लेखक परिचय

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

मीणा-आदिवासी परिवार में जन्म। तीसरी कक्षा के बाद पढाई छूटी! बाद में नियमित पढाई केवल 04 वर्ष! जीवन के 07 वर्ष बाल-मजदूर एवं बाल-कृषक। निर्दोष होकर भी 04 वर्ष 02 माह 26 दिन 04 जेलों में गुजारे। जेल के दौरान-कई सौ पुस्तकों का अध्ययन, कविता लेखन किया एवं जेल में ही ग्रेज्युएशन डिग्री पूर्ण की! 20 वर्ष 09 माह 05 दिन रेलवे में मजदूरी करने के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृति! हिन्दू धर्म, जाति, वर्ग, वर्ण, समाज, कानून, अर्थ व्यवस्था, आतंकवाद, नक्सलवाद, राजनीति, कानून, संविधान, स्वास्थ्य, मानव व्यवहार, मानव मनोविज्ञान, दाम्पत्य, आध्यात्म, दलित-आदिवासी-पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक उत्पीड़न सहित अनेकानेक विषयों पर सतत लेखन और चिन्तन! विश्लेषक, टिप्पणीकार, कवि, शायर और शोधार्थी! छोटे बच्चों, वंचित वर्गों और औरतों के शोषण, उत्पीड़न तथा अभावमय जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अध्ययनरत! मुख्य संस्थापक तथा राष्ट्रीय अध्यक्ष-‘भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान’ (BAAS), राष्ट्रीय प्रमुख-हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन, राष्ट्रीय अध्यक्ष-जर्नलिस्ट्स, मीडिया एंड रायटर्स एसोसिएशन (JMWA), पूर्व राष्ट्रीय महासचिव-अजा/जजा संगठनों का अ.भा. परिसंघ, पूर्व अध्यक्ष-अ.भा. भील-मीणा संघर्ष मोर्चा एवं पूर्व प्रकाशक तथा सम्पादक-प्रेसपालिका (हिन्दी पाक्षिक)।

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हिन्दू शूद्रों और स्त्रियों के ताकतवर होने से महान भारत और हिन्दुत्व कमजोर होता है! 

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ 

विकीलीक्स के खुलासे के नाम पर कुछ समय से वेब मीडिया पर इस बात को प्रचारित किया जा रहा है कि कॉंग्रेस के महासचिव राहुल गॉंधी ने यह कहा था कि ‘‘भारत को हिन्दुत्व से खतरा है’’| इसी बात को लेकर एक महाशय लिखते हैं कि ‘‘राहुल ने अमेरिकी राजदूत से कहा था, ‘भारतीय मुसलमानों के बीच कुछ ऐसे तत्व हैं जो लश्कर-ए-तैयबा जैसे इस्लामिक संगठनों का समर्थन कर रहे हैं, लेकिन उससे बड़ा ख़तरा तेजी से पांव पसार रहे चरमपंथी हिंदू संगठनों से है जो मुस्लिम समुदाय से धार्मिक तनाव और राजनैतिक वैमनस्य पैदा कर रहे हैं|’….’’

सर्वप्रथम तो इस प्रकार के खुलासे की सत्यता का कहीं कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं दिया जा रहा है| दूसरे इस प्रकार की बात राहुल गॉंधी के बयान के बारे में लिखी गयी हैं| जिसे लेकर कॉंग्रेस विरोध मात्र के लिये ही जन्मे कुछ लोग जमकर हो हल्ला मचा रहे हैं|

जबकि पहली नजर में इस वाक्य में जिसे राहुल गॉंधी का बयान बताया जा रहा है| कुछ भी गलत या असत्य नजर नहीं आता है| जिसमें भारत को खतरा ‘चरमपंथी हिंदू संगठनों से’? बताया गया है| क्योंकि भारत का मतलब है| एक ऐसा देश जिसमें सॉंप और सपेरे बसते हैं| जिस देश में कोई भी आक्रान्ता या लुटेरा आता है और भारत तथा भारत के लोगों को लूटता है और चला जाता है| भारत की बहन-बेटियों की इज्जत को तार-तार कर देता है| और भारत के हिन्दू अपने भगवान को रक्षक मानकर मूकदर्शक बने देखते रहते हैं|

जिन्दगीभर हत्याएँ करने वाले सम्राट अशोक का अचानक हृदय परिवर्तित हो जाता है तो उसे हम भारतीय महान सम्राट अशोक का दर्जा दे देते हैं| इस्लाम के अलावा अन्य धर्मो का सम्मान करने की बात करने और कहने वाले बादशाह अकबर को भी हम अशोक की ही भॉंति महानता का तमगा थमा देते हैं| अंग्रेज आते हैं और देश का सारा धन विदेशों में ले जाते हैं| आज भी ले जा रहे हैं और सदैव की भांति इस देश का हिन्दू ‘‘वसुधैव कुटम्बकम्’’ का नारा देकर चुप बैठे रहते हैं|

यही नहीं भारतीय हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा हिस्सा (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के बाद शेष आबादी) अर्थात् शूद्र वर्ग हजारों वर्ष से मुठ्ठीभर उच्च जातीय हिन्दुओं के अत्याचारों और मनमानी को अपनी नियति मानकर सहता और झेलता रहता है| भारत की हिन्दू स्त्री को दोयम दर्जे का नागरिक, बल्कि निरीह प्राणी समझा जाता रहा है| इसके बाद भी भारत की स्त्री हजारों वर्षों से चुपचाप इसे सहती रही है| इसके उपरान्त भी स्त्री को कागजी सम्मान देने के लिये उसे देवी बना दिया जाता है| जिसे एक कवियत्री “स्त्री की त्रासदी” बताती हैं और कहती हैं कि “स्त्री या तो देवी है या दासी|”

भारत की इस स्थिति को भारत के कथित उच्च पदस्थ हिन्दू, हिन्दुत्व की धार्मिक ताकत कहते रहे हैं! इसी को भारत की महान संस्कृति कहते रहे हैं! क्योंकि मुठ्ठीभर हिन्दुओं को इस नीति से शेष सभी हिन्दुओं को मानसिक रूप से गुलाम बनाये रखने में बड़ी भारी आसानी रही है!

लेकिन पहली बार भारत के हिन्दू का बहुसंख्यक और मुठ्ठीभर हिन्दू बदल रहा है| भारत की स्त्री भी बदल रही है| बहुसंख्यक भारत हिन्दुत्व की धार्मिक गुलामी के खिलाफ खड़ा हो रहा है| स्त्री अपनी धार्मिक एवं सामाजिक गुलामी से मुक्ति के लिये सक्षम होकर संघर्ष कर रही है| बल्कि छटपटा रही है| मुठ्ठीभर हिन्दू जिनका काम शूद्रों और स्त्रियों को गुलाम बनाये रखना था, उसे समझ में आ गया है कि अब स्त्री और शूद्र को फिर से पुराने तरीकों से गुलाम बनाये रखना सम्भव नहीं है| ऐसे में वह उग्र हिन्दुत्व और इस्लाम विरोध के नाम पर फिर से हिन्दुत्व का राग अलाप रहा है|

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को आक्रामक मुद्रा में दर्शा रहा है और विधर्मियों का खतरा दिखा कर अपने ही नेतृत्व में फिर से सम्पूर्ण स्त्रियों सहित, शूद्र हिन्दुओं को एकजुट होने का आह्वान कर रहा है| जिससे कि हिन्दू धर्म के नाम पर शोषण करने वाला मुठ्ठीभर हिन्दू फिर से हिन्दू धर्म को इस्लाम और ईसाईयत से खतरा दिखाकर सारे हिन्दू धर्मावलम्बियों को एकजुट कर सकें| क्योंकि अब भोले-भाले शूद्र मनु या वेदव्यास या तुलसीदास के धर्मादेशों से तो एकजुट हो नहीं सकते| ऐसे में हिन्दुओं के बड़े वर्ग (शूद्र-दलित, आदिवासी, पिछड़े और सम्पूर्ण वर्गों की स्त्री) को गुलाम बनाने के लिये नये-नये राजनैतिक और कूटनीतिक तरीके ईजाद किये जा रहे हैं|

जिसमें से एक बहुत बड़ा और खतरनाक तरीका है-लगातार यह सिद्ध करते रहना कि भारत को इस्लाम से खतरा है! भारत को सोनिया से खतरा है! भारत को ईसाईयत से खतरा है! भारत को अंग्रेजी से नहीं, अंग्रेजों से खतरा है! भारत को मुस्लिम वोटरों से नहीं, मुस्लिम धर्म से खतरा है! भारत को धर्म निरपेक्षता से खतरा है! भारत को समाजवादी और सामाजिक न्यायवादियों से खतरा है| भारत को कॉंग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा और कम्यूनिष्टों से खतरा है| यहॉं तक कि द्रवड़ि पार्टियों से भी भारत को खतरा है| इस प्रकार की छद्म बातें करने वाले लोगों का भारत हिन्दुत्व को मजबूत करने से मजबूत होता है, लेकिन साथ ही साथ हिन्दू शूद्रों और हिन्दू स्त्रियों के ताकतवर होने से इनका महान भारत कमजोर होता है|

यही तो कारण है कि हृदय परिवर्तन के जरिये बदलाव लाने की बात करने वाले और अनशन को हृदय परिवर्तन का सबसे ताकतवर अहिंसक माध्यम बतलाने वाले मोहन दास कर्मचन्द गॉंधी भारत के बहुसंख्यक शूद्रों के उत्थान के लिये स्वीकृत सैपरेट इलेक्ट्रोल को छीनने के लिये अनशन करते हैं और शूद्रों से छलावा करके सैपरेट इलेक्ट्रोल के अधिकार को छीनकर शूद्रों को हमेशा के लिये पंगु बना देते हैं| यही नहीं गॉंधी डॉ. अम्बेड़कर को विवश कर देते हैं कि वे शूद्रों के लिये सरकारी सेवाओं और विधानमण्डलों में आरक्षण के प्रावधान को मानें और सैपरेट इलेक्ट्रोल की मांग को छोड़ें, क्योंकि इससे भारत का हिन्दुत्व मजबूत होता है| लेकिन गॉंधी के हिन्दुत्व से उत्पन्न गॉंधी के मानसपुत्रों को गॉंधी के शूद्रों को आरक्षण देने के विचार से भी हिन्दुत्व को खतरा उत्पन्न होता दिख रहा है| इसलिये उन्हें स्त्रियों, पिछड़ों, आदिवासियों, दलितों और अल्पसंख्यकों को नौकरियों, शिक्षण संस्थानों और विधान मंडलों में आरक्षण देने से देश कमजोर होता नजर आ रहा है| हिन्दुत्व कमजोर होता नजर आ रहा है! उन्हें उनका महान भारत कमजोर होता नजर आ रहा है|

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि स्त्रियों, पिछड़ों, आदिवासियों, दलितों और अल्पसंख्यकों के उत्थान और सत्ता तथा संसाधनों में समान भागीदारी का विरोध करने वाले हिंदुत्व के पुजारियों को, बतलाना चाहिये कि वे कौनसे भारत के कमजोर होने की बात कर रहे हैं| वह कौनसा भारत है जो स्त्रियों, पिछड़ों, आदिवासियों, दलितों और अल्पसंख्यकों के ताकतवर होने से कमजोर होगा? वह कौनसा भारत है जो स्त्रियों, पिछड़ों, आदिवासियों, दलितों और अल्पसंख्यकों को सत्ता, संसाधनों एवं प्रशासन में समान भागीदारी देने से रसातल में चला जायेगा? वह कौनसा हिन्दुत्व है जो हिन्दू स्त्रियों, हिन्दू पिछड़ों, हिन्दू आदिवासियों, हिन्दू दलितों और हिन्दू अल्पसंख्यकों के मानवीय उत्थान और इनके सम्मान की रक्षा से टूट सकता है? मुसलमानों को शिक्षा और नौकरी देने में सामना अवसर देने से भारत कैसे टूट जायेगा?

इस क्रूर षड्यन्त्र को समय रहते इस देश के बहुसंख्यक लोगों को समझना होगा| अन्यथा मुठ्ठीभर हिन्दुत्व के सौदागर भारत के सच्चे हिन्दुओं के हकों का कभी भी गला घोंट सकते हैं| क्योंकि इनका न तो हिन्दुत्व से कोई लेना-देना है और हीं राष्ट्रवाद से! इनका सीधा और साफ उद्देश्य है येनकेन प्रकारेण भारत की सत्ता पर काबिज होना और भारत को लूटना अभी भी अनेक क्षेत्रों में ये लूट ही रहे हैं!

ऐसे में भारत के हिन्दुओं को जागना होगा और हिन्दुत्व को खतरे के नाम पर हिन्दुओं को बरगलाने वाले धोखेबाजों से सावधान रहना होगा| क्योंकि ये हिन्दुत्व के वेष में हिन्दू धर्म और बहुसंख्यक हिन्दू आबादी के सबसे बड़े दुश्मन हैं| हिन्दुओं को गुलाम बनाने के लिये ये बहरूपिये, शूद्र हिन्दुओं को मुसलमानों से लड़ाने के बहाने ढूँढते रहते हैं| जिसके लिये हिन्दुओं को आतंकवादी विचारधारा में झोंकने से भी नहीं चूक रहे हैं| यदि राहुल ने ऐसे लोगों या विचारधारा से भारत को खतरा बतलाया है तो इसमें कौनसी गलत बात कही है? ऐसे खतरनाक लोगों से भी क्या भारत को खतरा नहीं है? निश्‍चय ही ऐसे लोग भारत के लिये सबसे बड़ा खतरा हैं, क्योंकि सत्य तो यही है कि भारत का मतलब है, “बहुसंख्यक भारत के लोगों का भारत!” सबसे घिनौनी बात तो यह है कि हिन्दुत्व को ताकतवर करने के नाम पर देशवासियों को बरगालने वाले हर हाल में एक ही घिनौना सूत्र लेकर चल रहे हैं कि हिन्दुत्व को ताकतवर बनाने की बात करते रहो, लेकिन हिन्दू शूद्रों और स्त्रियों को दबाये रखो! क्योंकि इनके कमजोर होने से हिन्दुत्व और भारत कमजोर होता है!

39 Responses to “राहुल गांधी के इस बयान में कुछ भी गलत नहीं है : डॉ. मीणा”

  1. Johng321

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    धर्म निरपेक्षता एक निरर्थक शब्द है. आवश्यक है धर्मनिष्ठा . धर्म का अर्थ है चराचर सृष्टि में सभी के शांतिपूर्ण समुन्नतिकारक सह अस्तित्व के लिए स्वीकृत जीवन मूल्यों पर आधारित व्यवहार और आचरण. धर्म का कोइ नाम नहीं होता. इस्लाम इसाइयत बौद्ध जैन आदि सब पंथ या संप्रदाय या मजहब है, धर्म नहीं, क्यों की इनमे से कोइ भी धर्म के उपर्युक्त लक्षणों की पूर्ति नहीं करता. हिंदुत्व यह मजहब नहीं, एक जीवन पद्धति है जो धर्म के उपर्युक्त लक्षण की पूर्ति करती है . इसलिए हिंदुत्व ही धर्म है वही मानवधर्म है . सर्वे भवन्तु सुखिनः —–के अनुसार व्यवहार करने वाले धर्म निष्ठ है, यही हिंदुत्व है. जो जतिपान्ति भेद करते है वे हिंदुत्व से दूर है वे मनु से या मानव धर्मं से अर्थात धर्म से दूर है अर्थात जाती उच्च नीच भेद मानने वाले ही धर्म निरपेक्ष है. जो किसी भी प्रकारका भेद करते है, तुष्टिकरण की राजनीति करते है, किसीको मनुवादी कहकर अपना उल्लू सीधा करते है वे ही है धर्म निरपेक्ष अर्थात धर्म से दूर. शांतिपूर्ण सह अस्तित्वा के शत्रु.

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  3. मुकेश चन्‍द्र मिश्र

    मुकेश चन्‍द्र मिश्र

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा जी पहले तो शुभकामनावों के लिए धन्यवाद् पर ना तो मेरा प्रोफेसन लेखन है और ना ही मै लेखक बनना चाहता हूँ….पर किसी बात पर सहमत या असहमत होने पर टिप्पड़ी करना मेरा सामाजिक दायित्व है………अच्छा होता अगर आप मेरे द्वारा कही गयी बातों पर बात करते ना की अपने को महान लेखक साबित करने के लिए गवेश्नात्मक चिंतन और लेखन के लिए प्रेरित करते….मै तो आपको पहले ही महान लेखक मानता हूँ वर्ना आपके लेखों पर इतना समय ही ना देता….ये अलग बात है की आपकी ये महानता सिर्फ कुछ खास लोगों के लिए और तथाकथित ऊँची जातियों को गरियाने में ही प्रयोग होती है, जो अगर निष्पक्ष होती तो सचमुच में कुछ परिवर्तन ला सकती थी …….आशा है आप हम जैसे लोगों के अहसास को भी समझने की कोशिश करेंगे जिसे मनुवाद के ना तो मनु का पता है ना ही वाद का फिर भी मनुवादी कह कर संबोधित किये जातें हैं…
    आपका छोटा भाई:
    मनुवादी मुकेश चन्द्र मिश्र

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  4. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

    श्री मुकेश मिश्रा जी आपने मेरे अनुरोध को असंगत टिप्पणी लिखकर के मुझे सम्मानित किया, इसके लिए आपका आभार! हालाँकि आपसे जो अनुरोध था आपने उससे हटकर कुछ और ही लिख दिया है और अभी भी आपके पास लिखने को है! बंधु हमें कभी-कभी गवेश्नात्मक चिंतन और लेखन भी कर लेना चाहिए! कोई खाश नुकसान नहीं होता है! जैसे कि श्री विमलेश जी परिश्रमपूर्ण टिप्पणी लिखकर विचारों के प्रवाह को संयम पूर्वक आगे बढाया है! आशा करता हूँ कि उम्र और अनुभव आपको भी अधिक अच्छा और श्रेष्ठतम लेखन की ओर अग्रसर करेंगे! शुभकामनाओं सहित! धन्यवाद!
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

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  5. vimlesh

    धर्मनिरपेक्ष व सेक्युलरिज्म दोनों एक ही है इन दोनों शब्दों में देश को २ या अधिक भागो में बाटने की पूरी क्षमता है

    अंग्रेजी में”सेकुलेर”जिसका अर्थ होता है”संसारी धर्म से सम्बन्ध ना रखने वाला”और इसी को”इज्म”जोड़ कर”सेकुलरिजम”अर्थात “धर्म निरपेक्षता ” किन्तु हमारे संविधान के हिन्दी संस्करण में धर्म निरपेक्षता शब्द नहीं है बल्कि पंथ निरपेक्षता शब्द प्रयुक्त हुआ है जो सही भी है। किसी पंथ या संप्रदाय के प्रति सरकार का कोई विशेष झुकाव नहीं होगा – यहां तक तो सहमति हो सकती है परन्तु धर्म निरपेक्षता तो सरासर एक आत्मघाती आत्म-प्रवंचना है इससे अधिक कुछ भी नहीं । हिन्दू किसी रिलीजन या मज़हब का नाम नहीं है, वास्तव में यह एक जीवन- दर्शन है। हिन्दू जीवन दर्शन में अनेकानेक पंथ व संप्रदाय हैं, अनेकानेक पूजा पद्धतियां हैं । जो भगवान को मानता है, वह भी हिन्दू, जो अनीश्वरवादी है वह भी हिन्दू ! जो मूर्ति पूजा करता है, वह भी हिन्दू और जो इसे एक ढकोसला मानता है, वह भी हिन्दू । ऐसे में हिन्दू समाज की सही परिभाषा यही की गई है कि जो इस देश को अपनी जन्मभूमि, पितृ-भूमि व पुण्यभूमि मानता है, वह हिन्दू है। जन्म लेने मात्र से जन्म भूमि निर्धारित हो जाती है किन्तु पितृ-भूमि का अर्थ है मेरे पुरखे भी इसी देश के थे। पुण्य-भूमि का अर्थ है कि मेरे इष्ट देव, आराध्यदेव भी इसी देश में पैदा हुए थे, कहीं किसी अन्य देश में नहीं । इन तीन शर्तों को पूरा करते ही आप हिन्दू हो जाते हैं।

    अपरिभाषित सेक्यूलरिज्म के जलवे

    भारतीय संविधान इस अर्थ में अटपटा बना दिया गया है, कि इस का एक आधारभूत सिद्धांत ‘सेक्यूलरिज्म’ नितांत अस्पष्ट है। प्रथम पृष्ठ पर यह शब्द लिख कर संविधान में जोड़ दिया गया, किन्तु कहीं परिभाषित नहीं किया गया। न अलग से कोई कानून बनाकर, न सुप्रीम कोर्ट के किसी निर्णय में इसका कोई स्पष्ट अर्थ दिया गया है। सबसे लाक्षणिक बात तो यह कि इसे पारिभाषित करने के प्रयास को भी बाधित किया जाता है। नेतागण, सुप्रीम कोर्ट और प्रभावी बुद्धिजीवी वर्ग सब ने इसे अस्पष्ट रहने देने की सिफारिश की है।

    यह सामान्य बात नहीं, क्योंकि इसी के सहारे भारत में एक विशेष प्रकार ही राजनीति का दबदबा बना, जिसकी धार हिन्दू-विरोधी है। और इसी को कवच बनाकर देश-विदेश की भारत-विरोधी शक्तियाँ भी अपने कारोबार करती हैं।

    ध्यान देने पर यह किसी को भी दिख सकता है। कुछ पहले मधु किश्वर ने तवलीन सिंह (दोनों प्रसिद्ध पत्रकार) का ध्यान इस बात पर आकृष्ट कराया कि विचार-विमर्श में हिंदू शब्द केवल गाली के रूप में इस्तेमाल हो रहा है। तवलीन जी ने ध्यान देना शुरू किया और पाया कि बात सच है। उन्हें स्थिति ऐसी गंभीर लगी कि सेक्यूलरिज्म ‘हिंदू सभ्यता के विरुद्ध चुनौती’ बन गया है। भारतीय सभ्यता अपने उत्कर्ष पर हिंदू सभ्यता ही थी। जिसने संपूर्ण विश्व को गणित से लेकर दर्शन, धर्म, साहित्य और विज्ञान तक हर क्षेत्र में अनमोल उपहार दिए। किंतु आज भारत में यह बात कहना हिंदू सांप्रदायिकता है। इसीलिए किसी पाठ्य-पुस्तक में ऐसी बातों का संकेत भी अवांछित है। विश्व-प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैक्स वेबर भगवतगीता को नैतिक राजनीति का विश्व में एकमात्र ग्रंथ कह सकते थे। किंतु कोई भारतीय आज यह लिखे तो वह ‘भगवा लेखक’ बताकर अपमानित किया जाता है। अतः सेक्यूलरिज्म को हिंदू-विरोध का दूसरा नाम कहकर तवलीन जी ने कड़वी सच्चाई बयान की थी।

    सच पूछें तो ऐसे प्रसंग हमारे देश के बौद्धिक वातावरण पर एक टिप्पणी है। कि किस तरह एक विकृत मतवाद ने लोगों को इतना दिग्भ्रमित कर दिया है कि वे देखकर भी नहीं देख पाते। अन्यथा तवलीन सिंह को यह समझने में इतने दशक न लगे होते। प्रसिद्ध इतिहासकार रमेश चंद्र मजूमदार ने 1965 में ही स्पष्ट देखा था कि, “इस देश में मुस्लिम संस्कृति और भारतीय संस्कृति की चर्चा की जा सकती है। मगर हिंदू संस्कृति की नहीं। हिंदू शब्द केवल नकारात्मक अर्थों में प्रयोग किया जाता है”। याद रहे, यह तब की बात है जब न राम-जन्मभूमि आंदोलन था, न विश्व-हिंदू परिषद थी। मगर तब भी ‘हिंदू’ शब्द का प्रयोग पोंगापांथी, सांप्रदायिक, फासिस्ट संदर्भ में ही होता था। चार दशक में आज वह ‘विष’ भी बन गया! जिससे विवध पुस्तकों, पदों, संस्थानों को मुक्त करने का ‘डि-टॉक्सिफिकेशन’ चलाना पड़ता है।

    दुनिया के सबसे बड़े हिन्दू देश में हिन्दू-विरोध ही बौद्धिकता की कसौटी कैसे बन गया? यह सोचने की बात है। आरंभ यह जैसे भी हुआ, किन्तु दिनों-दिन इसकी बढ़त अपरिभाषित सेक्यूलरिज्म के कारण ही हुई। इसी से संभव होता है कि एक समुदाय के मजहबी शिक्षा-संस्थानों को भी अनुदान, सम्मान, पहचान मिले, जबकि दूसरे को अपनी औपचारिक शिक्षा में महान दार्शनिक ग्रंथों को भी पढ़ने की अनुमति न दी जाए। अपरिभाषित सेक्यूलरिज्म के डंडे से ही हिंदू मंदिरों पर सरकारी कब्जा कर लिया जाता है जब कि मस्जिदों, गिरजाघरों को संबंधित समुदाय को मनमर्जी से चलाने के लिए छोड़ दिया जाता है। इतना ही नहीं, कई बड़े हिन्दू मंदिरों की आमदनी से दूसरे समुदाय की हज यात्रा को करोड़ों का अनुदान दिया जाता है (कर्नाटक, आंध्र)।

    यहाँ अवैध धर्मांतरण कराने वाले विदेशी ईसाई को राष्ट्रीय सम्मान दिया जाता है, जब कि अपने धर्म में रहने या वापस आने की अपील करने वाले हिंदू समाजसेवी को सांप्रदायिक कहकर लांछित किया जाता है। अप्रमाणित आरोप पर भी एक शंकराचार्य दीवाली के दिन गिरफ्तार कर अपमानित किए जाते हैं। जब कि मौलवियों-इमामों को देश-द्रोही बयान देने, संरक्षित पशुओं को अवैध रूप से अपने घर में लाकर बंद रखने, न्यायालयों की उपेक्षा करने पर भी छुआ तक नहीं जाता। उल्टे राजनीतिक निर्णयों में उन्हें विश्वास में लेकर उन की शक्ति बढ़ा दी जाती है। भयंकर आतंकवादी तक ‘लादेन जी’ का सम्मानित संबोधन पाता है, जबकि लब्ध प्रतिष्ठित योगाचार्य को ‘रामदेव ठग’ कहा जाता है।

    यदि सेक्यूलरिज्म वैधानिक रूप से परिभाषित हो गया, तो यह सभी राजनीतिक मनमानियाँ और वैचारिक गुंडागर्दी नहीं हो सकेगी। इस सेक्यूलरिज्म की अस्पष्टता का ही करिश्मा है कि शिक्षा, संस्कृति और राजनीति – हर क्षेत्र में भारत में अन्य समुदायों को हिंदुओं से अधिक अधिकार मिले हुए हैं। इस अत्याचार पर जानकार हिंदू कसमसाते हैं, पर कुछ कर नहीं पाते। क्योंकि उन पर यह जुल्म हिंदू कुल में जन्मे, किंतु सेक्यूलरिज्म में दीक्षित हो गए नेता व बुद्धिजीवी ही करते रहे हैं, कोई और नहीं।

    कहने को अभी देश में सेक्यूलरिज्म की कम से कम चार परिभाषाएं हैं, यद्यपि कोई वास्तविक नहीं। विभिन्न लोग इच्छानुसार इनका उपयोग करते हैं। एक परिभाषा 1973 में न्यायाधीश एच. आर. खन्ना ने दी कि “राज्य मजहब के आधार पर किसी नागरिक के विरुद्ध पक्षपात नहीं करेगा”। कुछ बाद दूसरी परिभाषा कांग्रेस पार्टी ने दी, “सर्व-धर्म, सम-भाव”। तीसरी परिभाषा भाजपा की, “न्याय सबको, पक्षपात किसी के साथ नहीं”। चौथी एक टिप्पणी है। किंतु सुप्रीम कोर्ट के पूर्व-मुख्य न्यायाधीश एम. एन. वेंकटचलैया की होने के कारण इस का महत्व है। इन के अनुसार “सेक्यूलरिज्म का अर्थ बहुसंख्यक समुदाय के विरुद्ध नहीं हो सकता”। यह टिप्पणी प्रकारांतर स्वीकारती है कि व्यवहार में इस का यही अर्थ हो गया है। यहाँ याद करें कि स्वयं संविधान निर्माता डॉ. अंबेदकर ने भारतीय संविधान को सेक्यूलर नहीं माना था क्योंकि “यह विभिन्न समुदायों के बीच भेद-भाव करती है”।

    उपर्युक्त परिभाषाओं में सबसे विचित्र बात यही है कि इन में से किसी को वैधानिक रूप नहीं दिया गया। कांग्रेस ने 1976 में इमरजेंसी के दौरान 42वाँ संशोधन करके, संविधान की प्रस्तावना में ‘सेक्यूलर’ शब्द जबरन जोड़ दिया। किंतु बिना कोई अर्थ दिए। जबरन इस रूप में, कि तब विपक्ष जेल में डाला हुआ था, और प्रेस पर अंकुश था। बाद आई जनता सरकार ने 1978 में 45वें संशोधन द्वारा कांग्रेस वाली परिभाषा को ही वैधानिक रूप देने की कोशिश की। लोक सभा में यह पारित भी हो गया। पर राज्य सभा में कांगेस ने ही इसे पारित नहीं होने दिया!

    यह इस का पक्का प्रमाण था कि संविधान की प्रस्तावना में ‘सेक्यूलर’ शब्द गर्हित उद्देश्य से जोड़ा गया था। इसीलिए उसे जान-बूझ कर अपरिभाषित रखा गया। ताकि जब जैसे चाहे, दुरुपयोग किया जाए। यह अन्याय सुप्रीम कोर्ट ने भी दूर नहीं किया। उलटे 1992 में ‘एस. आर. बोम्मई बनाम भारत सरकार’ वाले निर्णय में इसने लिख डाला कि सेक्यूलरिज्म लचीला शब्द है, जिस का अपरिभाषित रहना ही ठीक है। जबकि ऐसा कहना कानून की धारणा के ही विरुद्ध है। कानून का अर्थ ही निश्चित रूप से लागू होने वाला आदेश होता है। पर जो स्पष्ट ही नहीं, वह मनमानी के सिवा और लागू कैसे होता? [विस्तार से जानने के लिए देखें, इस लेखक की पुस्तक ‘भारत में प्रचलित सेक्यूलरवाद’, अक्षय प्रकाशन, दिल्ली]

    दुर्भाग्य से राष्ट्रीय चेतना वाले लोगों ने न तो 1978, न बाद में कभी इस गड़बड़ी के विरुद्ध कोई आंदोलन चलाना आवश्यक समझा। वे अपरिभाषित सेक्यूलरिज्म के दूरगामी घातक परिणामों को समझने में विफल रहे। जिस भाजपा को ‘स्यूडो-सेक्यूलरिज्म’ के विरुद्ध लंबे समय से शिकायत थी, उसने भी अपने शासन काल (1998-2004) में सेक्यूलरिज्म को परिभाषित करने पर कोई विचार तक नहीं किया। उल्टे वह ‘हम भी सेक्यूलर’ की होड़ में लग गई। अन्यथा उसने इसे कानूनी रूप से परिभाषित करना-करवाना अपना प्रधान कर्तव्य समझा होता। पर हिंदू समुदाय के गले में फंदे की तरह पड़े इस अस्पष्ट सेक्यूलरिज्म को परिभाषित करने की जरूरत पर उनके हाथ-पैर भी ठंढे हो गए।

    यह चिर-परिचित हिंदू भीरुता थी। इसी कारण स्यूडो-सेक्यूलरिज्म के खिलाफ रोने-धोने वाले नेताओं को इस ‘स्यूडो’ को ‘रीयल’ रूप देने का साहस न हुआ। इसी का प्रमाण था कि संविधान कार्यचालन की समीक्षा का आयोग तो बनाया गया, किंतु उस ने भी इस पर कोई अनुशंसा नहीं दी। यह भी हिंदू महानुभावों पर लाक्षणिक टिप्पणी ही है कि इस आयोग के अध्यक्ष वही न्यायमूर्ति एम. एन. वेंकटचलैया थे। स्पष्टतः उन्होंने भी सेक्यूलरिज्म को ‘बहुसंख्या के विरुद्ध प्रयोग किए जाने’ के चलन को रोकने के लिए कुछ करना आवश्यक नहीं समझा!

    यह मानना गलत है कि सेक्यूलरिज्म को परिभाषित करने का विधेयक संसद से पास नहीं होता या नहीं होगा। ऐसा विधेयक आने पर, उस का विरोध करने पर भी जो राष्ट्र-व्यापी बहस होगी, उसी में उस की बड़ी सफलता निश्चित है। भारतीय जनता – हिंदू, मुस्लिम दोनों – ही यह देखेगी कि अपरिभाषित सेक्यूलरिज्म राजनीतिक दुष्टताओं की जड़ है। जिस चीज को संविधान और शासन का आधारभूत सिद्धांत कहा जाता है, उसे परिभाषित होने से किस आधार पर रोका जाएगा? एक अर्थ पसंद नहीं तो दूसरा सही, पर कोई पक्का, वैधानिक अर्थ तो होना ही चाहिए। इस से हीला-हवाला करने पर लोगों को समझने में कठिनाई नहीं होगी, कि सेक्यूलरिज्म को अपरिभाषित रखना विभिन्न समुदायों के बीच दूरी को बनाए रखने का औजार है। इसलिए यदि सेक्यूलरिज्म को परिभाषित करने का गंभीर प्रयास हो, तो इस का कोई न कोई कानूनी अर्थ तय करवाना बिलकुल संभव है। यदि प्रयास शुरू में विफल भी हो तब भी उस पर राष्ट्रीय बहस भारतीय समाज को जागृत करेगा।।

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  6. vimlesh

    मुकेश जी बहुत बहुत धन्यवाद कथित धर्म निरपेक्षता की संवैधानिक परिभाषा कुछ भी हो किन्तु आपने जो तथ्य बताये ये कदापि नहीं हो सकते .

    यदि आपके उपरोक्त लिखित को धर्म निरपेक्षता के पोषक तथ्य मान लिया जाय तो तथाकथित सेकुलरिज्म की तो लुटिया डूब जाएगी व समाज से सेक्युलर जैसे फैंसी शब्द का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा बेचारे कथित सेक्युलर जो छाती पीट पीट कर उपरोक्त का विरोध करते करते अपनी जाने दे रहे है वा शहीद हो रहे है उन बेचारो का क्या होगा .

    देश में धर्म निरपेक्षता का सीधा सीधा अर्थ है चुपचाप ईसाइयत स्वीकार करो हिन्दू धर्म को गरियाओ जो ब्रह्मण ठाकुरों की जागीर है तथा पिछडो दलितों को समझाओ की तुम हिन्दू नहीं हो उन्हें भी ईसाइयत स्वीकार करवाओ बदले में कीमती पारितोषक ग्रहण करो तथा सदाशय धर्म निरपेक्ष सेक्युलर समाजसुधारक आदि आदि कहलाओ

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  7. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

    श्री मुकेश मिश्र जी, श्री जीत भार्गव जी की टिप्पणी आने तक, आपसे व्यक्तिगत तौर पर अनुरोध है कि आप धर्म निरपेक्षता की आपकी इस अधूरी परिभाषा को पूर्ण कर सकें तो मैं आभारी रहूँगा!

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    • मुकेश चन्‍द्र मिश्र

      Mukesh Mishra

      डॉ. पुरुषोत्तम मीणा जी धर्म निरपेक्षता की जो परिभाषा आप मुझसे पूरी करवाना चाह रहें हैं वो सायद आप भी जानते हैं की ज्यादातर हिन्दू उससे बढ़कर पूरा कर रहें हैं या यूं कहें की इस्लाम परस्त होकर कर रहें हैं और सायद इतनी धर्म निरपेक्षता खुद मुस्लिम वर्ग भी नहीं चाहता जैसे-
      १. लालू प्रसाद यादव ने साबरमती (गोधरा) में हिन्दुवों की मुस्लिमो द्वारा की गयी हत्या को झूठा करार देने के लिए एक नया आयोग बिठा दिया. और उस हिन्दू जज ने भी लालू की इच्छा अनुसार रिपोर्ट दी जिसे मुस्लिम भी झूठा ही मानते हैं. क्यों? क्योंकी वो हिन्दू होते हुए भी जरुरत से ज्यादा धर्म निरपेक्ष हैं.
      २. मुस्लिम भले ही ९% आरक्षण चाहता है पर मुलायम सिंह मुस्लिमो को १८% आरक्षण दिलवाना चाहते हैं. क्यों? क्योंकी वो हिन्दू होते हुए भी जरुरत से ज्यादा धर्म निरपेक्ष हैं.
      ३. गोवध पर रोक न लगे इसके लिए ममता बनर्जी पूरा संसद अपने सर पर उठा लेती हैं. क्यों? क्योंकी वो हिन्दू होते हुए भी जरुरत से ज्यादा धर्म निरपेक्ष हैं.
      ४. नीतीश कुमार नरेन्द्र मोदी को बिहार में प्रचार नहीं करने देते क्यों? क्योंकी वो हिन्दू होते हुए भी जरुरत से ज्यादा धर्म निरपेक्ष हैं.
      ५. रामबिलास पासवान ओसामा बिन लादेन जैसे मानवता के दुश्मन का हमशक्ल साथ में लेकर घूमते हैं क्यों? क्योंकी वो हिन्दू होते हुए भी जरुरत से ज्यादा धर्म निरपेक्ष हैं.
      ६.अटल बिहारी बाचपेयी मुस्लिमो के बीच उनकी टोपी पहन कर रोजा इफ्तार की पार्टी मनाते हैं (जबकि हर मुस्लिम हिन्दुवों के लगभग सारे रीति रिवाज को इस्लाम विरोधी मानता है) और हज सब्सिडी बढ़ा देते हैं. क्यों? क्योंकी वो हिन्दू होते हुए भी धर्म निरपेक्ष हैं.
      ७. अडवाणी जैसे तथाकथित हिंदूवादी नेता जिन्ना जैसे आदमी की तारीफ़ कर देते हैं क्यों? क्योंकी वो हिन्दू होते हुए भी धर्म निरपेक्ष हैं.
      ८. नरेन्द्र मोदी जिसपर तमाम लोग सांप्रदायिक होने का लेबल लगा चुके हैं उनकी तारीफ मुस्लिम स्वयं कर रहे हैं जैसे वस्तानवी, महबूबा मुफ्ती यहाँ तक की अब तो कोंग्रेस भी क्यों? और उन्होंने अपने शासन काल में किसी मुस्लिम के साथ कोई भेदभाव नहीं किया क्योंकी वो हिन्दू होते हुए भी धर्म निरपेक्ष हैं.
      ९. दिग्विजय सिंह बटला हॉउस को झूठा बता अपनी ही सरकार के खिलाफ हो जाते हैं और शहीद पुलिश इंस्पेक्टर के परिजनों को दुखी करते हैं और आतंकवादी का साथ देते हैं क्यों? क्योंकी वो हिन्दू होते हुए भी जरुरत से ज्यादा धर्म निरपेक्ष हैं.
      १०. हमारे प्रधानमंत्री देश के संसाधन पर पहला हक़ मुस्लिमो का मानते हैं, दलितों का भी नहीं जबकि कहा जाता है दलित १००० साल से पीड़ित रहे हैं क्यों? क्योंकी वो हिन्दू होते हुए भी जरुरत से ज्यादा धर्म निरपेक्ष हैं.

      और भी बहुत कुछ लिखा जा सकता है…

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  8. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

    श्री जीत भार्गव जी आपने एक अधूरा सा वाक्य”–सेकुलरिज्म यानी सर्व धर्म समभाव-” लिखकर धर्म निरपेक्षता पर अपने सकारात्मक विचारों को समाप्त कर दिया! जिस पर हमारी आपसी चर्चा केन्द्रित है और जिस बारे में चर्चा हो नहीं रही उस पर आप बार-बार विस्तार से लिख रहे हैं! और तो और हिन्दी के धर्म निरपेक्षता शब्द के बजाय अंगरेजी के “सेकुलरिज्म” शब्द का ही प्रयोग कर रहे हैं! इससे लगने लगा है कि आप धर्म निरपेक्षता पर सकारात्मक चर्चा करना ही नहीं चाहते! आप धर्म निरपेक्षता क्या नहीं है, ये तो बतला रहे हैं! दुसरे लोगों ने कथित रूप से धर्म निरपेक्षता को कैसे विकृत कर दिया है ये भी बता रहे हैं, लेकिन धर्म निरपेक्षता पर अपने सकारात्मक और संवैधानिक विचार लिखने से ना जाने क्यों किनारा करते नज़र आ रहे हैं! मैंने शुरू में ही लिखा था कि विचार रखना ना रखना आपकी इच्छा पर निर्भर है! लेकिन आप ना भी नहीं कर रहे और सकारात्मक विचार रखने से किनारा करके निकलना चाहते हैं! ये पलायनवाद है! आपसे फिर से आग्रह है कि आप सम्पूर्ण विस्तार से लिखें कि संविधान के प्रावधानों के अनुसार धर्म निरपेक्षता से आप क्या मतलब निकालते हैं और देश के लोगों को इसे सकारात्मक रूप में किस प्रकार समझना चाहिए! आप धर्म निरपेक्षता क्या नहीं है, इस पर जोर देने के बजाय धर्म निरपेक्षता क्या है, ये बताने का कष्ट करेंगे तो सकारात्मक विचारों का प्रसार होगा! इच्छा आपकी!
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
    संपादक-प्रेसपालिका (पाक्षिक)

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    • मुकेश चन्‍द्र मिश्र

      Mukesh Mishra

      धर्म निरपेक्षता:
      १. भगवान राम, कृष्ण जो हिन्दुवों द्वारा पूजे जाते हैं अगर उनको दुसरे धर्म के लोग भी अपना पूर्वज माने इनके प्रति आदर रखें तो ये धर्म निरपेक्षता है, भले ही वो इनकी पूजा ना करें.
      २. माथे पर तिलक लगाना इस भारत भूमि की संस्कृति है उसे बिना किसी धर्म से जोड़े यदि दूसरे धर्मो के लोग भी लगायें तो यह धर्म निरपेक्षता है.
      ३. विदेशी मुस्लिम लुटेरों से यदि अपने आपको मुस्लिम वर्ग न जोड़ें और ये माने की वो सिर्फ क्रूर अत्याचारी लुटेरे ही थे तो यह धर्म निरपेक्षता है.
      ४. हमारे राष्ट्रगीत वन्दे मातरम को यदि हर धर्म के लोग स्वेक्षा से गायें तो यह धर्म निरपेक्षता है.
      ५. कश्मीर से मार कर भगाए गए हिन्दुवों को यदि कश्मीर सरकार वापस फिर से बसाये तो यह धर्म निरपेक्षता है.
      ६. समान नागरिक सहिता यदि भारत में मुस्लिम खुद लागू करवाएं तो यह धर्म निरपेक्षता है.
      ७. हज सब्सिडी लेने वाले अगर हिन्दुवों के तीर्थ स्थानों के भ्रमण के लिए भी इस तरह की किसी व्यवस्था का समर्थन करें तो यह धर्म निरपेक्षता है.
      ८. अभी तक बहुसंख्यक हिन्दुवों ने अपने देश में कई मुस्लिम राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री और तमाम मंत्री बिना किसी विवाद के स्वीकार किये हैं, अगर कश्मीर में भी एक बार कोई हिन्दू मुख्यमंत्री मुस्लिमो के सहयोग से बने और मुस्लिम उसे स्वेक्षा से स्वीकार करें तो यह धर्म निरपेक्षता है.
      ९. सलमान रुश्दी पर छाती पीटने वाले यदि इसी तरह का विरोध फ़िदा हुसैन का करते तो यह धर्म निरपेक्षता होती.

      और भी बहुत कुछ है लिखने के लिए पर बिना अनुमति के और दूसरे से पूछे गए प्रश्न का इतना जवाब ही बहुत है….

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  9. Jeet Bhargava

    श्री मीणा साहब, मेरा मानना है –सेकुलरिज्म यानी सर्व धर्म समभाव.
    लेकिन भारत में यह सेकुलरिज्म अपनी सुविधा के हिसाब से परिभाषित होता रहा है. खासकर उन लोगो द्वारा जो खुद को सेकुलरिज्म के महान ठेकेदार समझते हैं.
    और इसा तरह उन्होंने मुस्लिम ईसाई तुष्टिकरण, हिन्दू हितो के दमन, और आजकल तो जेहाद के समर्थन, जबरन धर्मानातार्ण को ही सेकुलरिज्म मान लिया है.

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  10. रामनारायण सुथार

    सत्यनारायण कथा एक पाखंड है अर्थात आपकी नजर से कर्मकांड का हर एक पहलु पाखंड है
    आर सिंहजी आप सही है यदि धरम के नाम पर की गई हर एक ओपचारिकता को पाखंड मानते है तो शायद पाखंड की परिभाषा इतनी सरल और सहज है की जो चाहे अपने विचारो के अनुसार इसे मूर्तरूप दे सकता है

    छूत अछूत छुआछुत ये सब सनातन धरम के विरुद्ध है सनातन अर्थार्त जो आदिकाल से चला रहा है यह मानव मात्र के लिए है किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं क्या रामायण या महाभारत काल में अछूत जैसे किसी शब्द का वर्णन मिलता है

    आज की छुआछुत मध्ययुगीन शासक वर्ग की देन है हर किसी देश में छुआछुत ऊँचनीच का कोई न कोई पहलू विधमान है चाहे वो काले गोरे के आधार पर हो या मान प्रतिष्ठा के आधार पर जब कोई सकीर्ण सोच का व्यक्ति ऊँचे पद पर बैठता है तो वो अपने निचे के व्यक्तियों को अपना गुलाम समझ लेता है और ये गुलामी की परम्परा भारतीय परम्परा नहीं है बल्कि मुस्लिम शाशको द्वारा भारत पर थोपी गई है
    विदेशी लुटरो के हाथो जब भारत गुलाम हुआ तो उनके अनुसार हर वो व्यक्ति जो हमारे शासन में रहता है या तो वो हमारा गुलाम बने या मोत्त को गले लगाये उनका प्रजा हितो से कोई संबध नहीं था और जिन भारतीयों ने इस कार्य में लुटेरो का साथ दिया उन्होंने ये परम्परा अपना ली थी धीरे धीरे यही परम्परा भारत में छुआछुत का कारन बनी क्योंकि यहाँ जाती कर्म के आधार पर थी और कर्म छोटे और बड़े होते ही है इससे धरम का कोई लेना देना नहीं है और इसी काल में कुछ लोगो ने अपने स्वार्थ साधने के लिए धरम ग्रंथो में भी परिवर्तन किया परन्तु इनमे सनातन कुछ भी नहीं है
    जहा तक मुझे ज्ञात है किसी भी सनातन धर्मी ऋषि महरिशी संत महात्मा ने जातिवाद को बढ़ावा नहीं दिया होगा और ऐसे बहुत से संत महात्मा मिल जायेंगे जिन्होंने इस छुआछुत जातिवाद के विरोध में बहुत कुछ किया फिर ये सनातन धरम की देन कैसे हो सकता है

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  11. आर. सिंह

    R.Singh

    रामनारायण सुथार जी सनातन धर्म के पाखंडों में एक है सत्यनारायण कथा.उसको पढ़िए और इसके बाद बताइये की मैं गलत हूँ या सही.
    दूसरा पाखण्ड है तथा कथित अछूतों के मंदिर प्रवेश पर रोक.
    अन्य बहुत से पाखंड सनातन धर्म से जुड़े हुए हैं,पर उनपर चर्चा फिर कभी.सनातन धर्म से बौद्ध और जैन धर्म का उद्भव और बाद में आर्य समाज का जन्म बहुत हद तक इन्ही पाखंडों की देन है.

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  12. Jeet Bhargava

    मीणा साहब, आभारी हूँ की आपने उत्तर दिया. मैंने अपनी पिछली टिप्पणी में भारत के अनोखे सेकुलरिज्म के बारे में अपनी बात रखी है.
    हमारे संविधान में वर्णित परिभाषा और असल जिन्दगी में राग-सेकुलर गानेवाले सेकुलर नेताओं व मीडिया की करनी में अंतर पर भी लिखा है. कृपया उस पर पुन: गौर करके मार्गदर्शन करें.

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  13. रामनारायण सुथार

    माननीय आर . सिंहजी आपके विचारो से में सहमत हु की आज जाती का आधार कर्म नहीं है क्योंकि आज कर्म का आधार भी जाती नहीं है जाती केवल एक सामाजिक व्यवस्था बनाने के लिए थी जो समय के साथ दुर्भावनाओ का शिकार हो गई
    परन्तु सनातन धर्म से जुड़े हुए पाखंड ये कोनसे पाखंड है शायद मुझे नहीं मालूम इनके बारे में आशा करता हु आप इन पाखंडो की जानकारी अवश्य देंगे

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  14. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

    श्री जीत भार्गव जी मैंने आपसे निवेदन किया था कि-

    “………इस प्रसंग में, मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूँ कि कृपया यहॉं पर बतलाने का कष्ट करें कि भारतीय संविधान में जिस धर्म निरपेक्षता की बात कही गयी है| उसे आप संविधान के प्रकाश में किस प्रकार से परिभाषित करना चाहेंगे|……..”

    अपने अपनी टिप्पणी में इस विषय पर एक शब्द भी नहीं लिखा है! एक फिर से अनुरोध है! यदि आप विमर्श और चर्चा में विश्वास करते हैं तो कृपया अपनी टिप्पणी जरूर दें!

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’
    संपादक प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित हिंदी पाक्षिक)
    फोन : 0141-2222225 , मो. 98285-02666

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  15. Jeet Bhargava

    श्री मीणा साहब आप मेरी बात से सहमत नहीं हो, लेकिन मैं आपकी बात से सहमत हूँ की भारत के संविधान में कही पर भी नहीं लिखा है कि हिंदुत्व का विरोध ही धर्म निरपेक्षता माना जाए.
    रोना इसी बात का है कि आजकल देश का सेकुलरिज्म बाबा साहब रचित संविधान को ताक में रखकर नेहरू द्वारा सीखाई गयी परिभाषा के अनुसार चल रहा है. जिसका एक ही अर्थ है- हिन्दू दमन=सेकुलरिज्म. मुस्लिम तुष्टिकरण=सेकुलरिज्म. नेहरू के इस कुपरिभाषित सेकुलरिज्म के प्रभाव में न सिर्फ बुद्धीजीवी बल्कि मीडिया भी है. उनके अगर आप भगवे कपडे पहने तो साम्प्रदायिक हो कहलायेंगे. लेकिन जामा मस्जिद से पाकिस्तान जिंदाबाद कहेंगे तो देश के सेकुलर नेता आपके वहां सिजदा करने पहुँच जायेंगे. आपके और मेरे जैसे हिन्दू के घर पर डॉ. कलाम या मोहम्मद रफ़ी का चित्र टंगा हो, और किसी मुसलमान भाई के घर महात्मा गांधी या बाबा साहेब की तस्वीर हो तो सेकुलर कहा जा सकता है लेकिन अब हालात ये है कि मुझे खुद को सेकुलर साबित करने के लिए अपने ड्राइंग रूम में अफजल खान या अजमल कसाब का चित्र लगाना पडेगा या दुर्दांत ओसामा को ‘मरहूम ओसामाजी’ कहना होगा…!!

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  16. डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

    आदरणीय श्री जीत भार्गव जी, कम से कम मैं इस बात से कतई भी सहमत नहीं हूँ कि हिन्दुओं या हिन्दुत्व का विरोध धर्म निरपेक्षता है| न हीं संविधान में ऐसा कहीं पर लिखा या कहा गया है| इस प्रसंग में, मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूँ कि कृपया यहॉं पर बतलाने का कष्ट करें कि भारतीय संविधान में जिस धर्म निरपेक्षता की बात कही गयी है| उसे आप संविधान के प्रकाश में किस प्रकार से परिभाषित करना चाहेंगे| यह आपकी इच्छा पर है| आप चाहें तो ही इस बारे में विचार व्यक्त करें|

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  17. आर. सिंह

    R.Singh

    रामनारायण सुधार जी आपने लिखा है कि”प्रथम तो हिंदुत्व कोई धर्म नहीं एक जीवन शैली जो सनातन धरम का अनुशरण करती है और सनातन धरम में जाति क्रम के आधार पर है न की वंशावली के आधार पर.”इस कथन के दो भाग हैं ,एक तो हिंदुत्व कोई धर्म नहीं ,जीवन शैली है.मैं आपके इस बात से सहमत हूँ ,पर अगर इसे आप जीवन शैली के रूप में लेते हैं,तो इसमें सनातन धर्म से जुड़े हुए पाखंडों को नहीं समाहित कर सकते.इसी सिलसिले मैं आप को सलाह दूंगा कि एक पुस्तक पढ़िए “इस्लाम चैलेन्ज टू रेलिजन”उसमें विद्वान् लेखक ने अपने तर्कों द्वारा सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि इस्लाम धर्म नहीं जीवन शैली है.मुझे उनके तर्क भी ठीक लगे.ऐसे विभिन्न धर्मों का जो थोड़ा ज्ञान मुझे है ,उससे मैं इसी निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ की सभी धर्मों में जीवन शैली को बदलने और उसे अच्छा बनाने की सलाह दी गयी है.
    आपके जिस कथन को मैंने यहाँ उद्धृत किया है,अब उसके दूसरे भाग पर आता हूँ.जहां आपने लिखा है कि सनातन धर्म में जाति कर्म द्वारा निर्धारित की जाती है.सिद्धांततः आप ठीक हो सकते हैं,पर वास्तविकता इससे बहुत भिन्न है.यहाँ तो जातियाँ ,वंशावली और केवल वंशावली पर चल रही है.

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  18. Jeet Bhargava

    श्री आर सिंह जी, आपकी बात से १००% सहमत हूँ. लेकिन आजकल बुद्धीजीवी और मीडिया समेत अपने आप को सेकुलर कहनेवाली पार्टिया सिर्फ हिन्दू विरोध और हिन्दू दमन को ही सेकुलरिज्म मानते हैं. नेहरू जी जो सीखा कर गए है..उसी फ्रेम में आप आये तो ही सेकुलर कहे जाओगे. और हमारा विरोध भी ऐसे ही ढोंगी सेकुलरिज्म से है, जो सिर्फ हिन्दू प्रजा और मान बिन्दुओं पर ही हमला करता है. कबीर का सेकुलरिज्म सदैव प्रशंसनीय है. लेकिन आज के नकली सेकुलरो को वह नहीं चाहिए.

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  19. आर. सिंह

    R.Singh

    जीत भार्गव जी,सेक्युलरिज्म एक विचार धारा है और वह किसी पार्टी या दल की बपौती नहीं है.ऐसे यह भ्रम बहुत से लोग पाले हुए हैं.सेक्युलरिज्म का सबसे बड़ा उदाहरण संत कबीर हैं.आज के युग में न जाने वे किस पार्टी में होते?

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  20. रामनारायण सुथार

    मीणाजी आपका बहुत बहुत आभार की आपने कुछ जवंलत समस्याए रखी परन्तु आप इन सब समस्याओ का कारन अगर हिंदुत्व को मानते है तो आप पूर्ण रूप से गलत है प्रथम तो हिंदुत्व कोई धर्म नहीं एक जीवन शैली जो सनातन धरम का अनुशरण करती है और सनातन धरम में जाति क्रम के आधार पर है न की वंशावली के आधार पर

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  21. आर. सिंह

    R.Singh

    मुकेश मिश्र जी आपने यह याद दिलाकर की जयचंद भी राजपूत था,बहुत से अहंकारी राजपूतों का मान मर्दन किया है.मेरे जैसे तो सत्य को सत्य ही मानते हैं,अतः ईससे कोई अंतर नहीं पड़ता. ऐसे भी यह तो एक संयोग है किसने कहाँ जन्म लिया है,अतः जन्मकी तुलना में मैं कर्म को सर्वोपरी मानता हूँ.रह गयी बात मेरी प्रतिक्रया की तो आप अपनी टिप्पणी फिर से पढ़िए शायद आप मेरे कथन का अर्थ समझ जाए.

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  22. मुकेश चन्‍द्र मिश्र

    Mukesh Mishra

    आर सिंह जी आपसे बड़े ही आदर के साथ कहना चाहता हूँ की मेरा जन्म भले ही ब्रह्मण कुल में हुआ है पर मै न तो इससे अपने आपको दूसरे लोगों या जातियों से महान समझता हूँ और न ही दूसरी जातियों को छोटा…रही डाक्टर निरंकुश की बात तो मै इनका लेख अक्सर पढता हूँ और अभी तक जितने भी लेख इन्होने लिखे हैं सारे पूर्वाग्रह से प्रेरित ही थे, ये भूतकाल में हुयी घटनावों का बदला आज की पीढ़ी से लेना चाहते हैं, जैसे “किसी के दादा ने किसी की हत्या की थी तो उनका तो कोई कुछ बिगाड़ न पाया आज उनके पोते से बदला लेने की बात कर रहा है या गाली दे रहा है” I आपको आदेश देने की मेरी औकात नहीं है, हाँ निवेदन जरुर है की अपनी लेखनी का इस्तेमाल समाज को जोड़ने में करें, समाज में बदलाव या तो रक्तपात से आता है या ह्रदय परिवर्तन से, मेरा मानना है ह्रदय परिवर्तन वाले रास्ते पर हम काफी दूर तक चल चुके हैं और मंजिल के करीब हैं….अब ये आपके ऊपर है की आप इन्हें कौन सा रास्ता चुनने के लिए प्रेरित करना चाहते हैं….वैसे जहाँ तक मै जानता हूँ “जयचंद” राजपूत ही था जिसका न तो कोई हिन्दू सम्मान करता है न ही मुस्लिम…..

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  23. आर. सिंह

    R.Singh

    मुकेश मिश्र जी, एक ब्राहमण खानदान का कुल भूषण होने के अधिकार का प्रयोग करते हुए डाक्टर निरंकुश को तो आपने उनकी औकात दिखा दी,क्योंकि वे ब्राह्मण नहीं हैं और हिन्दू संस्था द्वारा निर्मित सोपान के अनुसार शायद सवर्ण भी नहीं हैं,पर मेरे जैसे लोगों के लिए आप कौन आदेश जारी कर रहे हैं?आपकी सुविधा के लिए मैं आप को बता दूं की संयोग बस मेरा जन्म क्षत्रिय या राजपूत वंश में हुआ है.

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  24. Jeet Bhargava

    श्री रमण सिंह जी आज आपसे ये नई और अद्भुत बात जानने को मिली कि दिन रात सेकुलरिज्म का जाप करनेवाली रास्ट्रवादी कोंग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ मंत्री को आपके अनुसार सेकुलर नहीं माना जाए!!
    सत्य को नहीं जानना अलग बात है और और सत्य को जानकर उससे मुंह मोड़ना दूसरी बात है.
    आप विद्वान व्यक्ति हैं. लेकिन कथित सवर्ण- कथित दलित नाम से दिन रात हिन्दू विभाजन का राग अलापने वाले इस लेख के लेखक वैचारिक रूप से कोंग्रेस और राष्ट्रवादी कोंग्रेस पार्टी जैसे दलों से वैचारिक समानता रखते हैं, न कि कथित रूप से ”साम्प्रदायिक, हिंदूवादी” भाजपा या शिवसेना से. जबकि भाजपा/शिवसेना जैसे दल कथित दलितों के हक की बात करते रहते है, बावजूद दलितों के मसीहा उनके लिए गाली निकालते हैं. जबकि दलितों के दमन की पैरवी करने वाले सेकुलर एनसीपी के सेकुलर मंत्री से सहानुभूति है!! और उसके लिए भी प्रकारांतर हिन्दू सवर्ण को कोसना!! वाह!! इसे वैचारिक दोगलापन ही कहा जा सकता है.

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  25. आर. सिंह

    R.Singh

    श्री जीत भार्गव जी,आपके लिंक पर उपलब्ध समाचार मैंने देखा.यहाँ सेक्युलरिज्म तो कहीं दिखा नहीं .यहाँ तो मुझे हिन्दुओं की वही पुरानी परम्परा दिखी,एक सवर्ण हिन्दू द्वारा दलितों पर होने वाले अत्याचार का समर्थन.वे महाशय सेक्युलरिष्ट कैसे हो गए? मेरे विचार से किसी पार्टी विशेष में रहने से ही कोई सेक्युलिस्ट नहीं हो जाता.मुझे वे भी उसी संस्कार की उपज लगे ,जो हिंदुत्व का जड़ खोखला करती रही है.मैंने अपनी टिप्पणी में लिखा है की इन कुविचारों से राष्ट्र को खतरा तो बाद में है,पर हिंदुत्व को पहले है. हिन्दू संस्था इन्ही जैसे लोगों के चलते इस अवस्था को प्राप्त हुई है अगर विचार धारा इसी तरह की रही ,इसमें कोई परिवर्तन नहीं आया तो मुठ्ठी भर सवर्ण, हिन्दू और हिंदुत्व को नहीं बचा पायेंगे.

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  26. मुकेश चन्‍द्र मिश्र

    Mukesh Mishra

    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ आपके लेख पढ़कर हमें कम से कम यह तो समझ में आ ही गया की आप लोगों को भूतकाल में पठन – पाठन से दूर क्यों रखा गया था….आप के हाथ में चाहे बम दे दिया जाए या कलम आप उसका इस्तेमाल स्वयं का और अपनों का नुकसान करने में ही करोगे….शायद भष्मासुर आप लोगों के वर्ग से ही था इसीलिए उसका अनुसरण कर रहे हो………

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  27. Jeet Bhargava

    श्री रमण सिंह जी, महाराष्ट्र में दलित महिला पर किए गए जुल्म को न्यायसंगत ठहरानेवाले कोइ हिन्दुत्व वादी नहीं है, बल्कि सुपर सेकुलर शरद पवार की राष्ट्रवादी कोंग्रेस पार्टी का एक आला मंत्री है. ज़रा इस लिंक पर गौर फरमाए..http://www.dnaindia.com/mumbai/report_minister-justifies-atrocity-on-dalit-widow-in-satara_1637475

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  28. kaushalendra

    मीणा जी को यह स्पष्ट करना चाहिए कि आदिवासी हित के लिए ….और ब्राह्मणों द्वारा किये जा रहे उनके तथाकथित शोषण के विरुद्ध उनकी रणनीति क्या है…वे क्या चाहते हैं ? इस तरह विष वमन करने से केवल माहौल खराब होगा, उन्हें एक सकारात्मक सोच प्रस्तुत कर सभी को अपने साथ लेकर चलना चाहिए …..

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  29. आर. सिंह

    R.Singh

    इसका कोई प्रमाण है क्या की कथित ब्यान राहुल गांधी का है?ऐसे ब्यान की प्रमाणिकता स्थापित किये बिना इस लेख को वर्तमान शीर्षक देकर डाक्टर निरंकुश ने स्वयं इस सारगर्भित लेख को हल्का कर दिया है.सुपर हिन्दुओं से राष्ट्र को तो खतरा बाद में है.प्रथम तो उनसे हिंदुत्व को ही खतरा है,हिन्दुओं की कथनी और करनी में फर्क हिन्दू समाज को एक नहीं होने दे रहा है.डाक्टर मीणाने जो कुछ इस लेख में लिखा है,वह वास्तविकता है और एक भुक्त भोगी ही उस पीड़ा को समझ सकता है जो उनकी लेखनी से उदगार बन कर निकला है.ऐसे कहा जाता है की लोग अपनी गलतियों से सीखते हैं,पर ऐसा नहीं लगता की हिन्दू समाज ख़ास कर वे लोग जो अपने को हिंदुत्व का मसीहा समझते हैं इससे कोई सबक ले रहे हैं.ऐसे श्री राजन ने एक लिंक पढने को कहा था .उस लिंक को पढ़ कर मुझे तो वही सुपर्हिंदु वाली बात वहां भी नजर आयी.मैंने अपनी टिप्पणी वहां लिख दी है और वहां शायद प्रकाशित भी हो गयी है.उस लेख के प्रथम भाग पर मेरी टिप्पणी कुछ यों है.I am sorry to say that this is highly biased and misguiding article. In my personal opinion there is hardly a Hindu in India. Rather there were none from the time immortal. Whom do you call Hindu? If you take out scheduled castes, scheduled tribes and some other who have been deprived social benefits of so called Hinduism, how many Hindus you will be left with? Even Hindu women should be taken out of it, because they have always been considered, either Devi or Dasi,but never an ordinary Insaan. Upper caste Hindus influenced by Brahmins never tried to think of this. In describing historical facts you have said nothing about those Muslim rulers who ruled over India before Moghuls. They were not less cruel than Moghuls. Jajia Tax, which was abolished by Akbar and reintroduced by Aurangzeb, was introduced before the arrival of Moghuls You has not spoken a word about the period in which India saw its Nadir. I am talking about the period after fall of Guptas’ regime up to advent of Muslim rule. Hindus with their atrocities on their own people were bound to kiss the dust. History has been very cruel to Hindus due to their misdeeds. There is no reprieve even today. Unless you create social equality among Hindus, merely boasting and blaming others is not going to help your cause. There are many other bitter truths about which you have not spoken even a word. Without elaborating I would like to say one thing. First look into the ills, some of which was part of Hinduism from long time and some, which have crept into it with the passing of time and rectify it.

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  30. Jeet Bhargava

    मीणा साहब आप हर बार हिन्दू संगठनो और हिंदुत्व को पानी पीकर कोसते हैं. लेकी देखिये आपके सेकुलर मित्रो का दलितों के प्रति क्या नजरिया है..
    Minister justifies atrocity on Dalit widow in Satara
    Nationalist Congress Party (NCP) leader and Minister for Water Supply and Sanitation department, Laxmanrao Dhoble, tried to justify the alleged attack on a Dalit widow by saying that the anger of the family was natural.

    The 42-year-old victim was allegedly stripped naked, paraded, tied to a tree and beaten up by members of an upper caste family in Mulgaon village of Patan taluka in Satara district on Monday.

    After the comment, the Dalit Mahasangh burned an effigy of Dhoble outside Krishna Charitable Hospital in Karad, where the woman is being treated.

    On Friday, after visiting the victim, who belongs to the Matang community, Dhoble told the media that the incident had been exaggerated.

    “The outburst of the girl’s family is natural. The facts are being twisted to create an environment of suspicion and distrust between the two communities,” Dhoble said.

    The widow was attacked after her 21-year-old son eloped from the village last month with his 18-year-old girlfriend, who belongs to upper caste Maratha community. Five people have been arrested in the case, and the state government has already ordered an inquiry.

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  31. Jeet Bhargava

    ”जिन्दगीभर हत्याएँ करने वाले सम्राट अशोक का अचानक हृदय परिवर्तित हो जाता है तो उसे हम भारतीय महान सम्राट अशोक का दर्जा दे देते हैं| इस्लाम के अलावा अन्य धर्मो का सम्मान करने की बात करने और कहने वाले बादशाह अकबर को भी हम अशोक की ही भॉंति महानता का तमगा थमा देते हैं| अंग्रेज आते हैं और देश का सारा धन विदेशों में ले जाते हैं| आज भी ले जा रहे हैं और सदैव की भांति इस देश का हिन्दू ‘‘वसुधैव कुटम्बकम्’’ का नारा देकर चुप बैठे रहते हैं|”

    यह उपरोक्त पेरेग्राफ ही एकमात्र सार्थक विश्लेषण है, जिस पर हिन्दू कौम को सोचना होगा. बाकी माफ़ कीजिये मीणा साहब कुछ नया नहीं लिखा है आपने..! वही रती-रटाई बाते हैं आपकी.

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