चौर्यकला का नूतन अध्याय

विजय कुमार

भारत एक कलाधर्मी देश है। कला के गाना, बजाना, चित्रकला, मूर्तिकला, लेखन आदि 64 प्रकार हैं। इनमें एक ‘चौर्यकला’ भी है। इसका प्राथमिक ज्ञान तो हमें बचपन में ही हो जाता है। मां जब पिताजी से छिपाकर कुछ पैसे रख लेती है। बच्चे बाजार से सामान लाते समय दो-चार रु. बचा लेते हैं। व्यापारी भी तराजू, बाट या मीटर को घटा-बढ़ाकर कुछ हेरफेर कर लेता है। कर्मचारी बच्चों के लिए दफ्तर से कागज-कलम ले आते हैं। जेब काटना और अंधेेरे में किसी घर या दुकान में सेंध लगाना इस कला का उत्कृष्ट रूप है।चोरी के बारे में भारतीय साहित्य और फिल्म जगत सदा जागरूक रहा है। चोरी-चोरी, चोरों का राजा, हेराफेरी, चोरी मेरा काम.. जैसी कई फिल्मों ने सरेआम जनता की जेब काटी है। चोर और चोरी पर बने गाने भी खूब प्रचलित हुए हैं। दिल की चोरी के बिना तो कोई फिल्म आगे बढ़ती ही नहीं है। चोरी जैसा ही काम ठगी भी है। इस पर एक बहुचर्चित फिल्म अभी आयी है। यद्यपि बड़े कलाकारों के बावजूद जनता ने इस बार ठगे जाना स्वीकार नहीं किया।कुछ चोर सफेदपोश होते हैं। ये लोग टैक्स चुराते हैं या फिर बैंक से कर्ज लेकर विदेश भाग जाते हैं। नीरव मोदी और विजय माल्या को कौन नहीं जानता ? पुलिस-प्रशासन के कई बड़े लोग भी जाल में फंसे हैं। जांच करने वालों की ही जांच हो रही है। कई तो जेल में भी हैं।राजनेताओं का तो कहना ही क्या ? न जाने क्यों भारत में अधिकांश राजनेता चोर ही माने जाते हैं। यद्यपि उसके लिए उन्होंने एक भला सा शब्द ‘भ्रष्टाचार’ गढ़ लिया है। कुछ नेता तो इसके बल पर ही गांव की राजनीति से राज्य और केन्द्र तक पहुंचे हैं। माननीय पुलिस विभाग के बारे में भी लोगों की यही राय है।कुछ लोग कहते हैं कि गरीब लोग ही चोरी करते हैं; पर अनुभव इसके विपरीत है। निर्धन व्यक्ति अधिक धार्मिक होता है। इसलिए रिक्शा या आॅटो वाले प्रायः सामान लौटा देते हैं; पर तथाकथित बड़े लोगों के साथ ऐसा नहीं है। आपको विश्वास न हो, तो रेल विभाग से पूछ लें।रेल वालों को हमेशा यह शिकायत रही है कि साधारण डिब्बों में पंखे और बल्ब तथा शौचालय से मग और शीशे पार हो जाते हैं; पर अब इसमें एक नया आयाम जुड़ गया है। गत एक साल में ए.सी. यात्रियों ने भी 14 करोड़ रु. के कम्बल, चादर, तकिये और तौलिये पार कर लिये हैं। छी-छी।मेरे एक मित्र ने बताया कि डिब्बे के प्रबंधक अब तौलिया तो देते ही नहीं है। क्योंकि उसके गायब होने की बहुत शिकायत थी। लोग बिस्तर अस्त-व्यस्त छोड़कर उतर जाते हैं। बाद में प्रबंधक सिर पीटता रहता है। क्योंकि छोटा सा तौलिया बैग में बड़े प्रेम से आ जाता है। बेचारा प्रबंधक किस-किसका सामान देखे ? मजबूरी में उसे इसका पैसा अपनी जेब से भरना पड़ता है। इसलिए तौलिये का रिवाज ही खत्म कर दिया गया।पर कंबल, चादर और पूरा तकिया ले जाना तो आसान नहीं है। हो सकता है कुछ शेरदिल ऐसे भी हों; पर अधिक संभावना यही है कि तौलिये, तकिये और उसके खोल का पैसा पूरा करने के लिए डिब्बे के प्रबंधक ही कंबल और चादर से अपनापन दिखा देते हों। आखिर उन्हें भी तो अपना परिवार पालना है। कुछ पैसा तो वे बिस्तर को देर से धुलवा कर निकाल लेते हैं; पर इससे भी घाटा पूरा नहीं होता।इस बारे में हमारे प्रिय शर्मा जी का कहना है कि यात्रियों का व्यवहार चोरी है और प्रबंधकों का सीनाजोरी; पर मेरा मानना है कि यह ‘चौर्यकला’ है। पुराने समय में मकान, दुकान और खजाने में ही चोरी होती थी; पर अब रेलगाड़ी और हवाई जहाज का जमाना है। अतः साहित्यकारों को कला के इस नूतन अध्याय का भी अध्ययन करना चाहिए।

 

 

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