आ गया है बुढ़ापा

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आ गया है बुढ़ापा,शरीर अब चलता नहीं |
चेहरा जो गुलाब था,वह अब खिलता नहीं ||

हो गयी आँखे कमजोर,अब दिखता नहीं |
काँपने लगे है हाथ,अब लिखा जाता नहीं ||

हो गये है कान कमजोर,अब सुना जाता नहीं |
लगा लिया चश्मा भी,उससे काम चलता नहीं ||

टूट गये सभी दाँत,अब खाना खाया जाता नहीं |
लगा लिया है दाँतो का सैट,पर काम चलता नहीं ||

लड़खड़ाने लगे है पैर उनसे अब चला जाता नहीं |
ले लिया है बैत का सहारा,उससे काम चलता नहीं ||

करता हूँ प्रार्थना ईश्वर से,इस संसार से उठा ले मुझे |
ईश्वर भी सुनता नहीं, क्यों नहीं उठता अब वह मुझे ||

आर के रस्तोगी

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आर के रस्तोगी
जन्म हिंडन नदी के किनारे बसे ग्राम सुराना जो कि गाज़ियाबाद जिले में है एक वैश्य परिवार में हुआ | इनकी शुरू की शिक्षा तीसरी कक्षा तक गोंव में हुई | बाद में डैकेती पड़ने के कारण इनका सारा परिवार मेरठ में आ गया वही पर इनकी शिक्षा पूरी हुई |प्रारम्भ से ही श्री रस्तोगी जी पढने लिखने में काफी होशियार ओर होनहार छात्र रहे और काव्य रचना करते रहे |आप डबल पोस्ट ग्रेजुएट (अर्थशास्त्र व कामर्स) में है तथा सी ए आई आई बी भी है जो बैंकिंग क्षेत्र में सबसे उच्चतम डिग्री है | हिंदी में विशेष रूचि रखते है ओर पिछले तीस वर्षो से लिख रहे है | ये व्यंगात्मक शैली में देश की परीस्थितियो पर कभी भी लिखने से नहीं चूकते | ये लन्दन भी रहे और वहाँ पर भी बैंको से सम्बंधित लेख लिखते रहे थे| आप भारतीय स्टेट बैंक से मुख्य प्रबन्धक पद से रिटायर हुए है | बैंक में भी हाउस मैगजीन के सम्पादक रहे और बैंक की बुक ऑफ़ इंस्ट्रक्शन का हिंदी में अनुवाद किया जो एक कठिन कार्य था| संपर्क : 9971006425

1 COMMENT

  1. कर्मयोगी रस्तोगी का यह काव्य मुझे जचता नहीं।

    जब तक शरीर में प्राण? मानो, कर्म है जुडा हुआ॥

    ऐसे शस्त्र डाल देना, कवि को शोभा देता नहीं॥

    अच्छा है, कवि की प्रार्थना ईश्वर भी सुनता नहीं,

    शायद यह रचना है, संदेश फिर भी उचित नहीं।

    निराशा का संदेश, कृष्ण ने दिया न राम ने।

    राम -कृष्ण को ये संदेश देना शोभा देता नहीं।

    कर्मयोगी रस्तोगी का यह काव्य मुझे जचता नहीं।

    अच्छा है, कवि की प्रार्थना ईश्वर भी सुनता नहीं,

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