राजनीतिक दल वचन भंग के दोषी क्यों नहीं 

उदय भगत

भारत की राजनीति सचमुच एक अजूबाघर है । इसमें नेताओं के लिए कोई दूसरा कानून होता है तो जनसाधारण के लिए दूसरा कानून होता है । एक की नैतिकता की कसौटी कुछ और होती है तो दूसरे की नैतिकता की कसौटी कुछ और होती है ।जनता के लोग परस्पर कोई लेनदेन करें और उसमें वचन भंग कर दें , किसी संविदा को भंग कर दें , तो उन पर कानून अपना शिकंजा कस लेता है । उन्हें जेल की हवा खानी पड़ सकती है। इसी प्रकार साधारण व्यक्ति का नैतिक और व्यक्तिगत चरित्र भी देखा जाता है , परंतु यह नियम या सिद्धांत जनसाधारण पर लागू होता है । सार्वजनिक जीवन में रहने वाले नेताओं पर यह सिद्धांत लागू नहीं होता। वहां नेताओं के लिए यह मान्यता प्रचारित व प्रसारित कर दी गई है कि व्यक्ति का व्यक्तिगत चरित्र अलग होता है और उसका सर्वजनिक चरित्र अलग होता है , इसलिए नेता हर जगह से बचकर निकलने के लिए अपने रास्ते बनाए हुए हैं ।
भारत में राजनीतिक दल अपनी ओर से हर चुनाव में अपना घोषणा पत्र जारी करते हैं ।जिसमें वह स्पष्ट करते हैं कि यदि उनकी सरकार आती है तो वह जनहित में लोकतंत्र की गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए जन कल्याण के अमुक – अमुक कार्य करेंगे और यदि वह सत्ता में आते हैं तो अमुक – अमुक प्रकार से लोगों की सेवा करते हुए देश को विकास और उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ाएंगे । यह इस प्रकार की घोषणा सचमुच एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है और उसका एक अंग है। ऐसा होना भी चाहिए और यह बताया भी जाना चाहिए कि यदि मैं सत्ता में आता हूं तो जनहित में अमुक अमुक कार्य करूंगा और देश को इस इस प्रकार से आगे बढ़ाने का प्रयास करूंगा , परंतु इस पर हमें आपत्ति उस समय हो जाती है जब हम देखते हैं कि राजनीतिक दल अपने निजी स्वार्थ के लिए या सत्ता प्राप्ति के लिए इतनी – इतनी बड़ी – बड़ी घोषणा कर जाते हैं , जिन्हें उनके द्वारा पूरा किया जाना संभव ही नहीं है ।वह अनंत काल के लिए घोषणा करते जान पड़ते हैं ना कि पंचवर्षीय योजना के लिए । कई राजनीतिक दलों ने ऐसी घोषणाएं की हैं और करते रहे हैं या कर रहे हैं कि वह कभी पूरी होने वाली नहीं है। इनको देखकर ऐसा लगता है कि इन पर कोई ना कोई कानूनी कार्यवाही अवश्य होनी चाहिए । इनके घोषणा पत्र को राजनीतिक वचन पत्र बताया जाना चाहिए और इसी प्रकार उसको लिया भी जाना चाहिए ।घोषणा इतना हलका शब्द कर दिया गया है कि इसे अब कोई भी व्यक्ति देश में गंभीरता से नहीं लेता ।
राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्रों को अधिक गंभीरता से न लेने का परिणाम यह निकला है कि नेता भी अपने आप में जो चाहे सो बोल जाते हैं । वे स्वयं को बेलगाम मानते हैं और सोचते हैं कि जनता की स्मृति बहुत ही दुर्बल होती है ।अगले चुनाव तक वह सब कुछ भूल जाएगी और जो घोषणाएं उसने की हैं उन पर अधिक ध्यान न देगी । इसका स्वभाविक परिणाम यह निकला है कि राजनीति में हल्के , झूठे और मक्कार लोग प्रवेश करने में सफल हो रहे हैं । राजनीतिक लोग यह समझते हैं कि जैसे भी हो , जिस प्रकार भी हो , सत्ता प्राप्त की जाए या सीट निकाली जाए और सत्तासीन होकर जनता पर शासन किया जाए ,इतना ही पर्याप्त है । इस प्रकार से भारत की राजनीति में चुनावी घोषणा पत्रों का कोई अधिक महत्व नहीं रह गया है । जबकि चुनावी घोषणा पत्रों का लोकतंत्र में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है ।
चोर उचक्के या निम्न स्तर के लोग जब राजनीति में आ जाते हैं तो राजनीतिक और लोकतांत्रिक क्षेत्र में जिन मानदंडों और मूल्यों की अपेक्षा उनसे की जाती है , उन्हें निभा नहीं पाते हैं । जिससे लोगों का राजनीति और राजनीतिक दलों से विश्वास भंग हो जाता है । देश में राजनीतिक विश्वसनीयता का संकट उत्पन्न हो जाता है और देश ना चाहते हुए भी अराजकता की स्थिति में पहुंच जाता है।
इस संदर्भ में हमें बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर जी के जीवन से भी कुछ शिक्षा लेनी चाहिए । उन्हें कुछ लोगों ने उनके जीवनकाल में ही भारतीय संविधान का निर्माता कहकर पुकारना आरंभ कर दिया था । जिससे वह स्वयं भी आहत होते थे । उन्होंने 2 सितंबर 1953 को राज्यसभा में कहा था — “श्रीमान जी मेरे मित्र मुझसे कहते हैं कि मैंने संविधान बनाया है , पर मैं यह कहने के लिए पूरी तरह तैयार हूं कि इसे जलाने वाला मैं पहला व्यक्ति हूंगा , मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है ।यह किसी के लिए भी अच्छा नहीं है। ”
इसका अभिप्राय है कि संविधान के क्रियान्वयन पर या संविधान के उन छिद्रों पर बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर को भी संदेह होने लगा था जो इस देश की शासन व्यवस्था को आगे चलकर या उसी समय किसी ना किसी प्रकार से प्रभावित कर रहे थे या करने वाले थे । वह सोचने लगे थे कि देश के संविधान का जिस प्रकार क्रियान्वयन हो रहा है वह भविष्य के लिए किसी भी प्रकार से उपयुक्त नहीं कहा जा सकता । जिन भावनाओं से या जिन आशा और अपेक्षाओं से देश के संविधान का निर्माण देश के संविधान निर्माताओं ने किया था , उस पर यह संविधान बहुत शीघ्र ही खरा नहीं उतर कर किसी विपरीत दिशा में जाने लगा था । जिससे बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर भी खिन्न औऱ क्षब्ध थे । उन्होंने अपनी खिन्नता और क्षुब्धता को लगभग 2 वर्ष पश्चात राज्यसभा में ही स्पष्ट किया था।
19 मार्च 1955 को राज्यसभा सदस्य डॉ अनूप सिंह ने डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के उक्त कथन को एक बार फिर उठाया । चौथे संवैधानिक संशोधन पर चर्चा के समय उन्होंने डॉ अंबेडकर को स्मरण कराया कि आप ने संविधान को जलाने की बात कही थी । ऐसा आपने क्यों कहा था ? कृपया इसका उत्तर दीजिए । इस पर बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी ने कहा था —- ” मेरे मित्र ने कहा है कि मैंने कहा था कि मैं संविधान को जलाना चाहता हूं । पिछली बार मैंने जल्दी में इसका कारण नहीं बताया था । आज जब मेरे मित्र ने मुझे अवसर दिया है तो मुझे उसका कारण बताना ही चाहिए । कारण यह है कि हमने भगवान के रहने के लिए एक मंदिर बनाया था , पर इससे पहले कि भगवान इसमें आकर रहते , एक राक्षस आकर उस में रहने लगा । अब उस मंदिर को तोड़ देने के अतिरिक्त चारा ही क्या है ? हमने इसे असुरों के रहने के लिए तो बनाया नहीं था । हमने इसे देवताओं के लिए बनाया था । इसीलिए मैंने कहा था कि मैं इसे जलाना चाहता हूं।”
बात स्पष्ट है कि जिस मंदिर का निर्माण हमारे संविधान निर्माताओं ने और बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर जी जैसे लोगों ने किया था – उसका कहीं ना कहीं अपहरण हो गया । बाबासाहेब ने यह बात किस प्रसंग में कैसे और किस प्रकार कहीं होगी – इस पर तो हमें नहीं पता , परंतु इतना तो स्पष्ट हो ही गया कि सारी राजनीतिक व्यवस्था को असुरों ने अपने नियंत्रण में ले लिया है। कदाचित इसी के लक्षणों को समझकर बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का हृदय उस समय चीत्कार कर उठा था ,जब उन्होंने संविधान को जलाने की बात की थी । वह समझ गए थे कि इसका क्रियान्वयन उन अपवित्र हाथों के माध्यम से हो रहा है जो इसे अपवित्रता की ओर ले जा रहे हैं और इसकी दिशा को परिवर्तित करने का सफल प्रयास कर रहे हैं । यदि डॉ भीमराव अंबेडकर जी की पीड़ा को उसी समय समय रहते समझा गया होता और संविधान के क्रियान्वयन की दिशा को सही दिशा मे परिवर्तित करने का उचित प्रयास किया गया होता तो आज हम जिस दलदल में आकर फँसकर खड़े हो गए हैं , संभवत: उसमें न पहुंचे होते ।आज राजनीतिक लोगों का और राजनीतिक दलों का विश्वास जनसाधारण में नहीं है । लोकतंत्र के लिए यह बहुत भारी अपशकुन है कि राजनीतिक लोगों का विश्वास जनसाधारण के बीच समाप्त हो जाए । यह इसीलिए हुआ है कि राजनीतिक दल अपने चुनावी घोषणा पत्रों में पूरी न होने वाली घोषणाओं को कर देते हैं और ऐसा स्पष्ट प्रयास करते हैं कि उनका लक्ष्य केवल और केवल सत्ता प्राप्ति है , जनकल्याण नहीं।
अब इसी बात को लेकर कनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने चुनावी घोषणा पत्र की पवित्रता पर प्रश्न उठाते हुए 29 अक्टूबर 2018 को मुख्य निर्वाचन आयुक्त श्री ओ0पी0 रावत को पत्र भेजा है । जिसमें राजनीतिक दलों की अपने चुनावी घोषणा पत्रों के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की है । कनफेडरेशन आफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स का कहना है कि राजनीतिक दल चुनावी घोषणापत्र में बड़े-बड़े और पूरे न होने वाले वायदे तो करते हैं , पर चुनाव होते ही अपने घोषणा पत्र को और अपने वायदों को भूल जाते हैं । अतः चुनाव आयोग राजनीतिक दलों को निर्देश जारी करें कि चुनावी घोषणा पत्र में केवल उन्हीं मुद्दों या वायदों को सम्मिलित किया जाए जिन को पूरा करने में वे सक्षम हो । यह चुनावी घोषणा पत्र केवल मतदाताओं को लुभाने के लिए जारी किए जाते हैं और चुनाव उपरांत रद्दी की टोकरी में फेंक दिए जाते हैं।
हम कनफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के द्वारा उठाई गई उपरोक्त मांग से पूर्णतया सहमत हैं । वास्तव में ही इस समय राजनीतिक दलों पर शिकंजा कसने का समय आ गया है। चुनाव आयोग को इस पर संज्ञान लेना चाहिए । राजनीतिक दल अपने घोषणापत्र को अपनी नीतियों की घोषणा तक सीमित रखें कि यदि हम सत्ता में आते हैं तो अमुक अमुक प्रकार से जन कल्याण और देश उत्थान के काम हम करेंगे । राजनीतिक दल अपनी सीमाओं को लांघते हुए मतदाताओं को उस समय रिश्वत देने का प्रयास करते हैं जब कोई भी दल कहीं किसी भी प्रान्त में किसानों के ऋण माफ करने की बात करता है या किसी भी प्रकार से लैपटॉप देने या टीवी सेट देने या कोई और चीज देकर लोगों को खरीदने की बात करता है । निश्चित रूप से इस क्षेत्र में कुछ सुधार किए गए हैं , परंतु अभी बहुत कुछ किए जाने की संभावना है।
हमारे देश में एक और भी राजनीतिक कुसंस्कार राजनीति के क्षेत्र में पांव फैलाता जा रहा है और वह यह है कि सामान्यतया लोग उसी राजनीतिक दल के चुनावी घोषणा पत्र की चर्चा करते हैं या उसी पर ध्यान देते हैं जो सत्तासीन होता है । विपक्ष में बैठने वाले राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है । यहां तक कि विपक्ष में बैठने वाले राजनीतिक दल भी अपने आप को इस प्रकार दिखाते हैं अथवा प्रस्तुत करते हैं कि जैसे अब उनके ऊपर तो कोई जिम्मेदारी है ही नहीं अब उन्हें अपने चुनावी घोषणा पत्र से भी मुक्ति मिल गई है और वह जैसे चाहे जो चाहे वैसा उच्छृंखल व्यवहार करने के लिए स्वतंत्र हैं । यह प्रवृत्ति भी देश के लिए घातक है । जितनी जिम्मेदारी राजनीति में सत्तासीन दल की है उतनी ही जिम्मेदारी विपक्ष में बैठने वाले दल की भी है – इस बात को लोकतंत्र में बहुत गंभीरता से लिया जाना चाहिए। इसलिए कोई भी दल जो किसी भी प्रकार से किसी विधानमंडल में या देश की संसद में अपनी एक दो सीट तक भी प्राप्त करने में सफल होता है, वह भी अपनी राजनीतिक जिम्मेदारी की गंभीरता के प्रति उदासीन नहीं हो सकता , ऐसा प्रयास हमें करना चाहिए।
हमारे देश में जो दल विपक्ष में बैठ जाता है वह अपने कर्तव्य और संवैधानिक दायित्वों को भी भूल जाता है। वह सोचता है कि सत्ता पक्ष की टांग खींचना और उसे पटक कर सत्तासीन होने की युक्तियां खोजना ही अब उसका एकमात्र कार्य है। अतः हर राजनीतिक दल को इस बात के लिए चुनाव पूर्व अपने घोषणापत्र में जनता को वचन देना चाहिए कि यदि उसे विपक्ष में बैठना पड़ा तो वह राष्ट्रहित में ही कार्य करेगा और सत्ता पक्ष को आवश्यकता पड़ने पर सहयोग भी करेगा । यह प्रत्येक राजनीतिक दल के लिए अनिवार्य किया जाना चाहिए कि यदि वह सत्ता में नहीं आता है तो विपक्ष में बैठकर वह कैसा आचरण करेगा ? – इसे भी वह चुनाव पूर्व अपने अगले 5 वर्ष के लिए जनता से वचन देने के रूप में स्पष्ट करके चले तो अच्छा रहेगा । याद रहे कि संसद सत्ता पक्ष के लिए ही नहीं बनी है और ना ही सत्ता पक्ष से ही बनती है । संसद यदि सर्वोपरि है तो वह राज्यसभा लोकसभा और राष्ट्रपति इन तीनों से मिलकर बनती है और उसकी गरिमा तभी बनती है जब प्रत्येक सदस्य अपने कर्तव्य और दायित्व के प्रति गंभीर हो । यदि ऐसी भावना और ऐसा विचार हमारे राजनीतिक दलों में और संसद के सदस्यों में नहीं है तो इससे संसद की गरिमा भंग होती है और देश में अराजकता पांव फैला सकती है।
वास्तव में चुनावी घोषणा पत्र किसी भी राजनीतिक दल की वह संकल्पाभिव्यक्ति है जिसे वह देशोत्थान और जनकल्याण के प्रति समर्पित होकर अपने देशवासियों से करता है और उन्हें विश्वास दिलाता है कि यदि वह सत्ता में आया तो अपनी इस संकल्पाभिव्यक्ति को मूर्त रूप दे कर ही दम लेगा । अपनी संकल्पाभिव्यक्ति की एवज में ऐसा प्रत्येक राजनीतिक दल देशवासियों से उनका मत प्राप्त करने की अपील करता है ।
मत की प्राप्ति के लिए हमारा मानना है कि इसका मूल्य किसी प्रकार की रिश्वत ना होकर इसके विपरीत देश – उत्थान और जनकल्याण की अपनी नीतियों में देशवासियों के मत की अभिव्यक्ति हो । इस प्रकार चुनावी घोषणापत्र जहां राजनीतिक दलों की संकल्पाभिव्यक्ति हैं वही देश के मतदाता जब उस घोषणापत्र को स्वीकार कर लेते हैं या नकार देते हैं तो उनकी यह स्वीकृति या नकारने की प्रकृति उनकी विकल्पाभिव्यक्ति है ।मानो वे कह रहे हों कि हां हम तुम्हें अपने ऊपर शासन करने का सर्वोत्तम विकल्प स्वीकार करते हैं या नहीं करते हैं । इस संकल्पाभिव्यक्ति और विकल्पाभिव्यक्ति से जो तीसरा सुर निकलता है वह राष्ट्र निर्माण का है । राष्ट्र निर्माण में यदि कहीं किसी प्रकार का प्रमाद रह गया अर्थात संकल्पाभिव्यक्ति मद्धम पड़ गई या विकल्पाभिव्यक्ति ने उचित विकल्प ढूंढने में असावधानी बरती तो राष्ट्र निर्माण का कार्य अवरुद्ध हो जायेगा या रुक जायेगा या कहिए कि बाधित हो जाएगा या उसकी दिशा विपरीत हो जाएगी , इसलिए राष्ट्र निर्माण के महत्वपूर्ण कार्य में संकल्पाभिव्यक्ति और विकल्पाभिव्यक्ति की दोनों धाराओं को मिलकर काम करना चाहिए ।यह दोनों गंगा ,जमुना जब एक साथ मिलकर आगे बढ़ती हैं तो उसके सुंदर परिणाम निकलते हैं । इसी संकल्पाभिव्यक्ति और विकल्पाभिव्यक्ति से उदभूत होने वाले राष्ट्र निर्माण को ही राष्ट्र की त्रिवेणी कहा जा सकता है । त्रिवेणी अर्थात गंगा – जमुना – सरस्वती की त्रिवेणी । इसी को सत्यम शिवम सुंदरम की अभिव्यक्ति का जा सकता है। भारत में चुनावी घोषणा पत्रों को इसी त्रिवेणी के सत्यम शिवम सुंदरम जैसी पवित्र ऊंचाई देने का कार्य करने की आवश्यकता है । अच्छा हो कि भारत का चुनाव आयोग इस ओर समय रहते ध्यान दें और हमारे राजनीतिक दल जिस प्रकार जनता को भ्रमित कर अपने शिकंजे में कसने का अनुचित व अलोकतांत्रिक प्रयास कर रहे हैं उससे उन्हें निषिद्ध किया जाए । इसके लिए जैसे भी कानून बनाने की आवश्यकता हो , वैसे बनाए जाएं ,तभी राष्ट्र सही दिशा में आगे बढ़ सकता है।

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