पाकिस्तान का अस्तित्व ही मिट जाना चाहिए

राकेश कुमार आर्य 

पुलवामा में जो कुछ भी हुआ है उसे अब पाकिस्तान पोषित आतंकवाद की हताशा का प्रतीक माना जा सकता है । पुलवामा जैसी घटनाएं हमारा विचार है कि अभी और भी होंगी । हम ऐसा क्यों कह रहे हैं ? इसके पीछे कारण है और वह कारण यह है कि प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता में आने के बाद कश्मीर से आतंकवाद को मिटाने की दिशा में ठोस और सकारात्मक कदम उठाए गए । यहां तक कि जब महबूबा मुफ्ती जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री थीँ तो उस समय वह भी न्यूनाधिक वही भाषा बोल रही थीं जो भारत की केंद्र सरकार उनसे चाहती थी । हमें यह समझना चाहिए कि सत्ता में बने रहने के लिये महबूबा मुफ्ती के लिए मुख्यमंत्री रहते वही भाषा बोलना अनिवार्य था जो उनसे केंद्र सरकार उस समय अपेक्षा कर रही थी । साथ ही हमें यह भी समझना चाहिए कि प्राण बचाए रखने के अब महबूबा उस भाषा को बोल रही है जो उनसे आतंकवादी बुलवाना चाहते हैं । हर व्यक्ति को सत्ता और प्राण इतने ही प्रिय होते हैं , जिन्हें बचाए रखने के लिए वह अपनी निजता को भूल जाता है और स्वाभिमान से समझौता कर लेता है । यह अलग बात है कि ऐसा व्यक्ति समाज में विश्वसनीय नहीं हो पाता और लोग उसके आचरण और व्यवहार का उपहास करने लगते हैं। जब महबूबा केंद्र के द्वारा समझाए गई अपनी भाषा और भूमिका को भूल गई तो उन्हें सत्ता गंवानी पड़ी । अब वह जिस दिन अपनी उस भाषा और भूमिका को भूल जाएंगी , जो उन्हें आतंकवादियों ने पढ़ाई और समझाई है तो यह निश्चित है कि उन्हें अपने प्राण भी गवाने पड़ जाएंगे । अतः महबूबा को लेकर हम यह पक्का मन बना लें कि वह सुधरेंगी नहीं और एक देशद्रोही कमजोर राजनीतिज्ञ की भांति वही भाषा बोलती रहेंगी जो हमारे लिए कष्टकारी होगी। 
अब आते हैं आतंकवादियों पर । आतंकवादियों के नेता पिछले लंबे समय से ऐसी सुविधाएं प्राप्त करते रहे हैं जो उन्हें कश्मीर में आतंकवाद के बहाने सम्मानित कराती हैं । एक सम्मानित जीवन को लात मारना भला कौन व्यक्ति चाहेगा ? अतः आतंकवादी संगठनों के सरगना नेता भी अब जब इनको लहू मुंह लग गया है तो वही भूमिका निभाते रहेंगे जो हमारे लिए कष्टकारी होगी । क्योंकि इस भूमिका को निभाते – निभाते यह इतनी दूर निकल आए हैं कि अब उनको वापस लौटना बड़ा कठिन दिखाई देता है। अतः आतंकवादियों के सुविधा भोगी नेताओं से भी हमें तब तक सावधान रहना है ,जब तक यह निपटा नहीं दिए जाते हैं ।
जो आतंकवादी पिछले 30 वर्ष से कश्मीर जैसे स्वर्ग को नरक बनाने में लगे हुए थे ,उन पर इतनी कठोर कार्यवाही होगी , ऐसा वे सपने में भी नहीं सोचते थे । उनकी सोच थी कि भारत के माँसल शरीर को यूँ ही खाते रहेंगे ,या कहिए कि उसके रक्त को चूसते रहेंगे। कश्मीर के एक – एक मोड़ पर और एक – एक स्थान पर यह लोग जोक की तरह भारत के शरीर में चिपक गए हैं। जो बड़े आराम से भारत का खून पीते रहे हैं। इनके सरगनाओं को जो सुविधाएं मिल रही थीं , वे इसी बात का प्रतीक थीं कि वह जोंक की तरह चिपटकर खून चूसने में ही आनंद ले रहे थे । उन्हें यही अच्छा लग रहा था कि हम आतंकवाद और आतंकवादियों को प्रोत्साहित करते रहें और हमें यह खून चूसने को मिलता रहे । भारत माता का खून चूस – चूसकर ये जोंकें फूल गई थीं । जब केंद्र सरकार में सत्ता परिवर्तन हुआ और मोदी सरकार ने सत्ता संभाली तो केंद्र ने गंभीर होकर इस समस्या की ओर देखना आरंभ किया । पीवी नरसिम्हा राव जैसे प्रधानमंत्रियों के काल को यदि हम याद करें तो ऐसे कई प्रधानमंत्री इस देश में हुए जिन्होंने कश्मीर की ओर देखना भी उचित नहीं समझा । उन्होंने यह मान लिया कि तेरे रहते यह समस्या सुधरेगी नहीं । इसलिए जैसा चल रहा है वैसा चलने दिया जाए । उपेक्षापूर्ण यथास्थितिवाद की इस प्रवृत्ति से हमारे नेताओं ने समझौता कर लिया और उधर जोंकें फूलती चली गईं । इतना ही नहीं वह अपने लिए और भी अधिक सुविधाओं की मांग करने लगीं और सुविधाओं को प्राप्त करना उन्होंने अपना मौलिक अधिकार तक मान लिया । अब जहां ऐसी स्थिति आ जाती है कि सुविधाओं को प्राप्त करना अपना मौलिक अधिकार लोग मान लेते हैं , तो वहां अधिकारों के छीनने पर कष्ट होता है । इसे हमारे मनोवैज्ञानिक ऋषियों के दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह भी सच है कि क्रोध तब आता है जब किसी उद्देश्य की प्राप्ति में कहीं कोई व्यक्ति आपके मनोरथ में बाधा डालता है । केंद्र की मोदी सरकार आतंकवादियों और उनके लक्ष्य के बीच में एक बाधा बनकर उपस्थित हुई । जिसका परिणाम यह होना ही था कि आतंकवादियों को और उनके आकाओं को क्रोध आना था । जिसके विरोध में वह कोई न कोई प्रतिशोधात्मक कदम उठाते ही । उनका यह प्रतिशोधात्मक कदम ही आज का पुलवामा है । जिसे निश्चित रूप से उनकी प्रतिशोधात्मक हताशा ही कहा जाएगा । जब तक आतंकवादियों के पास प्रतिशोध करने के लिए हथियार हैं या उनकी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए पीछे से किसी का नैतिक समर्थन उन्हें प्राप्त है , तब तक वह ऐसा करते रहेंगे । यह वैसे ही है जैसे कि जब तक रोग के कीटाणु भीतर से शांत नहीं हो जाते हैं ,तब तक पर्याप्त चिकित्सा करने के उपरांत भी रोग लौट – लौट कर आता रहता है। 
इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो निश्चय ही पुलवामा की घटना आतंकवादियों की हताशा को प्रकट करने वाली घटना है । इसके पश्चात ऐसी घटनाएं तब तक होती रहेंगी , जब तक उनके पास हथियार रहेंगे या वह शक्ति रहेगी जिससे वे भारत को झुका देना चाहते हैं । हमारा मानना है कि ऐसी घटनाएं स्वाभाविक होती हैं । परंतु हमें यह भी याद रखना चाहिए कि यह घटनाएं जितनी अधिक होंगी उतना ही समझो कि रोगी का रोग शांत होता जा रहा है । इसलिए इस प्रकार की घटनाओं से घबराने की आवश्यकता नहीं है , अपितु यह सोचने की आवश्यकता है की रोगी का रोग शांत होने लगा है और इस समय रोगी का उपचार एक श्रेष्ठ चिकित्सक के हाथों हो रहा है । इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि कई रोग ऐसे होते हैं , जिनमें चिकित्सक रोगी को केवल इसलिए गोली या कोई ऐसी औषधि देता है कि रोगी को उल्टी हो । उल्टी होने को डॉक्टर रोग शांत करने के अनुकूल समझता है । रोगी को उल्टी होती हैं तो पड़ोस का वातावरण दुर्गंधयुक्त होता है । परंतु उल्टी से वैद्य या चिकित्सक यह अनुमान लगा लेता है कि रोग को शांत करने के लिए अभी उसे और कौन-कौन सी दवाइयां देनी हैं ? पुलवामा में आतंकवादियों ने उल्टी की है तो अब हमारी चिकित्सक बनी सेना को यह जानने में सहायता मिलेगी कि अभी उसे ऑपरेशन करने के लिए किन-किन क्षेत्रों में क्या क्या कार्यवाही करनी है ? जितनी ये आतंकवादी उल्टी करेंगे उतना ही कश्मीर शांति की ओर लौटेगा । यह आयुर्वेदिक उपचार है , जिसे मनुष्य के शरीर पर ही नहीं बल्कि समाज के शरीर पर भी घटाकर देखना चाहिए । 
हमारा केंद्रीय नेतृत्व अभी तक इस भूल में रहा है कि हम चुपचाप ऑपरेशन करके रोगी को पूर्व – अवस्था में ले आएंगे । पुलवामा के हो जाने से हमारे केंद्र की भ्रांति भी समाप्त होगी । उसको पता चलेगा कि रोगी का रोग भयंकर है और इसके उपचार के लिए अभी और बड़ी टीम की आवश्यकता है ।
जब हम यह कह रहे हैं कि पुलवामा जैसी घटनाएं अभी और भी होंगी या ऐसी घटनाओं का होना रोगी के रोग को शांत करने के लिए आवश्यक है तो इसका अभिप्राय यह नहीं है कि हम पुलवामा जैसी घटनाओं के समर्थक हैं । हम यहां पर केवल एक स्वाभाविक क्रम की विवेचना मात्र कर रहे हैं , और यह मानकर चल रहे हैं कि यह सब स्वाभाविक है । अतः हम सभी देशवासियों को पुलवामा जैसी घटनाओं से भी बड़ी घटनाओं को सहन करने के लिए तैयार रहना चाहिए । शत्रु निश्चित रूप से कभी भी दुर्बल नहीं मानना चाहिए। वह आपको अनअपेक्षित चोट भी पहुंचा सकता है । यही कारण है कि हमारे पूर्वज प्राचीन काल से यह कहते आये हैं कि जब आप गीदड़ का शिकार करने चलें तो आपके पास हथियार शेर के शिकार वाले होने चाहिए । हमारे अहिंसक राजा भी शेरों का शिकार या जंगली हिंसक जीवों का शिकार इसीलिए किया करते थे कि उनकी क्षत्रियोचित वीरता ,शौर्य और पुरुषार्थ सब बने रहें और उनका अभ्यास होता रहे । हमें आज भी इस बात को ध्यान रखना चाहिए कि हम जंगली हिंसक जीवों का शिकार करने के लिए निकले हैं और वे जंगली हिंसक जीव अर्थात आतंकी किसी भी हमारे साथी का प्राण ले सकते हैं। जंगली हिंसक जीवों के विरुद्ध हमारा संघर्ष दीर्घकालीन है । इसे हम किसी छोटी कार्यवाही से समाप्त नहीं कर सकते । इनके विरुद्ध हमें इजराइल की पद्धति पर कार्य करना होगा । सारे देश को यह मानना होगा कि हमारा युद्ध जंगली हिंसक जीवों के विरुद्ध दीर्घकाल तक के लिए चल रहा है । हमने बहुत देर तक जंगली हिंसक जीवों को सहन किया है , अन्यथा हमें अब से 30 वर्ष पहले यह घोषणा कर देनी चाहिए थी कि जब तक यह जंगली हिंसक जीव समाप्त नहीं कर दिए जाएंगे , तब तक हम निरंतर उनकी सफाई के लिए युद्ध करते रहेंगे । हम युद्ध की घोषणा से बचते रहे और इसीलिए अवांछित युद्ध की आग में अपने आप को झुलसने के लिए बाध्य करते रहे । यही हमारी सबसे बड़ी भूल रही । आज हमें इनके विरूद्ध खुले युद्ध की घोषणा कर देनी चाहिए । उसकी चपेट में चाहे बेशक पाकिस्तान आए , चाहे कोई और आए , पर हमें युद्ध की घोषणा से बचना नहीं चाहिए। 
पुलवामा की घटना चाहे जिस क्रम में हो गई हो परंतु यह सही समय पर हुई है । अभी देश चुनावों की ओर बढ़ रहा है और इस समय देश के लिए मोदी का प्रधानमंत्री बने रहना आवश्यक है। पुलबामा की घटना ने हमारी आंखें खोल दी हैं और हम में से कई लोग छोटे स्वार्थों के कारण जिस प्रकार टुकड़े-टुकड़े गैंग को प्रोत्साहित करने वाले नेताओं की ओर अपने आप को बढ़ा रहे थे , वे रुक गए हैं । अब उन्होंने मन बना लिया है कि देश की एकता और अखंडता के लिए इस समय मोदी की आवश्यकता है । 
हमें इस समय यह भी देखना होगा कि टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थन करने वाले नेता इस देश के गद्दार तो हो सकते हैं , देशद्रोही हो सकते हैं , जयचंद हो सकते हैं – पर वे देश के नायक नहीं हो सकते । इस सब के उपरांत भी प्रधानमंत्री श्री मोदी की 56 इंच की छाती को सिद्ध करने के लिए भी पुलवामा हो ही जाना चाहिए था । क्योंकि उन्हें यह सिद्ध करना ही होगा कि वह सचमुच 56 इंच की छाती रखते हैं । देश को चाहे उन पर कितना ही भरोसा हो , फिर भी देश यह देखना चाहता है कि वह सचमुच 56 इंच की छाती रखते हैं । उनके विरोधी उन्हें त्वरित कार्यवाही के लिये उकसा रहे हैं । पर यह भी एक शुभ संकेत है कि श्री मोदी उनके उकसावे में नहीं आ रहे हैं और पूरी गंभीरता के साथ आगे बढ़ रहे हैं । अब हम भी यही कहेंगे कि श्री मोदी को 56 इंच की अपनी छाती का परिचय देना ही होगा । इस समय उनके विरोधियों की मंशा उनके प्रति चाहे जो हो ,पर देश की अपेक्षा उनसे यही है कि वह इस समय पाकिस्तान को ठोकने के लिए उचित और ठोस कार्यवाही करें । 
हमें यह भूल जाना चाहिए कि पाकिस्तान की स्थिरता हमारे हित में है ।पाकिस्तान अस्थिर रहे , टूटे ,बिखरे और अत्यंत कमजोर देश के रूप में हमारे पड़ोस में रहे – यही हमारे लिए उचित है ,अन्यथा पाकिस्तान हमारे भीतर एक और पाकिस्तान बनाने की तैयारी करता रहेगा । हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान जब बना था तो उसने अपने आप को संसार में इस्लाम के नायक के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया था । आज तक वह इस भूल में है कि वह इस्लामिक देशों का नेता है । जब तक उसकी यह भूल नहीं निकल जाएगी , तब तक भारत भी अस्थिर रहेगा । अतः पाकिस्तान की इस भूल को मिटाने के लिए उसका अस्तित्व मिटाना आवश्यक है । पाकिस्तान के कमजोर पड़ने से पाकिस्तान के माध्यम से भारत को दबाव में रखने की चीन की नीति भी विफल होगी और साथ ही भारत के अंदर जो नाग पनप रहे हैं या पल रहे हैं ,उनकी आतंकी गतिविधियों पर भी लगाम लगाने में सफलता मिलेगी । अतः इस समय यही उचित है कि पाकिस्तान को सबक सिखाने की नहीं ,बल्कि मिटाने की तैयारी करनी चाहिए । दक्षिण एशिया में शांति रखने के लिए और भारत को अपनी सुनियोजित विकास और उन्नति की दिशा में आगे बढ़ने के लिए सब तरह से यही उचित है कि पाकिस्तान का अस्तित्व अब संसार के मानचित्र से मिटना ही चाहिए। 
भारत के नेतृत्व को अब आंखों में पानी नहीं भरना है, अपितु आंखों में आग भरनी है और दोजख की आग में नापाक पाकिस्तान को झोंक देना है । सारा देश अपनी सरकार के साथ है ।समय अनुकूल है , देश की परिस्थितियां भी अनुकूल हैं , तो देर किस बात की ? 

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