लेखक परिचय

इक़बाल हिंदुस्तानी

इक़बाल हिंदुस्तानी

लेखक 13 वर्षों से हिंदी पाक्षिक पब्लिक ऑब्ज़र्वर का संपादन और प्रकाशन कर रहे हैं। दैनिक बिजनौर टाइम्स ग्रुप में तीन साल संपादन कर चुके हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में अब तक 1000 से अधिक रचनाओं का प्रकाशन हो चुका है। आकाशवाणी नजीबाबाद पर एक दशक से अधिक अस्थायी कम्पेयर और एनाउंसर रह चुके हैं। रेडियो जर्मनी की हिंदी सेवा में इराक युद्ध पर भारत के युवा पत्रकार के रूप में 15 मिनट के विशेष कार्यक्रम में शामिल हो चुके हैं। प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ लेखक के रूप में जानेमाने हिंदी साहित्यकार जैनेन्द्र कुमार जी द्वारा सम्मानित हो चुके हैं। हिंदी ग़ज़लकार के रूप में दुष्यंत त्यागी एवार्ड से सम्मानित किये जा चुके हैं। स्थानीय नगरपालिका और विधानसभा चुनाव में 1991 से मतगणना पूर्व चुनावी सर्वे और संभावित परिणाम सटीक साबित होते रहे हैं। साम्प्रदायिक सद्भाव और एकता के लिये होली मिलन और ईद मिलन का 1992 से संयोजन और सफल संचालन कर रहे हैं। मोबाइल न. 09412117990

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homosexualityइक़बाल हिंदुस्तानी

 

आईपीसी की धारा 377 को निरस्त करना इतना आसान नहीं है!

       एल जी बी टी यानी लेस्बियन,गे, बायोसैक्सुअल और ट्रांस्जेंडर जिनको हिंदी में हम समलैंगिक के नाम से जानते हैं चार तरह के लोग पाये जाते हैं। लेस्बियन यानी महिला के महिला से अंतरंग संबंधगे यानी पुरूष के पुरूष के रिश्ते, बायोसैक्सुअल मतलब एक पुरूष के पुरूष और स्त्री या एक स्त्री के स्त्री और पुरूष दोनों से शारिरिक सम्बंध और ट्रांस्जेंडर उनको कहते हैं जो पुरूष होकर स्त्री जैसा और स्त्री होकर पुरूष जैसा व्यवहार करते हैं। दरअसल ऐसा वे जानबूझकर नहीं करते बल्कि उनके जन्मजात जींस मंे ही यह इनबिल्ट होता है। सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा फैसला इस मामले में लीक से हटकर आया है। अब तक देखने मंे यह आया है कि सुप्रीम कोर्ट कई बार अपनी सीमा लांघकर ऐसे आदेश देता रहा है जिनपर संसद का अधिकार माना जाता है।

    मिसाल के तौर पर उसने चुनाव में प्रत्याशियों के लिये यह अनिवार्य कर दिया कि वे नामांकन में अपने अपराधिक मामले, सम्पत्ति और शिक्षा का उल्लेख करेंगे। सरकार ने इस आदेश को टालने की काफी कोशिश की लेकिन कोर्ट के अपने निर्णय पर अडे़ रहने और जनता में नेताओं की छवि और ख़राब होने पर ना चाहते हुए भी उसको ऐसा कानून बनाना पड़ा। ऐसा ही शाहबानों मामले में हुआ था जब राजीव सरकार ने कानून बनाकर मुस्लिम पतियों को तलाक के बाद अपनी पत्नियों को गुज़ारा भत्ता देने से बरी कर दिया लेकिन कोर्ट आज भी ऐसी तलाकशुदा मुस्लिम पत्नियों को आईपीसी की धरा 125 के तहत गुजारा भत्ता दिला रहा है। जहां तक समलैंगिकों के मामले में चार साल पहले आये दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का सवाल है वह धारा 377 को ख़त्म करने का नहीं था बल्कि अदालत ने यह कहा था कि यह सैक्शन संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करता है।

     उधर सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि जब तक धारा 377 मौजूद है तब तक समलैंगिक संबंध गैर कानूनी है। सरकार चाहे तो इस धारा को ख़त्म कर सकती है या संशोधित कर सकती है लेकिन यहां सुप्रीम कोर्ट अपनी पुरानी परंपरा से हटकर प्रगतिशील और आधुनिक समाज बनाने के लिये सरकार को दिल्ली हाईकोर्ट की तरह इस धारा को अवैध या गैर संवैधानिक नहीं बताता है। इस धारा में कहा गया है कि जो भी स्वैच्छा से किसी पुरूष, महिला या पशु से अप्राकृतिक जिस्मानी रिश्ता बनायेगा उसको दस साल, या उम्रकैद और जुर्माने की सज़ा दी जायेगी। यह धारा 1861 के पुलिस एक्ट के तहत बनी थी लेकिन 1935 में इसमें मुख मैथुन को जोड़कर और विस्तार कर दिया गया। यह भी माना जा रहा है कि चूंकि दिल्ली हाईकोर्ट के इस विवादित निर्णय को धार्मिक संस्थाओं ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी इसलिये कोर्ट ने केवल उनकी बात पर एकतरफा विचार करके राहत दे दी है।

   रिग्वेद में कहा गया है कि विकृति इवम प्रकृतिअर्थात विकृति भी प्रकृति ही है क्योंकि कुदरत ने ही एकलिंगी, समलिंगी और उभललिंगी पैदा किये हैं। ईश्वर ने जब कुछ लोगों को लैंगिक विकलांगता दी है तो उनका समलैंगिक होना भी स्वाभाविक है। मनुष्य ही नहीं पेंगुइन, चिम्पैजी, डॉल्फ़िन और सील जैसी जीवों में भी समलैंगिकता पाई जाती है। इसके साथ ही ऐसे एकलिंगी जीव भी प्रकृति ने बनाये हैं जो जैविक रूप से अपने ही शरीर से अपना वंश अकेले चलाने मंे सक्षम हैं। यह भी सच है कि इंसान का नंगा पैदा होना प्राकृतिक है लेकिन वह सभ्य होने की वजह से कपड़े से अपने शरीर को ढकता है। वह नहाता है और सैक्स करता है लेकिन छिपकर अकेले में। जो भी कुछ प्राकृतिक है वह सब कानूनन मान्यता नहीं पा सकता। यह माना जाता है कि समलैंगिकता को मान्यता देकर एड्स से बचाव के अभियान को काफी तेज़ी से चलाया जा सकता है।

 

    समलैंगिकता अपराध होने की वजह से इनमें एचआईवी जागरूकता नहीं फैल पा रही है क्योंकि समलैंगिक इसे स्वीकार करने से बचते हैं। इतना ही नहीं समलैंगिकों में यौन संबंधों से पैदा होने वाली बीमारियां, डिप्रेशन और हेपेटाइटिस के ख़तरे भी सामान्य लोगों के मुकाबले कई गुना ज़्यादा बढ़ रहे हैं। आज समलैंगिकता को देह व्यापार से भी घृणित माना जाता है। भारत में 26 लाख समलैंगिक हैं जिनमें से 25 लाख गे और एक लाख लेस्बियन हैं। महाराष्ट्र में सबसे अधिक यानी डेढ़ लाख समलैंगिक बताये जाते हैं। देश में 8 लाख समलैंगिक एचआईवी संक्रमण से ग्रस्त हैं। दुनिया के 126 देशों में समलैंगिकता को कानूनी मान्यता दी गयी है। तुर्की, ईरान, ईराक, सउूदी अरब जैसे मुस्लिम मुल्कों के साथ ही जॉर्डन जैसे 80 देशों में इस पर पाबंदी है। डेनमार्क ने 1989 में सबसे पहले समलैंगिककों को कानूनी मान्यता दी थी।

    इसके बाद नार्वे, स्वीडन, आयरलैंड के बाद हॉलैंड ने 2001 में पहली बार समलैंगिक जोड़े को शादी का कानूनी अधिकार भी दे दिया। अमेरिका के कुछ प्रांतों में भी इसको मान्यता मिली हुयी है। इस मामले में कांग्रेस जहां सवा सौ करोड़ लोगों की भावनाओं को दरकिनार करके 25 लाख से अधिक समलैंगिकों की अपने तरीके से जीने की संवैधनिक आज़ादी को सुरक्षित रखने के लिये धारा 377 में बदलाव लाने जा रही है वहीं 2014 के चुनाव में सत्ता में आने को आतुर भाजपा ने यह सोचकर चुप्पी साध ली है कि पक्ष और विपक्ष दोनों में बोलने से उसको वोटों का नुकसान हो सकता है।

     भाजपा नेता दबी जुबान से अपना विरोध दर्ज करा भी रहे हैं लेकिन उनके यह तर्क काफी हल्के और दिखावटी अधिक हैं कि समलैंगिकता को मान्यता मिलने से भारतीय सभ्यता और संस्कृति ख़तरे मंे पड़ेगी और गे पार्लर और समलैंगिक क्लब बड़े पैमाने पर खुल जाने से वहां इनकी आड़ में ज़िंदा गोश्त का कारोबार सैक्स रेकिट चलाने लगेंगे। यह आशंका पूरी तरह से निराधार भी नहीं है क्योंकि दुनिया की 3 खरब डॉलर की तीसरी सबसे बड़ी सैक्स इंडस्ट्री की गिध्द दृष्टि भारत पर गड़ी हुयी है । बताया जाता है कि अगर ऐसा होता है तो भारत थाईलैंड और मैक्सिको के बाद दुनिया की तीसरी बड़ी सेक्स मार्केट बन कर उभर सकता है।

    समलैंगिकता को मानसिक, अनुवांशिक और हारमोनल यानी पैदायशी जींस की बीमारी भी माना जाता है और चिकित्सकों व वैज्ञानिकों का दावा है कि इसको विकृति नहीं कहा जा सकता क्योंकि समलैंगिक जानबूझकर ना तो ऐसा करता है और ना ही वह चाहकर भी अपने स्वभाव को बदल सकता है। कुछ डाक्टर इसके इलाज का दावा भी करते हैं लेकिन आज तक यह कारगर नहीं रहा है। अंत में यही कहा जा सकता है कि आज दुनिया ग्लोबल विलेज में बदल चुकी है जिससे समलैंगिकता का समर्थन समलैंगिक होना नहीं है।  

  नई नस्लों की खुद मुख़्तारियों को कौन समझाये,

   कहां से बचके चलना है कहां जाना ज़रूरी है।।

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