‘नोटबंदी’ के बाद ‘बत्ती बंदी’ यानी बड़ा फैसला…

अब बात करें राज्य सरकारों की तो, केन्द्र की भांति राज्य सरकार इस पर फैसला खुद लेगी,लेकिन माना जा रहा है कि केन्द्रीय फैसले के बाद राज्यों पर इसे लागू करने का दबाव रहेगा। दरअसल खासकर भाजपा शासित राज्यों पर इसका सीधा असर आएगा। हालांकि,पहले बहुत सारे मंत्री ‘लालबत्ती’ होने के पक्ष में बयान देते रहे हैं,तो अब इसे छोड़ने से उनके दिल में कसक तो रहेगी,पर इसे जनहित में सही समय पर लिया गया स्वस्थ निर्णय मानना इनकी भी मजबूरी है। यदि फैसले की खिलाफत की तो सम्भव है कि,पीएम ऐसे मंत्रियों को पुराने नोट की तरह अनुपयोगी कर दें।

अजय जैन ‘ विकल्प ‘

इसे कहते हैं निर्णय लेना और उसे अमल में लाना..जी हाँ, केन्द्र में आसीन मोदी सरकार ने सरकारी तंत्र की एक और कमजोर कड़ी को मज़बूती देने के लिए ‘बत्ती बंदी’ का बड़ा फैसला लिया है। भाजपा सरकार का ‘नोटबंदी’ के बाद यह दूसरा बड़ा निर्णय है,जिससे जनता के साथ मंत्रियों का वीआईपी ठसका निश्चित रुप से कम होगा। वीआईपी कल्चर पर आप इसे प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की करारी चोट या सेना वाली ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ भी कहें तो गलत नहीं होगा। इस चोट का मैदानी असर मई से दिखने भी लगेगा,क्योंकि देश में सिर्फ़ 5 लोग ही ‘लाल बत्ती’ लगा पाएंगे। केन्द्र की मोदी कैबिनेट ने वीवीआईपी कल्चर के खिलाफ यह जो बड़ा फैसला लिया है,उससे सिर्फ 5 बड़े लोगों को ही आजादी दी गई है।यानी वाहनों पर लाल बत्ती का इस्तेमाल अब सिर्फ भारत के राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति,प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश और लोकसभा स्पीकर ही कर सकेंगे। बत्ती गुल करने के इस फैसले से मंत्रियों को अपनी शान में भले ही कमी लगे,पर सरकारी तंत्र में वीआईपी संस्कृति पर ऐसी लगाम आवश्यक है। जब आप जनता के सेवक हैं और ये बात सभा में कहते भी हैं तो आपको जाने-घूमने के लाल बत्ती की आवश्यकता क्या है। कुछ केन्द्रीय मंत्रियों ने इस अहम निर्णय के आते ही अपनी लाल बत्ती छोड़ दी,और सामान्य हो गए हैं। जनता में अपने खास होने का दम्भ तोड़ने के लिए मोदी ने केन्द्रीय मंत्रियों के साथ ही अधिकारियों की भी लाल बत्ती छीन ली है। इस महती फैसले का एक अच्छा पहलू यह भी माना जाए कि,1 मई यानी ‘मजदूर दिवस’ पर सरकार आमजन को यह संदेश देना चाहती है कि,उसके मंत्री वीआईपी कल्चर से दूर रहेंगे,यानी बत्ती की झांकी से बचेंगे। अभी बत्ती के वीआईपी और वीवीआईपी ठसके से कई मंत्री तथा अधिकारी जनता से दूर ही रहते हैं और खुद को उच्च मानकर सेवा से बचते हैं,पर अब इससे उनके मिलने और काम में आसानी होगी।

अब बात करें राज्य सरकारों की तो, केन्द्र की भांति राज्य सरकार इस पर फैसला खुद लेगी,लेकिन माना जा रहा है कि केन्द्रीय फैसले के बाद राज्यों पर इसे लागू करने का दबाव रहेगा। दरअसल खासकर भाजपा शासित राज्यों पर इसका सीधा असर आएगा। हालांकि,पहले बहुत सारे मंत्री ‘लालबत्ती’ होने के पक्ष में बयान देते रहे हैं,तो अब इसे छोड़ने से उनके दिल में कसक तो रहेगी,पर इसे जनहित में सही समय पर लिया गया स्वस्थ निर्णय मानना इनकी भी मजबूरी है। यदि फैसले की खिलाफत की तो सम्भव है कि,पीएम ऐसे मंत्रियों को पुराने नोट की तरह अनुपयोगी कर दें। इस फैसले से उम्मीद की जानी चाहिए कि,अब राज्य भी इस पर सोचकर खुद निर्णय करेंगे। इससे पूर्व पंजाब की अमरिंदर सरकार ने ‘लाल बत्ती’ पर रोक लगा दी थी तो यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी  लाल बत्ती से हूटर निकालने की बात कही थी।

कैबिनेट के इस फैसले के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने अपने राज्य में किसी फैसले के बिना ही अमल कर लिया है। इन्होंने बिना लाल बत्ती लगी गाड़ी में आकर अन्य राज्यों को प्रेरणा दी है कि,वो पहल करके निर्णय लें। दिल्ली की उक्त केन्द्रीय घोषणा से प्रभावित होकर मध्यप्रदेश में एक निगम ने अध्यक्ष ने लाल बत्ती छोड़ दी  है। लाल बत्ती के वीवीआईपी कल्चर को खत्म करने की दिशा में उठाए गए इस क़दम के बाद सरकार को चाहिए कि,असलियत में ऐसे सुविधाभोगी अधिकारियों और मंत्रियों की वीआईपी-वीवीआईपी सुविधाओं को समाप्त किया जाए। ये भी आमजन की तरह ही जनता की सुविधाओं के लिए करोड़ों रुपयों से तैयार सड़कों पर संचालित टोल का टैक्स चुकाएं और झाँकीबाजी कम करें। सिर्फ इनकी बत्ती हटाने से ही ये बत्तीबाजी बँद नहीं करेंगे,और सरकारी खजाने को अपनी सुविधाओं पर खाली करना भी इनका शौक बना रहेगा। सरकार को ऐसे जनप्रतिनिधियों को बत्ती छोड़ने के साथ ही यह भी समझाना पड़ेगा कि,राजनीति करना सेवा का मेवा है,कोई निवेश का विकल्प नहीं कि,उस पर किया गया खर्च सरकारी खजाने और जनता से वसूला जाए।

अजय जैन ‘ विकल्प ‘

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