पाक हुक्मरानों, जागो! कहीं देर न हो जाए

-तनवीर जाफरी

26 नवंबर 2008 को भारत की आर्थिक महानगरी मुंबई पर आतंकवादी हमला करने वाले गिरफ्तार किए गए एकमात्र जीवित पाकिस्तानी आतंकी अजमल आमिर कसाब को आख़िरकार अपेक्षित रूप से सजा-ए-मौत सुनाई जा चुकी है। मुंबई की एक विशेष अदालत के न्यायधीश न्यायमूर्ति एम तहिलियानी ने कसाब के विरुद्ध चार अलग-अलग आतंकी मामलों में उसे मृत्युदंड की सजा सुनाई है। जबकि ऐसे ही पांच मामलों में उसे आजीवन कारावास की सजा भी सुनाई गई है। कसाब पर 86 आरोप निर्धारित किए गए थे। जिसमें सभी मामलों में उसे दोषी पाया गया है। उसपर सामूहिक हत्याएं करने, हत्या की साजिश रचने, भारत के विरुद्ध युद्ध छेड़ने तथा आपराधिक गतिविधि निरोधक कानून के अंतर्गत सजा-ए- मौत सुनाई गई है। भारत के लोग 2611 की उस घटना को संभवत: कभी नहीं भूल पाएंगे जबकि इसी पाकिस्तानी नागरिक कसाब ने अपने 9 अन्य पाकिस्तानी सहयोगियों के साथ मुंबई को अपनी आतंकी गतिविधियों से तीन दिनों तक लगभग बंधक सा बना लिया था। देश की अब तक की सबसे बड़ी समझी जाने वाली इस आतंकी घटना में 171 बेगुनाह लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। जबकि 300 से अधिक लोग घायल हुए थे।

गौरतलब है कि 2611 के हादसे के बाद पाकिस्तान ने इस बात की पूरी कोशिश की थी कि वह भारत में आतंकी क़हर बरपा करने वाले सभी 10 आतंकियों को पाकिस्तानी नागरिक मानने से इंकार कर दे। और आख़िरकार कमांडो कार्रवाई तथा पुलिस गोलीबारी में मारे गए 9 आतंकियों को पाकिस्तान ने अपना नागरिक अभी तक स्वीकार नहीं किया। परिणामस्वरूप अभी कुछ समय पूर्व ही उन 9 आतंकियों की लाशों को भारत की ही ामीन पर दंफन करना पड़ा। चूंकि कसाब को जीवित गिरंफ्तार किया गया था इसलिए पाकिस्तान अपनी तमाम चालबाजियों तथा मुकरने के प्रयासों के बावजूद उसे पाकिस्तानी नागरिक स्वीकार करने से अपने आप को बचा नहीं पाया। हालांकि पाक ने इस बात की पूरी कोशिश जरूर की। ज्ञातव्य है कि कसाब सहित 10 आतंकवादी कराची के समुद्री रास्ते से चलकर मुंबई में दांखिल हुए थे। 26 नवंबर की शाम को इनके द्वारा आतंक की कार्रवाई शुरु किए जाने के मात्र एक घंटे के भीतर ही इन आतंकवादियों के पाकिस्तान से मोबाईल संपर्क जुड़े होने को ट्रैक कर लिया गया था तथा यह स्पष्ट हो गया था कि पाकिस्तान में बैठे इन आतंकियों के आक़ा भारत के विरुद्ध छेड़े गए इस ‘युद्ध’ को सीमा पार से संचालित कर रहे हैं।

अजमल कसाब को सुनाई गई सजा-ए- मौत में एक बड़ी बात यह भी काबिले है कि उसे अदालत द्वारा यह सजा उसके इकबालिया जुर्म के आधार पर नहीं दी गई है। बल्कि उसकी सजा का आधार उसके विरुद्ध जुटाए गए पर्याप्त साक्ष्य तथा गवाहों के बयान को माना गया है। अदालत ने यह माना है कि कसाब पाक स्थित आतंकी संगठन लश्करे-तैयबा का सदस्य है। अदालत ने यह भी कहा है कि मुंबई हमले में इन आतंकवादियों के अतिरिक्त जमाअत-उद-दावा प्रमुख हाफिज सईद तथा ज़कीउर रहमान लखवी सहित लगभग 20 अन्य पाकिस्तानी लोग हमले के प्रमुख योजनाकार के रूप मे शामिल थे। यहां हमें यह भी याद रखना होगा कि मुंबई हमले के तत्काल बाद भारत के कड़े तेवर को भांपकर पाकिस्तान ने जिस हाफिज सईद को यथाशीघ्र नारबंद किया था वही हाफिज सईद न केवल पाक अदालत द्वारा बहुत जल्दी बरी कर दिया गया बल्कि मुंबई हमले से प्रोत्साहित होकर उसी हाफिज सईद ने अपनी रिहाई के बाद पाकिस्तान के प्रमुख नगरों में भारत विरोधी सशस्त्र रैलियां निकालीं तथा खुले तौर पर भारत के विरुद्ध मुंबई हमले जैसे और भी हमले कराए जाने की चेतावनी देने लगा। जाहिर है पाकिस्तान में सार्वजनिक रूप से भारत के विरुद्ध इस प्रकार की आतंकी चेतावनी पाकिस्तानी रहनुमाओं की मर्जी के बिना अथवा उनसे छिपा कर नहीं दी जा सकती थी।

अभी कुछ ही समय पूर्व पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में पाक स्थित सभी प्रमुख आतंकी संगठनों का एक संयुक्त सम्मेलन सार्वजनिक तौर पर आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में भी भारत के विरुद्ध जेहाद छेड़ने का संकल्प लिया गया तथा मुस्लिम युवकों को ‘जेहाद’ में शामिल होने तथा ‘जन्नत का हंकदार’ बनने का आह्वान किया गया। पाकिस्तान में इस प्रकार की गतिविधियां अब लुकछुप कर नहीं चलतीं बल्कि यह सब नजारे वहां सरेआम देखे जा सकते हैं। जिस सेना अथवा पुलिस के अधिकारियों व कर्मचारियों को इस प्रकार की विषैली रैलियों तथा आयोजनों के विरुद्ध कार्रवाई करनी चाहिए वही सुरक्षाकर्मी कार्रवाई करने के बजाए स्वयं इन आयोजनों में शरीक होकर असहाय बने खड़े दिखाई देते हैं। तथा वे भी उस जेहादी मानसिकता वाली उस भीड़ का एक अंग नार आते हैं। यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि अपनी ताकत को निरंतर बढ़ाते जा रहे यह आतंकी संगठन अब इस हद तक अपना विस्तार कर चुके हैं कि पाक पुलिस तथा सेना का इनके विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई करना यदि असंभव नहीं तो आसान भी नार नहीं आता।

बहरहाल एक ओर भारत में जहां कसाब को फांसी की सजा सुना दी गई है वहीं दूसरी ओर इन्हीं दिनों में अमेरिका के न्यूयार्क शहर में फैसल शहजाद नामक एक 30 वर्षीय पाकिस्तानी मूल के नागरिक को आतंक फैलाने जैसे ऐसे ही एक ख़तरनाक जुर्म में गिरफ्तार किया गया है। शहजाद ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया है। पाकिस्तानी मूल के इस व्यक्ति ने 17 अप्रैल 2009 को अमेरिकी नागरिकता ग्रहण की थी। शहजाद का पिता बहारुल हक पाकिस्तान में एयर वाईशा मार्शल तथा हवाई यातायात प्राधिकरण के प्रमुख जैसे महत्वपूर्ण पदों पर अपनी सेवाएं दे चुका है। शहजाद ने अपने इंकबाले जुर्म में यह बताया कि उसने 1300 डॉलर खर्च कर पाथफांईडर एस यू वी (स्पोर्टस यूटिलिटि वहिकल) खरीदी थी तथा वह इसमें बम फ़िट कर कनेक्टीकर से न्यूयार्क तक अकेले चलाकर लाया था। उसने न्यूयार्क के टाईम स्कवायर में उसी वैन में विस्फोट करने का असफल प्रयास किया था।

फैसल के इंकबाले जुर्म के अनुसार उसने पाकिस्तान के वजीरीस्तान क्षेत्र में अलकायदा व तालिबानी संगठनों से बम तैयार करने का प्रशिक्षण प्राप्त किया था। इन्हीं संगठनों ने उसे ‘जेहाद’ में शामिल होने तथा ‘शहीद’ होने के लिए मानसिक रूप से तैयार किया था। फैसल की गिरंफ्तारी उस समय हुई जबकि वह अमेरिका के जे एफ कैनेडी एयरपोर्ट से दुबई भाग निकलने हेतु विमान पर बैठ चुका था। परंतु अमेरिकी सुरक्षा अधिकारियों ने विमान रुकवाकर उसे धर दबोचा। यहां भी बड़े आश्चर्य की बात है कि फैसल शहजाद तो स्वयं यह स्वीकार कर रहा है कि वह पाकिस्तान का ही नागरिक है। उसका वर्तमान निवास तो पेशावर के एक पॉश इलाके में है जबकि उसका पुश्तैनी मकान पेशावर से 30 किलोमीटर दूर मोहिब बंदा नामक गांव में है। परंतु पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक साहब इस प्रकरण में भी कसाब की ही तरह फैसल से भी अपना पीछा छुड़ाने की कोशिश के अंतर्गत यह कहने लगे हैं कि फैसल भले ही पाकिस्तानी मूल का है परंतु वह इस समय ‘अमेरिकी नागरिक’ है।

पाकिस्तान एक बार फिर अपनी वही घिसी-पिटी दलील दोहराने लगा है कि -‘अमेरिका में एक वैन में बम मिलने की ख़बर पर पूरी दुनिया का ध्यान चला जाता है जबकि पाकिस्तान में ऐसी गाड़ियां आए दिन फटती रहती हैं। अर्थात् पाकिस्तान कई वर्षों से आतंकी गतिविधियों का स्वयं शिकार है’। पाक गृहमंत्री इसी के साथ यह भी फरमाते हैं कि -‘आतंकवादी पाकिस्तान को एक नाकाम रियासत साबित करना चाहते हैं’। यहां सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान अपनी नाकामियों, कमजोरियों तथा अक्षमताओं का भागीदार भारत अथवा अमेरिका को कब तक बनाता रहेग। नि:संदेह पाकिस्तान इस समय आतंकी गतिविधियों के चलते दया का पात्र बनता जा रहा है। परंतु आतंकवादी नेटवर्क को ध्वस्त करने को लेकर पाक शासकों द्वारा बरती जा रही दोहरी नीतियां निश्चित रूप से उनके इरादों के प्रति संदेह पैदा करती हैं। अजमल कसाब के विषय में पहले तो पाकिस्तान ने अपना नागरिक स्वीकार करने से बचने की कोशिश की थी परंतु मीडिया तथा पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरींफ द्वारा कसाब को पाक नागरिक बताने के बाद उसने कसाब को पाकिस्तानी तो जरूर स्वीकार किया परंतु साथ-साथ उसके आतंकी होने के लिए उसकी गरीबी तथा जहालत की दलील भी पेश की। परंतु अमेरिका में गिरंफ्तार किये गए फैसल शहजाद की गिरंफ्तारी के बाद पाक शासकों के उस प्रकार के तर्क भी धराशायी हो गए हैं क्योंकि फैसल शिक्षित भी है, संपन्न भी तथा एक उच्च कोटि की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी रखता है।

पाकिस्तान की लगातार सैनिक व आर्थिक सहायता करते रहने वाले अमेरिका ने भी न्यूयार्क की टाईम स्कवायर घटना के बाद पहली बार पाक को कड़ी चेतावनी देते हुए यह संदेश दे दिया है कि भविष्य में अमेरिका में ऐसी घटना की पुनरावृति हुई तो पाक को इसके ‘अज्ञात गंभीर परिणाम’ भुगतने पड़ेंगे। लिहाजा पाक हुक्मरान, जब जागो तभी सवेरा की नीति का अनुसरण करते हुए तथा आतंकवाद विरोधी कार्रवाई में पूरी पारदर्शिता बरतते हुए सख्त एवं ईमानदाराना कार्रवाई करें तथा लश्करे तैयबा, अलक़ायदा, जमाअत-उद-दावा, तालिबान, तहरीक-ए तालिबान तथा अन्य अतिवादी नेटवर्क के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई करे। नफरत की बुनियाद पर खड़े इन सांप्रदायिक नेटवर्क को जब तक जड़ से उखाड़ा नहीं जाएगा तब तक पाकिस्तान को पूरी दुनिया के समक्ष आए दिन यूं ही शर्मिंदगी का सामना करते रहना पडेग़ा तथा पाक की धरती पर पोषित आतंकवाद से प्रभावित देशों की धमकियां व घुड़कियां सुननी पडेंग़ी। और यदि अभी भी पाक हुक्मरानों ने अपनी कुंभकर्णी नींद नहीं तोड़ी तो कोई आश्चर्य नहीं कि इनके जागने तक और अधिक देर न हो जाए और नंफरत की बुनियाद पर बने इस देश को कहीं नफरत ही तार-तार न कर डाले।

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