सेक्युलरिज्म की अग्नि में झुलसता ‘न्यू इंडिया’

 आशीष रावत

देश में एक शब्द का प्रयोग बड़े जोर-शोर से किया जाता है। उस शब्द का नाम है ‘सेक्युलर’। यह हमारी राजनीतिक प्रणाली में क्यों और किस तरह से आया? जब इस शब्द का प्रादुर्भाव हुआ था तब किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि इस शब्द का भारत की राजनीति पर इतना असर होगा। अब जरा सोचकर देखिए, क्या कोई व्यक्ति सेक्युलर हो सकता है? सेक्युलर अर्थात् जिसका धर्म से दूर-दूर तक कोई वास्ता न हो, वह किसी भी धर्म को न माने। क्या कोई व्यक्ति सेक्युलर हो सकता है, जो नेता सेक्युलर होने का दंभ भरते हैं, क्या वे सेक्युलर हैं? असल रूप में सेक्युलर व्यक्ति नहीं होता, सत्ता होती है, राज व्यवस्था होती है। जिसका किसी भी धर्म से कोई रिश्ता नहीं होता। जो न्याय के सिद्धांत पर आधारित होती है। भारत में हमेशा से ही न्याय और धर्म को पृथक रखा गया है। हर राज व्यवस्था लौकिक होती है, उसका परमात्मा, अध्यात्म, पारलौकिकता, उपासना से कोई संबंध नहीं होता, होना भी नहीं चाहिए, ऐसा हम भारतीयों का आग्रह होता है और वैसा व्यवहार भी होता है।

15 नवम्बर, 1948 को जब संविधान सभा में संविधान की प्रस्तावना पर बहस चल रही थी तब संविधान सभा के सदस्य के. टी. शाह ने सेक्युलर, फेडरल और सोशलिस्ट जैसे शब्दों को जोड़ने का प्रस्ताव रखा। लेकिन ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया। डॉ. अम्बेडकर की दलील थी कि संविधान में पहले ही इन बातों की व्यवस्था है। इन्हें प्रस्तावना में डालना जरूरी नहीं और देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है। ऐसे में इस तरह के दायरे बनाना जरूरी नहीं। 1950 में संविधान के लागू होने के करीब 26 वर्ष बाद 42वें संशोधन के जरिए संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलर और सोशलिस्ट शब्द जोड़ा गया। उसके बाद से ही यह दोनों शब्द संविधान की प्रस्तावना का हिस्सा बन गए। अक्सर यह प्रश्न उठता है कि जब डॉ. अम्बेडकर ने 1949 में इन शब्दों को जोड़ना जरूरी नहीं समझा तो 1976 में ऐसा क्या हो गया कि इंदिरा गांधी की सरकार ने संविधान संशोधन लाकर सेक्युलर शब्द को भारत के संविधान का हिस्सा बना दिया? इसके बाद वाजपेयी सरकार ने भी 1998 में संविधान की समीक्षा के लिए कमेटी बनाई। तब ये बहस उठी कि संविधान के मूल ढांचे को प्रभावित करने की कोशिश है, पंथनिरपेक्षता और आरक्षण को खत्म करने की कोशिश है। लेकिन तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने उस वक्त एक लम्बे लेख में केशवानंद भारती केस का जिक्र करते हुए लिखा कि सेक्युलरिज्म भारत की संस्कृति में है। अगर हम संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलर शब्द को धर्मनिरपेक्ष मान लें और अपने संवैधानिक प्रावधानों पर गौर करें तो पाते हैं कि संविधान धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यकों का पूर्णरूपेण ख्याल रखता है। अनुच्छेद 25 से लेकर अनुच्छेद 30 तक इस विषय में कई प्रावधान मौजूद हंै। इस तरह से हमारा संविधान जब धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यक होने की बात करता है तो वह नागरिकों के धर्म को विचार में लेता है या सापेक्ष हो जाता है। इसके अलावा अनुच्छेद 14 से लेकर 21 तक जो मौलिक अधिकार दिए गए हैं उनमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है और अगर संविधान हमें किसी भी धर्म के प्रति निरपेक्ष होने को कहता है तो यह हमारे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन होगा क्योंकि अनुच्छेद 25 में हमें वही संविधान अपने पसंद के धर्म को चुनने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता देता है।

हाल ही में अनन्त कुमार हेगड़े ने इच्छा व्यक्त की कि क्या भारत के संविधान से सेक्युलर शब्द हटाया जा सकता है? उन्होंने कहा कि कुछ लोग कहते हैं कि सेक्युलर शब्द है तो आपको मानना पड़ेगा। क्योंकि यह संविधान में है, हम इसका सम्मान करेंगे लेकिन यह आने वाले समय में बदलेगा। संविधान में पहले भी कई बदलाव हुए हैं। अब हम हैं और हम संविधान बदलने आए हैं।’ उनके शब्द थे, ‘सेक्युलरिस्ट लोगों का नया रिवाज आ गया है। अगर कोई कहे कि वो मुस्लिम है, ईसाई है, लिंगायत है, हिन्दू है तो मैं खुश होऊंगा। क्योंकि उसे पता है कि वो कहां से आया है। लेकिन जो खुद को सेक्युलर कहते हैं, मैं नहीं जानता कि उन्हें क्या कहूं। ये वो लोग हैं जिनके मां-बाप का पता नहीं होता या अपने खून का पता नहीं होता।’ गत दिनों उप-राष्ट्रपति वैंकेया नायडू ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के लिए अपने भाषण में कहा था कि भारत सिर्फ इसलिए सेक्युलर नहीं है क्योंकि यह हमारे संविधान में है। भारत सेक्युलर है क्योंकि सेक्युलरिज्म हमारे ‘डीएनए’ में है।

अब अगर स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो आज सेकुलरिज्म का मतलब रह गया है तुष्टिकरण। हमारे संविधान निर्माताओं ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस शब्द को वो एक आधार बना रहे हैं वो विकृत होते-होते खुद आधारहीन हो जाएगा। आज सेक्युलर वो है जो मुसलमानांे के पक्ष में बोलकर, उनकी सहानुभूति बटोरकर सत्ता का सुख भोगे और फिर उन्हें हिन्दुओं से खतरा बताकर बेवकूफ बनाता रहे। इसी सेक्युलर शब्द के कारण ही आज हमारे देश की स्थिति इतनी विकराल हो गई है कि बयां करना तक मुश्किल हो गया है। मुसलमानांे की इतनी तरफदारी होती है कि जिससे हिन्दुओं में उनके प्रति ईष्र्या भड़कने लगती है और जिसे कुछ संगठन हवा देकर द्वेष बना देते हैं और ये अब इतना बढ़ गया है कि आज किसी मंदिर में गाय का मांस या किसी मस्जिद में सूअर का मांस मिलते ही दो-चार लाशें बिछा दी जाती हैं मगर हकीकत क्या थी बाद में पता चलता है। मुसलमान की बस्ती से दुर्गा पूजा का जुलुस या हिन्दू कि बस्ती से मुहर्रम का जुलुस निकलने पर आपस में मारपीट और दंगे हो जाते हैं। किसी मौलाना के एक बयान पर कारसेवकों को ट्रेन में जिन्दा जला दिया जाता है और फिर उसका बदला लेने के लिए निर्दोष बच्चों, महिलाओं और बूढ़ों का कत्लेआम तक कर दिया जाता है। क्या इसको सेक्युलरिज्म कहना उचित होगा? आज जरूरत इस बात को समझने की है कि हमारा समाज और देश धर्मनिरपेक्ष कभी हो ही नही सकता। जरूरत इस बात की भी है कि सेक्युलर शब्द के सही मायने को समझा जाए और इसका दुरूपयोग बंद किया जाए।

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