लेखक परिचय

सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र”

सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र”

विगत २ वर्षो से पत्रकारिता में सक्रिय,वाराणसी के मूल निवासी तथा महात्मा गाँधी कशी विद्यापीठ से एमजे एमसी तक शिक्षा प्राप्त की है.विभिन्न समसामयिक विषयों पे लेखन के आलावा कविता लेखन में रूचि.

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silentचुप  हैं  सब  करता  नहीं  क्‍यों  दूसरा  कुछ  बातचीत, अमर शहीद पं रामप्रसाद  बिस्मिल का ये शेर देश के मौजूदा हालातों को देखते हुए आज और भी प्रासंगिक हो गयी हैं । अभी कुछ दिनों पूर्व ही उत्‍तराखंड में आयी आपदा हजारों लोगों को मौत की ओर ढकेल गयी और हम सब खामोश बने रहे । आपदा के कारणों  से ज्‍यादा चर्चा मदद करने वालों की नियत पर हुई किसी को फेंकू या स्‍पाइडर मैन कहना किस प्रकृति की मानसिकता को दर्शाता है ? जहां तक प्रश्‍न है हमारे आपदा प्रबंधन का तो प्रारंभ से ही आमजन को इससे आशायें न के बराबर थीं, प्रसन्‍नता का विषय है कि हमारी राजकीय आपदा प्रबंधन विभाग कम से कम उम्‍मीदों पर खरा उतरा । इस पूरे प्रकरण में आशा की अंतिम किरण बन कर उभरी सेना और वाकई सेना ने पूरे देश का दिल जीत लिया । कभी सोचता हूं कि सेना न होती तो क्‍या होता ? ये कश्‍मकश कुछ उसी तरह की है जिसे गालिब ने कुछ यूं  बयां किया था-

न था कुछ तो खुदा था,न होता कुछ तो खुदा होता ।

डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्‍या होता ?

इसलिए ये प्रश्‍न प्रासंगिक हो गया है कि सेनाएं न होती तो क्‍या होता ? यथा जम्‍मू काश्‍मीर में अलगाववादी संगठनों की सक्रियता या आतंकियों की घुसपैठ तो सेना है न । इस तरह की प्राकृतिक आपदाएं तो सेना हैं न,पड़ोसियों के इरादे खराब है तो सेना है न । कई बार सोचता हूं कि क्‍या क्‍या करेंगी हमारी सेनाएं ? किस किस  मोर्चे पर जंग लड़ेंगे हमारे जवान ? और कब तक हमारे जवानों की वीरता को तिरस्‍क्‍ृत किया जाता रहेगा ? यहां तिरस्‍कार शब्‍द का प्रयोग इसलिए क्‍योंकि कई बार हमारे मानवाधिकारों के ठेकेदार सेना पर अल्‍पसंख्‍यकों के उत्‍पीड़न का आरोप भी लगाते हैं ? या दूसरे शब्‍दों में कहें तो आतंकियों के मानवाधिकार की पैरवी । हैरत हो रही है  लेकिन ये सब देखकर भी आप और हम एक दम खामोश बने रहते हैं । आखिर कब टूटेगी ये चुप्‍पी ? कब सही को सही और गलत को गलत कहना सीख पाएंगे हम ? इन तथाकथित विद्वानों के बाद क्रम आता है कांग्रेस ब्‍यूरों ऑफ इन्‍वेस्टिगेशन (सीबीआई) का ,यहां तक की न्‍यायालय को तोते की आजादी की चिंता सता रही है लेकिन तोते को सोने का पिंजरा रास आ गया है । सीबीआई की सक्रियता से राष्‍ट्र हित का कोई कार्य हुआ हो अथवा नहीं लेकिन इसकी विश्‍वसनीयता कांग्रेस के प्रति तो सदैव दृढ़ रही है । चाहे वो क्‍वात्रोच्चि को भगाने की साजिश में शामिल लोगों के असल चेहरे उजागर करने का मुद्दा हो या कालेधन पर नियंत्रण का मुद्दा हो सीबीआई चहुंओर विफल ही रहती है । यदि आपको सीबीआई की सक्रियता देखनी है तो गुजरात में देखीये। अपनी इसी विशिष्‍टता के कारण ही इशरत जहां प्रकरण में आईबी और सीबीआई आमने सामने हैं । मोदी को गुनहगार साबित करने में एड़ी चोटी का जोर लगाने वाली सीबीआई को पवन बंसल,बूटा सिंह के काले कारनामें नहीं दिखते । स्‍मरण रहे कि इन सभी प्रकरणों में जांच की गति में काफी तीव्रता देखने को मिली और आरोपियों को बाइज्‍जत बरी भी कर दिया गया है ।धन्‍य है हमारा लोकतंत्र और हमारी सीबीआई  ।

आजादी के बाद भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राष्‍ट्र घोषित किया गया लेकिन हमारी धर्मनिरपेक्षता वास्‍तव में संसार भर के लिए किसी आठवें अजूबे से कम नहीं है । इसके एक नहीं कई कारण हैं जो निम्‍नवत हैं-

१.  पूरे देश में एकसमान कानून व्‍यवस्‍था का नियंत्रण न होना ।

२.  वर्ग विशेष के वोटों को ध्‍यान में रखकर शरियत की वकालत ।

३.  एक राष्‍ट्र दो विधान एवं दो ध्‍वज जैसी दोगली व्‍यवस्‍थाएं ।

४.   वर्ग विशेष को दंगे एवं मारकाट की विशेष छूट ।

५.  वर्ग विशेष को राष्‍ट्रध्‍वज एवं राष्‍ट्रीय गीत के अपमान की खुली छूट मिलना ।

६.  शहादत का भी विशेष वर्गीकरण ।

७.  धर्म के आधार पर आतंकियों के मानवाधिकार की पैरवी ।

अभी दिल्‍ली में शबे बारात में हुई हिंसक घटना तो आप सब को याद होगी । आततायियों की भीड़ का सड़कों पर नंगा नाच लाचार पुलिस और सहमी जनता सिहरन होती है ऐसे दृश्‍यों को याद करके । बहरहाल हमारे मूक लोकतंत्र में ये कोई नयी बात नहीं है । सबसे हैरत की बात है कि मानवाधिकारों की वकालत करने वाले विद्वान जन एवं मीडियाकर्मी किसी ने भी कोई ऐतराज नहीं जताया । अथवा असम के दंगों को विशेष तवज्‍जो नहीं दी जाती ,या काश्‍मीरी विस्‍थापितों के दर्द से किसी का भी दिल नहीं पसीजता क्‍यों  ? आखिर ये दोहरे मापदंड क्‍या हैं ? इशरत जहां जिसके आतंकी कनेक्‍शन आम आदमी को भी समझ आने लगे है कि पैरवी क्‍यों ? वंदे मातरम का विरोध करने वालों के विरूद्ध किस सजा का प्रावधान है ? अफसोस हमारी कोई राष्‍ट्रीय पहचान नहीं है, और हम सब खामोश हैं ।

 

मुसीबतें सिर्फ इतनी होती तो कोई बात न थी । अभी आज ही समाचार पत्रों में नक्सली हिंसा का नया अध्‍याय पढ़ा और हैरत की बात है दोबारा वही सन्‍नाटा चारों ओर पसरा हुआ है । कुछ देर में वही आश्‍वासन और रटे रटाये बयान और सब शांत । क्‍या जवानों के प्राणों का मूल्‍य नहीं होता ? अथवा उन्‍होने कुछ विशेष शपथ ली होती है ? शपथ से एक बात याद आ रही है, कुर्सी पद एवं गोपनीयता की शपथ तो नेता मंत्री भी लेते हैं जो घोटालों को अंजाम देते रहते हैं । भला हो इन जवानों का जो कम से कम अब भी शपथ का अर्थ समझते हैं और विपरीत परिस्थितियों में उनका निर्वहन भी करते हैं ।अन्‍यथा मंत्रियों से लगायत संतरी तक शपथ की अहमियत से आप और हम सभी वाकिफ हैं । अब तो कुछ कहो खामोशी के पैरोकारों ….. । हैरान हूं अद्भुत लोकतंत्र में समाजवादी युवराजों के अस्तित्‍व, राष्‍ट्र का विखंडन और आवाम की खामोशी देखकर । क्‍या यही लोकतंत्र के मूलभूत लक्षण हैं ? या योग्‍यता परिवार विशेष की बपौती है ? किन युवाओं के प्रतिनिधित्‍व की बात होती है ? कहां सो रहे हैं वो युवा ?कब अन्‍याय का मुखर विरोध करना सीखेंगे हम ? यक्ष प्रश्‍न है कब टूटेगी हमारी चुप्‍पी ?

 

One Response to “कब टूटेगी हमारी चुप्पी ?—सिद्धार्थ मिश्र “स्वितंत्र””

  1. mahendra gupta

    मानवाधिकारी तो इस देश में समय परिस्थिति व जति समुदाय के हिसाब से बोलते हैं.कभी उन्हें एक समुदाय के साथ हुआ व्यव्हार अनुचित लगता है,लेकिन दुसरे समुदाय के साथ वैसा ही होने पर,अनुचित नहीं लगता.उन्होंर भी इस नाम पर केवल अपनी दुकानदारी जमाने का एक जरिया बना लिया है.यदि हम अपने इर्द गिर्द हुई विभिन्न घटनाओं पर नजर डाले तो साफ़ ही यह सब नजर आ जायेगा.कोई भी राष्ट्र वादी विचारधारा वाले व्यक्ति को गैर सेक्युलर,व देश द्रोही करार दे दिया जाता है.यदि वह सत्ताधारी दल का सदस्य है,तो कोई बात नहीं ,यदि अन्य कोई है,तो सब चेत जाते हैं,और इसलिए इस देश में कुछ भी किसी का नहीं बिगड़ सकता.

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