लेखक परिचय

डॉ. मनोज चतुर्वेदी

डॉ. मनोज चतुर्वेदी

'स्‍वतंत्रता संग्राम और संघ' विषय पर डी.लिट्. कर रहे लेखक पत्रकार, फिल्म समीक्षक, समाजसेवी तथा हिन्दुस्थान समाचार में कार्यकारी फीचर संपादक हैं।

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डा॰मनोज चतुर्वेदी

भाइयों,मित्रों! समय की मांग है। न्यूय‚र्क के मैनहटन में “ओक्कूपाई व‚ल स्ट्रीट” आंदोलन चरमोत्कर्ष पर है। यह वह स्थान हैजहां अमेरिका के शेयर बाजारों तथा नामी-गिरामी वित्तीय संस्थाओं के कार्यालय हैं। आंदोलन का एक नारा है – 1 प्रतिशत लोगों के लालच और करप्शन की सजा 99 प्रतिशत को भुगतनी पड़ रही है। मूलत: यह आंदोलन 1990 के दशक में उदारीकरण तथा भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था के मजाल की उपज है। जहां देश के प्राय: हरेक क्षेत्रों के जो जनता का शोषण कर रहे हैं।

 

अत: युवा साथियों! सबसे पहले ओक्कूपाई भारतीय दूरदर्शन क्योंकि यह आपातकाल में “इंदिरा दर्शन” था। आज सोनिया-राहुल दर्शन बन गया है। ओक्कूपाई आजतक,इंडिया टीवी,स्टार न्यूज,सीएन-ईबीएन,साधना,आस्था,प्रज्ञा,कात्यायनी,संस्कार एंव समस्त चैनलों पर कब्जा करो। ये पूंजीवाद के प्रचारक हैं।

 

अब बारी है Çप्रट मीडिया की। ओक्कूपाई “दैनिक जागरण, ओक्कूपाई दैनिक भास्कर,ओक्कूपाई अमर उजाला,ओक्कूपाई नयी दुनिया,ओक्कूपाई राष्ट्रीय सहारा,ओक्कूपाई दैनिक टि्रब्यून,ओक्कूपाई हरिभूमि,ओक्कूपाई दैनिक प्रभात खबर,हिन्दुस्तान के बाद ओक्कूपाई टाईम्स अ‚फ इंडिया,ओक्कूपाई हिन्दुस्तान टाईम्स, ओक्कूपाई प‚योनियर,ओक्कूपाई इंडियन एक्सप्रेस।

 

मित्रों! अबकी बारी साप्ताहिकों पर कब्जा करो। ओक्कूपाई द विक,ओक्कूपाई तहलका,ओक्कूपाई इंडिया टूडे,ओक्कूपाई साप्ताहिक शुकवार ओक्कूपाई आजकल,ओक्कूपाई रोजगार समाचार। यह इसलिए कि ये कुछ लोगों के नुमाइदे हैं। इनके अंदर पत्रकारिता की वो धार नहÈ है। ये समाज में मूल्यों की स्थापना में बाधक है,पर थैलियों के साधक है।

 

मित्रों! प्रकाशन एक व्यवसाय हो गया है। धड़ाधड़ किताब छापो तथा पुस्तकालयों में लगवा दो पर लेखकों को ज्यादा देने की जरूरत नहÈ। लेकिन पुस्तकों का मूल्य ज्यादा रखो। अत: ओक्कूपाई एनबीटी,ओक्कूपाई भारतीय ज्ञानपीठ,ओक्कूपाई राजकमल प्रकाशन,ओक्कूपाई राधाकृष्ण प्रकाशन,ओक्कूपाई सुरूचि प्रकाशन,ओक्कूपाई जागृति प्रकाशन,आक्यूपाई सादतपुर,आक्यूपाई अक्षर प्रकाशन,ओक्कूपाई प्रोगसेसिव पबिलसिटी,ओक्कूपाई ठाकुर प्रसाद एवं सन्स,ओक्कूपाई प्रवीण प्रकाशन ,ओक्कूपाई इलाहाबाद पटना,वाराणसी,भोपाल,रांची तथा समस्त देशों के प्रकाशन। यह इसलिए कि वे अपने पुस्तकों के मूल्यों की तुलना सर्व सेवा संघ प्रकाशन,राजघाट,वाराणसी से क्यों नहीं करते?

 

दोस्तों! इससे भी काम नहीं बनने वाला है। अत: ओक्कूपाई राष्ट्रीय काँग्रेस,भाजपा,शिवसेना,राजद,शिरोमणी आकाली दल,जदयू,बसपा,नेशनल कॉन्फ्रेंस इत्यादि समस्त राजनीतिक दलों को ओक्कूपाई करो। क्योंकि इनमें जाति,धर्म,भाषाएँ क्षेत्र तथा भ्रष्टाचार के प्रति जनता में आकोश है। इनके लिए सत्ता ही सर्वोपरि है। इनके केंद्र में मानव तथा राष्ट्र नहीं हैं।

 

मित्रों! ओक्कूपाईसार्क,ओक्कूपाई आसियान,सिएटो,सेंटो,नाटो,ग्रुप-6 तथा ओक्कूपाई यूनओ। क्योंकि यहां लोकतंत्र का घोर अभाव दिखता है।

 

मित्रों! ओक्कूपाई56 इस्लामिक राष्ट्रों को तथा अ‚क्यूपाई-125 ईसाई राष्ट्रों को भी क्योंकि न ये इस्लाम के अनुयायी है और ना यीशु के।

 

मित्रों! ओक्कूपाई फिकी,एसोचेन,लघु उधोग भारती तथा अन्य व्यापारीक प्रतिष्ठानों को भी ओक्कूपाई करो। ओक्कूपाई जनवादी लेखकसंघ,अखिल भारतीय लेखिका संघ,समाजवादी लेखक संघ,प्रगतिशील लेखक संघ,अखिल भारतीय इतिहास काँग्रेस,अखिल भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद,अखिल भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद,अखिल भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद,अखिल भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद,क्योंकि इनमें कहीं न कहीं छदम सेक्यूलरिष्टों का कब्जा हो चुका है। और ये भारतीय समाज की माक्र्सवादी चश्में से व्याख्या कर रहे हैं।

विश्व के कोने-कोने में जहां-जहां मानवीय मूल्यों का ह्रास देखो। उसे ओक्कूपाई करो। यह आंदोलन कनाडा से चलते हुए अमरीका तथा अन्ना के नेतृत्व में भारत में शुरू हो चुका है। अत: देर करने की जरूरत नहीं हैं। उठो! कमर कस लो तथा ओक्कूपाई कर लो। यह एक ऐतिहासिक मौका है। इसे निकलने मत दो। लेकिन अपने साथ गवान को रखो। अन्यथा किरन बेदी तथा केजरीवाल की सिथति न हो जाए।

 

2 Responses to “अक्यूपाई वालस्ट्रीट टू यूएनओ”

  1. डॉ. राजेश कपूर

    rajesh kapoor

    सारे रोगों की जड़ यह देशद्रोही सरकार है. अतः ” औकुपाई केंद्र सरकार” या हिंदी में कहें, ” केंद्र सरकार पर कब्जा करो”

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  2. nand kashyap

    आज के संकट का कारण विकसित देशों में उपभोक्ता वाद को प्रश्रय देने के कारण है ,पूंजीपतियों का मुनाफा बढ़ता जाये ,उनका एकाधिकार सारी दुनिय में हो जाय ,इसलिए दुनिया भर को अपना उपनिवेश बना डाला ,परन्तु आज का इन्सान गुलाम होने को तैयार नहीं है ,उसने अपने लोकतान्त्रिक अधिकार बड़ी कुर्बानियों के बाद हासिल किया है ,इन अधिकारों को कॉर्पोरेट जगत कुचलना चाहता है ,आह इस व्यवस्था के खिलाफ समता और समानता की लड़ाई लड़ने की घडी आ गई है

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