कोई भी कृति राम चरित्र की पूर्णाहुति नहीं है

—विनय कुमार विनायक
कोई भी कृति राम चरित्र की पूर्णाहुति नहीं है,
वाल्मीकि के पूर्व रामकथा लौकिक आस्था थी!

नारद की मौलिक पत्रकारिता को वाल्मीकि ने
रामायण नाम से काव्यात्मक अभिव्यक्ति की!

आगे कालिदास, भवभूति, तुलसी लेखनी चली,
किन्तु राम की महिमा अब भी बहुत अनकही!

रामचरित्र पर एक आक्षेप है शूद्रहन्ता होने का,
कितना झूठ, कितना कल्पित, कितना है सही?

कहते हैं राम ने ब्राह्मण के कहने पे हत्या की,
शम्बूक नामधारी, एक धार्मिक शूद्र तपस्वी की!

लेकिन ये आरोप सर्वथा मिथ्या प्रतीत होता है,
कोई धार्मिक, तापस शूद्र कहलाता कदापि नहीं!

वस्तुत:शम्बूक की कथा वाल्मीकि ने नहीं कही,
उत्तरकाण्ड प्रक्षिप्त, परवर्ती रामायणी गद्यकृति!

पर उत्तरकाण्ड विस्तृत, संपूर्ण रचना प्रतीत होती,
जिसे उपेक्षित कदापि नही की जा सकती क्योंकि

शम्बूक वध प्रकरण महाभारत, भवभूति,रघुवंशम् में
‘कृतदंड:स्वयं राज्ञा लेभे शूद्र:सतां गतिम्’ की उक्ति,

आखिर राम को ब्राह्मण रक्षी शूद्र हंता ही ठहराती,
तो क्या शम्बूक सचमुच शूद्र था या कुछ और ही?

हां शम्बूक ब्राह्मण रावण की बहन, शूर्पनखा और
राक्षस विद्युज्जिह्व का सुपुत्र, था रावण का द्रोही!

उसकी तपस्या का लक्ष्य था स्वपिता के हत्यारोपी,
मामा रावण के वध हेतु चंद्रहास खड्ग की प्राप्ति!

वस्तुत: परवर्ती ब्राह्मण की लेखनी बौद्ध धर्म से
घृणा में लिखी गई, ईश्वर को विप्ररक्षी बनाने की!

ऐसा है कि ना रावण ब्राह्मण था, ना शम्बूक शूद्र,
सिर्फ प्रयास ईश्वर को जाति घेरे में कैद करने की!

अपनी-अपनी सुविधानुसार विभिन्न रचना काल में,
युग नायकों में जाति गौरव स्थापित करते ऐसे ही!

जब लेखनी ब्राह्मण कर में, ईश्वर है उनका अनुचर,
जब कलम गहेगा क्षत्रिय,ईश्वर वीररसपायी होगा ही!

जब लेखनी वैश्य के हाथ में लगती तो उनका विष्णु
वैष्णव अहिंसक, पर माखनचोर, मलाईखोर रहेगा ही!

सबका भगवान तो वो राम हैं, जो वाल्मीकि का स्नेही,
केवट का भाई, वानर सुग्रीव सखा, जिनकी मां भीलनी!

उत्तर से दक्षिण तक राम वही,जिसने माना कपि को पुत्र,
गिद्ध जटायु को पिता,भीत विभीषण को दी शरणागति!

ऐसे में कोई कैसे कह सकता कि तापस शूद्र शम्बूक की
राम ने हत्या की,यह एक कुत्सा है राम चरित्र हनन की!

ना ही शम्बूक शूद्र था,ना भक्त तपस्वी ईश्वर का, वह था
पंडित रावण अनुगामी छद्म तपी, चंद्रहास खंग आकांक्षी!

रावण भी था छद्म तपी ब्राह्मण,आसुरी वेदों के संपादक,
पशुवध,गोवध,नरवध, ब्राह्मण वध, मद्य,मांस, मैथुनवादी!

रावणकृत कृष्ण यजुर्वेद मंत्र ‘गणानांत्वा गणपतिं हवामहे—
एक अश्लील मंत्र है,जिसे मांगलिक अवसर में पढ़ते पंडित!

‘वाचे पुरुषमालभेत्,’यानि ‘वाणी देव हेतु पुरुष का वध करो’,
‘ब्राह्मणे ब्राह्मणमालभते’,‘ब्राह्मण वध ब्राह्मण अहं देव को’!

‘आशायै जामिम्,वधकर तृष्णाभिमानी देव को रजनिवृत नारी’,
‘प्रतीक्षायै कुमारी,’वधकर लब्ध प्रतीक्षित देव को बालाकुमारी’!

रावण विधि से यज्ञ में गाय, घोड़ा आदि सात-सात पशुबलि,
अश्वमेधयज्ञ में यजमान-पत्नी का घोड़े संग सोने की रीति!

अस्तु; आज शिश्न पूजक रावण संपादित कृष्ण यजुर्वेद व
ब्रह्मा रचित मूल शुक्ल यजुर्वेद में भेद, मुश्किल है प्रतीति!

वेदविकृतिकर्ता रावण हारा था, रामपूर्व आर्य सहस्त्रार्जुन व
वानरराज बाली से, बाली भगिनी से रावण ने शादी कर ली!

किन्तु यशस्वी हैहयवंशी क्षत्रिय राजा सहस्त्रार्जुन का कैदी
रावण को प्रपिता पुलस्त्यऋषि के अनुनय से मिली मुक्ति!

राम पूर्व एक और भार्गव परशुराम था, रावण समकालीन,
जो हर सुकर्म कुकर्म पर दर्ज कराते थे, अपनी उपस्थिति!

जिन्होंने पिता के कहने पर, स्वमाता की हत्याकर दी थी,
गोहरण पर किया वृद्ध मौसा का वध, विधवा हुई मौसी!

सपथवीर इतना की अपने मौसेरे भाइयों सहित मातृवर्णी
क्षत्रिय संहार किया इक्कीसबार, बनी हजार मनुज जाति!

एक शिवधनुष राम के तोड़ने पर मचा हाहाकार ऐसा कि
उनसा शिवभक्त ना कोई, जबकि तोड़ी दांत शिवपुत्र की!

परशुराम थे वेदाध्यायी, शस्त्रधारी, पर घोर ब्राह्मणवादी
रावणी कुकर्म पर मौन, रावण से थी वर्णवादी दुर्भिसंधी!

यद्यपि पुराण से अधिक वर्तमान में परशुराम के ईश्वरीय
अवतार होने की विरुदावली गाई जाती, जो अपेक्षित नहीं!

अस्तु रावण को ब्राह्मण कहना, ब्रह्मणत्व का अपमान है,
शम्बूक को शूद्र कहने से दलितजन की होती है मानहानि!

राम तो राम है,हर्ष विषाद से परे,लाभ-हानि से मुक्त महर्षि,
राम ईश्वर हैं या ना,पर वे आदर्श पुत्र-पिता-भ्राता-सखा-पति!

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