कर मौत के मुंह सुला दिया, यह तो एक
ऐतिहासिक सत्य है ; किन्तु गोड्से के मन में गांधी के प्रति
श्रद्धा-सम्मान युक्त अनुरागपूर्ण सद्भाव भरा हुआ था, यह एक भी एक
प्रामाणिक सत्य है । इसके प्रमाण आज भी देखे जा सकते हैं । जी हां ,
महात्मा के प्रति गोड्से के अनुराग  का प्रमाण ! पुणे के गोड्से सदन में
नत्थूराम की पार्थिव देह की राख व अस्थियां महात्माजी के सम्मान की
अक्षुण्णता कायम करने के लिए आज भी इस उद्देश्य से रखी हुई हैं कि वो
गोड्से की अंतिम इच्छा के अनुसार अखण्ड-भारत की सिन्धु नदी में ही
विसर्जित की जाएंगी । अर्थात भारत-विभाजन की रेखा जब मिट जाएगी या यों
कहिए कि पाकिस्तान के आधिपत्य को मिटा कर सिन्धु नदी जब भारत-राष्ट्र के
ध्वज की छाया में बहने लगेगी तब , चाहे इसमें सैकडों वर्ष और कई पीढियां
ही क्यों ने बीत जाएं । मालूम हो कि गोड्से ने अपनी इच्छा व्यक्त करते
हुए जब ये बातें कही थी; तब जैसा कि ‘गांधी वध और मैं’ नामक पुस्तक में
उनके छोटे भाई गोपाल गोडसे ने लिखा है- उन्होंने उनसे जब यह पुछा कि आम
हिन्दू तो गंगा में अस्थियां विसर्जित करना-कराना चाहता है , किन्तु आप
सिन्धु में विसर्जन क्यों चाहते हैं ? तब इस प्रश्न का उतर देते हुए
गोड्से ने जो कारण बताया था, वह महात्मा के प्रति  गोड्से के अनुरागपूर्ण
सद्भाव का सबसे बडा गांधी-प्रमाण है । बकौल गोपाल गोड्से- नत्थुराम ने
कहा था- “सिन्धु नदी में अपनी अस्थियां विसर्जित करवा कर मैं पाकिस्तान
से गांधी जी के अपमान का बदला चुकाना चाहता हूं” ।
      आज अधिकतर लोगों को शायद यह मालूम नहीं है कि जिस महात्मा ने
अपनी जान संकट में डाल अनशन कर के भारत सरकार से पाकिस्तान को पचपन करोड
रुपये दिलवा कर उसे संजीवनी प्रदान किया था, उस पाकिस्तान ने उस गांधी को
उनके उस एहसान के बदले में कितना अपमानित किया । मालूम हो कि गांधीजी के
निधनोपरांत भारत सरकार ने उनकी पार्थिव देह की राख व अस्थियां दुनिया भर
की तमाम छोटी-बडी नदियों में विसर्जित करायी थी, जिसका किसी भी देश में
किसी के द्वारा कोई विरोध नहीं किया गया था । किन्तु  पाकिस्तान के नक्शे
में प्रवाहित सिन्धु नदी में राख व अस्थियां विसर्जित करने की अनुमति
देने से मुस्लिम लिगी पाकिस्तानी आकाओं ने यह कहते हुए साफ इंकार कर दिया
था कि ‘गांधी काफिर हिन्दुओं  के नेता थे’ और इस कारण उनका देहावशेष
नापाक है, जो पाक में बहने वाली किसी नदी के लिए कतई मुनासिब नहीं है ।
आप समझ सकते हैं कि पाकिस्तानी हुक्मरानों का वह रुख एहसानफरामोशी व
बेमुरव्वती की कैसी जाहिल मिशाल थी कि जिस गांधी की जान पाकिस्तान के
सहयोगार्थ किये गए अनशन की प्रतिक्रिया से भडकी हिन्दू-भावनाओं की
गोलियां खा कर चली गई , उसे उनने ‘काफिर’ , ‘नापाक’ व ‘हिन्दू-नेता’ कह
कर अपमानित ही नहीं, तिरष्कृत भी कर दिया । कराची से भारतीय उच्चायुक्त
श्रीप्रकाश ने नई दिल्ली को जब यह सूचना दी कि पाकिस्तान सिन्धु नदी में
गांधीजी की भस्मी विसर्जित करने की इजाजत उनके हिन्दू होने की वजह से
नहीं दे रहा है , तब तत्कालीन कांग्रेसी सरकार और कांग्रेसी नेताओं  ने
महात्माजी के सम्मान की अक्षुण्णता को बिगाडने वाले उस अपमान का कोई
प्रतिकार करना भी उचित नहीं समझा । किन्तु कारागार की काल-कोठरियों में
कैद हो कर अपनी फांसी के दिन गिन रहे नत्थूराम गोड्से ने अखबारों से यह
जानकारी प्राप्त होने के पश्चात गांधीजी के उस अपमान का बदला चुकाने
के बावत अपने उतराधिकारी परिजनों के नाम लिखे  ‘मृत्यु-पत्र’ में अपनी
अस्थियों को सिन्धु में ही विसर्जित करने की जो सख्त हिदायत कर दी, सो महात्मा
गांधी के प्रति उनके उत्त्कट अनुराग-प्रेम का ही परिचायक है । ऐसे में
गोड्से को आतंकवादी या राष्ट्रद्रोही नहीं कहा जा सकता, क्योंकि
‘गांधी-वध’ का उनका कृत्य वास्तव में विभाजनकारी जिहाद-प्रेरित
मुस्लिम-आतंकवाद के विरुद्ध क्रियात्मक प्रतिकार का परिणाम था ।  सामान्य
तौर पर कोई हत्यारा जिस व्यक्ति की हत्या का दण्ड भुगत रहा हो, वह उस
व्यक्ति के अपमान पर खुश हो कर उसका उपहास करता ही पाया जा सकता है ;
किन्तु महात्माजी की हत्या के अभियुक्त- नत्थुराम की तत्सम्बन्धी असामान्य
प्रतिक्रिया आज भी यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि गोड्से का
महात्मानुराग किसी भी गांधीवादी की तुलना में अधिक उदात व उत्त्कट था ।
गोड्से की आत्मा तो महात्माजी की प्रतिज्ञा के विरुद्ध बने पाकिस्तान को मिटा देने
और लीगियों द्वारा किये गए उनके उपरोक्त अपमान को  सिन्धु नदी में धो डालने के
बावत उसे भारत-भू का भाग बना लेने के निमित्त उसमें अपनी अस्थियां
विसर्जित कराने को बेचैन है, किन्तु उन ‘महात्मा’ की वैशाखी के सहारे सत्ता का
सुख-चैन भोगते रहने वाले कांग्रेसियों और सत्य-अहिंसा का राग आलापते रहने
वाले तथाकथित गांधीवादियों ने तो  उनके उस अपमान व तिरष्कार का मौन
समर्थन करते रहना ही मुनासिब समझा ।
             महात्माजी के जीते-जी नेहरु-कांग्रेस ने उनके ‘हिन्द-स्वराज’
की धज्जियां उडा दी थी और उनकी प्रतिष्ठा जिन विशेषताओं के कारण
‘महात्मा’ के रुप में कायम हुई थी, उनकी अवहेलना करते हुए हत्या की
प्रतिक्रियावश पूरे महाराष्ट्र भर में हजारों चितपावण-ब्राह्मणों की
हत्यायें कर उन आदर्शों को भी धूमिल कर दिया । गोड्से द्वारा
गांधी-प्रेमियों व गांधी-भक्तों को पत्र लिख-लिख कर यह निवेदन किया जाता
रहा कि वे गांधी-हत्या का औचित्य-अनौचित्य सिद्ध कर हत्यारे को अपराध-बोध
कराते हुए पश्चाताप के लिए विवश कर गांधी-दृष्टि से उसका हृदय-परिवर्तित
कर गांधीवाद की अपराजेयता प्रमाणित कर दें । महात्मा गांधी के ज्येष्ठ
पुत्र रामदास गांधी ने इस बावत उत्सुकता भी जतायी थी और दोनों के बीच इस
हेतु कई पत्राचार भी हुए थे । किन्तु तत्कालीन
प्रधानमंत्री नेहरु ने इसकी अनुमति ही नहीं दी तो जाहिर है- विमर्श हो ही
नहीं सका ।  फिर गांधीजी के तीसरे पुत्र
देवदास गांधी ने भी जब ऐसी कोशिश की, तब दो बडे गांधीवादियों- आचार्य
विनोबा भावे व किशोरी लाल मश्रुवाला को नाथूराम से मिलाने  की बात सरकार
के स्तर पर तय जरूर हुई, किन्तु अन्ततः नेहरुजी की अनुमति नहीं मिल पाने
के कारण वह क्रियान्वित नहीं हो सकी । इस तरह, महात्मा गांधी के तथाकथित
प्रेमियों ने गांधीवाद को भी कैद कर गोडसे की विचारणाओं-भावनाओं को जाने
बिना ही उन्हें राष्ट्रद्रोही करार दे दिया, जबकि अदालत में गोडसे ने जो
बयान दिया उसे भी सार्वजनिक नहीं कर प्रतिबंधित कर दिया । गोड्से की पहल
और महात्माजी के पुत्रों की इच्छा के अनुसार अगर उस हत्याकाण्ड के
औचित्य-अनौचित्य एवं गोड्से के कृत्य-कुकृत्य पर सार्वजनिक बहस-विमर्श
हुआ रहता, तो उसके निष्कर्षों से और कुछ होता या नहीं, किन्तु देश को
इतना लाभ जरूर होता कि गोड्से को ‘आतंकवादी राष्ट्रद्रोही’ या
‘गांधीहन्ता किन्तु राष्ट्रभक्त’ माने जाने सम्बन्धी दो प्रकार की
मान्यतायें आकार ही नहीं ले पातीं, तो इसे ले कर दो पक्षों के बीच
वैचारिक टकराव भी नहीं होता । किन्तु अपेक्षित वैचारिक विमर्श का जो काम
तब के विचारशील कांग्रेसियों-गांधीवादियों को करना चाहिए था, वह आज के
‘गांधी’ नामधारियों द्वारा भी नहीं किया जा रहा है और गोड्से को देशभक्त
बताये जाने सम्बन्धी भाजपा सांसद- साध्वी प्रज्ञा के  तत्सम्बन्धी बयान
के विरोध में कांग्रेसी नेता राहुल गांधी द्वारा उन्हें बिना किसी आधार
के ही आतंकवादी सिद्ध करने का राग आलापा जा रहा है । यह नत्थूराम गोड्से
और साध्वी प्रज्ञा के लिए तो कम किन्तु महात्मा गांधी के लिए अधिक
त्रासदपूर्ण है ।

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