रात के व्यापारी रात नै ए जा लिए….

सुशील कुमार ‘नवीन’

अफसर तो भई अफसर ही होते हैं। उनके मुख से निकला हर वर्ण पत्थर की लकीर की तरह होता है। अब ये उन पर निर्भर है कि वो अपने मातहतों से चाहे मूसे(चूहे) पकड़वाए या उन पर लार टपकाने वाली बिल्ली। कुत्तों की प्रजातियों की गणना करवाये या गधे-घोड़ों की। सांडों की पहचान करवाएं या उन्हें पकड़ गौशालाओं में भिजवाएं। उनको कोई रोक थोड़े ही सकता है। 

एक किस्सा मुझे याद आ रहा है। एक बार मनमौजी अफसर जिले में आ गया। हर काम हंसते-हंसाते करने की उनकी फितरत थी। मातहत समझ ही नहीं पाते कि वो जो आदेश दे रहे हैं वो वास्तविक है या मजाक। एक बार रात को घूमने निकल गए। साधारण भेष में थे सो कोई पहचान भी नहीं सकता था। 

शहर के मुख्य चौराहे पर चार सुराप्रेमी  मिलबैठ सुख-दुख साझा कर रहे थे।एक बोला- यार जिंदगी नीरस हो गयी है। सब मतलबी है। अपना कोई ध्यान नहीं रखने वाला। दूसरे ने हामी भरी और कहा- बात सौ आने की है। घर जाते हैं। घर वाले छूत के रोगी की तरह एक कोने में पटक देते हैं । थाली में रोटी लाकर आगे ऐसे रख जाते हैं जैसे हम कुत्ते हों। तीसरा बोला-यहां तक तो ठीक है। हम सही मूड में हो तब भी यही कहते हैं- तुम तो चुप ही रहो। नशा अभी उतरा नहीं है क्या। चौथा थोड़ा ज्यादा समझदार था। बोला- यार,अपनी बिरादरी को जागरूकता के लिए एकजुट करते हैं। किसी के साथ कुछ गड़बड़ हो तो सब वहीं पहुंच अगले पर ऐसा धावा बोले कि वो दोबारा हमारी प्रतिष्ठा के खिलाफ कुछ न कर पाए। सबकी इस पर सहमति बन गई। 

चारों महानुभावों की बात सुन अफसर महोदय का ह्रदय भी द्रवित हो गया। नशे में भी एकजुटता की बात उनको मन ही मन सम्मानित करने का निर्णय कर गयी। अगले दिन सुबह अपने मातहतों को बुलाकर उन चारों को ढूंढकर लाने के निर्देश जारी कर दिए। मातहत साहब के स्वभाव से परिचित थे। सोचा कि इसमें भी वे कुछ हास्य ढूंढ रहे होंगे। चौराहे पर साहब की नजरों में आने वाले वो कौन से सुराप्रेमी थे, इसका कुछ भी पता नहीं लग पाया। पर आदेश तो आदेश था। खोजबीन में चार और मिल गए। उन्हें साहब के दरबार में लाया गया। साहब ने उनसे रात की बात के बारे में पूछा। चारों के पास इसका कोई जवाब नहीं था। 

उनमें से  एक सीधे-सपाट शब्दों में बोला- जी आपको एक कहानी सुनाऊं। साहब की स्वीकृति पर उसने कहानी सुनानी शुरू कर दी। बोला- जी, रात को राजा की सवारी जा रही थी। उसके सामने हमारे भाईचारे का एक व्यक्ति आ गया और बोला-अरे, ओ राजा, ये हाथी कितने में बेचेगा, जिस पर तूं बैठा है। मुझे यह खरीदना है। मोल बता, मोल। राजा के सामने इस तरह की हिमाकत करने पर सैनिकों ने उसे पकड़ लिया। राजा ने कहा- इससे सुबह बात करेंगे। अभी यह नहीं बोल रहा। इसका नशा बोल रहा है। राजा के कहने पर उसे छोड़ दिया गया। 

सुबह राजा के सैनिक उसके घर पहुंचे और उसे दरबार ले आये। रात का नशा अब उतर चुका था। उसे कुछ याद नहीं था। राजा ने पूछा- हां, अब बता। मेरा हाथी ख़रीदेगा। बोल कितनी स्वर्णमुद्रा दे सकता है। राजा का हाथी खरीदने की तो वह सुराप्रेमी सोच भी नहीं सकता था। राजा ने उसे रात की घटना से अवगत कराया। मामले की गम्भीरता पर उसने राजा के सामने हाथ जोड़ लिए। बोला-महाराज, माफ करो। रात के व्यापारी तो रात को ही जा लिए। दिन में खरीदारी करना उनके बस की बात नहीं। उसकी बात सुनकर राजा को भी हंसी आ गई और उसे चेतावनी देकर छोड़ दिया।

कहानी सुन अपने अफसर महोदय को भी चेत आ गया। वे तो उनके सम्मान आयोजन के लिए आदेश तैयार कराए बैठे थे। उन्होंने अपने विशेष मातहत को बुला फौरन उस आदेश को वापस लेने के निर्देश जारी किए। मातहत ने कहा- जनाब, क्या बात हुई। जो इतनी जल्दी आदेश वापस कर दिया। साहब ने उसे पास बुलाया और कहा-मुझे पता नहीं था कि ये रात के व्यापारी है। अब मुझे दिव्य ज्ञान हो गया है। अपना सम्मान इनके व्यापार के आगे तुच्छ है। इनकी रात की सौदगिरी का कोई मोल नहीं है। एक राजा ही इनसे सौदागिरी नहीं कर पाया तो मैं तो एक अदना सा अफसर हूं। इसलिए समय को जान और उस पर्चे को फाड़कर फैंक दे। आगे से मैं इन सौदागरों का विशेष ध्यान रखूंगा। मातहत,  जी जनाब कहकर लौट गया। 

( नोट: कहानी मात्र मनोरंजन के लिए है। इसका मास्टरों को सुराप्रेमियों को गिनने सम्बन्धी पत्र को अफसरान द्वारा वापस लेने से कोई सम्बन्ध नहीं है।)

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