लेखक परिचय

दानसिंह देवांगन

दानसिंह देवांगन

बीएससी गणित, एमएम भाषा विज्ञान में गोल्ड मेडेलिस्ट और बीजेएमसी तक आपकी शिक्षा हुई है। विगत दस सालों से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं। जनसत्ता, दैनिक भास्कर, देशबंधु, नवभारत और जनमत टीवी से काफी समय तक जुड़े रहे। छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद पर बेबाकी से राय देने के लिए जाने जाते हैं। संप्रति आप दैनिक स्वदेश, रायपुर के संपादक हैं।

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– 72 दिन तक हिंसा नहीं करने का प्रस्ताव

रायपुर। केंद्र और राय सरकार द्वारा चलाए जा रहे संयुक्त अभियान से नक्सलियों में हाहाकार मच गया है। यही वजह है कि उन्होंने 72 दिन तक हिंसा नहीं करने का प्रस्ताव दिया है। युद्ध विराम 25 फरवरी से लागू होगा। उन्होंने बुद्धिजीवियों से बातचीत की पहल करने के साथ-साथ केंद्र सरकार से आपरेशन ग्रीन हंट तत्काल बंद करने की मांग भी की है। पी चिदम्बरम के गृहमंत्री बनने के बाद यह पहला मौका है, जब नक्सलियों ने शांति वार्ता का प्रस्ताव दिया है। नई परिस्थितियों में अब केंद्र सरकार नए सिरे से रणनीति बनाने में जुट गई है।

गौरतलब है कि श्री चिदम्बरम ने गृहमंत्री बनते ही नक्सलियों पर सिकंजा कसना शुरू कर दिया था। करीब एक साल में उन्होंने न सिर्फ केंद्र और रायों के बीच समन्वय बनाने में सफलता हासिल की, बल्कि दलगत राजनीति से उपर उठकर प्रभावित रायों में जरूरत के मुताबिक केंद्रीय बल भी मुहैया कराया। नई रणनीति के तहत चारों ओर से नक्सलियों को घेरा जा रहा है। इससे नक्सली संगठनों ने बौखलाकर आम जनता को मारना शुरू कर दिया था। इसका परिणाम उलटा हुआ और आम जनता के बीच जो घुसपैठ थी, वह कम होने लगी। इसी का फायदा उठाकर सरकार ने अपना अभियान तेज कर दिया। अब नक्सलियों के सामने मरने या समर्पण करने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिख रहा है। यही वजह है कि कल तक सरकार को झुकाने की बात करने वाले नक्सली अब स्वमेय 72 दिन तक हिंसा नहीं करने का प्रस्ताव देने लगे हैं।

नक्सलियों की ओर से किशनजी ने यह प्रस्ताव रखा है। किशनजी नक्सली संगठन के सर्वोच्च कंमाडर माने जाते हैं। बताया जाता है कि हाल में हुए सभी नक्सली घटनाएं किशनजी के दिशा निर्देश पर ही किए गए। नए प्रस्ताव भी किशनजी की ओर से ही आए हैं, इसलिए केंद्र सरकार समेत देशभर के सभी बुध्दिजीवियों ने गंभीरता से लिया है। लेकिन इसमें भी एक पेंच है। आखिर माहभर पहले केंद्र सरकार की गोलियों का जवाब गोलियों से देने का ऐलान करने वाले नक्सली आखिर युध्द विराम की बात कैसे कर रहे हैं। इसके दो ही अर्थ निकाले जा सकते हैं, या तो नक्सली सचमुच में आपरेशन ग्रीन हंट से टूट चुके हैं और बातचीत से कोई हल निकालना चाहते हैं या फिर उनकी कोई गुप्त चाल है ताकि वार्ता की आड़ में आपरेशन ग्रीन हंट बंद हो जाए और उन्हें फिर से खोई जमीन तलाशने का मौका मिल जाए। केंद्र सरकार को नए सिरे से रणनीति बनाने समय दोनों ही विकल्पों पर विचार करना होगा। ताकि भविष्य में सरकार को पछताना न पड़े।

-दानसिंह देवांगन

3 Responses to “आपरेशन ग्रीन हंट से टूटे नक्सली”

  1. bhawana dewangan

    दान सिंह जी मैं आपसे सहमत नही हु, क्योंकि किसी बीमार हो मरकर बीमारी को ख़त्म नही किया जा सकता….

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  2. दानसिंह देवांगन

    daan singh dewangan

    नक्सलियों का खात्मा सिर्फ उन्हें मारकर ही किया जा सकता है

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  3. गोपाल सामंतो

    gopal samanto

    वाह ! दान सिंह जी आपने अच्चा प्रयास किया है ….पर मुझे लगता है जब तक सरकारे नक्साल्वाद के तह में छुपे उसके कारणों को नहीं ढूंड पायेगी तब तक शायद ये सारे प्रयास निरर्थक ही रहेंगे ….आज कुछ नक्सली मारे जायेगे तो कुछ दिन बाद एक नयी पौध उनकी खरी हो जाएगी …..क्योंकि कुप्रशासन और लालफितासाही ही नक्साल्वाद को जन्म देती है .

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