More
    Homeराजनीतिविकल्प

    विकल्प

                                                      2014 लोकसभा चुनाव मे भाजपा को अभूतपूर्व सफलता मिली थी,अच्छे दिनो की आशा मे जब ये उम्मीद टूटी, तो उपचुनावों मे जनता का झुकाव कांग्रेस की तरफ़ हो गया, जिसे कुछ महीने पहले ही जनता ने हाशिये पर खड़ा कर दिया था।जनता कांग्रेस के कार्यकाल के सारे हज़ारों करोड़ रुपयों के घोटाले भूलने लगी या कोई उचित विकल्प नहीं मिला! वैसे कांग्रेस और भाजपा एक ही सिक्के के दो पहलू है। कांग्रेस धर्मनिर्पेक्षता के नाम पर मुस्लिम तुष्टिकरण करती रही है, भले ही उससे मुसलमनो को कोई लाभ न मिला हो। भाजपा संघ के निर्देश पर हिन्दुत्व का नारा लगाती है, उसके नेता हिन्दूराष्ट्र की मांग करते हैं, मोदी जी, ऐसी बातों पर कोई टिप्पणी नहीं करते, संघ के आदेशों को उसी तरह मौन स्वीकृति मिल जाती है, जैसे सोनिया के आदेशों को मनमोहन सिंह जी द्वारा मिल जाती थी । धार्मिक असहि्ष्णुता का वातावरण देश मे बन रहा है। इनका देश की भलाई या जनता की समस्याओं से कोई लेना देना नहीं है।‘’जब तेरा राज हो तो तू मेरे भ्रष्टाचार पर पर्दा डाल देना, जब मुझे सत्ता मिलेगी तो मै भी तेरी ग़लतियों को ढ़क दाब दूंगा।‘’ ऐसी अनकही सहमति इन दोनो पार्टियों के बीच है, वो एक दूसरी पार्टी के काले कारनामो को बाहर नहीं आने देंगें। क्या 120 दिन मे काला धन आया? राजा और कलमाडी स्वतन्त्र घूम रहे हैं। वाद्रा और डी. एल. ऐफ. की डील से होने वाले बड़े आर्थिक लाभ को तो शायद दामाद जी की जायज़ आमदनी माना जा चुका हैं । इसका बड़ा सीधा सा जवाब दिया जाता हे कि ‘’हम बदले की राजनीति नही करते, अपराधियों को बख्शा नहीं जायेगा…………….. कानून अपना काम कर रहा है, कानून अपना समय लेगा।’’ बड़े बड़े अपराधी आराम से बेल पर घूंमते हैं , कुछ पर कोई केस नहीं बनता ऐसा कह दिया जाता है। इन अपराधियों पर उंगली उठाने वाले को रोज़ रोज़ तबादले झेलते पड़ते हैं या वो निलंबित कर दिये जाते है। इसके बावजूद भी ये दोनो पार्टियां एक दूसरे की कट्टर विरोधी के रूप मे जनता के सामने आती हैं।

    इसके अलावा बहुत सी क्षेत्रीय पार्टियाँ है, जिनकी केन्द्र मे सिर्फ इतनी भूमिका है कि पूर्ण बहुमत न मिलने से बड़ी पार्टी से सौदा करके गठबंधन की सरकार बना सकती हैं या बाहर से समर्थन दे सकती हैं। ये सत्ता और पद के लियें ये किसी भी दल से जुड़ सकती हैं।

    बीजेपी के पास संसाधनो की कमी नहीं थी, मोदी जी भाषण लुभावने थे इसलियें बीजेपी पूर्ण बहुमत के साथ देश की सरकार बना पाई।मै क्या, सभी जानते हैं कि ‘आप’ जैसी नई पार्टी को केन्द्र मे सत्ता इस बार तो नहीं मिल सकती थी, हम भी चाहते थे, कुछ अनुभव के बाद उन्हे ये दायित्व मिले, पर यदि उनके 25-30 प्रत्याशी भी संसद मे पंहुच पाते तो देश की राजनीति मे परिवर्तन लाते… पर ये हो न सका।हममे से शायद ही कोई चाहता हो कि देश मे फिर कोई बहुदलीय सरकार बनती और मुलायम सिंह, मायावती, ममता बैनर्जी, नितीश कुमार जैसा कोई नेता प्रधानमंत्री बनता, इसलियें मोदी जी ही बेहतर विकल्प के रूप मे सामने आये। कांग्रेस को जनता नकार चुकी थी।

    मोदी जी के आने के बाद पैट्रोल की क़ीमते घटी हैं, पर उसका श्रेय उन्हे नहीं दिया जा सकता। आम जनता के जीवन मे कोई सुधार नहीं हुआ है।मंहगाई बेरोज़गारी शिक्षा, यातायात सेवाओं, स्वास्थ्य सेवाओं की हालत जैसी थी वैसी ही है। शपथ समारोह मे नवाज़ शरीफ़ के आने , साड़ी , शाल और आमों का आदान प्रदान होने के बावजूद पाकिस्तान से संबध बिगड़े है। चीन की घुसपैठ नहीं रुक रही है। जापान और पड़ौसी देशों की यात्रा को सफल कहा जा सकता है।

    जन धन योजना अच्छी है, पर योजना तो राजीव आवास भी अच्छी ही थी, नरेगा भी अच्छी थी। योजना क्रियान्वित सही तरह से हो और जब तक उसका लाभ जनता तक न पहुंचे, योजना की सफलता का आकलन नहीं हो सकता।

    जनता को रिझाने के लियें विकास के नाम पर मुंबई अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन चलाई जायेगी। बुलेट ट्रेन चलाना हमारे लियें फ़ायदे का सौदा नहीं होगा। बहुत कम यात्री इस सेवा का लाभ उठा पायेंगे। बहुत से विकसित देशों मे बुलेट ट्रेन नहीं है, इसलियें ये कोई प्रतिष्ठा का मामला भी नहीं है। तेज़ रफ्तार के लिये हवाई यात्रा का विकल्प है। रेल सेवाओं मे सुधार और विस्तार की बहुत गुंजाइश है। सड़कों को भी बेहतर बनाना चाहिये, हर गाँव पक्की सड़क से जुड़ा होना चाहिये। हाइवे पर 20 कि.मी. की दूरी पर रैस्ट रूम बनाना भी अनिवार्य होना चाहिये। बुलेट ट्रेन का खिलौना अभी भारतीय जनता को नहीं चाहिये।

    49 दिन तक ‘आप’ की कमियाँ और उपलब्धियाँ रोज़ आंकी जाती थी। उन दिनो औटो और टैक्सी सेवाओं मे सुधार जनता ने महसूस किया था। छोटे उपभोक्ताओं के बिजली के बिल कम आये थे। लोग रिश्वत देने और लेने से डरने लगे थे, सरकारी ख़र्चे कम हुए थे।खैर, दिल्ली सरकार इस्तीफ़ा न भी देती तो लोकसभा चुनाव तक तो उसे गिरा ही दिया जाता। उनकी इस ग़लती के कारण ही उन्हे ‘भगोड़ा’ कहा गया।

    अभी भी दिल्ली विधानसभा की स्थिति वही है, ‘आप’ से बिन्नी चले गये है, बीजेपी के तीन विधायक सांसद बन चुके हैं। अतः बिना दूसरी पार्टी से तोड़े उनके पास सरकार बनाने लायक विधायक न तब थे न अब हैं।अन्हे लग रहा है कि वोटर फिर दूसरी पार्टियों का रुख़ कर रहे है, मोदी मोह कम हो गया है इसलिये वो चुनाव मे जाने से डर रहे हैं।कांग्रेस तो इस बात से आश्वस्त है कि जनता बीजेपी से रूठी तो उन ही के पास जायेगी, और कोई विकल्प है ही कहा!

    इस बीच ‘आप’ जनसभायें कर रही है, मोहल्ला सभायें कर रही है, वोटर तक पंहुच कर अपना पक्ष समझा रही है।अपनी पार्टी को मज़बूत कर रही है, ग़लतियाँ जो की हैं उनकी समीक्षा हो रही है।इस पार्टी मे सत्ता या पद के लालच मे आये हुए लोग नहीं टिक सकते, जो लोग अपना सब कुछ त्याग कर निस्वार्थ भाव से जुड़े है, वही टिके रहेंगे।महाराष्ट्र मे सीटों के बटवारे और सी.एम. के पद को लेकर कितना दँगल मचा हुआ है। ऐसी स्थिति ‘आप’ मे आने की संभावना नहीं है।

    मै नहीं जानती कि दिल्ली मे चुनाव होंगे या नहीं, बी.जे.पी. की जोड़ तोड सफल होगी या नही। यदि दिल्ली मे चुनाव होते हैं, तो जनता अपने पिछले अनुभव के आधार पर ही वोट देगी।

    बीनू भटनागर
    बीनू भटनागर
    मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

    3 COMMENTS

    1. जब तक जनता भावनाओं में बहकर वोट देती रहेगी तब तक नेता या कोई भी पार्टी विकास या सुशासन पर ध्यान क्यों देगी?

    2. ” अंधे और काने में चुनाव करना था सो जनता ने काने को चुन लिया ” पर ये देश हित का विकल्प नहीं है ————————

      ये तो होना ही था पर समाजवादियों ने भी उ.प्र. में कुछ नहीं किया है और अखिलेश के बगल बैठी डिम्पल यादव जब कन्नौज से खड़ी हुई थीं तो कांग्रेस के साथ ही साथ बी.जे.पी. और कम्यूनिस्टों ने भी अपने उम्मीदवार न खड़े करके उनका निर्विरोध चयन पक्का करवाया था ?
      उसी तरह झारखण्ड से अम्बानियों के एजेंट परिमल नथवानी जब राज्यसभा के लिए निर्दलीय खड़े हुए थे तो अन्य सभी पार्टियों ने अपने उम्मीदवार न खड़े करके उनका निर्विरोध चयन पक्का करवाया था ?
      इसलिए जब मौका पड़ेगा तो ये सब लूट के हकदार और पैरोकार जरूर बन जाएँगे जनता गई भाड़ में 17% रेल भाड़ा बढ़ने पर और अब रेलवे सर्विस कमीशन की फीस बढ़ने पर आम आदमी पार्टी के अतिरिक्त सब आश्चर्यजनक रूप से चुप हैं ——– इसका प्रमुख कारण है रिलायंस कम्पनी —— रिलायंस एक ऐसी कम्पनी है जो अपने दोस्तों का ही ज्यादा नुकसान करती है – पहले इन्होंने कांग्रेस को फाइनेंस किया – कांग्रेस को आगे करके पैसा कमाया और बदनाम भी करवाया आज कांग्रेस की वर्तमान दशा के जिम्मेदार पूरी तरह रिलायंस वाले ही हैं !
      अब ये बी.जे.पी. और मोदी के साथ हैं इतने दिनों के राह-रंग से आप समझ ही गए होंगे कि आने वाले चुनावों में शायद बी.जे.पी. को सिंगल डिजिट में ही संतोष करके रह जाना पड़े, सारे अशोभनीय कार्य साम-दाम-दण्ड-भेद नीति के द्वारा रिलायन्स वाले बी.जे.पी. और मोदी से कराएँगे जब ये राह के टट्टू हो जाएँगे तो फिर कोई और को ढूँढेंगे !!
      जो भी देशभक्त हैं जिस भी विचारधारा के हैं प्रतिज्ञा कर लीजिए :– रिलायंस जैसी लुटेरी कम्पनी का हम पूर्णतया बहिष्कार करेंगे :– – – – रिलायंस देश को लूट रही है – हर देश भक्त को रिलायंस तथा उनके प्रोडक्ट का पूरी तरह बॉयकॉट करना चाहिए —

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    * Copy This Password *

    * Type Or Paste Password Here *

    11,739 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress

    Captcha verification failed!
    CAPTCHA user score failed. Please contact us!

    Must Read