“मांसाहार मनुष्य के स्वभाव व प्रकृति के अनुरूप नहीं है”


मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

               परमात्मा ने इस सृष्टि व ब्रह्माण्ड को बनाया है और इसमें अनेक प्रकार के प्राणियों व वनस्पति जगत को भी बनाया है। जितने भी प्राणी हैं वह सब जीवधारी अर्थात् जीवात्मा को अपने शरीर में धारण किये हुए हैं। शरीर में विद्यमान जीवात्मा एक अनादि, नित्य, अमर, अविनाशी, एकदेशी, स्वल्प परिमाण, निराकार, ज्ञान व कर्म करने की सामर्थ्य से युक्त, अल्पज्ञ, जन्म-मरणधर्मा तथा बन्धनों में आबद्ध सत्ता है। सृष्टि उत्पन्न होने के बाद से इसके जन्म व मृत्यृ का क्रम निरन्तर चलता रहता है। हम आज इस जीवन में हैं तो इससे पूर्व जन्म से कुछ समय पहले मनुष्य या किसी अन्य योनि में मृत्यु को प्राप्त होकर परमात्मा की व्यवस्था से यहां आये हैं और यहां वृद्धावस्था, रोग, दुर्घटना आदि व किसी अन्य कारण से मृत्यु होने पर पुनः इस जन्म के कर्मों के अनुसार हमारा पुनर्जन्म सुनिश्चित है। ऋषि दयानन्द ने पूना में उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जो प्रवचन दिये हैं उसमें उन्होंने अपने एक प्रवचन में पुनर्जन्म को अनेक तर्क व प्रमाणों से सिद्ध किया है। अतः जीवात्मा का जन्म, मरण मोक्ष सत्य वैदिक सिद्धान्तों के अनुरूप अनादि काल से होता रहा है और अनन्त काल तक होता रहेगा, यह शाश्वत् ईश्वरीय नियम सिद्धान्त है। मनुष्य योनि सभी प्राणीयोनियों में सर्वश्रष्ठ योनि है। यह सर्वश्रेष्ठ तभी बनती है कि जब हम सत्य ज्ञान को प्राप्त कर सद्कर्मों को धारण करें व उनका आचरण करें। यदि ऐसा नही करते तो हम मनुष्य होकर भी मनुष्य कहलाने के अधिकारी नहीं है। वेदों के अनुपम विद्वान ऋषि दयानन्द जी ने कहा है कि मनुष्य उसी को कहना कि जो मननशील हो। जो स्वात्मवत अन्यों के सुखदुःख हानि लाभ को समझे। जो मनुष्य मननशील होकर केवल जिह्वा के स्वाद के लिये भोजन करे, वह अविवेकी होता है। उसे सच्चे अर्थों में मनुष्य नहीं कह सकते। मनुष्य का पहला कर्तव्य स्वयं को इस सृष्टि को बनाने इसका संचालन, पालन व्यवस्था करने वाली सत्ता ईश्वर को जानना है। जिन्होंने ईश्वर को जान लिया है वह धन्य हैं और जिन्होंने नहीं जाना है वह शरीर की आकृति से भले ही मनुष्य हों, वह ज्ञान व कर्म की दृष्टि से मनुष्य नहीं कहे जा सकते। सद्ज्ञान व कर्तव्यों का ज्ञान हमें वेद व वेदानुकूल विद्वानों के ग्रन्थों से होता है जिसमें सबसे अधिक सरल व सुबोध ऋषि दयानन्द की रचना सत्यार्थप्रकाश है जिसके प्रथम दस समुल्लासों में वेदानुकूल सभी मान्यताओं को युक्ति व तर्क सहित अनेक ऋषियों के प्रमाणों के साथ प्रस्तुत व सिद्ध किया गया है। अतः आज के समय में हम देश के सभी नागरिकों के लिये सत्यार्थप्रकाश के प्रथम दस समुल्लासों का अध्ययन अनिवार्य व अपरिहार्य समझते हैं। हम अनुभव करते हैं सत्यार्थप्रकाश के अध्ययन से ही मनुष्य सच्चा मनुष्य बन सकता है। हमारे पाठक व मित्र इस विषय में अपनी प्रतिक्रियाओं के आदान-प्रदान एवं तर्कों द्वारा इस विषय का निर्णय कर सकते हैं।

               मनुष्य के भोजन विषयक स्वभाव व प्रकृति के बारे में विचार करते हैं। मनुष्य भोजन क्यों करता है? इसका उत्तर है कि मनुष्य स्वयं को स्वस्थ रखने, निरोग बने रहने और बल वा शक्ति की प्राप्ति के लिये भोजन करता है। इससे उसे सुख मिलता है। भूख की निवृत्ति भी इसका एक कारण है। जिस प्रकार से प्यास को दूर करने के लिये स्वच्छ जल ही उत्तम माना जाता है इसी प्रकार से हमारा अन्न व फल आदि सभी पदार्थ भी शुद्ध होने चाहिये। कोई मनुष्य बासी, पुराना व कीड़े लगा हुआ फल कभी नहीं खाता। इसी प्रकार से भोजन करते हुए भी यह विचार अवश्य करना चाहिये कि भोजन से स्वास्थय आरोग्य होगा या नहीं? सभी वनस्पतियों से निर्मित व परम्परा से प्राप्त शाकाहारी भोजन स्वास्थ्य के लिये श्रेष्ठ पाया जाता है। घोड़ा घास खाता है और सबसे तेज दौड़ता है। विज्ञान ने भी इस बात को स्वीकार कर शक्ति की ईकाई को अश्वशक्ति या हार्स पावर का नाम दिया है। हाथी भी शाकाहारी पशु है। यह भी वनस्पतियों पर अपना जीवन बिताता है। इसे बल में सर्वाधिक कह सकते हैं। यह पेड़ को भी अपनी सूंड से पकड़ कर जड़ से उखाड़ने की क्षमता रखता है। शेर मांसाहारी प्राणी है। बल भी उसमें होता है। वह सभी प्रकार के पशुओं का मांस खाता है। उसमें इतना साहस व वीरता नहीं होती कि वह हाथी पर सामने से आक्रमण करे। इससे ज्ञात होता है कि व डरपोक प्राणी है, कम से कम हाथी से तो डरता ही है। उसे अपने बल का पता है कि वह बल में हाथी को पराजित नहीं कर सकता। शेर में इस डर व साहस की न्यूनता मांस व पतित भोजन के कारण हैं। इसमें शेर की भी गलती नहीं है। परमात्मा ने उसे बनाया ही वैसा है। उसके शरीर में दांत व पांचन तन्त्र पशु के मांस को खाने व पचाने के अनुरूप है तथा पैर के पंजे भी इस काम में सहायक होते हैं। परमात्मा ने शाकाहारी जीव-जन्तुओं के दांत व मांसाहारी जीव-जन्तुओं के दांतों में भी अन्तर किया है। उनके पाचन तंत्र भी अलग प्रकार के बनाये हैं। मनुष्य के दांत व पाचन तंत्र शाकाहारी पशुओं के समान होने से भी ईश्वर ने यह सन्देश दिया है कि मनुष्य एक शाकाहारी प्राणी है। मनुष्य नादानी व अज्ञानता में भले ही मांस का सेवन कर ले परन्तु वह पशुओं की भांति केवल कच्चे मांस पर निर्भर व जीवित नहीं रह सकता। उसे मांस को पकाकर खाना पड़ता है उसमें नमक, मिर्च, मसाले, तेल व घी आदि डालने पड़ते हैं अन्यथा केवल मांस को पशुओं की भांति दांतों से कच्चा चबा कर वह नहीं खा सकता। इससे मनुष्य के लिये पशुओं का मांस प्रकृति व स्वभाव की दृष्टि से अनिष्ट व विरुद्ध है।

               मनुष्य को परमात्मा ने अहिंसक स्वभाव का प्राणी बनाया है। उसके हृदय में दूसरों के प्रति दया व करूणा का भाव दिया है। मनुष्य गाय पालता है तो उसका दूध पीकर उसमें गाय के प्रति माता की भावना उत्पन्न होती है। गाय भी अपने पालक पर दया व करूणा की वर्षा करती है। गायपालक व उसका पूरा परिवार गाय को मात्र घास का भोजन ही कराता है जिसे परमात्मा ने प्रकृति में बहुतायत में उत्पन्न किया है। घास को कृषक को उगाना नहीं पड़ता, वह स्वयं ही उगता है व निःशुल्क प्राप्त होता है। उस घांस से गायपालक का अपना पूरा परिवार स्वस्थ, निरोग व बलिष्ठ बनता है। दीर्घायु होता है। मांसभक्षी पशु प्रायः अल्पायु वाले होते हैं जबकि शाकाहारी पशु व मनुष्य दीर्घायु, निरोग, सुख व प्रसन्नता का जीवन व्यतीत करते हैं। मांसाहारियों द्वारा मांस का सेवन करने से उनके उदर व पांचन तन्त्र पर बुरा प्रभाव पड़ता है। अनेक मांसाहारी मदिरापान के दुर्व्यसन से भी ग्रस्त होते हैं। यह सब पदार्थ रोगकारक अल्पायु को आमंत्रण देते हैं। इससे जितना अधिक बचा जाये उतना अच्छा है।

               जब हम इतिहास पर दृष्टि डालते हैं तो उसमें शूरवीर व बलवानों पर दृष्टि जाती है। हनुमान व भीम हमारे इतिहास में सबसे अधिक बलवान मनुष्यों के रूप में हैं। यह दोनों ही शुद्ध शाकाहारी व वेदानुयायी थे। महर्षि दयानन्द जी का शरीर भी अत्यन्त आकर्षक, स्वस्थ एवं बलवान था। यदि स्वामी दयानन्द जी को उनके विरोधियों, शत्रुओं और षडयन्त्रकारियों द्वारा समय-समय पर विष न दिया जाता तो सम्भव है कि वह 100 से अधिक वर्षों तक जीते। महाभारत काल में 160 से 180 वर्षों के बीच के भीष्म पितामह इस बड़ी आयु में भी युवाओं से युद्ध करते रहे और उन्होंने हजारों व लाखों वीरों को मृत्यु के पार पहुंचाया था। यह शाकाहार का प्रमाण है। इसी प्रकार से हमारे मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम, योगश्वर श्री कृष्ण, रावण, सुग्रीव, लक्ष्मण आदि सभी शाकाहारी वीर व साहसी योद्धा थे। अतः मांस बल का पर्याय न होकर रोग और अल्प जीवन का पर्याय ही कहा जा सकता है।

               वैदिक धर्म जो कि ईश्वर प्रदत है, इसका एक प्रमुख सिद्धान्त कर्म-फल सिद्धान्त है। संसार में जो भी प्राणी जन्म लेता है वह अपने पूर्वजन्मों के कर्मों का फल भोगने के लिये ही जन्म लेता है। सभी पशु, पक्षी आदि प्राणी अपने जीवन में अपने पूर्वजन्मों के पापों का फल भोगते हैं। एक वा अनेक पशु-पक्षी योनियों में फल भोगने के बाद इनका मनुष्य योनि में जन्म होता है जिससे यह मनुष्यों की भांति अपने कर्म के बन्धनों को काट कर मोक्ष को प्राप्त कर सके। सभी पशु पक्षी भी किसी किसी प्रकार से मनुष्य को लाभ पहुंचाते हैं। ऐसे लाभकारी पशुओं को मारना हिंसा है जो कि अमानवीय होने से मनुष्य की प्रकृति स्वभाव के विरुद्ध है। मनुष्य का कर्तव्य लाभकारी पशुओं की रक्षा करना उनके लिये भोजन का प्रबन्ध करना उचित है तभी वह अपने बन्धनों को काट सकते हैं। ऐसा करना उनके लिये बहुत अधिक हानिकारक कार्य है। मांसाहारी मनुष्य देश व समाज को भी हानि पहुंचाते हैं और अपना परजन्म भी नष्ट करते हैं। महर्षि दयानन्द ने लिखा है कि हिंसक स्वभाव वाले मांसाहारियों को योग विद्या व ईश्वर की पूजा में सफलता प्राप्त नहीं होती। हो भी कैसे, वह ईश्वर की आज्ञा का उल्लंघन जो करते हैं। अतः मनुष्य को भोजन के पदार्थों पर मनन करना चाहिये व वैदिक विद्वानों की सम्मति लेनी चाहिये। पशुओं का मांस का आहार छोड़कर उनकी रक्षा व पालन कर अपने दुष्कर्मों का प्रायश्चित करना चाहिये। इसी के साथ इस लेख को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

मनमोहन कुमार आर्य

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