राम मंदिर पर सुनवाई का रास्ता खुला

प्रमोद भार्गव
अयोध्या के राम मंदिर विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ही 1994 के फैसले को यथावत रखते हुए इस मामले की सुनवाई में आ रही बाधा को दूर कर दिया है। अब न्यायालय केवल विवादित भूमि के मालिकाना हक का निपटारा करेगी। दरअसल 1994 में इस्माल फारुकी प्रकरण में  शीर्ष  न्यायालय ने फैसला दिया था कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है। फारूकी के वकील राजीव धवन ने मस्जिद में नमाज पढ़ने के अधिकार को बहाल करने की मांग की थी। किंतु अदालत ने 1994 के फैसले को बहाल रखने के साथ इस मामले की सुनवाई 5 सदस्यीय खंडपीठ में भेजने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने जब 5 दिसंबर 2017 को इस विवाद की सुनवाई नियमित शुरू करने का निर्णय लिया, तब मुस्लिम पक्षकार फारुकी ने इस मुद्दे को लटकाने के लिए यह बहाना ढूंढ लिया था। जबकि अदालत इस मुद्दे की सुनवाई में मुख्य बिंदु जमीनी विवाद मान रही है। दरअसल 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि ढांचे की तीन गुबंदों में बीच का हिस्सा हिंदुओं का होगा, दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़ा का और बांकी एक तिहाई भूमि सुन्नी वक्फ बोर्ड की होगी। इस फैसले से विवाद से जुड़े सभी पक्ष असंतुष्ट  थे, लिहाजा पक्षकारों ने ऊपरी अदालत में चुनौती पेश  कर दी थी। 9 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए यथास्थिति को बहाल कर दिया था। तब से अब इस मामले में जमीनी हक का निराकरण होने की उम्मीद बढ़ती लग रही है।
भगवान राम के जन्मस्थल से जुड़ा हुआ यह विवाद एक ऐसा प्रकरण है, जिसने भारतीय समाज और उसकी मानसिकता को उद्वेविलत किया हुआ है। इस दृष्टि से मामले की संवेदनशीलता का अनुभव न्यायपालिका ने हरेक मुद्दे पर किया है। मुख्य न्यायाधीश  दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली 3 सदस्यीय पीठ ने यह फैसला दो-एक के बहुमत से दिया है। तीसरे न्यायामूर्ती एसए नजीर ने जरूर कहा है कि मस्जिद इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है, गोया इस विशय में धार्मिक आस्था को भी रेखांकित करना चाहिए। हालांकि नजीर खुद कानूनविद् होने के साथ शीर्ष  न्यायालय के न्यायाधीश भी हैं। अलबत्ता वे जानते ही होंगे की अदालत आस्था या भावना की बजाय तथ्य और साक्ष्यों के आधार पर फैसला सुनाती हैं। इस लिहाज से इस मामले के पहलू को धर्म, आस्था और भावना की दृष्टि से देखना कतई उचित नहीं है। वैसे भी भारत एक बहुधर्मी और बहुसांस्कृतिक देश  होते हुए भी संवैधानिक रूप से एक धर्मनिरपेक्ष देश है, इसलिए आस्था और धार्मिक भावनाओं को उभारना न्यायसंगत नहीं है।
पिछले 70 साल से यह विवाद विभिन्न अदालतों से होता हुआ शीर्ष  न्यायालय की दहलीज पर आकर ठिठक गया था, जो अब आगे बढ़ता नजर आ रहा है। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए आयोध्या में विवादित ढांचे में स्थित राम मंदिर का ताला खोलने की अनुमति स्थानीय अदालत ने दी थी। इसके बाद विश्व हिंदू परिषद और बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति के बीच शुरू हुए विवाद का दुखद अंत इस ढांचे को ढहाए जाने की परिणति के रूप में सामने आया। 2010 में हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक साक्ष्यों व रडार तकनीक से जुटाए गए सबूतों के आधार पर विवादित स्थल के नीचे मंदिर के अवशेष  होना पाया। इस आधार पर विवादित 840 वर्ग फीट भूमि का स्वामित्व मंदिर के पक्षकारों का माना, लेकिन 3 सदस्यीय न्यायमूर्तियों की पीठ में से एक ने दोनों समुदायों के बीच समरस्ता बनाए रखने की पैरवी करते हुए 280 वर्ग फीट भूमि इस्लाम धर्मावलंबियों को देने का आदेश  दिया। नतीजतन मालिकाना हक की अस्पष्टता  के चलते पक्षकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। तब से मामला लंबित है।
अयोध्या विवाद देश  के हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच लंबे समय से तनाव का कारण बना हुआ है। इस मुद्दे ने देश  की राजनीति को भी प्रभावित किया है। विश्व हिंदू परिषद अयोध्या में उस विवादित स्थल पर मंदिर बनाना चाहती है, जहां पहले एक कथित रूप से मस्जिद थी। जबकि मुस्लिमों का पक्ष है कि यहां मंदिर होने के कोई साक्ष्य नहीं हैं। यह स्थान 1528 से मस्जिद है और 6 दिसंबर 1992 तक इसका उपयोग मस्जिद के रूप में होता आया है। हालांकि पुरातत्वीय साक्ष्यों और लोक साहित्य से यह प्रमाणित होता है कि 1528 में एक ऐसे स्थल पर हिंदुओं को अपमानित करने की दृष्टि से मस्जिद का निर्माण कराया गया, जहां भगवान राम की जन्मस्थली थी। 1528 में मुगल बादशाह बाबर ने यह मस्जिद बनवाई थी। इस कारण इसे बावरी मस्जिद कहा जाता है। 1853 में पहली बार इस स्थल को लेकर हिंदू और मुस्लिम समुदायों में सांप्रदायिक झड़प हुई थी। 1859 में चालाकी बरतते हुए ब्रिटिश  शासकों ने विवादित स्थल पर रोक लगा दी और विवादित परिसर क्षेत्र में दो हिस्से करके हिंदुओं और मुस्लिमों को प्रार्थना करने की अनुमति दे दी।
आजादी के बाद 1949 में मस्जिद में भगवान राम की मूर्तियां पाई गई। एकाएक इन मूर्तियों के प्रकट होने पर मुस्लिमों ने विरोध जताया। दोनों पक्षों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। नतीजतन सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित  कर ताला डाल दिया और दोनों संप्रदाओं के प्रवेश  पर रोक लगा दी। 1984 में विहिप ने भगवान राम के जन्मस्थल को मुक्त करके वहां राम मंदिर का निर्माण करने के लिए एक समिति का गठन किया। इस अभियान का नेतृत्व भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने संभाला। 1986 में जब केंद्र में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार थी, तब फैजाबाद के तत्कालीन कलेक्टर ने हिंदुओं को पूजा के लिए विवादित ढांचे के ताले खोल दिए। इसके परिणामस्वरूप मुस्लिमों ने बावरी मस्सिद संघर्ष  समिति बना ली। 1989 में राम मंदिर निर्माण के लिए विहिप ने अभियान तेज किया और विवादित स्थल के नजदीक मंदिर की नींव रख दी। 1990 में विहिप के कार्यकर्ताओं ने विवादित ढांचे को क्षति पहुंचाने की कोशिश  की, लेकिन तबके प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने बातचीत से मामला सुलझाने की कोशिश  की, किंतु कोई हल नहीं निकला। अततः 1992 में भाजपा, विहिप और शिवसेना के कार्यकर्ताओं ने 6 दिसंबर को विवादित ढांचे को ढहा दिया। इस समय केंद्र में कांग्रेस के पीवी नरसिंहराव प्रधानमंत्री थे।
हालांकि पुरातत्वीय साक्ष्यों, निर्मोही अखाडे़ और गोपाल सिंह विशारद द्वारा मंदिर के पक्ष में जो सबूत और शिलालेख अदालत में पेश किए गए थे, उनसे यह स्थापित हो रहा था कि विध्वंस ढांचे से पहले उस स्थान पर राममंदिर था। जिसे आक्रमणकारी बाबर ने हिन्दुओं को अपमानित करने की दृष्टि से शिया मुसलमान मीर बांकी को मंदिर तोड़कर मस्जिद बनवाने का हुक्म दिया था। मस्जिद के निर्माण में चूंकि शिया मुसलमान मीर बांकी के हाथ लगे थे, इस कारण इस्लामिक कानून के मुताबिक यह शिया मुसलमानों की धरोहर थी। इसकी व्यवस्था संचालन के लिए शिया ‘मुतवल्ली’ की भी तैनाती बाबर के ही समय से चली आ रही थी। उत्तराधिकारी के रूप में जिस मुतवल्ली की तैनाती थी, उस व्यक्ति ने हिन्दू संगठनों से मिलकर बाबरी ढांचे को विवादित परिसर से बाहर ले जाकर स्थापित करने में सहमति भी जता दी थी। मालिकाना हक भी इसी मुतवल्ली का था। लेकिन सुन्नी वक्फ बोर्ड ने ऐसा नहीं होने दिया और मामला कचहरी की जद में बना रहा। इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में राम की दिव्यता और उनके प्रति आस्था का जिक्र भले ही था, लेकिन तीनों विद्वान न्यायाधीशों ने आखिरकार जनभावनाओं और आस्था को दरकिनार करते हुए फैसले का आधार पुरातत्वीय सर्वेक्षण की रिपोर्ट और साक्ष्यों को ही माना था।
सर्वोच्च न्यायालय में अपील किए जाने के बाद अदालत ने यथास्थिति बनाए रखने का फैसला दिया था। दरअसल, विवादित भूमि 2.77 एकड़ के एक हिस्से पर इस्लाम के दावे को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा मंजूर किए जाने से जो मतांतर सामने आया था, वह असंतोष व शीर्ष न्यायालय में अपील का प्रमुख आधार था। इसी बिना पर स्थगन देते हुए न्यायमूर्ति आफताब आलम और आरएम लोढ़ा की संयुक्त पीठ ने कहा था कि किसी भी पक्ष ने जब विवादित भूमि बंटवारे की मांग नहीं की थी, फिर यह अजीब व चकित कर देने वाला हाईकोर्ट ने आदेश क्यों दिया ? जबकि फैसला भूमि के मालिकाना हक पर केंद्रित रहना था। इस वजह से इस फैसले को एक नया आयाम मिला और यह विचित्रता की श्रेणी में आ गया। हालांकि न्यायाधीश धर्मवीर शर्मा ने जरूर संपूर्ण विवादित भूमि हिन्दुओं को सौंपने का फैसला दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने स्थगन देते समय विवादित भूमि के अह्म पहलू को रेखांकित कर यह जाहिर कर दिया था कि अब जो फैसला आएगा वह भूमि के मालिकाना हक को तय करते हुए, एक सर्वमान्य फैसला होगा और भूमि का बंटवारा संप्रदायों के अनुसार नहीं होगा।
विवादित परिसर ढांचे से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह था कि किसी मंदिर अथवा धार्मिक स्थल को तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाई गई थी अथवा नहीं ? इसे हाईकोर्ट के फैसले का संयोग कहिए या विलक्षणता कि तीनों न्यायमूर्तियों ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट व जुटाये साक्ष्यों के आधार पर निर्विवाद रूप से यह माना है कि राम के बाल रूप में जिस स्थल पर राम की मूर्ति स्थापित है, वही स्थल रामजन्म भूमि है। विवादित ढांचे के विध्वंस के बाद बाबरी संघर्ष समिति की भी यही प्रमुख मांग थी कि पहले यह तय किया जाए कि यही स्थल रामजन्म भूमि है। यह भी सुनिश्चित हो कि बाबरी मस्जिद के वजूद में आने से पहले यहां कोई मंदिर था और यह भी तय किया जाए मस्जिद निर्माण के लिए मंदिर तोड़ा गया था ?
बाद में इस सर्वेक्षण की जिम्मेबारी एएसआई को सौंपी गई। इसने विवादित रामजन्म भूमि, बाबरी मिस्जद. परिसर के नीचे उत्खनन का कार्य कराया और 5 अगस्त 2003 को खुदाई की 574 पन्ने की रिपोर्ट न्यायालय को सौंप दी। इस खुदाई में जो पुरातत्वीय साक्ष्य मिले उनसे तय हुआ कि तोड़े गए ढांचे के नीचे ग्यारहवीं सदी के हिन्दुओं के धार्मिक स्थल से जुड़े साक्ष्य बड़ी संख्या में मौजूद हैं। अनेक शिलालेख और भगवान शंकर की मूर्ति मिलने के सबूत भी न्यायालय में पेश किए गए। परिसर का राडार सर्वेक्षण भी कराया गया। इसी से तय हुआ कि ढांचे के नीचे एक और ढांचा है। इन्हीं साक्ष्यों के बूते हाईकोर्ट के तीनों न्यायमूर्तियों ने बहुमत से माना कि विवादित स्थल का केंद्रीय स्थल रामजन्म भूमि है। बहरहाल इस मामले के निराकरण का रास्ता खुलता दिख रहा है।

 

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