अच्छी बात नहीं।

औरों के घर में हो अंधेरा, तुम्हारे घर में हो उजाला,
यह तो अच्छी बात नहीं।

हमारे हो महल दुमहले,
और तरसे झोपड़े को भी, यह तो अच्छी बात नहीं।

जो चाहा हमने वह हमें मिले औरों को जो मिला,
वह भी हम छीन लें,
यह तो अच्छी बात नहीं।

मेरी हर बात सच्ची बात,
तेरी हर बात झूठी बात ,
यह तो अच्छी बात नहीं।

किसी का पोछ कर सिंदूर, चाहती अपना मांग सजाना,
यह तो अच्छी बात नहीं।

किसी को दर-बदर कर,
चाहते हो अपना घर बसाना
यह तो अच्छी बात नहीं।

करके दूसरों की नींद हराम,
चाहते हो सुख चैन की नींद,
यह तो अच्छी बात नहीं।

किसी को देकर ताउम्र का दर्द,
चाहते हो खुश रहना,
यह तो अच्छी बात नहीं

सुपुर्द-ए-खाक कर घर किसी का,
रोशन-ए-चिराग करना चाहते हो घर अपना,
यह तो अच्छी बात नहीं।

खुद कत्ल करोगे किसी का, और चाहोगे लोग रहें तुम पर मेहरबान,
यह तो अच्छी बात नहीं।।

तुम करो गलती पर गलती, और चाहो किसी से भूलकर भी ना हो नुकसान
यह तो अच्छी बात नहीं।।

छोड़ चुके हैं वे तो घर-बार, मां- बाप अपने ,
चाहते हैं हम भी छोड़ दें नाते रिश्ते सभी,
यह तो अच्छी बात नहीं है।

Leave a Reply

%d bloggers like this: