मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

निर्मल रानी

भारत वर्ष में सर्वधर्म संभाव व सांप्रदायिक सौहार्द्र जैसी बुनियादी प्रकृति को उजागर करने वाले अल्लामा इकबाल की यह पंक्तियां-मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना-हिंदी हैं हम वतन हैं हिंदोस्तां हमारा, गत 6 अक्तूबर को हरियाणा के बराड़ा कस्बे में साक्षात रूप से चरितार्थ होते देखी गर्इं। यह अवसर था विश्व के सबसे ऊंचे 185 फुट के रावण के पुतले को फंूके जाने का। लिम्का बुक ऑफ रिकार्ड 2011 में दर्ज रावण का यह पुतला गत् 5 वर्षों से लगातार अपने ही पिछले कीर्तिमानों को तोड़ता आ रहा है। श्री राम लीला क्लब बराड़ा के संस्थापक अध्यक्ष राणा तेजिंद्र सिंह चौहान इस महत्वाकांक्षी योजना के सूत्रधार, निर्देशक तथा प्रमुख कर्ता-धर्ता भी हैं। इस रावण की लम्बाई का कारण समाज में बढ़ती हुई बुराईयों व कुरीतियों को बताया गया । आतंकवाद,सांप्रदायिकता,जातिवाद ,जनसंख्या वृद्धि,दहेज प्रथा,भ्रष्टाचार,कन्या भू्रण हत्या,अशिक्षा,मिलावटखोरीव मंहगाई जैसी तमाम बुराईयों को रावण की लंबाई के रूप में प्रतिबिंबित किया जाता है। इस वर्ष 6 अक्तूबर के आयोजन का मकसद विजयदशमी के अवसर पर जहां अपने विश्व कीर्तिमानों को तोडऩे के लगातार 5वें वर्ष में प्रवेश करना था वहीं सबसे ऊंचे रावण के रूप में लिम्का बुक में नाम दर्ज होने के उत्सव स्वरूप भी इस आयोजन को बड़े ही भव्य व उत्साहजनक तरीके से मनाया गया। एक अनुमान के अनुसार लगभग डेढ़ लाख भक्त जनों व दर्शकों ने न केवल बराड़ा व आस पास के क्षेत्रों से बल्कि,पंजाब,हिमाचल प्रदेश,उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान जैसे पड़ोसी राज्यों से भी आकर इस कार्यक्रम में शिरकत की। इस महत्वपूण आयोजन को देखने के लिए 110 वर्ष के बुज़ुर्ग तक को दूर -दराज़ से चलकर आते हुए देखा गया।

हमारा देश अपनी गंगा-जमनी तहज़ीब के लिए प्रारंभ से ही प्रसिद्ध रहा है। यह परंपरा आज भी पूर्ववत् जारी है। देश में तमाम जगहों से आज भी ऐसे समाचार प्राप्त होते हैं जिनसे यह पता लगता है कि कहीं किेसी मुसलमान द्वारा मंदिर के लिए ज़मीन दान में दी गई तो क हीं किसी मुसलमान ने पूरे मंदिर का निर्माण करोड़ों रूपये खर्च कर कराया। कहीं किसी मंदिर में मोहर्रम के ताजि़ए सजाने की $खबर मिलती है तो कहीं मुस्लिम समुदाय के लोग गणेशपूजा करते व गणेशपूजा उत्सव में बढ़-चढ़ कर शरीक होते दिखाई देते हैं। कहीं हिंदू समुदाय के लोग रमज़ान के महीने में रोज़ा रखते दिखाई देते हैं तो कहीं हिंदू समाज के लोग मोहर्रम मनाते,मातमदारी करते व ईद-बकरीद जैसे खुशियों भरे त्यौहार में अपने मुस्लिम भाईयों के साथ गले मिलते नज़र आते हैं व त्यौहार का भरपूर आनंद उठाते हुए दिखाई देते हैं। इसी सांझी भारतीय संस्कृ ति की सांझी विरासत को आगे बढ़ाते हुए अंबाला जि़ले का बराड़ा क़स्बा पूरे विश्व में मशहूर होता जा रहा है।

बराड़ा में गत् 6 अक्तूबर अर्थात विजयदशमी के दिन जिस विश्व के सबसे ऊंचे रावण के 185 फुट ऊं चे पुतले को सामाजिक बुराईयों के प्रतीक के रूप में फूंका गया उसका निर्माण विगत् कई वर्षों से एक मुस्लिम परिवार करता आ रहा है। मोहम्मद उस्मान कुरेैशी नामक मुस्लिम कारीगर अपने पूरे परिवार व अपने मुस्लिम सहयोगियों के साथ बराड़ा में स्थाई रूप से रहकर तेजिंद्र सिंह चौहान के निर्देशन में इस पुतले का निर्माण करता है। इस दौरान रावण के पुतले के निर्माण की कार्यशाला में बने एक मंदिर की देखभाल मोहम्मद उस्मान की पत्नी किया करती है। वह जहां रमज़ान के महीने में पवित्र रोज़े धारण करती है व नमाज़ अदा करती है वहीं वह इस मंदिर में भी पूरी श्रद्धा के साथ झाड़ू -सफाई आदि का कर्तव्य भी अदा करती है। उधर तेजिंद्र सिहं चौहान भी इस परिवार की सभी धार्मिक ज़रूरतों को सहर्ष पूरा करते हैं। मोहम्मद उस्मान कुरैशी ने ही इस वर्ष रावण के विशाल पुतले की पृष्ठभूमि में सोने की लंका का निर्माण कर इस आयोजन को और आकर्षक व शानदार बनाया।

दूसरी ओर गत् पांच वर्षों से इस आयोजन में राणा तेजिंद्र सिंह चौहान का साथ हरियाणा साहित्य अकादमी शासी परिषद् के पूर्व सदस्य तथा लेखक व स्तंभकार तनवीर जाफरी द्वारा भरपूर तरीके से दिया जा रहा है। सामाजिक महत्व के इस आयोजन को विश्व प्रसिद्ध स्तर का आयोजन बनाने में तनवीर जाफरी की महत्वपूर्ण भूमिका है। इतना ही नहीं बल्कि लगभग तीन घंटे तक लगातार चलने वाले इस रावण दहन कार्यक्रम को भी गत् पांच वर्षों से जा$फरी द्वारा अपने विशेष साहित्यिक अंदाज़ से संचालित किया जा रहा है। अपने संचालन में जहां वे भगवान श्री राम की महिमा का लाखों दर्शकों की उपस्थिति में गुणगान करते हैं वहीं वे इस विशाल जनसमूह के बीच जय श्री राम के नारे भी लगवाते हैं। इस वर्ष के आयोजन में तो तनवीर जाफरी द्वारा सामाजिक बराईयों के प्रतीक विश्व के इस सबसे ऊंचे रावण की शान में एक बेहतरीन कसीदा भी पढ़ा गया। अपने इस कसीदे में उन्होंने रावण की लंबाई के महत्व व उसके कारणों का जहां जि़क्र किया वहीं इस रचना को सांप्रदायिक सौहाद्र्र के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय उदाहरण भी बताया।

उधर बराड़ा में उमड़े जनसैलाब में भी सभी धर्मों व संप्रदायों के लोगों ने बड़ी संख्या में शिरकत की। इसकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर की प्रसिद्धि को देखते हुए इस वर्ष हरियाणा के प्रसिद्ध महर्षि मार्केण्डय विश्वविद्यालय द्वारा इस आयोजन को श्री रामलीला क्लब बराड़ा के साथ मिलकर सह प्रायोजित किया गया। अशिक्षा के विरुद्ध ज़ोरदार संघर्ष चलाने वाले महर्षि मार्केण्डय विश्वविद्यालय के चेयरमैन तरसेम गर्ग व विश्वविद्यालय संचालन समिति के सचिवों सर्वश्री संजीव गर्ग व विशाल गर्ग ने रिमोट का बटन दबाकर बुराईयों के प्रतीक रावण के पुतले को अग्रि की भेंट किया।

सर्वधर्म संभाव,सांप्रदायिक सौहाद्र्र तथा देश व दुनिया में फैली तमाम सामाजिक बुराईयों को समाप्त करने जैसे संकल्प का प्रतीक बन चुके इस आयोजन को इस वर्ष देश की तमाम महत्वपूर्ण हस्तियों की भी शुभकामनाएं व उनके संदेश प्राप्त हुए। देश के जिन महत्वपूर्ण व अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने श्री रामलीला क्लब बराड़ा विशेषकर इसके संस्थापक अध्यक्ष तेजिंद्र सिंह चौहान के इन प्रयासों की अपने शुभकामना संदेशों के माध्यम से सराहना की उनमें भारत की महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल, हरियाणा के महामहिम राज्यपाल श्री जगन्नाथ पहाडिय़ा, हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित,गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी,केंद्रीय आवास एवं शहरी $गरीबी उपशमन मंत्री कुमारी सैलजा,केंद्रीय संसदीय कार्य एवं जल संसाधन मंत्री श्री पवन कुमार बंसल के अतिरिक्त और भी कई मंत्रियों व सांसदों के शुभाशीष इस आयोजन को प्राप्त हो चुके हैं।

यह आयोजन केवल हिंदू या मुस्लिम एकता को ही नहीं दर्शाता बल्कि जातिगत् सद्भावना का भी यह बहुत बड़ा प्रतीक है। लगभग 8 महीने तक लगातार चलने वाले रावण के इस पुतले के निर्माण में दलित व पिछड़ी जातियों के भी सैकड़ों लोग दिन-रात एक किए रहते हैं। इन सब का लक्ष्य केवल एक ही होता है कि किसी प्रकार से तेजिंद्र चौहान के नेतृत्व में बराड़ा का नाम पूरी दुनिया में रौशन हो तथा बराड़ा इस विश्वविख्यात रावण के पुतले के माध्यम से पूरे देश व दुनिया को सांप्रदायिकता,जातिवाद तथा आतंकवाद जैसी अनेक बुराईयों के विरुद्ध अपना स्पष्ट संदेश दे सके। राणा तेजिंद्र सिंह चौहान जोकि न केवल श्रीरामलीला क्लब बराड़ा के संस्थापक अध्यक्ष हैं बल्कि स्वयं एक बेहतरीन कलाकार, संगीत प्रेमी तथा परोपकारी प्रवृति के व्यक्ति भी हैं। चौहान का कहना है कि जिस प्रकार वे अपने इस आयोजन को सामाजिक कुरीतियों के प्रतीक स्वरूप मना रहे हैं तथा सर्वधर्म संभाव का संदेश इस आयोजन के माध्यम से पूरी दुनिया को दे रहे हैं उसी प्रकार सभी धर्मों के सभी आयोजनों में प्रत्येक धर्म व समुदाय के व्यक्ति को बढ़-चढ़ कर व खुले दिल से हिस्सा लेना चाहिए क्योंकि वास्तव में यही एक समृद्ध व संपन्न भारत की सांझी तहज़ीब है। आशा की जानी चाहिए कि देश में होने वाले इस प्रकार के आयोजन हमारे देश की धर्मनिरपेक्षता, राष्ट्रीय एकता व अखंडता को बर$करार रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगे। देश के किसी भी भाग में किसी भी धर्म अथवा समुदाय के व्यक्तियों या संगठनों द्वारा जहां भी ऐसे आयोजन किए जा रहे हों उन्हें न केवल आम लोगों द्वारा बल्कि शासन व प्रशासन द्वारा भी पूरी तरह प्रोत्साहित किए जाने की सख्त ज़रूरत है।

2 thoughts on “मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना

  1. at the starting the article was nice but as we go done what rubbish you have written ??????????????????????????????????????????????

  2. लेख उत्तम है। किन्तु शीर्षक उपयुक्त नहीं। कोई मजहब और उसके मानने वाले दो भिन्न चीज हैं। लेख में कुछ लोगों के कार्य के उदाहरण हैं। जिनसे किसी मजहब का मूल्यांकन नहीं हो सकता। वह तो उसके अपने सिद्धांतों, लक्ष्य और विश्वासों के आधार पर ही हो सकता है। वह कार्य लेखिका को सराहनीय लगे, किन्तु किन्हीं मजहबी मतावलंबियों को गलत भी लगते हैं। दोनों प्रकार के लोग एक ही मजहब को मानते हैं। तब उनके कार्यों से मजहब का मूल्यांकन कैसे होगा?

    वैसे भी, अल्लामा इकबाल की वह रचना जिसमें यह शीर्षक वाली पंक्ति है, अपने मजहब लोगों को आपस में बैर न रखने का आग्रह कर रही है है। न कि मजहब से बाहर के दूसरे धर्म-मतावलंबियों के साथ बैर न रखने का। क्योंकि उन्हीं इकबाल ने दूसरे धर्म-विश्वासियों का तो दुनिया से पूरी तरह सफाया करने की जरूरत बताते हुए ‘शिकवा और जबावे शिकवा’ नामक पूरी किताब लिखी थी।

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