ओ अनजाने सहयात्री

—विनय कुमार विनायक
ओ अनजाने सहयात्री!
तू बैठ जा मेरी आधी सीट पर
मेरी पीठ से लगकर कि यात्रा अभी बहुत लम्बी है!

यह मत समझना कि यकायक तुम पर
मेरा प्यार उमड़ आया किसी स्वार्थ या श्रद्धा भाव से!

मेरी सदाशयता है आशंका प्रसूत
कि तुम्हें ईर्ष्या न हो जाए मेरे भाग्य से
जग न जाए एक शैतान तुम्हारे अंदर
उग न आए तमंचा तुम्हारी जेब में
और चलाने न लगो अंधाधुंध गोलियां
निर्दोष सहयात्रियों पर!

तुम्हें कोफ्त है लंबे समय से कतार में खड़े होने
और टिकट के खप जाने से
उन बेकतारियों के बीच जो अभी-अभी उग आए थे
अफसोस कि मैं उन्हीं में हूं/मुझे जाना है
आज ही इस आखिरी गाड़ी से उस दादी से मिलने
जिसकी आखिरी सांसें अटकी हैं
सिर्फ मेरी मुलाकात के लिए!

कि मैंने खरीद ली एक फुट जगह मजबूरी में
उन बेकतारी आरक्षण खरीददारों की तरह
खर्च कर अलग से रोकड़े!

कि अलग से खर्चने के रोकड़े
अपनी औकात में नहीं होते किसी के पास
कि रोकड़े की चाहत, आशक्ति, संतुष्टि सबकी
अलग-अलग होती,मगर सबके पास होती
अपनी-अपनी मजबूरियां भी!

रोकड़े आवश्यकता से अधिक क्यों?
क्यों नहीं? इन यक्ष प्रश्नों के उत्तर में
आशंका है तुम चलाने लगो गोलियां
और निकल जाए निर्दोष यात्रियों की अर्थियां!

कि मुझे जीना है बूढ़ी दादी की उन अटकी सांसों के लिए
जो आखिरी सांस लेना चाहती थी पोते का मुख देखकर!

कि मुझे जीना है उस मां के लिए
जिसने मुझे जनने की सुखद अहसास में काटी थी नौ मास
बिना टानिक-अखरोट-मेवा खाए दो फटी साड़ियों में लिपट कर!

कि मुझे जीना है उस पिता के लिए जो मेरे जन्म के बाद
सुखद बुढ़ापे की तलाश में भर जवानी लादते रहे पीठ पर बोरे!

कि लिखना है मुझे भाग्य लेख उस नन्ही बिटिया का
जो मेरी मौत के बाद बन सकती है एक त्रासद कथा!

कि मुझे लिखनी है उस दक्ष जमाता की अनकही कहानी
जिसे घोषित किया गया था दहेज लोलुप हत्यारा
पितृयज्ञ में उसकी गौरी के आत्मदाह कर लेने पर!

कि लिखनी है एक कालजयी कविता उस भाई पर
जिसने चौथाई भर हिस्सा दहेज में ले जाने की आशंका से
मासूम कुंवारी बहन को जहर पिला दिया!

एक व्यंग्य कथा उस बेटे पर भी जिसने अनुकंपा नौकरी की
चाहत में दबा दिया नौकरीशुदा बाप का गला!

एक एकांकी उस पुरोहित पर जिसकी पुरोहिताई मर गई
अर्थाभाववश जिसके बेटे को मिली नहीं उच्च शिक्षा
कि पंडित का बेटा पंडित होता मिली नहीं कोई आजीविका!

कि हल चलाना चाहता था पंडित का बेटा
किन्तु हल चलाने देगी नहीं बिरादरी और हल चलवाएगा नहीं
गैर बिरादर कि ब्राह्मण को मजूरी खटाना पाप है!

लिखूंगा वह भी एक कथा कि दुखी राम का बेटा बी०ए० पास है
पर सुखी राम के बेटा का वह घास है और कि घोड़ा घास चर गया!

ओ अनजाने सहयात्री! तू बैठ जा मेरी आधी सीट पर,
मेरी पीठ से लगकर कि मैं लिखूंगा तेरी भी व्यथा कथा!

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