किसी चमत्कार से कम नहीं – ज्योतिषीय उपाय

जगत में हर वस्तु जैसे धरती, जल, वायु, कीड़े-मकौड़े, पतंगा, जानवर, पत्थर, स्फटिक और धातु व रंग, खुशबू, आकार, गति, ग्रह व तारां में ऊर्जा होती है जो चमत्कार कर सकती है। चमत्कार आलौकिक या अस्वाभाविक नहीं बल्कि यह कुछ अलग, बहुत स्वाभाविक लेकिन प्रकृति से परे होता है। चमत्कार एक रत्न की तरह स्वाभाविक है और उतना ही सच्चा है जितने कि हम, हमारी सांसें और सूर्य जैसा शक्तिशाली। किसी खास समस्या के समाधान के लिए हम रत्न, रुद्राक्ष, मंत्र, यंत्र, तंत्र, यज्ञ, अनुष्ठान, स्तुति पाठ, शंख, ताबीज, अंगूठी, लॉकेट, स्फटिक, पिरामिड या सिक्के का प्रयोग कर सकते हैं।

रत्न

रत्नों के चमत्कार का अर्थ है शक्ति का विकल्प के परिवर्तन के लिए प्रयोग। अब हम समझ सकते हैं कि रत्नों में गुप्त शक्तियां, किरणपात व ऊर्जा होती है। विभिन्न प्रकार के रत्नों में विभिन्न प्रकार की ऊर्जाएं होती है जो कि हमारे जीवन में बदलाव उत्पन्न करने में सक्षम हैं। रत्नों में अपने से संबंधित ग्रहों की रश्मियों, चुम्बकत्व शक्ति  को खींचने की शक्ति के साथ-साथ उसे परावर्तित कर देने की भी शक्ति होती है। रत्न की इसी शक्ति के उपयोग के लिए इन्हें प्रयोग में लाया जाता है।

रुद्राक्ष

हमारे रत्नों के कोष हमारी जिस तरह से सहायता करते हैं, उसी तरह रुद्राक्ष में विद्युत चुंबकीय गुण होते हैं जो शरीर क्रिया विज्ञान पर प्रभाव डालते हैं। रुद्राक्ष कवच सबसे शक्तिशाली प्रतिकारक यंत्र होता है क्योंकि यह व्यक्ति के सकारात्मक गुणों में वृद्धि करता है और हर नकारात्मक पक्ष को मिटाता है।

यंत्र

यंत्रों में गूढ़ शक्तियां होती है और ये हमारी रक्षा एक कवच की तरह करते हैं। महर्षि  को यंत्र का जनक माना जाता है जिन्होंने शिल्पकला और ज्यामितीय रेखांकन के द्वारा त्रिकोण, चाप, चतुष्कोण तथा षट्कोण को आधार मानकर बीज मंत्रों द्वारा इष्ट शक्ति को रेखांकित करके अति विशिष्ट दैवीय यंत्रों का आविष्कार किया। यंत्र इष्ट शक्ति को आबद्ध करने की सर्वोच्च विधि है। अतः यंत्र की पूजा-अर्चना से देवता शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं।

मंत्र

मंत्रोच्चारण हमारे अंदर स्पंदन ;टपइतंजपवदद्ध पैदा करता है और हमारे व्यक्तित्व व बुद्धि का विकास करता है। मंत्र का शाब्दिक अर्थ ‘‘म से मन ‘‘त्र से त्राण अर्थात् ‘‘मननात् त्रायतेति मंत्रः’मनन के द्वारा प्राणों की रक्षा करने वाला। भारतीय हिंदू शास्त्रों में मंत्रों का बहुत महत्व बताया गया है।

मंत्र क्या है?

व्यक्ति की प्रसुप्त या विलुप्त शक्ति को जगाकर उसका दैवी शक्ति से सामंजस्य कराने वाला गूढ़ ज्ञान मंत्र कहलाता है। सद्गुरु की कृपा एवं मन को एकाग्र कर जब इसको जान लिया जाता है। तब यह साधक की मनोकामनाओं को पूरा करता है।

यंत्र

किसी विशिष्ट देवी देवता को समर्पित यंत्र के विभिन्न आवरणों के पूजा की संपूर्ण प्रक्रिया को पद्धति कहा जाता है। प्रत्येक देवी-देवता के नाम कोई न कोई विशेष यंत्र समर्पित है तथा इनके पूजा की प्रक्रिया के पहलू अति सूक्ष्म हैं जिसमें अत्यधिक ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता होती है। किसी यंत्र की विधिवत पूजा करने की सबसे पहली अर्हता है कि गुरु के द्वारा दिये गये मंत्र का कम से कम एक लाख 25 हजार जप किया जाय। यंत्र पूजा के द्वारा संदर्भित देवी-देवता की कृपा प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ तरीका है।

कवचम

कवच का शाब्दिक अर्थ होता है सुरक्षा आवरण। इसके अंतर्गत किसी देवी अथवा देवता से संबंधित श्लोकों के द्वारा उस देवी देवता का आह्वान किया जाता है तथा कठिनाई के समय ये जातक को सुरक्षा प्रदान करते हैं।

सहस्रनाम

अपने इष्ट देवता के 1000 नामों का जप सहस्रनाम कहा जाता है। इस प्रकार के साहित्य हमें विश्व में कहीं और देखने को नहीं मिलते जिसमें कि श्लोकों एवं कविताओं के माध्यम से ईश्वर के नामों के जाप एवं स्मरण की ऐसी पद्धति हो जिसके अर्थ काफी गूढ़ महिमामयी एवं आकर्षक हों तथा जिसमें काव्यगत विशेषताओं को नजर अंदाज किया गया। इन स्तोत्रों के लयबद्ध स्वर सुनने में इतने मनभावन होते हैं कि इन्हें अवश्य सुनना चाहिए तथा इनका अनुभव प्राप्त करना चाहिए।

स्तुति

स्तोत्रम एवं स्तुति दोनों का उद्भव एक ही क्रिया ‘स्तु से हुआ है जिसका शाब्दिक अर्थ है प्रसंशा करना। सामान्य रूप में स्तुति स्तोत्रम् का ही छोटा रूप है।

पंचांग

किसी विशेष देवी देवता की पूजा हेतु पांच आवश्यक अंगों के समूह को पंचांग की संज्ञा दी गयी है। ये हैं-

पटाला मंत्र

जिसे कोड के रूप में अंकित किया गया है तथा ये साधना हेतु बनी मूर्ति का वर्णन करते हैं।

पद्धति

आवरण अर्थात देवताओं के सेवकों की पूजा के रिवाज।

कवच

अशुभत्व दूर करने हेतु सामान्यतः शरीर पर पहना जाता है।

सहस्रनाम

एक हजार नामों का जाप

स्तुति

साधक के इष्टदेवता को प्रसन्न करने हेतु ऋचाएं

सूक्त

सूक्त, स्तोत्र एवं स्तुति शब्द समानार्थक हैं जिनका तात्पर्य होता है प्रशंसा करना। सूक्त वेदों के अंग हैं। किंतु स्तोत्र एवं स्तुति वदों से संबंधित नहीं हैं। सामान्यतः स्तुति स्तोत्र का ही छोटा रूप है।

स्तोत्र

स्तोत्र एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है- कसीदा, स्तवन अथवा प्रशंसनात्मक ऋचाएं, स्तोत्र प्रार्थना के रूप में अथवा वर्णनात्मक अथवा बातचीत के रूप में हो सकता है किंतु इसकी संरचना काव्यात्मक ही होती है। यह सामान्य कविता हो सकती है जिसमें किसी देवी अथवा देवता की प्रसंशा की गयी हो अथवा उनके प्रति व्यक्तिगत भक्ति को प्रदर्शित किया गया हो। अनेक स्तोत्र की ऋचाएं देवी, शिव अथवा विष्णु के विभिन्न पहलुओं की प्रशंसा हेतु सृजित हैं।

सुप्रभातम

ईश्वर को जगाने हेतु आहवान करना सुप्रभातम कहलाता है। सामान्यतः यह एक छोटी स्तुति के रूप में होती है जिसे अहले सुबह गाया जाता है।

अष्टकम एवं चालीसा

अष्टकम एवं चालीसा में निश्चित संख्या में दोहे होते हैं। अष्टकम में आठ श्लोक होते हैं किंतु चालीसा प्रमुखतः हिन्दी प्रार्थना है तथा इसमें चालीस दोहे होते हैं।

ध्यानम् एवं अर्चनम्

ध्यानम् एवं अर्चनम् प्रार्थना नहीं हैं, ये पूजा के प्रकार हैं। ध्यानम् का तात्पर्य साधना एवं अर्चनम का अर्थ पूजा करना होता है जैसा कि शास्त्रों में उल्लेख है। लक्ष्मी ध्यानम अथवा देवी अर्चनम में देवी लक्ष्मी से संबंधित प्रार्थनाओं एवं पूजा पद्धति के समुह हैं जिनका उपयोग आप साधना के वक्त अथवा देवी लक्ष्मी की पूजा के वक्त कर सकते हैं।

प्रार्थना

प्रार्थना एक ऐसा कृत्य है जिसमें पूजा की वस्तु का जबर्दस्ती संवाद के द्वारा आहवान किया जाता है। प्रार्थना व्यक्तिगत अथवा सामुहिक हो सकता है तथा इन्हें सार्वजनिक स्थल पर अथवा निजी स्थान पर आयोजित किया जा सकता है। इसमें शब्दों, गानों को समाविष्ट किया जा सकता है अथवा प्रार्थना बिल्कुल मौन रखकर भी किया जा सकता है। प्रार्थना किसी देवी देवता भूत-प्रेत, मृत व्यक्ति आदि को निर्दिष्ट किये जा सकते हैं जिसका उद्देश्य उनकी पूजा करना, निर्देश के लिए अनुरोध करना, उनकी सहायता हेतु विनय करना अथवा उनसे अपने द्वारा किये गये अपराध हेतु अपने विचार एवं भावनाओं का प्रदर्शन कर क्षमा प्रार्थना करना है।

माला

मालाओं का प्रयोग विभिन्न मंत्रोच्चारण करने के लिए किया जाता है। मालाओं में विशेष रूप से 108 मनकों का प्रयोग करने का विधि-विधान है क्योंकि : ऋषि या द्रष्टा यह भी कहते हैं कि माला के 108 मनके हमें हर तरह की सिद्धि प्राप्त कराते हैं। अंकशास्त्र के मुताबिक 108 का अंक सिद्धिदायक माना जाता है। जप माला में 108 मनकों का विधान दिया गया है।

स्फटिक

स्फटिक  प्रकाश और ऊर्जा का एक शक्तिशाली माध्यम है। यह परिवर्तक व विस्तारक / वर्द्धक के रूप में विभिन्न ऊर्जाओं को जैव ऊर्जाओं में परिवर्तित करके हमारे शरीर तंत्र / शारीरिक संरचना को संतुलित करते हैं व कोशिकीय, भावनात्मक, मस्तिष्कीय व आध्यात्मिक स्तर पर पुनः ऊर्जावान् बनाते हैं।

शंख

पुराणों में शंख को शुभता का प्रतीक माना गया है इसलिए पूजा-अर्चना व मांगलिक कार्यों पर शंख ध्वनि की विशेष महता है। शंख के ऊर्जा चक्र व ध्वनि के प्रभाव से ईश्वर ध्यान में पुजारी को सर्प इत्यादि खतरनाक जीव बाधा नहीं पहुंचाते तथा बुरी आत्माएं दूर भागती हैं साथ ही इसके अनेक सौभाग्यदायक, अनिष्ट शमन कारक व औषधीय गुण लोक प्रसिद्ध हैं।

भारतीय वैज्ञानिकों के अनुसार शंख ध्वनि कंपनों से वातावरण में रहने वाले सभी कीटाणु पूर्णतया नष्ट हो जाते हैं तथा प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग से बचाव हो सकता है व ओजोन लेयर के सुराख भर सकते हैं। शंख बजाने से बजाने वाले के अंदर साहस, दृढ़ इच्छा शक्ति, आशा व शिक्षा जैसे गुणों का संचार होता है तथा श्वांस रोग, अस्थमा व फेफड़ों के रोगों में आराम मिलता है।

पारद शिवलिंग

पारद् शिवलिंग की पूजा करके हमें शिवजी का आशीर्वाद तुरंत प्राप्त होता है क्योंकि पारद शिवलिंग की पूजा से हजार करोड़ शिवलिंगों की पूजा का फल प्राप्त होता है। शिव पुराण में पारे को शिव का पौरुष कहा गया है। इसके दर्शन मात्र से पुण्यफल की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि शास्त्रों में इसे अत्यंत महत्व दिया गया है।

अंगूठी

यह माना जाता है कि अंगूठियों का हमारे ऊपर रहस्यमयी प्रभाव होता है। जब रत्न हमारी उंगली को स्पर्श करता है तो हमारे अंदर अनुकूल ऊर्जा का प्रवाह करता है जिसका सीधा प्रभाव हमारे मस्तिष्क पर होता है चूंकि हमारी उंगलियों की स्नायु का संबंध सीधे मस्तिष्क से होता है।

पिरामिड

पिरामिड उपयुक्त स्थान पर स्थापित करने से, भूमि व भवन के ऊर्जा क्षेत्र को सकारात्मक (बलशाली व जैव-ऊर्जा में परिवर्तित करता है और व्यक्ति की जैव-ऊर्जा को खाली करने के बजाय संपूर्ण करता है। अतः वह व्यक्ति थकान व तनाव न महसूस करते हुए अतिरिक्त ऊर्जावान होकर रोजमर्रा की जिंदगी के दबावों व अपेक्षाओं का डटकर सामना कर पाता है। सकारात्मक ऊर्जा स्रोत के अंतर्गत व्यक्ति बेहतर निद्रा व स्वस्थ एवं सतुंष्ट जीवन को प्राप्त करता है। ऐसे में व्यक्ति अधिक अच्छे से ध्यान लगा सकता है तथा उसकी तनाव, थकान व संक्रामक रोगों से मुक्ति हो जाती है।

 सिक्के / लॉकेट / ताबीज

सिक्के व सिक्कों के आकार के लॉकेट (जिनमें कुछ यंत्रों की आकृति होती है) को बतौर ताबीज धारण करने/रखने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है। यंत्रां, रुद्राक्ष व रत्नों के लॉकेट गले में पहनने के लिए होते हैं। योगियों के अनुसार लॉकेट का सकारात्मक स्पंदन ;टपइतंजपवदद्ध हृदय चक्र को सक्रिय करता है। जब हम गले में लॉकेट पहनते हैं तो यह ढाल बनकर हमारी काला जादू, बुरी आत्माओं, भूत प्रेत व ग्रहों के प्रतिकूल प्रभाव से रक्षा करता है।

फेंगशुई सामग्री

फेंगशुई का अर्थ है वायु व जल। प्राचीनकाल से ये दोनों जल व वायु दो बड़ी शक्तियां मानी जाती रही है। यही ऊर्जा व्यक्ति के स्वास्थ, प्रगति व सौभाग्य के लिए ज़िम्मेदार होती हैं। फेंगशुई सामग्री हमारे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह की बेहतरी का दावा करती है।

रंग चिकित्सा

रंग चिकित्सा हमारे शरीर के ऊर्जा चक्रों को संतुलित करती है और उसमें वृद्धि करती है। यह हमारे शरीर के स्वतः स्वस्थ होने की क्षमता को प्रेरित करती है। रंग चिकित्सा रंगों के प्रयोग से चक्रों के ऊर्जा केद्रां को पुनः संतुलित करती है।

लाल किताब

ज्योतिष की चमत्कारिक पुस्तक लाल किताब में कुछ विलक्षण उपायों का उल्लेख है। ये उपाय सस्ते हैं व एक आम आदमी की पहुंच में हैं तथा आसानी से किए जा सकते हैं।

यज्ञ

इस समग्र सृष्टि के क्रिया कलाप ‘यज्ञ’रूपी धुरी के चारों ओर ही चल रहे हैं। प्राचीन धर्म शास्त्रों में ऋषियां ने ‘‘अयं यज्ञो विश्वस्य नाभिः (अथर्ववेद 9, 15, 14) कहकर यज्ञ को भुवन की इस सृष्टि का आधार बिंदु कहा है। स्वयं गीताकार योगिराज श्रीकृष्ण ने कहा है।

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाच प्रजापतिः।

अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्ट कामधुक।।

प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ कर्म के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो।’’ यज्ञ भारतीय संस्कृति के मनीषी ऋषिगणों द्वारा सारी वसुन्धरा को दी गयी ऐसी महत्वपूर्ण देन है, जिसे सर्वाधिक फलदायी एवं पर्यावरण केंद्र (इको सिस्टम) के ठीक बने रहने का आधार माना जा सकता है।

प्राणायाम

हमारे ऋषियों ने जीवन-भर तपस्या के फल स्वरूप, संसार में वास्तविक सुख और शांति लाने के लिए योग विज्ञान का निर्माण किया था। योग साधना में प्राणायाम सर्वश्रेष्ठ है। कहा जाता है कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का नाम योग है। प्राणायाम सांस को लेने और छोड़ने की प्रक्रिया है। प्रायः हम शरीर के रोगों का इलाज औषधियों द्वारा करते हैं। परंतु यह देखा गया है कि रोग, मात्र इन औषधियों से नष्ट नहीं होते।

योग और प्राणायाम के अभ्यास से हम इन शारीरिक रोगों से मुक्त हो सकते हैं। प्राणायाम के निरंतर अभ्यास से विचार केंद्रित होते हैं और इस से प्राप्त शक्ति मनुष्य के जीवन के लिए लाभदायक सिद्ध होती है। प्राणायाम को सर्वश्रेष्ठ तप की संज्ञा भी दी गई है तथा इसकी साधना से पापों का नाश होता है तथा ईश्वर की प्राप्ति होती र्है। प्राणायाम से कुंडलनी शक्ति को भी जागृत किया जा सकता है।

अर्घ्य

मनोकामना पूरी करने के लिए देवताओं को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। यह प्रक्रिया सभी पूजा पद्धतियों का अभिन्न अंग है। जल ईश्वर को अत्यंत प्रिय है। इसलिए इसकी महिमा का वर्णन श्री मद्भगवद् गीता में भी मिलता है।

दान

दान पूजा का एक महत्वपूर्ण अंग है पूजा के अन्य दो मुख्य अंग हैं जप व तप। श्रीमद्भगवद्गीता में पूजा के तीन अंग बताए गये हैं। ये तीन अंग हैं जप, तप और दान। दान के बिना जप व तप आदि क्रियाएं फलीभूत नहीं हो पातीं। इसलिए मनीषियों ने दान को भी नित्य क्रियाओं में शामिल किया। प्रातःकालीन सूर्य को अर्घ्य दान करना संध्या का अभिन्न अंग माना जाता है। कुंडली में जो ग्रह अनिष्टकारक होते हैं उनसे संबंधित वस्तुओं का दान करने से कष्टों व अनिष्टों से अवश्य ही छुटकारा मिल जाता है।

देव दर्शन

देव दर्शन अर्थात् तीर्थ स्थल की यात्रा को सभी धर्मों में शुभ माना गया है। अलग-अलग लोगों को अलग-अलग मंदिरों में आस्था होती है। इसलिए वह लोग अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए मंदिरों की यात्रा करने में विश्वास रखते हैं।

व्रत

व्रत एक अटल निश्चय है जब तक मनुष्य कोई व्रत नहीं करता तब तक उसका मन इधर-उधर भटकता है अर्थात एकाग्र नहीं हो पाता योग साधना के अनुसार भी यम और नियम पर बल दिया जाता है और ये दोनों ही व्रत हैं। व्रत धारी के मन में यह पूर्ण निश्चय होना ही चाहिए कि यदि इससे मेरी कोई तात्कालिक हानि हो रही हो तब भी में अपना व्रत भंग नहीं करुंगा।

भारतीय हिंदू संस्कृति में व्रत व पर्वों का अधिकाधिक महत्व रहा है। वास्तव में व्रत करना व रखना भी एक तप के समान ही है, हमारे पौराणिक धर्म गं्रथों व हिंदू शास्त्रों में व्रतों की अत्यधिक महिमा बताई गई है, इसलिए व्रतों को समस्या निवारण का एक अचूक उपाय माना जाता है। इन व्रतों में एकादशी, महाशिव रात्रि, नवरात्र, वट सावित्री, करवाचौथ, पूर्णिमा आदि को श्रेष्ठ माना जाता है।

औषधि स्नान

आयुर्वेद के अनुसार आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का प्रयोग कर औषधि स्नान से स्वास्थ्य में सुधार होता है।

जल विसर्जन

फूल, दीपक या देवी देवता की मूर्तियों के द्वारा ईश्वर का विशेष आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए विसर्जित किया जाता है।

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