परशुराम व सहस्त्रार्जुन: कथ्य, तथ्य, सत्य और मिथक

—-विनय कुमार विनायक
हे परशुराम! आप वैशाख शुक्ल अक्षय तृतीया को जन्मे थे,
किन्तु आपकी कृति मानवोचित गौरवशाली व अक्षय कहां?
क्षय-विनाश के सिवा,आपका कौन सा कर्म है भला अच्छा?

आप घोषित मातृहत्यारा और मातृकुल के संहारक भी थे,
जाति पूछकर वरदान व अभिशाप देने की प्रथा आपसे चली,
आपकी शिक्षा संहारक, जातिवादी और अर्थवाद से दूषित थी,
जिससे द्रोणाचार्य जैसी बदनाम गुरु परम्परा चल निकली!

द्रोणाचार्य;आपके शिष्य आपसे आगे बढ़कर बिना शिक्षादान दिए,
अवांछित शिष्य एकलव्य से कटा अंगूठा गुरुदक्षिणा में दान लिए!
इतना ही नहीं अपने कुपुत्र अश्वत्थामा को राजपद दिलाने खातिर,
दूजा शिष्य अर्जुन के बलबूते पर मित्र द्रुपद का राज्य हड़प किए!

आपसे तो कहीं अच्छे थे क्रोधी ऋषि दुर्वासा,
जो पेट भर भोजन खाकर, तृप्त हो जाते थे,
वरदान देने के पूर्व वे जाति नहीं विचारते थे,
अत्रिपुत्र दुर्वासा किसी का वंश नहीं उजाड़ते थे,
उनके ही शुभाशीष से पाण्डु का वंश चला था,
उनके वरदान से पृथा को पुत्र कर्ण मिला था!

पृथा पुत्र पार्थ कर्ण नहीं था श्वेत-लाल-पीला-काला,
कर्ण था देव का दिव्य शिशु, बिल्कुल भोला भाला!
किन्तु खोज ली आपने कर्ण की जाति कुवर्णवाली,
और ब्राह्मणी अहं वश कर्ण को शापित कर डाला!
दी जो शिक्षा आपने उन्हें ब्राह्मण जाति समझकर,
उसको क्षणभर में क्षीण-हीन-दीन-मलीन कर डाला!

जो अजातशत्रु महादानी थे उसे आपकी जाति ने दान लेकर,
और शाप देकर अपने ही सहोदर भाई के हाथों कटा डाला!

आपको कुछ परवर्ती शास्त्र विष्णु के अवतार कहते,
राम पूर्व आप ही राम थे, राम से बड़े परशुराम थे,
पर क्यों नहीं आपने रावण को मारा, भेद खोलिए?

राम पूर्व रावण विजेता; जो एक परमवीर अर्जुन थे,
राम पूर्व कृष्ण के पूर्वज, अर्जुनों में श्रेष्ठ सहस्त्रार्जुन;
हैहय-यदुवंशी सहस्त्रबाहु वो,गाकर जिनकी विरुदावली,
आपके पूर्वज व रावण के पितामह ऋषि पुलस्त्य ने,
दुराचारी रावण को उनकी कारा से मुक्ति दिलाई थी!

अगर रावण से जातिगत रजामंदी व दुर्भिसंधी नहीं थी,
तो रावणविजेता सहस्त्रार्जुन को आपने क्यों मारा था?
रामावतार पूर्व रावण को आपने क्यों नहीं संहारा था?

आप भारतीय संस्कृति के प्रथम मातृहत्यारा ठहरे,
सहस्त्रार्जुन पितृतुल्य मौसा थे,जिनकी हत्याकर के,
मौसी के सुहाग को उजाड़े, झूठे गोहरण के बहाने,
न भूतो ना भविष्यति,परशुराम आप उदाहरण ऐसे!

अगर सत्य में आप होते कोई अवतारी ईश्वर,
तो आपके जीते जी विष्णु क्यों लेते अवतार?
पुनः राम बनकर,एक सूर्यवंशी क्षत्रिय कुलधर?

वस्तुतः आप थे, अताताई रावण से बढ़कर के,
मानव जाति के हत्यारे,मातृघाती व कृतघ्न भी,
दिव्यास्त्र दाता स्व आराध्य देव शंकर के प्रति,
जिनके पुत्र को एकदन्त किए परशु प्रहार से!

जब आपके पिताश्री भार्गव जमदग्नि जीवित थे,
फिर किस पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लिए थे?
पचासी वर्षीय वृद्ध मौसा सहस्त्रार्जुन को मारके?
उनकी निर्दोष संततियों को इक्कीसबार संहारके?
गर्भस्थ शिशुओं की माताओं की पहरेदारी करके?

सहस्त्रबाहु वधपर आपके जीवित पिता ने कहा,
‘हाय परशुराम! तुमने यह बड़ा पाप कर्म किया,
राम! राम! तुम वीर हो, पर सर्वदेवमय नरदेव;
सहस्त्रार्जुन का व्यर्थ ही, क्योंकर वधकर दिया?
“राम राम महाबाहोभवान पापम कारषीत।
अवधीन्नरदेवं यत् सर्वदेवमयं वृथा।“(38.भा.पु.)

सचमुच कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन सर्वदेवमय नरदेव ही थे,
उनके वंशधर विष्णु के अवतार श्री कृष्ण ने कहा था,
‘मेरे ही सुदर्शनचक्र के अवतार कार्तवीर्यार्जुन धरा पर’
‘मम चक्रावतारो हि कार्तवीर्यो धरातले’ (ब्रह्मांड पुराण)
अस्तु हे परशुराम! आप विष्णु के अवतार कदापि नहीं!
प्रश्न चिन्ह है आपके विष्णु के अवतारी कहे जाने पर?

आपने तो विष्णु के अवतार राम तक को दुत्कारा था,
शिव धनुष राम के द्वारा टूटना तो एकमात्र था बहाना,
उद्देश्य था जातीय वर्चस्व व अहंकार को बनाए रखना!

(2)
हे परशुराम! आप होते परमेश्वर के अवतार यदि?
तब सोचता आपकी पूजा-अर्चना-वंदना करने की!

पर हे मातृहत्यारा! कैसे करें कोई वंदना आपकी?
जो हुए नहीं सगी मां-मौसी-मौसेरे भाई के,वे कैसे?
पराई मां-बहन-बेटी,काकी-फूफी-मामी के रिश्तेदार!
आपने लगाया क्षत्रिय नारी के गर्भ पर पहरेदार?
कंश सा किए गर्भस्थ शिशुओं से घृणित व्यवहार?
आपके विदेशी आक्रांताओं जैसे इक्कीसबार कहर से
क्षत्रिय वर्ण वैश्य-शूद्र-अंत्यज जातियों में बिखर गए!

चन्द्रसेन क्षत्रियपुत्र चन्द्रसेनी कायस्थ बने आपसे डरकर,
ऐसे ही ढेर सारी जातियां बन गई क्षत्रिय वर्ण से टूटकर,
गोप,अहीर,जाट,जडेजा,खत्री,सोढ़ी, कलचुरी, कलसुरी,
सुरी,सुढ़ी,शौरि, शौण्डिक,कलाल,जायसवाल, कलवार,
चन्द्र-पुरुरवा-ययाति-यदु-हैहयवंशी क्षत्रिय के दावेदार!

हैहयवंशी क्षत्रिय सहस्त्रार्जुन सपूत जयध्वज से,
तालजंघ,उनसे पांच कुल; भोज,अवन्ती,वीतिहोत्र,
स्वयंजात और शौण्डिकेय क्षत्रिय में बंट गए थे!
“हैहयानां कुला: पंच भोजाश्चावन्तयस्तथा।
वीतिहोत्रा: स्वयंजाता: शौण्डिकेयास्तथैव च।“(अ.पु.)

आपके भय से क्षत्रियों में मचा था ऐसा हाहाकार,
कि कश्यप ऋषि ने आपसे पृथ्वी को दान लेकर,
आपकी शर्त पर क्षत्रियों को क्षत्रियत्व से च्युतकर,
सभी अत्रिगोत्री चन्द्रवंशियों को कश्यप गोत्र देकर,
जीने का अधिकार दिया वैश्य,शूद्र,वनवासी कहकर!

आज अधिकांश जातियां कश्यपगोत्री होती इसी से,
कश्यपगोत्री में सगोत्री विवाह होता इसी कारण से!

“मेकला द्राविड़ा लाटा पौण्ड्रा:कान्वशिरास्तथा।
शौण्डिका दरदा दार्वाश्चचौरा:शबर बर्बरा:।17।
किराता यवनाश्चैव तास्ता क्षत्रिय जाति:।
वृषलत्वमनु प्राप्ता ब्राह्मणामर्षणात्।“18।(म.भा.अ.प.35)

मेकल,द्रविड़, लाट,पौण्ड्र, कान्वशिरा, शौण्डिक, दरद,
दार्व,चौर/चोल,शबर,बर्वर,किरात,यवन सभी क्षत्रिय थे,
ब्राह्मण के अमर्ष से वृषल;क्षत्रिय हो गए निम्नतर!
कोई जाति छोटी-बड़ी नहीं, कृषक,कामगार,कर्मकार,
ताम्रकार, स्वर्णकार, कांस्यकार,केशरी,ठठेरा, कुंभकार,
काश्तकार,वनवासी, सभी ऋषि-मुनि वंशज कर्मवीर!
(3)
कोई मातृहंता! कैसे हो सकते जग के तारणहार?
हे परशुराम! कोई माता, कुमाता कैसे हो सकती?

मां जो संतान को दस माह तक कुक्षि में रक्षा करती!
निज देह नोच के लख्तेजिगर को कोख से निकालती!
वक्ष चीरकर रक्त दूधिया,अमिय क्षीर बनाकर पिलाती!

हे परशुराम!आप वेद में नहीं,पर स्मृति-पुराण में हैं,
‘यत्र नारियंतु पूज्यंते रमंते तत्र देवता’ नहीं पढ़े थे?
‘माता कुमाता न भवति’,किम्वदन्ती नहीं सुने थे?
प्रश्न कि मातृहंता,पितृआज्ञापालक कैसे हो सकते?
क्या यही हमारी सभ्यता, यही पौराणिक संस्कृति?

आपके पिता वैदिक मंत्र द्रष्टा ऋषि या वहशी थे?
आप नादान बालक या होश-हवास युक्त तपी थे?
हे परशुराम! आप मनुस्मृतिकार भृगु प्रपौत्र भार्गव,
क्या आपको मनुस्मृति के सद्श्लोक पे नहीं गर्व?

आपकी माता रेणुका, इच्छवाकु क्षत्रिय राजकन्या थी,
जिसे आपके प्रौढ़ पुरोहित पिता ने कन्यादान में मांगी
रेणुराज प्रसेनजित से, जो वाक्दत्ता थी सहस्त्रबाहु की!

एक राजकन्या बनके अरण्या, बनी पांच ऋषिपुत्रों की
माता; वसुमान,वसुषेण,वसु,विश्वावसु और आपकी भी,
आप कनिष्ठ पर युवा बलिष्ठ,आपके पिता अतिवृद्ध,
माता अवश्य वृद्धा रही होगी, फिर कुमाता कैसे हुई?

हे परशुराम! आपके वृद्ध मंत्र द्रष्टा पिताश्री ने कहा था,
हे पुत्र अपनी पापिनी माता को अभी मार खेद ना कर
और आपने परशु से माता का झटपट सिर छेद किया!
‘जहीमां मातरं पापां मा च पुत्र व्यथां कृता।
तद आदाय परशु रामो मातु:शिरोऽहरत्”।। (म.भा.16/14)

घटना क्या थी, आपकी माता नदी स्नान करने गई थी,
गंधर्वराज चित्ररथ का अपनी रानी के साथ जलक्रीड़ा देख,
उस राजकन्या के मन में वैसी स्वाभाविक लालसा जगी,
और आपने हत्या कर दी, कैसे अवतारी हो बर्वर सनकी?
किस विधि-विधान से नारी की अंतरात्मा परतंत्र नर की?
(4)
हे परशुराम! यदि आप नायक,अत्याचार के शिकार,
तो आपके प्रतिद्वंद्वी सहस्त्रार्जुन को, होना चाहिए,
राम के प्रतिद्वंद्वी रावण जैसा; नारी का अपहर्ता?
कृष्ण प्रतिद्वंद्वी कंश सा;बहन कोख के शिशुघाती?
पाण्डव शत्रु कौरव सा; जर-जमीन-जोरु के हकमार?

किन्तु क्या सहस्त्रार्जुन ऐसे थे या कुछ और थे?
इन तथ्यों पर ब्राह्मणी लेखनी से कर लें विचार!

कार्तिक शुक्ल सप्तमी रविवार, श्रावण नक्षत्र घड़ी,
प्रात:शुभ मुहूर्त में,अत्रिगोत्री महाराज कृतवीर्य रानी
शीलघना पद्मिनी कोख से, अनन्त व्रत पालन से,
कार्तवीर्यार्जुन जन्मे, अनन्त नारायण की कृपा से!
“कार्तिकस्यसिते पक्ष सप्तभ्यां भानुवासरे
श्रवणर्क्षे निशानाये निशिचे सु सुभेदर्णे।“ (स्मृति पु.)

सहस्त्रार्जुन की माता पद्मिनी कोई मामूली नहीं,
वह सूर्यवंशी सत्यहरिश्चन्द्र की विदुषी कन्या थी!

विष्णु का कथन यज्ञ दान तप विनय व विद्या में,
कार्तवीर्यार्जुन की बराबरी कोई राजा नहीं कर सकते!
“न नूनं कार्तृवीर्यस्य गतिं यास्यान्ति मानव:।
यज्ञैर्दानैस्तपोभिर्वा प्रश्रमेण श्रुतेण च।।(वि.पु.अ11/16)

वाल्मीकि ने रामायण में कहा अर्जुन विजेता में
श्रेष्ठ माहिष्मती नगरी के प्रभुत्वसंपन्न राजा थे!

‘अर्जुनो जयताम श्रेष्ठां माहिष्मत्यापति प्रभो’

उस महाबली राजा अर्जुन ने दशानन रावण को,
सहस्त्र भुजाओं में लपेटकर वैसे बंदीगृह में डाला,
जैसे भगवान नारायण ने बली को बांध दिए थे!

“सतु बाहुसहस्त्रेण बलाद् ग्रह्य दशाननम्।
बबन्ध बलवान् राजा बलिं नारायणो यथा।“(उ.का.32/64)
उक्त कथन से प्रमाणित होता कि सहस्त्रार्जुन हीं
नारायण के अवतार थे, जो पचासी वर्ष शासन कर
महाकालेश्वर शिवलिंग में ब्रह्मलीन हो गए थे!

वैशम्पायन मुनि कहते हैं, हरिवंश महापुराण में,
धर्मपूर्वक प्रजारक्षण करनेवाले राजा कार्तवीर्य के
प्रभाव वश किसी की संपत्ति नष्ट नहीं होती थी!
जो व्यक्ति सहस्त्रार्जुन के वृतांत को कहते-सुनते,
उनका धन नष्ट नहीं होता,खोई चीजें मिल जाती!
“अनष्टद्रव्यता यस्य वभूवामित्रकर्शन।
प्रभाषेण नरेन्द्रस्य प्रजा धर्मेण रक्षत:।(अ.33/36)
न तस्य वित्तनाशोऽस्ति नष्टं प्रतिलभेश्च स:।
कार्तृवीर्यस्य यो जन्मकीर्तियेहिद नित्यश:।(अ.33/56)

मत्स्य पुराण का ये कथन है, जो मनुष्य सहस्त्रार्जुन का
प्रात:स्मरण करते,उनका धन नष्ट ना होते, खोए मिलते,
उनकी आत्मा,जो भगवान कार्तवीर्यार्जुन का वृतांत कहते,
यथार्थ रुप में पवित्र और प्रशंसित होकर,रहती स्वर्ग में!
“यस्तस्य कीर्ति येन्नाम कल्य मुस्याय मानव:।
न तस्य वित्तनाश:स्यनाष्टं च लभते पुनः।।
कार्तवीर्यस्य यो जन्म:कथायेदित श्रीमत: यथावत।
स्विष्टपूतात्मा स्वर्गलोक महहीयते।“(म पु 33/52)

हे परशुराम! वेदव्यास का महाभारत में ये कथन,
कार्तवीर्य अर्जुन सहस्त्रबाहु शक्तिशाली राजा ने
अपने शौर्य से सागर पर्यंत मही पर किए शासन!
‘कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजाबाहु सहसवान्
येन सागर पर्यन्ता धनुषा निर्जिता मही’
अर्जुन महातेजस्वी सामर्थ्यवान होकर भी संयमी,
ब्रह्मज्ञानी,शरणागत वत्सल, दानवीर, शूरवीर थे!
‘अर्जुनस्तु महातेजा बली नित्यं शमात्यक:
ब्रह्मण्यश्च शरण्यश्च दाता शूरश्च भारत।'(शां.प.49/44)

योगवाशिष्ठ में कहा गया है जिसप्रकार कार्तवीर्य
गृह में प्रतिष्ठित होने से सब दुष्ट भयभीत होते,
विष्णु क्षीरोद में स्थित होने से भू में जीव जीते,
योगी के समान सिद्धियां स्थित होती, स्वर्ग में
इन्द्रासन की इच्छा से यज्ञ किए जाते हैं,वैसे हीं
हजारों में एक सहस्त्रार्जुन ईश्वर के समान होते!
“कार्तवीर्य गृहे तिष्ठान सर्वेषां भयदोऽअभवत्।—
—सहस्त्रेमेकं भवति तथा चास्मिज्जनार्दनक:।“

श्रीमद्देवीभागवत का कथन है हैहयवंश में
उद्भूत सहस्त्रबाहु बलवान,धर्म प्रवृत्त,हरि के
अवतार दत्तात्रेय शिष्य, शाक्त, योगेश्वर थे,
महादानी यजमान वे,थे भार्गव ब्राह्मणों के!
“ कार्तृवीर्येति नामाद्रभूद्धैहय:पृथिवीपति:।
सहस्त्रबाहुर्बलवानर्जुनो धर्मतत्पर:
दत्तात्रेयस्य शिष्योऽभूदवतारो हरेखि।
सिद्ध:सर्वार्थद:शाक्तो भृगणां याज्य एव से:।“(6/56/8-9)

ये योगी अर्जुन खड्गधारी, चक्रधर, धनुर्धर,
सप्त द्वीपों में भ्रमणकर चोर तस्करों पर,
रखके नजर पचासी सवर्ष शासक रहे भूपर!

“स हि सप्तसु द्वीपेषु खड्गी चक्री शरासनी
रथी द्वीपान्युचरन् योगी पश्यति तस्करान्।
पन्चाशीतिसहस्त्राणि वर्षाणां स नराधिप:।
ससर्वरत्न सम्पूर्णश्चक्रवर्ती वभूत ह।“(म.पु.43/25-26)

महाप्रज्ञ राजा कार्तवीर्यार्जुन प्रात:स्मरणीय थे,
सद्भावी,धर्मयुक्त प्रजापालक पुण्य चरित्र थे!
सद्भावेन महाप्रज्ञ:प्रजाधर्मेण पालयन्!
कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बहु सहस्त्रवान।(म.पु.)

श्रेष्ठ धर्मज्ञानी अर्जुन ने सप्तद्वीप में फैली
धरा को बाहुबल से जीतकर दान कर दी थी!
“ददौ स पृथिवी सर्वां सप्त द्वीपाम् सपर्वताम्।
स्वबाहौस्त्रबलेनोजौ जित्वा परमधर्मवित्।“(म.भा.शा.प.49/37)

वस्तुत ये बानगी है थोड़ी, सहस्त्रार्जुन की,
वाल्मीकि रामायण, सभी पुराण,इतिहास में,
सर्वगुणी अर्जुन की भरी पड़ी है विरुदावली!
(5)
हे परशुराम! अब सुनें आप अपना गुणगान,
आपके भृगुगोत्री कन्हैयालाल मा.ला.मुंशी ने
‘लोमहर्षिणि’ में आपकी जन्म कथा कही है,

‘बालक परशुराम का जन्म जिस दिन हुआ,
वह दिन भयानक था, भयानक वर्षा, बादल
गर्जन, विद्युत का रव, बालक जब रोता था,
तब ऐसा लगता जैसे वृषभ (बैल) रंभाता हो,
बड़ा होके वह जो चाहता बल से छीन लेता!
सिर बड़ा उसका, चायमान प्रथम गुरु बना!’

ऐसा ही दुर्योधन के जन्म लेने पर हुआ था,
जब दुर्योधन गदहा के जैसा रेंकने लगा था!
उसके जन्म पे ब्राह्मणों ने भविष्यवाणी की,
यह बालक कुलघाती होगा, सचमुच दुर्योधन
पितृकुलघाती एवं आप मातृहंता-मातृकुलघाती,
आपका आचरण है, विदेशी आक्रांताओं जैसी!

‘भगवान परशुराम’ में कन्हैयालाल मुंशी ने
सहस्त्रार्जुन और आपकी शत्रुता का कारण,
राजा सुदास भगिनी लोमहर्षिणि को बताया,
जिसे सुदास चाहते थे सहस्त्रबाहु से ब्याहना,
पर आप और आपके पिताश्री की चाहत थी,
हो विवाह आपसे जो उम्र में छःवर्ष बड़ी थी!

वैदिक दासराज्ञ और सुदास युद्ध में अर्जुन,
सुदास के पक्षधर थे, दिलाए उन्हें विजयश्री!
पता नहीं उस युद्ध में आप कहां थे किन्तु,
बिना विवाह लोमहर्षिणि को बनाए संगिनी!
फिर पता नहीं आपके विवाह और वंशवृद्धि,
क्योंकि आपसे ना वंश चला,नहीं गोत्र कोई!

ना आप मंत्रद्रष्टा,नहीं वेद ऋचाएं रचना की!
फिर भी आप हैं अजर अमर जीवित पूजित!
व्यक्ति पूजा जाति धर्म नहीं,व्यक्तित्व की होती,
आप जाति वंश के नाम से पूजे जाते आज भी!
भ्रमित है भारत का ब्राह्मण आपके नाम से,
कश्यप-सूर्य-मनु,अत्रि-चंद्र-बुध पूर्वज भारत के!

भार्गव नहीं प्रतिनिधि समग्र ब्राह्मण जन के,
आपकी जाति वंश गोत्र भृगु ऋषि से निसृत,
जो वर्णवादी घृणा-द्वेष ब्राह्मणवाद पोषक थे,
अत्रिगोत्री सहस्त्रार्जुन; कश्यप संतति रक्षक थे,
कन्हैयालाल मुंशी ने कहा दास,द्रविड़,नाग के,
सहस्त्रार्जुन हितैषी होने से, परशुराम शत्रु बने!

युग सच्चाई यह थी, कि भार्गव ब्राह्मणों में
धन प्राप्ति व धनार्जन की लालसा अति थी!
श्रेष्ठ धर्मज्ञानी सहस्त्रार्जुन ने सप्तद्वीप को,
बाहुबल से जीतकर ब्राह्मण को दानकर दी!
किन्तु लोलुपता वश संपत्ति भूमि में गाड़ दी,
कृषिकार्य,जनहित में राजस्वकर अदायगी में,
तत्कालीन भार्गवों में नहीं कोई अभिरुचि थी!

पर भार्गवों की इच्छा थी राजा वन जलावे,
साफकर कृषि योग्य बनाके ब्राह्मण को देदे!
उनकी चाहत थी, गोधन भृगु आश्रम में रहे,
दासों के साथ राजा समता भाव न दिखावे!
चाहत बड़ी थी, मगर हृदय के बड़े खोटे थे,
भार्गवों के जाति अहं के आगे सब छोटे थे!

एक प्रसंग है अग्निदेव ने ब्राह्मण बनकर,
चक्रवर्ती सम्राट सहस्त्रार्जुन से याचना की,
वन जलाकर कृषि योग्य भूमि प्राप्ति हेतु!
ब्राह्मण वेशधारी अग्निदेवता की चपेट में,
दूसरे ब्राह्मण के आश्रम को लपेट में लेली,
भार्गव ने निर्दोष राजा को ब्राह्मण के हाथों,
मृत्यु होने की झूठी भविष्यवाणी कर डाली!

विनयं क्षत्रिया:कृत्वोऽप्ययाचंत धनं बहु:।
न ददुस्तेऽतिलोभार्ता नास्ति नास्तिहीति वादिन:।
(भा.पु.6/1614)

श्रीमद्भागवत का यह कथन स्वयं प्रमाण है
कि सहस्त्रार्जुन नहीं कोई शासक अत्याचारी,
और परशुराम नहीं थे नायक कोई सदाचारी!
वे दुर्भावना से उपजाए सुनियोजित विचार हैं,
किसी सच्चरित्र महामानव के चरित्र हनन के,
सहस्त्रार्जुन ही नहीं राम,कृष्ण, बुद्ध आदि भी,
शिकार हुए समय-समय में ऐसे कूटलेखन के!

अस्तु परशुराम नहीं हैं कोई अवतार ईश्वर के,
वे प्रक्षिप्त विचार हैं, कलुषित मानव मन के!
परशुराम नहीं पवित्र पयस्विनी गंगा जल की,
वे पौराणिक सदाचार में मिलाए गए छल थे!
झूठी जाति अहं घृणा द्वेष छल कपट प्रपंच,
त्याग सदविचार फैलाए जो, श्रेष्ठ ब्राह्मण वे!
—-विनय कुमार विनायक

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