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    Homeसाहित्‍यकविताअपने ही लोग जहर बुनते हैं

    अपने ही लोग जहर बुनते हैं

    —विनय कुमार विनायक

    अपने ही लोग जहर बुनते हैं

    अपने अपनों की तरक्की में सिर धुनते हैं

    अपनों के बीच बड़ी साजिश होती

    अपनों के मध्य बड़ी रंजिश होती

    अपनों के बनाए व्यूह से बच निकलना

    तो सबसे बड़ा किला फतह होता

    अपनों की नजर से छिपकर तप करना

    मनोरथ सिद्धि के पूर्व में किसी को

    लक्ष्य गंतव्य कभी मत उजागर करना

    वर्ना ऋषि मुनि मानव दानव की तपस्या से

    देवराज इन्द्र तक को बुरा लगता

    कुछ पाना हो तो कुछ खोना होता

    रिश्ते नाते मित्र कुटुम्ब से दूर हो जाना होता

    जीवन में पहला प्रतिद्वंदी हित मित्र गोत्रज होता

    प्रतिस्पर्धी का प्रतिस्पर्धी उसका ही साथी संगी होता

    कोई भी प्रतियोगी अपने प्रतियोगी का

    कभी नहीं हित चिंतक होता बल्कि वो निंदक ही होता

    किसी की सफलता पर मातम मनाने वाला

    पहला कोई अपरिचित शत्रु नहीं परिचित मित्र ही होता

    किसी की उपलब्धि पर सबसे अधिक दुखी

    उसकी जाति उसका यार उसका नाता रिश्तेदार होता

    अपनों की बुरी नजर से बच पाना दुष्कर होता! —विनय कुमार विनायक

    विनय कुमार'विनायक'
    विनय कुमार'विनायक'
    बी. एस्सी. (जीव विज्ञान),एम.ए.(हिन्दी), केन्द्रीय अनुवाद ब्युरो से प्रशिक्षित अनुवादक, हिन्दी में व्याख्याता पात्रता प्रमाण पत्र प्राप्त, पत्र-पत्रिकाओं में कविता लेखन, मिथकीय सांस्कृतिक साहित्य में विशेष रुचि।

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