बाधक शत्रु हमारे कल्याणकारी मार्ग से दूर हों

                आचार्य डा. रामनाथ वेदालंकार जी वेदों को समर्पित अत्यन्त उच्च कोटि के विद्वान थे। उन्होंने जीवन भर वेद सेवा की है। अपने वेदों के प्रौढ़ ज्ञान से उन्होंने वेदों पर बड़ी संख्या में उच्च कोटि के ग्रन्थ लिखे हैं। उन्होंने सामवेद का संस्कृति व हिन्दी सर्वोत्तम भाष्य किया है जो वैदिक विद्वानों में समादृत है। अन्य वेदों पर भी उन्होंने मन्त्र संग्रह कर वेदमंजरी, ऋग्वेद-ज्योति, यजुर्वेद-ज्योति, अथर्ववेद-ज्योति आदि नामों से मन्त्रों की भावपूर्ण व अनेक रहस्यों को उद्घाटित करने वाली रचनायें दी हैं। वैदिक नारी, आर्ष ज्योति, वैदिक मधुवृष्टि, यज्ञ मीमांसा, वेदों की वर्णन शैलियां, वेद भाष्यकारों की वेदार्थ प्रक्रियायें, महर्षि दयानन्द के शिक्षा, राजनीति और कला-कौशल संबंधी विचार, उपनिषद्-दीपिका आदि उनके वेदों पर विख्यात ग्रन्थ है। आचार्य रामनाथ वेदालंकार जी गंगापार वाले कांगड़ी ग्राम के गुरुकुल कागड़ी विश्वविद्यालय के स्नातक थे। वहीं पर वह वेदाचार्य बने और साठ वर्ष की आयु में सेवानिवृत हुए थे। अथर्ववेद एवं सामवेदभाष्यकार तथा अनेक वैदिक ग्रन्थों के लेखक पं. विश्वनाथ विद्यालंकार वेदोपाध्याय विद्यामार्तण्ड उनके शिक्षा गुरु थे। हमें आचार्य रामनाथ वेदालंकार जी से पं. विश्वनाथ विद्यालंकार जी के कुछ प्रेरक प्रसंग सुनने का अवसर भी मिला था। पं. विश्वनाथ विद्यामार्तण्ड जी भी गुरुकुल के प्रथम विद्यार्थी एवं स्नातक थे। आचार्य जी गुरुकुल कागड़ी विश्व विद्यालय से सेवानिवृत्ति के बाद लगभग पांच वर्षों तक महर्षि दयानन्द वैदिक शोधपीठ, पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ़ में आचार्य एवं अध्यक्ष भी रहे। यहां उनके निर्देशन में अनेक शोध छात्रों ने शोध कार्य किया और कुछ उत्तम वैदिक ग्रन्थों की रचना हुई। आचार्य रामनाथ वेदालंकार जी ने वेदमन्त्रों की जो व्याख्यायें की हैं वह अत्यन्त सरल एवं सुबोध हैं तथा इन्हें पढ़कर पाठक की वेदाध्ययन में प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। हम इस लेख में आचार्य की प्रसिद्ध रचना वेदमंजरी से ऋग्वेद के मन्त्र संख्या 1.42.3 की सरस व सुन्दर व्याख्या प्रस्तुत कर रहे हैं। हम आशा करते हैं कि पाठक इससे लाभान्वित होंगे और उनकी वेदाध्ययन में प्रवृत्ति उत्पन्न होगी। मन्त्र हैः

                अप त्यं परिपन्थिनं, मुषीवाणं हुरश्र्चितम्।

                दूरमधि स्त्रुतेरज।।

                (ऋषिः कण्वः घौरः। देवता पूषा। छन्दः गायत्री।)

                मन्त्र का पदार्थः- [ पूषन्!, हे परमात्मन्], (त्यं) उस (परिपन्थिनं) मार्ग के बाधक शत्रु को (मुषीवाणं) चोर को [और] (हुरिश्चतम्) कुटिलता का संग्रह करनेवाले को (स्त्रुतेः अधि) मार्ग से (दूरं) दूर (अज) फेंक दो।

मन्त्र के अर्थ पर आचार्य रामनाथ वेदालंकार जी का व्याख्यान

                धर्म मार्ग पर चलने की वेदादि शास्त्र बार-बार प्रेरणा करते हैं। परन्तु वह धर्ममार्ग आसान नही है, प्रत्युत बहुत ही कंटककीर्ण है। अनेक छद्मवेषी शत्रु मार्ग में बाधक बनकर आ खड़ें होते हैं, जिनसे लोहा लेना बड़ा ही कठिन हो जाता है। जब कोई धर्मपथ पर चलने का व्रत लेता है और अपनी यात्रा आरम्भ करता है, तब अधार्मिक लोगों में खलबली मच जाती है। वे सोचने लगते हैं कि धार्मिकों की संख्या शनैः-शनैः बढ़ती गई तो एक दिन ऐसा आयेगा कि अधर्म को कन्दरा में जाकर मुख छिपाना पड़ेगा और हम लोगों को कहीं पैर टिकाने तक का आश्रय नहीं मिल सकेगा। अतः वे धर्म-मार्ग में विघ्न डालने का षड्यन्त्र रचाते हैं और धर्ममार्ग के पथिकों को मोह में डालने के लिए अधर्म को ही धर्म के रूप में उपस्थित करने लगते हैं। वे कहते हैं कि कर्म-फल देनेेवाला परमात्मा और कर्म-फल भोगनेवाला जीवात्मा कपोल-कल्पित वस्तुएं हैं, अतः इनसे भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। जिसे करने में स्वयं को सुख मिलता है, वही धर्म है, अतः खाओ, पिओ, नाच-रंग की रंगरेलियों में मस्त रहो, यही सच्चा जीवन-दर्शन है और यही धर्म है। परन्तु वस्तुतः धर्म का यह रूप उपस्थित करनेवाले लोग धर्म-मार्ग के परिपन्थी या शत्रु हैं। 

                धर्मपथ का पथिक जिस सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य आदि के पाथेय को साथ लेकर चलता है, उसे बीच में चुरा लेनेवाले ‘मुषीवा’ लोग भी बहुत-से मिलते हैं। वे हिंसा को अहिंसा से, असत्य को सत्य से, स्तेय को अस्तेय से, अब्रह्मचर्य को ब्रह्मचर्य से बड़ा बताकर और लुभावने रूप में उपस्थित करके अहिंसा आदि की सम्पत्ति को उससे ठग लेते हैं और ‘हुरश्चित्’ बनकर उसके मन को कुटिलताओं का आवास-भवन बना देते हैं। इन ‘परिपन्थी’, ‘मुषीवा’ और हुरश्चित्’ व्यक्तियों से हम धर्म-यात्रियों को सावधान रहना होगा, अन्यथा हमारी यात्रा विघ्नित और विच्छिन्न हो जाएगी।

                धर्म-यात्रा में हमें केवल इन बाह्य शत्रुओं का ही भय नहीं है, अपितु हमारे अन्दर भी शत्रु घर किये बैठे हैं। हमारे अन्दर प्रच्छन्न रूप से बैठे हुए अपने ही धर्म-विरोधी भाव धार्मिक भावों को दबा देना या चुरा लेना चाहते हैं और उनके स्थान पर हमारे अन्तःकरण को कुटिलताओं का संग्रहालय बना देने का षड्यन्त्र करते हैं। उन विरोधी भावों से भी हमें सचेत रहना होगा।

                हे पूषन्! हे हमारे आत्मा को पोषण देनेवाले परमात्मन्! तुम हमारे धर्म-मार्ग में बाधा डालनेवाले बाह्य और आन्तरिक समग्र शत्रुओं को दूर फेंक दो तथा हमें निरन्तर अपनी धर्म-यात्रा प्रवृत्त रखने के लिए परिपुष्टि प्रदान करते रहो।

                हमने यह मन्त्र व्याख्यान आचार्य रामनाथ वेदालंकार जी की पुस्तक वेदमंजरी से लिया है। हम वेदप्रेमी सभी बन्धुओं को इस ग्रन्थ को पढ़ने की प्रेरणा करेंगे। यह ग्रन्थ श्री प्रभाकरदेव आर्य, प्रकाशक श्री घूडमल प्रह्लादकुमार आर्य धर्मार्थ न्यास, हिण्डोन सिटी (मोबाइल सम्पर्कः 09414034072 / 09887452959 / 9352670448) से प्राप्त किया जा सकता है। आचार्य रामनाथ जी के कुछ अन्य ग्रन्थ भी उनसे प्राप्त किये जा सकते हैं। हम आशा करते हैं कि पाठकों आचार्य जी की वेदमन्त्र व्याख्या पसन्द आयेगी। ओ३म् शम्।

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