किसके सर पर होगा तेलंगाना का ताज कांग्रेस व टीडीपी की नजदिकियां ने केसीआर व भाजपा की मुशिकले बढ़ा दी है

 

रविरंजन आनंद

सन 2019 में सत्ता हमारी ही है, इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए. बीजेपी महासचिव राममाधव ने अभी कुछ दिन पहले कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था. अमित शाह ने भी कहा कि तेलंगाना में सरकार बनाना हमारा लक्ष्य है. देश में लोकसभा व तेलंगना में विधानसभा चुनाव जल्द ही होने वाले है. वहीं बीजेपी का दक्षिण भारत में जनाधार काफी कमजोर है. अब यह देखना है कि बीजेपी दक्षिण भारत विशेषकर तेलंगाना को कितना भगवा रंग में रंग सकती है. वहीं तेलंगाना के सीएम जल्द चुनाव कराने के चक्कर में सिंतबर में ही कार्यकाल पूरा होने से पहले ही पद से इस्तिफा दे दिया. वहीं विधानसभा भी भंग करवा दिया. इधर अमित शाह की टीम तेलंगाना में काफी सक्रिय है. वहीं दूसरी ओर कांग्रेस व टीडीपी के गंठबंधन के संकेत ने के चन्द्रशेखर राव( तेलंगाना राष्ट्र समिति) व बेजीपी की मुशिकले बढ़ा दी है. ऐसे में अब विधान सभा व लोकसभा चुनाव के बाद ही मालूम चलेगा की कांग्रेस व टीडीपी का गंठबंधन कितना सफल रहा. चुनावी समीकरण घाटे-फायेदे की बात करने से पहले तेलंगाना के राजनीतिक व ऐतिहासिक पहलुओं पर एक नजर डाल लें.

ऐसे तो तेलंगाना के नाम के पीछे कई उदाहरण है. मैं ज्यादा उनकी चर्चा नहीं कंरूगा. तेलंगाना का नाम एक हिंदू पौराणिक कथा के अनुसार शिवलिंग के रूप में तीन पहाड़ों कालेश्वर,श्रीसैलन औरा द्वात्रारामा जो त्रिलंगा देश के समीओं के रूप में चिहिंत हुआ. इसे सस्कृत में( त्रिलिंग देश) कहा जाता है. बाद में त्रिलिंगा से तेलिंगा और फिर समय के साथ बदलकर तेलंगाना हो गया.1956 में तेलंगा नवगठित आंध्रप्रदेश का हिस्सा बना था. चालीस के दशक में ही कामरेड वासुपुन्या के नेतृत्व में  कम्युनिष्टों ने पृथक तेलंगाना की मुहिम शुरूआत हुई थी. हालांकि उस समय आंदोलन का मूल उद्देश्या था भूमिहीनों को भूपति बनाना. खैर ऐतिहासिक पहलुओं से जारा हटकर तेलंगाना की मांग व गठन की थोड़ी बहुत चर्चा कर लेते है उसके बाद मूल मूद्दे पर आयेंगे.

1969 में तेलंगाना को अलग करने की मुहिम छात्रों ने शुरूआत की थी. लेकिन आंदोलन में लोगों की भागीदारी ने आंदोलन को ऐतिहासिक बना दिया. उस्मानिया विश्वविद्यालय आंदोलन का केंद्र बना. उस समय एम चेन्ना रेड्डी ने जय तेलंगाना का नारा उछाला था. लेकिन बाद में रेड्डी ने अपने प्रजा राज्यम पार्टी को कांग्रेस में विलय कर दिया. इससे पृथक तेलंगाना आंदोलन की मांग को झटका लगा. इन्दिरा ने एम चेन्ना को आंध्रा का सीएम बना दिया. वहीं 2001 में के चन्द्रशेखर राव ने पृथक तेलंगाना की मांग करते हुए तेलुगु देशम पार्टी छोड़ दी. और अलग पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति का गठन कर दिया. पिछले चार दशकों से चला आ रहा आंदोलन को 2004 में सफलता मिली.  आंध्र प्रदेश से अलग होकर पृथक तेलंगाना राज्य गठन हुआ. बंटवारे के समय तेलंगाना के हिस्से में 10 जिले व 119 विधान सभा व 17 लोकसभा की सीटे मिली थी. हांलाकि कि केसीआर राव की सरकार ने 10 मूल जिलों को पुनगर्ठित कर इसमें 21 नये जिलों का गठन कर दिया. वर्तमान में राज्य में 31 जिले है. राज्य में सबसे अधिक आबादी करीब 84 प्रतिशत हिन्दू 13 फीसदी मुस्लिम व 12 फीसदी में अन्य धर्म व समुदाय के लोग आते है.

अब हम चुनावी गुणा-गणित पर आते है. तेलंगानी किसका साथ देंगे किसका नहीं  यह तो आने वाले चुनाव के परिणाम ही बता पायेंगे. 2014 में केंद्र में बीजेपी की सरकार बनते ही अमीत शाह ने दक्षिण के राज्यों पर फोकस करना शुरू कर दिया है. चुकि 2019 के चुनाव में उतर के राज्यों  में बीजेपी को थोड़ी बहुत जो शिकत मिलेगी. तो उसका डैमेज कंट्रोल दक्षिण के राज्यों किया जा सके. इसी उद्देश्य से अमित शाह व उनकी टीम पूर जोश व खरोश के साथ दक्षिण के राज्यों में अपने-आप को स्थापित करने में लगी है. खैर तेलंगाना की बात हो रही है तो मुझे तेलंगाना पर हीं लौटना चाहिए. बीजेपी तेलंगना में हिन्दू कार्ड खेलकर अपना राजनीतिक वजूद खड़ा करना चाहती है. जैसे अभी हाल ही में बीजेपी के किसी प्रवक्ता ने आरएसएस के संस्थापक हेडगेवार के पूर्वजों का रिश्ता तेलंगाना से जोड़कर बता रहे थे.  जिस वजह से सिकंदराबाद,मलकागिरि, महबूबनगर और निजामाबाद जैसी जगहों पर बीजेपी संघ की मौजूदगी अच्छी है. अभी हाल ही में हैदराबाद में भगवान राम को लेकर विवाद चला था. भाजपा इन्हीं सब बातों को भुना कर तेलंगाना में  अपना राजनीतिक वजूद कायम करना चाहती है. इधर बीजेपी तेलंगाना में अकेले दम पर चुनाव लड़ने का दम तो भरती है. इधर केसीआर के साथ नजदीकी भी बढ़ा रही है. वहीं केसीआर भी समय-समय पर बीजेपी को राष्ट्रीय मुद्दो पर समर्थन कर चुके है. चुकि दोनों का एक ही मकसद है, कांगेस मुक्त तेलंगाना बनाना. इधर केसीआर ने समय से पूर्व इस्तिफा देकर विधानसभा चुनाव में जाने का फैसला ले लिया है. साथ ही दावा भी कर रहे है कि 119 सीटों में से 100 सीटों पर तेलंगाना राष्ट्र समिति की ही जीत  होगी. लेकिन यह डगर अब उतनी आसान नहीं रह गयी है . लगातार कांग्रेस व टीडीपी की नजदीकियां बढ़ रही है. जो केसीआर को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा सकती है. वहीं टीडीपी अपने साथ राज्य में तेलंगाना जन समिति जैसी छोटी पार्टियों को भी अपने पाले में लाने का प्रयास कर रही है. 2014 के चुनाव में टीडीपी व बीजेपी में गठबंधन था. टीडीपी आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायूड की अगुवाई वाली पार्टी है. तेलंगाना 2004 से पहले आंध्रा का ही भाग था. इसलिए तेलंगाना में टीडीपी का प्रभाव रहना स्वाभाविक बात है. टीडीपी अब बीजेपी गठबंधन से बाहर निकल चुकी है. टीडीपी को 2014 के चुनाव में करीब 12 फीसदी वोट हासिल हुआ था. इधर विपक्ष में रहे कांग्रेस को 25 फीसदी वोट मिला था. सूत्रों से जानकारी के हिसाब से करीब-करीब टीडीपी कांग्रेस में अंदरूनी तौर पर गठबंधन हो गया है. जो कि अब केवल गठबंधन का औपचारिक घोषणा करना ही बाकी रह गया है. ऐसे में टीडीपी व कांग्रेस साथ चुनाव लड़ते है तो 37 फीसदी वोट ला सकते है. वहीं केसीआर को 2014 के चुनाव में 34 फीसदी वोट मिला था. कांग्रेस व टीडीपी के साथ आने से इनके वोटों में तीन प्रतिशत की बढ़ोतरी हो जायेगी जो राज्य के सत्ता पर काबिज होने के लिए काफी है. वहीं बीजेपी उसी मुगलाते में है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा उन राज्यों में भी सत्ता में आयी है जहां वह पांरपरिक तौर पर मजबूत नहीं थी. वैसे ही पार्टी तेलंगाना में भी कुछ कमाल कर सकती है. पार्टी अध्यक्ष अमीत शाह व उनकी टीम लगातार तेलंगाना में कैंप कर रही है. लेकिन जमीनी स्तर पर पार्टी कितनी मजबूत हुई है यह तो विधानसभा चुनाव के बाद ही मालूम चलेगा. वैसे केसीआर और भाजपा का एक ही मकसद है कांग्रेस को सत्ता से बाहर रखना. यदि केसीआर की पार्टी व भाजपा में गठबंधन हो जाता है तो केसीआर चुनावी  बैतरनी पार कर सकते है. और भाजपा भी दक्षिण में अपना राजनीतिक वजूद खड़ा करने में कायम हो सकती है . हालांकि केसीआर के सामने टीडीपी व कांग्रेस के गठबंधन के बाद भी काफी मशक्कत करना पड़ेगा. चुकि कांग्रेस व टीडीपी में अभी स्पष्ट नहीं है कि सीएम का उम्मीदवार कौन होगा. केसीआर तेलंगाना के सभी दूसरे दलों भारी पड़ते है. तेलंगानी केसीआर को तेलंगाना आंदोलन से जोड़कर देखते है . वहीं केसीआर का बतौर मुख्यमंत्री रहते हुए कृषि क्षेत्र में किये गये कामों की प्रशंसा विपक्षी दल भी करते है. ऐसे में भाजपा टीडीपी व कांग्रेस के पास घोषणओं के अलावा कुछ नहीं है. अब तेलंगाना का निजाम कौन होगा यह तो चुनाव बाद ही तय होगा. लेकिन टीडीपी व कांग्रेस गठबंधन एक प्रयोग के तौर पर सफल भी हो सकता है. सबसे अधिक किसी को झटका लगने की उम्मीद है तो वह भाजपा को. भाजपा को तय करना कि तेलंगाना के इन राजनीतिक समीकरणों से कैसे निपटे.

 

 

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