जम्मू-कश्मीर पर अनर्गल बयानबाजी बंद होनी चाहिए

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मनोज ज्वाला
संविधान के अनुच्छेद-370 को निरस्त कर दिए जाने एवं जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरु होने के साथ ही अपने देश में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कुछ दलों के नेता अनर्गल बयानबाजी कर लोकतांत्रिक मूल्यों व राष्ट्रीय हितों  का हनन करते दिख रहे हैं। इसका फायदा पाकिस्तान के भारत-विरोधी अभियान को मिल रहा है। यह ठीक नहीं है। पाकिस्तान की ओर से भारत-सरकार के विरुद्ध लगाये जा रहे जिन आरोपों को सच मानने से पूरी दुनिया इनकार कर चुकी है, कुछ नेता उस पर वितण्डा खड़ा करने से नहीं चूक रहे। उनके बयानों से न केवल पाकिस्तान का दावा पुष्ट हो रहा है, बल्कि ऐसा प्रतीत हो रहा है कि ये बयानबाज लोग पाकिस्तानी हुक्मरानों के प्रवक्ता बने हुए हैं। पाकिस्तान की ओर से जो भी कहा जा रहा है, उसका समर्थन भारत के इन विपक्षी नेताओं द्वारा तुरंत किया जा रहा है। ध्यातव्य है कि पाकिस्तानी हुक्मरान आरम्भ से ही कश्मीर मामले को इस्लाम व मुसलमान के नजरिये से पेश करते रहे हैं, तो भारत में कांग्रेस-कम्युनिस्ट दलों के कुछ नेता उसे मुस्लिम सियासत का ही रुप दे देते हैं। ये नेता अनुच्छेद 370 को भारतीय संविधान द्वारा एक वर्ग विशेष को दिया हुआ उपहार बताते-मानते रहे हैं, जबकि सच यह है कि वह विशेषाधिकार तो समस्त जम्मू-कश्मीर को दिया गया था, जिसका नाजायज इस्तेमाल वहां के बहुसंख्यक मुसलमानों द्वारा अल्पसंख्यक हिन्दुओं के विरुद्ध किया जाता रहा था। उस अनर्थकारी सांवैधानिक प्रावधान को हटा दिए जाने के बाद  अब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान जब यह कह रहे हैं कि  कश्मीर में मुसलमानों पर जुल्म किया जा रहा है, तब कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा कहा जा रहा है कि ‘जम्मू-कश्मीर का मुस्लिम-बहुल होने के कारण वहां से अनुच्छेद 370 हटाया गया है।’ यह बयान तो वस्तुतः अनुच्छेद 370 कायम करने और उसे निरस्त कर देने के दोनों मौकों पर संसद में हुए बहस-विमर्श एवं उसके निष्कर्ष के आधार पर लिए गए उस निर्णय का अपमान है, जिसके तहत जम्मू-कश्मीर को दिया गया विशेष दर्जा समाप्त कर दिया गया। इस पूरे मामले में सच तो यही है कि बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी के कारण वह अनुच्छेद न जोड़ा गया था न हटाया गया है। लेकिन पाकिस्तान इसे इस्लामी रंग देकर इस मामले पर दुनिया के इस्लामिक देशों का समर्थन हासिल करने की कोशिश करने में लगा हुआ है। दुखद यह कि कांग्रेस के नेतागण भी उसी का समर्थन करते दिख रहे हैं।अनुच्छेद 370 के उन्मूलन एवं जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की योजना का क्रियान्वयन बता रहे हैं। वह संघ को नाजी संगठन बता रहे हैं। उधर, उन्हीं की हां में हां मिलाते हुए कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी कश्मीर की वर्तमान हालत को ‘एक नाजी कैम्प के समान’ बता रहे हैं। चौधरी से यह पूछा जाना चाहिए कि कांग्रेसी शासन के दौरान जिन दिनों कश्मीर में अनुच्छेद 370 का संरक्षण पाकर जिहादी शक्तियों द्वारा वहां के मूल निवासी हिन्दुओं को उनकी ‘जोरु-जमीन-जायदाद’ छीनकर मार-मार के भगाया जा रहा था और पूरी घाटी में मार-काट-आगजनी-फसाद का राज कायम था, उन दिनों के हालात कैसे थे? मुस्लिम-तुष्टिकरण की अपनी राजनीति चमकाने के लिए संघ व भाजपा के विरुद्ध हमेशा जहर उगलते रहने के कारण विगत चुनाव में धूल चाटने को विवश हुए दिग्विजय सिंह को तब कश्मीर शायद फूलों की तरह खिलता-मुस्कुराता हुआ दिख रहा था, जब वहां चार सौ भी अधिक मन्दिर जला दिए गए थे। अब जब जम्मू कश्मीर में अमन कायम हो रहा है तो विपक्ष के इन नेताओं को बेचैनी क्यों हो रही है? राहुल गांधी कहते हैं कि कश्मीर में केन्द्र सरकार ‘सत्ता की ताकत का दुरुपयोग’  कर रही है। सत्ता के मद में मदहोश होकर कांग्रेस की लुटिया डूबो देने वाले इस नेता को क्या यह मालूम है कि कश्मीर को भारत से पृथक कर देने के देशद्रोह-मामले में आरोपित होकर जेल की हवा खा रहे शेख अब्दुल्ला को नेहरुजी ने उस मुकदमें से मुक्त कर पीएम हाउस में मेहमान बना रखा था, तो वह सत्ता की ताकत का सदुपयोग कैसे था? कांग्रेस के जिन नेताओं को देश के इतिहास-भूगोल का ज्ञान नहीं है, वे आज कश्मीर-मामले पर लगातार बयान दाग रहे  हैं। भारत के विरुद्ध पाकिस्तान के नेताओं द्वारा जो आरोप नहीं लगाए जा रहे हैं, वह आरोप भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता ही इन दिनों लगा रहे हैं। मणिशंकर अय्यर कहते हैं कि ‘कश्मीर की हालत फिलीस्तीन जैसी हो गई है।’ दूसरे दलों के नेताओं द्वारा भी ऐसी ही अनर्गल बयानबाजी की जा रही है। इनके ऐसे बहके बोल से देश के भीतर तो कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं है, क्योंकि पूरा देश इनके पाखण्डी चरित्र व राष्ट्रघाती चिन्तन को जान-समझकर इन्हें जनमत का मोहताज बना दिया है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इनके ऐसे बयानों से पाकिस्तान का दावा मजबूत हो सकता है। अपने ऐसे बयानों से पाकिस्तान के सुर में सुर मिला रहे और प्रकारान्तर में अलगाववादियों को समर्थन दे रहे ये लोग कश्मीर जाने की जिद्द कर रहे हैं और उस यात्रा का प्रयोजन भारत सरकार की मदद करना बता रहे हैं, तो समझा जा सकता है कि ये लोग वहां जाकर किस प्रकार से किसकी मदद करेंगे। सरकार ने विपक्ष के एक दर्जन नेताओं को  कश्मीर जाने से रोक देने की जो कार्रवाई की है, सर्वथा उचित है। जरूरत एक ऐसे सख्त कानून की भी है, जो ऐसी अनर्गल बयानबाजियों पर अंकुश लगाए। पाक-प्रायोजित पुलवामा हमला का भारतीय सेना द्वारा प्रतिकार किये जाने का सबूत मांगने, जेएनयू में ‘भारत को टुकड़े-टुकड़े करने’ का नारा लगाए जाने पर भी इन नेताओं को भारत के विरोध में व पाकिस्तान के पक्ष चोंचलेबाजी करते देखा जाता रहा है। अतएव अनर्गल बयानबाजी रोकने की बाबत एक सख्त कानून का प्रावधान किया जाना अपरिहार्य प्रतीत हो रहा है।(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।) 

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