लेखक परिचय

सुरेश चिपलूनकर

सुरेश चिपलूनकर

लेखक चर्चित ब्‍लॉगर एवं सुप्रसिद्ध राष्‍ट्रवादी लेखक हैं।

Posted On by &filed under राजनीति.


सुरेश चिपलूनकर

संदीप पाण्डे और मेधा पाटकर के नेतृत्व में NGO गैंग वाले, AFSPA कानून और भारतीय सेना के अत्याचारों(?) के खिलाफ़ कश्मीर से मणिपुर तक एक रैली निकाल रहे हैं। कुछ सवाल उठ रहे हैं मन में –1) जब तक कोई NGO छोटे स्तर पर काम करता है तब तक तो “थोड़ा ठीक” रहता है, परन्तु जैसे ही उसे विदेशी चन्दा मिलने लगता है, और वह करोड़ों का आसामी हो जाता है तो वह भारत विरोधी सुर क्यों अपनाने लगता है?यह विदेशी पैसे का असर है या “हराम की कमाई की मस्ती”।2) NGO वादियों की इस गैंग ने हज़रतबल दरगाह पर शीश नवाकर इस यात्रा की शुरुआत की…। मैं जानना चाहता हूँ कि ऐसे कितने मूर्ख हैं, जिन्हें इसके पीछे का “देशद्रोही उद्देश्य” न दिखाई दे रहा हो?

3) इस घोर आपत्तिजनक यात्रा के ठीक पहले प्रशांत भूषण का बयान किसी सोची-समझी साजिश का हिस्सा तो नहीं? “(अन) सिविल सोसायटी” के अधिकतर सदस्य गाहे-बगाहे ऐसे बयान देते रहते हैं, जिनके गहरे राजनैतिक निहितार्थ होते हैं, शायद इसी उद्देश्य के लिए इन “शातिरों” ने बूढ़े अण्णा का “उपयोग” किया था…?

देश में पिछले कुछ महीनों से NGOs प्रायोजित आंदोलनों की एक सीरीज सी चल रही है, आईये पहले हम इन हाई-फ़ाई NGOs के बारे में संक्षेप में जान लें…
NGOs की “दुकान” जमाना बहुत आसान है…। एक NGO का गठन करो, सरकारी अधिकारियों को रिश्वत देकर रजिस्ट्रेशन एवं प्रोजेक्ट हथियाओ… अपने राजनैतिक आकाओं को की चमचागिरी करके सरकारी अनुदान हासिल करो… शुरुआत में 4-6 प्रोजेक्ट “ईमानदारी” से करो और फ़िर “अपनी असली औकात, यानी लूट” पर आ जाओ। थोड़ा अच्छा पैसा मिलने लगे तो एक PR एजेंसी (सभ्य भाषा में इसे Public Relation Agency, जबकि खड़ी बोली में इसे “विभिन्न संस्थाओं को उचित मात्रा में तेल लगाकर भाड़े पर आपकी छवि बनाने वाले” कहा जाता है) की सेवाएं लो… जितनी बड़ी “तलवा चाटू” PR एजेंसी होगी, वह उतना ही बड़ा सरकारी अनुदान दिलवाएगी। महंगी PR एजेंसी की सेवाएं लेने के पश्चात, आप मीडिया के भेड़ियों से निश्चिंत हो जाते हैं, क्योंकि यह एजेंसी इन्हें समय-समय पर उचित मात्रा में हड्डी के टुकड़े देती रहती है। जब PR एजेंसी इस फ़र्जी और लुटेरे NGO की चमकदार छवि बना दे, तो इसके बाद “मेगसेसे टाइप के” किसी अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार की जुगाड़ बैठाई जाती है। एक बार ऐसे किसी पुरस्कार की जुगाड़ लग गई तो समझो ये “गैंग” दुनिया की किसी भी सरकार को गरियाने के लाइसेंसधारी बन गई। इससे जहाँ एक ओर इस NGOs गैंग पर विदेशी “मदद”(???) की बारिश शुरु हो जाती है, वहीं दूसरी ओर सरकारों के नीति-निर्धारण में आए दिन टाँग अड़ाना, विदेशी आकाओं के इशारे पर सरकार-विरोधी मुहिम चलाना इत्यादि कार्य शुरु हो जाते हैं। इस स्थिति तक पहुँचते- पहुँचते ऐसे NGOs इतने “गब्बर” हो जाते हैं कि इन पर नकेल कसना बहुत मुश्किल हो जाता है…। भारत के दुर्भाग्य से वर्तमान में यहाँ ऐसे “गब्बर” टाइप के हजारों NGOs काम कर रहे हैं…।

संदीप पाण्डे जी के NGOs के बारे में और जानकारी अगले कुछ दिनों में दी जाएगी, तब तक इनकी “कलाकारी” का छोटा सा नमूना पेश है –

इन “सज्जन” ने 2005 में भारत-पाकिस्तान के बीच मधुर सम्बन्ध बनाने के लिए भी एक “पीस मार्च” आयोजित किया था (ज़ाहिर है कि “सेकुलरिज़्म का कीड़ा” जोर से काटने पर ही ऐसा होता है), यह पीस मार्च उन्होंने 23 मार्च 2005 से 11 मई 2005 के दौरान, दिल्ली से मुल्तान तक आयोजित किया था। इस पीस मार्च का प्रारम्भ इन्होंने ख्वाज़ा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर शीश नवाकर किया (जी हाँ, वही सेकुलरिज़्म का कीड़ा), और यात्रा का अन्त मुल्तान में बहदुद्दीन ज़कारिया के मकबरे पर किया था (इसीलिए अभी जो AFSPA के विरोध में यह “यात्रा” निकाली जा रही है, उसकी शुरुआत हज़रत बल दरगाह से हो रही है, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है…)।

खैर हम वापस आते हैं NGOs गैंग की कलाकारी पर…

दिल्ली से वाघा सीमा कितने किलोमीटर है? मेरे सामान्य ज्ञान के अनुसार शायद 450-500 किमी… यानी आना-जाना मिलाकर हुआ लगभग 1000 किमी। यदि एक घटिया से घटिया चौपहिया गाड़ी का एवरेज 10 किमी प्रति किमी भी मानें, तो 100 लीटर पेट्रोल में दिल्ली से वाघा की दूरी (आना-जाना) तय की जा सकती है। सन 2005 के पेट्रोल भाव को यदि हम 40 रुपये मानें तो लगभग 4000 रुपये के पेट्रोल खर्च में एक गाड़ी दिल्ली से वाघा सीमा तक आ-जा सकती है, यदि दो गाड़ियों का खर्च जोड़ें तो हुआ कुल 8000/-। लेकिन पीस मार्च के “ईमानदार” NGO आयोजकों ने दिल्ली-वाघा आने-जाने हेतु दो वाहनों का “अनुमानित व्यय” (Estimate) लगाया 1 लाख रुपये…। अब सोचिये, जो काम 8000 रुपये में हो रहा है उसके लिए बजट रखा गया है एक लाख रुपए, तो फ़िर बचे हुए 92,000 रुपए कहाँ जा रहे होंगे?ज़ाहिर है कि इस अनाप-शनाप खर्च में विभिन्न “एकाउण्ट्स एडजस्टमेण्ट” किए जाते हैं, कुछ रुपये विदेशी दानदाताओं की आँखों में धूल झोंककर खुद की जेब में अंटी भी कर लिया जाता है। अधिकतर NGOs का काम ऐसे ही मनमाने तरीकों से चलता है, इन “फ़ाइव स्टार” NGOs के उच्चाधिकारी एवं कर्ताधर्ता अक्सर महंगे होटलों में ठहरते हैं और हवाई जहाज़ के “इकोनोमी क्लास” में सफ़र करना इन्हें तौहीन लगती है… (विश्वास न हो, तो अग्निवेश के आने-जाने-ठहरने का खर्च और हिसाब जानने की कोशिश कीजिए)।

2005 में आयोजित इस “भारत-पाकिस्तान दोस्ती बढ़ाओ” वाली “पीस मार्च” में पोस्टरों पर 2 लाख रुपये, दो वाहनों के लिए एक लाख रुपये (जैसा कि ऊपर विवरण दिया गया), अन्य यात्रा व्यय ढाई लाख रुपये, उदघाटन समारोह हेतु 1 लाख रुपए, यात्रा में लगने वाले सामान (माइक, सोलर लाइट इत्यादि) हेतु 30 हजार तथा “अन्य” खर्च के नाम पर एक लाख रुपये खर्च किये गये…। ऐसे अनोखे हैं भारत के NGOs और ऐसी है इनकी महिमा… मजे की बात यह है कि फ़िर भी ये खुद को “सिविल सोसायटी” कहते हैं। एक बूढ़े को “टिशु पेपर” की तरह उपयोग करके उसे रालेगण सिद्धि में मौन व्रत पर भेज दिया, लेकिन इस “टीम (अण्णा)” का मुँह बन्द होने का नाम नहीं ले रहा। कभी कश्मीर पर तो कभी AFSPA के विरोध में तो कभी नरेन्द्र मोदी के विरोध में षडयंत्र रचते हुए, लगातार फ़टा हुआ है। यह बात समझ से परे है कि ये लोग सिर्फ़ जनलोकपाल, जल-संवर्धन, भूमि संवर्धन, एड्स इत्यादि मामलों तक सीमित क्यों नहीं रहते? “समाजसेवा”(?) के नाम पर NGOs चलाने वाले संदीप पाण्डे, मेधा पाटकर एवं प्रशांत भूषण जैसे NGOवादी, आए दिन राजनैतिक मामलों के फ़टे में टाँग क्यों अड़ाते हैं?

जनलोकपाल के दायरे से NGOs को बाहर रखने की जोरदार माँग इसीलिये की जा रही थी, ताकि चर्च और ISI से मिलने वाले पैसों में हेराफ़ेरी करके ऐसी घटिया यात्राएं निकाली जा सकें…। ये वही लोग हैं जिनका दिल फ़िलीस्तीनियों के लिए तो धड़कता है, लेकिन अपने ही देश में निर्वासितों का जीवन बिता रहे कश्मीरी पण्डित इन्हें दिखाई नहीं देते…।

मजे की बात यह है कि इसी सिविल सोसायटी टीम की एक प्रमुख सदस्या किरण बेदी ने AFSPA कानून हटाने का विरोध किया है क्योंकि वह एक पुलिस अफ़सर रह चुकी हैं और जानती हैं कि सीमावर्ती राज्यों में राष्ट्रविरोधियों द्वारा “क्या-क्या” गुल खिलाए जा रहे हैं, और सुरक्षा बलों को कैसी विपरीत परिस्थितियों में वहाँ काम करना पड़ता है, लेकिन अरुंधती, संदीप पाण्डे और गिलानी जैसे लोगों को इससे कोई मतलब नहीं है… उनकी NGO दुकान चलती रहे बस…!!!

बात निकली ही है तो पाठकों की सूचना हेतु बता दूँ, कि अफ़ज़ल गुरु को माफ़ी देने और “जस्टिस फ़ॉर अफ़ज़ल गूरू” (http://justiceforafzalguru.org/) नाम के ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने वालों में संदीप पाण्डे महोदय, अरुंधती रॉय, गौतम नवलखा, राम पुनियानी, हर्ष मन्दर इत्यादि सक्रिय रूप से शामिल थे…। ज़ाहिर है कि यह सिर्फ़ संयोग नहीं है कि अमेरिका में ISI के एजेण्ट गुलाम नबी फ़ई से पैसा खाकर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत विरोधी राग अलापने में भी इन्हीं NGOs की गैंग के सरगनाओं के नाम ही आगे-आगे हैं (यहाँ पढ़ें) इसी से समझा जा सकता है कि इन NGOs की डोर देश के बाहर किसी दुश्मन के हाथ में है, भारत के लोकतन्त्र में इन लोगों की आस्था लगभग शून्य है, भारतीय सैनिकों के बलिदान के प्रति इनके मन में कतई कोई श्रद्धाभाव नहीं है…। इस प्रकार के NGOs भारत की जनता की गाढ़ी कमाई तथा देश के भविष्य पर एक जोंक या पिस्सू की तरह चिपके हुए हैं…

===============
ज्यादा बड़ा न करते हुए, फ़िलहाल इतना ही…। NGOs की देशद्रोही तथा आर्थिक अनियमितताओं भरी गतिविधियों पर अगले लेख में फ़िर कभी…

विशेष :- “पिस्सू” के बारे में अधिक जानकारी हेतु यहाँ देखें…http://kudaratnama.blogspot.com/2009/08/blog-post_11.html

5 Responses to “देशद्रोही NGOs गैंग “जोंक और पिस्सू” की तरह हैं”

  1. आर. सिंह

    R.Singh

    एक असंतुलित लेख पर संतुलित टिप्पणी के लिए श्री इकबाल हिन्दुस्तानी को धन्यवाद.

    Reply
  2. Satyarthi

    भाई हिन्दुस्तानीजी
    आपका इकबाल बुलंद से बुलंद्तर हो पर चिपलूनकर जी से इतना खफा हो जाना आपको शोभा नहीं देता. जो तथ्य चिपलूनकर जी ने दिए हैं उनपर ग़ौर करना आपने मुनासिब नहीं समझा और एकदम गालिओं पर उतर आये. .आपको शायद मालूम न हो हमारे देश में बहुत सारे एन जी ओ देश द्रोही गतिविधिओं में लिप्त हैं और उन्हें देश के बाहर से बहुत धन मिल रहा है. यदि आप के पास समय हो और जान ने की इच्छा हो तो विजिल की पुस्तक ‘एन जी ओस,एक्टिविस्ट्स ,एंड फौरेन फंड्स ‘ नाम की पुस्तक पढने का कष्ट करें’ सर्कार इन लोगों के विरुद्ध उचित कार्रवाई क्यों नहीं करती यह भी यदि थोडा सोचेंगे तो स्वयं समझ जायेंगे. जहाँ तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न है उस में भी सीमायें हैं. उदारवादी लोग कुछ भी कहें पर मेरे विचार से देश हित के विरुद्ध प्रचार करने की स्वतंत्रता किसी को भी नहीं होनी चाहिए.

    Reply
  3. इक़बाल हिंदुस्तानी

    iqbal hindustani

    पूर्वाग्रह, घृणा, आक्रोश, निंदा, दोषारोपण, आरोप, क्रोध और विरोध के लिये विरोध सभी कुछ तो है इस ज़हरीले लेख में। अगर कुछ नहीं है तो वह है ठंडे दिमाग़ से इस समस्या का सोचा गया हल। जिस तरह से दक्षिणपंथी और पंथनिरपेक्ष विचारधारा को अपनी बात कहने और अपने काम करने का अधिकार है वैसे ही वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के लोगों को भी अपनी सोच के साथ जीने और गतिविधियां जारी रखने का नैसर्गिक और संवैधानिक अधिकार है।यह जनता तय करेगी कि कौन सही है और कौन गलत? एनजीओ को गैंग बताना और उसके चलाने वालों को जोंक और पिस्सू कहां का शिष्टाचार और सभ्यता है? जो एएफएसपीए के दुरूपयोग का विरोध करेगा वह देशद्रोही और जो इसके दुरूपयोग का समर्थन करेगा वह देशभक्त यह परिभाषा सुरेश चिपलूनकर जी आपके या आपकी सोच के लोगों द्वारा बना देने से इससे असहमत लोग मानने का तैयार नहीं हो सकते। सेना के इस विशेष अधिकार के दुरूपयोग के कारण ही आज हम, हमारी सरकार और हमारी सेना से कश्मीर ही नहीं मणिपुर तक में हमारे नागरिक बुरी तरह नाराज़ हैं। अलगाव की भावना के पीछे जहां कुछ लोगों का मज़हब और संकीर्ण सोच ज़िम्मेदार हो सकती है वहीं ऐसा जुल्म और ज्यादती भी इसके लिये उत्तरदायी होते हैं जिनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है। अगर मानवतावादी और सेकुलर सोच के कुछ लोग आपसी भाईचारे और एकता के लिये भारत पाक के धार्मिक स्थलों तक सद्भावना यात्रा करते हैं तो आपको क्या तकलीफ है? क्या फौज, हथियार और शक्ति के बल पर ही दुनिया की किसी समस्या का हल हो सका आज तक? जहां तक एनजीओ के धन के दुरूपयोग का आरोप है वह आपका एकतरफा दोषारोपण है जब तक दूसरे पक्ष की बात न सुन ली जाये तब तक यह नहीं माना जा सकता कि जो कुछ आप दावा कर रहे हैं वही पूरा सच है। एक बात और सरकार की ज़िम्मेदारी है कि अगर एनजीओ के धन का दुरूपयोग वास्तव में हो रहा है तो वह चुपचाप क्यों बैठी रहती है? भ्रष्टाचार और बेईमानी हमारे देश की ही नहीं पूरी दुनिया की कॉमन प्रॉब्लम है उसका हल तो आपने कोई सुझाया नहीं बस विषबुझे बाण ही छोड़ते छोड़ते आप अन्ना हज़ारे के एतिहासिक आंदोलन पर भी कीचड़ उछालने का महापाप करते दिखाई दे रहे हैं। जहां तक टीम अन्ना का सवाल है अरे सुरेश भाई यही तो वह जादू था जो बाबा रामदेव जैसे अन्ना से अधिक प्रभावशाली योगगुरू नहीं कर पाये जबकि केजरीवाल और किरण बेदी जैसे लोगों ने ऐसी रण्नीति बनाई कि सरकार के हाथ के तोते उड़ गये। टीम अन्ना के प्रशांत भूषण ने अगर यह कह दिया कि सारे संभव उपाय करने के बाद भी अगर कश्मीर के लोग हमारे साथ नहीं रहना चाहते तो उनको अलग होने का विकल्प दिया जाना चाहिये तो इसमें इतनी हायतौबा करने की क्या बात है? यह बात तो पहले भी कई और लोग कह चुके हैं। जब तक देश का बहुमत इस विचार से सहमत नहीं होगा तब तक इतना घबराने की क्या बात है? यह तो अभिव्यक्ति की आज़ादी है। क्या आप भी उसी तालिबान की सोच का अनुसरण करेंगे जो लोगों की सोचने समझने की आज़ादी पर ही रोक लगाता है? और अगर ऐसा करके वह सही करता है तो फिर उसकी आलोचना क्यों की जाती है? चिकलूनकर जी एक बार और ठंडे दिमाग और शांति के साथ सोचिये, पहले तोलिये और फिर बोलिये वर्ना तो पूरी दुनिया का दारोगा बनने चले अमेरिका का हश्र आप आज देख ही रहें हैं।-इक़बाल हिंदुस्तानी

    Reply
    • sanjay

      iqbal hindustani जी, आप कैसे पत्रकार हैं जो अधकचरी जानकारी के आधार पर टिपण्णी कर रहें है . Gulam नबी fai के दोस्त & justiceforafzalguru पर apeal करने वाले सपने में भी भारत हितेषी नहीं हो सकते. agar 4 june की raat को sarkar के pasine nahi छूटे होते तो जलियाँ वाला बाग़ को नहीं दोहराते. अन्ना के आन्दोलन का भी यही हश्र होता यदि अमेरिका से दो बार सार्वजनिक चेतावनी नहीं दी जाती. कश्मीर में (पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित) सेना हटाने की मांग is लिए की जा रही है ताकि आतंकवादियों की घुस पैठ asaani से की जा सके. यदि कोई सैनिक कोई अपराध करता है तो उसके ऊपर क़ानूनी करवाई की जा सकती है परन्तु अफजल गुरु के लिए न्याय मांगने वालों के रहते आतंकवादियों पर कौन अंगुली उठा सकता है. यदि आज अफजल गुरु को माफ़ कर दिया गया तो कल कसब की माफ़ी की बारी है.

      Reply
  4. आर. सिंह

    R.Singh

    सुरेश चिप्लुकर जी आपके अधूरे लेख पर मैंने टिप्पणी दी थी.आज आपका पूरा लेख मेरे सामने है,पर जानकारी के अभाव में मैं इस लेख में वर्णित बहुत सी बातों पर टिप्पणी करने में असमर्थहूँ,पर जहां तक मेरी जानकारी है ,किसी भी एन जी ओ की गति विधि या उसके खर्चे पर सरकार और दाताओं का नियंत्रण होता है,अतः अगर सरकारी अमले लोक पाल बिल से बांध दिए जाते हैं तो एन जी ओ पर लगाम वे कश ही लेंगे,अतः जन लोक पाल का दायरा एन जी ओ तक बढाने की आवश्यकता मेरे जैसे लोग भी, जिनको एनजीओ से कुछ लेनादेना नहीं है ,नहीं समझते. इसी तर्क के आधार पर कारपोरेट सेक्टर को भी लोकपाल के दायरे में लाने की आवश्कता नहीं है.किसी ने मेरी इसी तरह की पिछली टिप्पणियों के उत्तर में पहले लिखा था की सरकारी कर्मचारी ईमानदार होते तब न. यह सही है,पर लोक पाल उन्ही के गैर कानूनी और भ्रष्ट कारनामों पर अंकुश लगाने के लिए है.अगर वे ईमानदारी वरतने लगे(चाहे दबाव के कारण ही सही)तो एन जिओ और कारपोरेट सेक्टर तो अपने आप सुधर जायेंगे..जहां तक सशस्त्र सेना विशेषाधिकार क़ानून का प्रश्न है उसके भारत के किसी भी हिस्से में उसके अनिश्चित काल तक लागू करने के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ,चाहे वह कश्मीर हो या उतर पूर्वी राज्य.यह कहाँ का न्याय है की अपने ही देशवासियों के पीढ़ी दर पीढ़ी को कुछ सिरफिरे के गुनाहों के चलते स्वतंत्र देश के आम नागरिकों को प्राप्त सारे अधिकारों से वंचित रखा जाए सच पूछिए तो इसमे बहुत कुछ तुरत करने की आवश्यकता है.

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *