पधारो म्हारे देस जी… 

पिछले हफ्ते मैं शर्मा जी के घर गया, तो वे दोनों आंखें बंद किये, एक हाथ कान पर रखे और दूसरा ऊपर वाले की तरफ उठाये गा रहे थे, ‘‘पधारो म्हारे देस जी…।’’ कभी वे दाहिना हाथ कान पर रखते तो कभी बायां। कभी स्वर ऊंचा हो जाता, तो कभी अचानक नीचा। मेरी गाने-बजाने से दूर की भी रिश्तेदारी नहीं है। इसलिए मेरी समझ में नहीं आया कि ये राग कच्चा है या पक्का; ये राग तंदूरी है या सिंदूरी; ये राग विराग है या अनुराग; ये देशराग है या विदेश राग ? वे जिस तेज गति से लम्बी-लम्बी तानें खींच रहे थे, उससे तो ये राग ‘भाग मिल्खा भाग’ जैसा लग रहा था।

मेरी दोस्ती शर्मा जी कोई 40 साल से है; पर वे शास्त्रीय गायन में भी रुचि रखते हैं, यह मुझे पहली बार ही पता लगा। मैंने सोचा कि शायद वे प्रख्यात शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी को श्रद्धांजलि दे रहे हों। अतः थोड़ी देर में उनका गायन समाप्त हो जाएगा; लेकिन जब घंटा भर होने पर भी वे इस दुनिया से बाहर नहीं आये, तो मैं डर गया। मुझे लगा कि उनके सामान्य होने से पहले ही मुझे चल देना चाहिए, वरना लोग इसका दोष मुझे ही देने लगेंगे।

रात को मैंने फोन किया, तो उनकी मैडम ने बताया कि मेरे जाने के बाद उन्हें अकेला जानकर गायन में विशेषज्ञ कुछ चौपाये आकर साथ में संगत करने लगे। इस ‘ढेंचू राग’ से घबराकर उन्होंने पड़ोसियों को बुला लिया। भीड़ देखकर किसी ने थाने में सूचना दे दी। सबको लगा कि कुछ गड़बड़ जरूर है। कई लोगों ने शर्मा जी को हिलाया-डुलाया। मैडम जी ने उनके सिर पर पानी डाला। तब जाकर उनकी तंद्रा टूटी और सबकी सांस में सांस आयी।

अगले दिन मैंने गूगल बाबा की शरण में जाकर ‘पधारो म्हारे देस जी..’ को खोजा, तो पता लगा कि यह एक राजस्थानी लोकगीत है; लेकिन शर्मा जी का पिछली कई पीढ़ी से राजस्थान से कोई संबंध नहीं है। इसलिए कुछ दिन में जब हालत सामान्य हो गये, तब मैंने शर्मा जी से ही इस दुर्घटना का कारण पूछ लिया। शर्मा जी ने लाल आंखों से घूरते हुए अपने प्रश्नों की तोप का मुंह मेरी तरफ ही मोड़ दिया।

– वर्मा, ये बताओ कि पिछले दिनों जब हमारे नगर में मुख्यमंत्री जी आये थे, तो क्या हुआ था ?

– होना क्या है, उनके कुछ सरकारी और कुछ राजनीतिक कार्यक्रम हुए थे।

– और जब प्रधानमंत्री महोदय आये थे, तो …?

– तब भी यही हुआ था शर्मा जी।

– और जब केन्द्र और राज्य की सत्ताधारी पार्टी के मुखिया जी आये थे, तब… ?

– शर्मा जी, आप तो पहेलियां बुझा रहे हैं। इसका जवाब भी वही पहले वाला ही है; पर इसका ‘पधारो म्हारे देस जी’ से क्या संबंध है ?

– यह तुम जैसा छोटी बुद्धि वाला नहीं समझेगा। देखो, जब भी कोई बड़ा नेता आता है, तो सड़कें ठीक होती हैं। जिस रास्ते से उन्हें आना-जाना हो, वहां की सफाई होती है। सड़क के दोनों ओर चूना डलता है। ऊंट के कूबड़ जैसे ‘स्पीड ब्रेकर’ हटाये जाते हैं। नेता जी के काफिले का परेशानी न हो, इस चक्कर में अवैध अतिक्रमण के साथ-साथ कई बार वैध मकान और दुकान भी तोड़ दिये जाते हैं। खम्भों पर लगी बत्तियां जलने लगती हैं। उन दिनों पुलिस वाले गाय से भी अधिक विनम्र हो जाते हैं। ऐसा लगता है मानो रावण की लंका में रामराज्य आ गया हो।

– हां, ये तो है; पर पधारो म्हारे देस जी…?

– वही तो बता रहा हूं। जब नेताओं के आने पर नगर चकाचक हो जाता है, तो भगवान के आने पर क्या होगा ? इसलिए मैं उन्हें ही पधारने का आग्रह कर रहा हूं।

– पर शर्मा जी, ये ध्यान रहे कि नेता कभी अकेले नहीं आते। उनके साथ पुलिस, प्रशासन और सुरक्षा का पूरा तामझाम होता है। भगवान के साथ तो और भी ज्यादा होगा। अगर वे सब आपके घर में ही डट गये, तो आप कहां रहेंगे ?

शर्मा जी से कोई जवाब देते नहीं बना। उनकी चुप्पी देखकर मैं घर लौट गया; लेकिन तबसे शर्मा जी ने ‘पधारो म्हारे देस जी..’ गाना बंद कर दिया है।

– विजय कुमार,

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