आ गया है बुढ़ापा

आ गया है बुढ़ापा,शरीर अब चलता नहीं |
चेहरा जो गुलाब था,वह अब खिलता नहीं ||

हो गयी आँखे कमजोर,अब दिखता नहीं |
काँपने लगे है हाथ,अब लिखा जाता नहीं ||

हो गये है कान कमजोर,अब सुना जाता नहीं |
लगा लिया चश्मा भी,उससे काम चलता नहीं ||

टूट गये सभी दाँत,अब खाना खाया जाता नहीं |
लगा लिया है दाँतो का सैट,पर काम चलता नहीं ||

लड़खड़ाने लगे है पैर उनसे अब चला जाता नहीं |
ले लिया है बैत का सहारा,उससे काम चलता नहीं ||

करता हूँ प्रार्थना ईश्वर से,इस संसार से उठा ले मुझे |
ईश्वर भी सुनता नहीं, क्यों नहीं उठता अब वह मुझे ||

आर के रस्तोगी

1 thought on “आ गया है बुढ़ापा

  1. कर्मयोगी रस्तोगी का यह काव्य मुझे जचता नहीं।

    जब तक शरीर में प्राण? मानो, कर्म है जुडा हुआ॥

    ऐसे शस्त्र डाल देना, कवि को शोभा देता नहीं॥

    अच्छा है, कवि की प्रार्थना ईश्वर भी सुनता नहीं,

    शायद यह रचना है, संदेश फिर भी उचित नहीं।

    निराशा का संदेश, कृष्ण ने दिया न राम ने।

    राम -कृष्ण को ये संदेश देना शोभा देता नहीं।

    कर्मयोगी रस्तोगी का यह काव्य मुझे जचता नहीं।

    अच्छा है, कवि की प्रार्थना ईश्वर भी सुनता नहीं,

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