पैरेण्टिंग( परवरिश)

गङ्गानन्द झा

अमेरिकी शिक्षाविद एवम् बच्चों की कहानों के लेखक केट विगिन(1856-1923) की उक्ति है, “इस संसार में जन्मा हर बच्चा विधाता का एक नया विचार है, एक सतत अम्लान एवम् दीप्तिमान सम्भावना।”
जरूरत है कि माँ-बाप विधाता के विचार की सांकेतिक लिपि को समझने की निष्ठा रख पाएँ ताकि वे उसके विकास में सार्थक भूमिका का निर्वहन करें। हर बच्चा अपने आपमें अनोखा होता है। सही परवरिश के लिए उस अनोखेपन की पहचान करने की जरूरत होती है। तभी विधाता के उस विचार को विकसित करने में सार्थक भूमिका का निर्वहन किया जा सकता है। इसके लिए उन्हें शिशु को सम्मान देना सीखने की जरूरत होती है, सम्मान दिए बगैर किसीको जानना सम्भव नहीं होता।
बंगाल के कवि सुकान्त भट्टाचार्य ने शिशु की परवरिश के लिए परिवेश के महत्व को रेखांकित किया। कवि अपनी कविता “छाड़पत्र” में नवजात शिशु को प्रतिश्रुति देता है कि संसार को उसके वास योग्य करने के लिए समाज से अभाव, शोषण और असमानता दूर करेगा।
मनुष्य विश्व-प्रकृति की सन्तान है। लम्बी अवधि तक परीक्षण निरीक्षण के मध्य से उसकी उत्पति हुई है। वह परीक्षण निरीक्षण आज भी असम्पूर्ण है। इस प्रक्रिया के दौरान मानव-प्रकृति में नाना प्रकार की प्रवृत्तियाँ और आवेग सम्मिलित हुए हैं। योगात्मक आवेगों में यौन प्रेम का प्राकृतिक उद्देश्य वंश रक्षा है, वात्सल्य एवम् स्नेह का प्राथमिक उद्देश्य सन्तानपालन है।
प्राणी-जगत में मनुष्य का शिशु सबसे अधिक काल तक माता-पिता पर आश्रित होता है । मनुष्य का जैव उत्तराधिकार के अलावे सांस्कृतिक उत्तराधिकार होता है। शारीरिक तथा मानसिक तौर पर मानव शिशु का विकास इस तरह होता है कि कई वर्षों तक अवश्यम्भावी रूप से उसकी देख भाल की ही जानी चाहिए । सन्तान के प्रति माता-पिता का बन्ध (bondage) प्रकृति की सहज प्रवृति के साथ जुटा हुआ होता है, प्रजनन और सन्तान की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए । आत्मरक्षा की प्रवृत्ति जीवों की चेतना का प्रखर रुप है। सन्तान की परवरिश करना इसी प्रवृत्ति की सम्प्रसारित अभिव्यक्ति होती है। अपनी सन्तान के माध्यम से हम जीवित रहते हैं। जिन जीवों में सन्तान की परवरिश की अवधि बड़ी होती है उनकी आयु भी तदनुसार अधिक होती है। प्रकृति ने अपने प्रयोजन से ही प्राणियों के मन की प्रोग्रामिङ्ग की हुई है कि वात्सल्य और ममता स्वतःस्फूर्त रूप से क्रियाशील रहे।
जीना एक प्रक्रिया होती है जिसे जारी रखने के सिलसिले में ऊर्जा की अविराम जरूरत रहा करती है। परवरिश की प्रक्रिया में माता पिता अपने पास उपलब्ध ऊर्जा (एवम् संसाधनों) का आबण्टन अपने तथा अपनी सन्तान के बीच करते हैं। आबण्टन की यह प्रक्रिया सन्तान और माता पिता के बीच एक निरन्तर द्वन्द्वात्मक तथा जटिल बन्ध कायम करती है। इस प्रक्रिया में प्राथमिकता सन्तान के पक्ष में होती है, साथ ही साथ ध्यान रखने की जरूरत रहती है कि माता-पिता अपने को कम से कम वञ्चित करें।
अपनी परम असुरक्षाओं एवम् कमियों के बावजूद, हमारा लक्ष्य अपनी सन्तान में से हर एक की सभी सम्भावनाओं को प्रस्फुटित करना एवम् ऐसी स्थितियाँ प्रस्तुत करने के प्रयास करना रहना चाहिए जो ( सीमित संसाधनों की सीमा में) उनके व्यक्तित्व के विकसित होने के अनुकूल हों। हमारी महत्वाकांक्षा बस इतनी रहे कि हमारी सन्तान हमसे बेहतर मनुष्य बनें, इस अर्थ में नहीं कि परिवेशीय संसाधनों तक उनकी अबाध एवम् असीम पहुँच हो, बल्कि इस मायनी में भी कि उनमें अपने परिवेश को सार्थक एवम् प्रभावी रूप से उन्नत करने की प्रवृत्ति और क्षमता हो तथा ऐसा कर पाने पर उन्हें आनन्दानुभूति हो।
यह लक्ष्य ज़ाहिरा तौर पर अपरिभाषित एवम् अस्पष्ट प्रकृति का है। आदर्शवादी प्रतीत होते हुए भी व्यावहारिक है। हमारी प्रतिबद्धता उनमें से प्रत्येक के व्यक्तित्व के अनोखेपन की पहचान कर उसमें निवेश करने की हो। उनकी परवरिश और पढ़ाई अच्छी हो और आचार विचार में अच्छे रहें तो सम्मान एवम् स्वीकृति के अधिकारी होंगे ही।आशय और विषय अनायास उनके करायत्त होंगे। इससे अधिक उपलब्धि की कामना तो नहीं की जा सकती।

सत्य तो यह है कि सन्तान के साथ के अनुभवों में ‘ज्वाला-यन्त्रणा’ की इतनी अधिकता होती है कि अगर आदमी में सन्तान के ही माध्यम से पूर्णता का एहसास न आया करता, तो जीवन काफी असहज और अधिक कठिन हो जाया करता ।
कौतुक-बोध जीवन-पथ पर की यात्रा के पाथेय के रूप में बहुत उपयोगी हुआ करता है । विरोधी स्थितियाँ बार-बार उभड़ा करती हैं । अपनी सुविधा के लिए किए गए प्रयास असुरक्षा और असुविधा की स्थिति बनाते हैं तो हम भौंचके रह जाते हैं । सन्तान के साथ के रिश्ते के विकास के दौरान ऐसे ही वर्णपट्ट बना करते हैं । प्रकृति का ऐसा विधान है कि माता-पिता व्यग्रता और आतुरता से प्रतीक्षा किया करते हैं कि उनकी सन्तान कब वयस्क होकर आत्मनिर्भर हो जाए ; और फिर वह प्रतीक्षित क्षण उपस्थित होता है, जब घोंसले से निकलने की बेला आ जाती है । लेकिन तब वे सार्थकता एवम् सफलता अनुभव करने की जगह भौंचक हो जाते हैं। जिसे हमने मन-प्राण से प्यार दिया होता है, उसके प्रति अधिकार-बोध तो स्वतः जड़ कर ही लेता है; यह अधिकार-बोध केवल यन्त्रणा ही देता है ।
सन्तान वयस्क हो जाए, तो माता-पिता से स्वाधीन हो जाती है — भौतिक रूप से भी और भावनात्मक रूप से भी । सन्तान के सामने नए दिगन्त, नई सम्भावनाएँ और नई चुनौतियाँ उभड़ा करती हैं । सार्थकता का आह्वान उसे सम्मोहित ही नहीं, विवश भी, किया करता है । माता-पिता को किन्तु सन्तान से पृथक कोई फोकस नहीं मिल पाता । इसका नतीजा होता है कि अब वे अप्रासंगिकता की स्थिति में आ जाते हैं ।
अन्त में—-”जब बच्चा गोदी में चढ़ने की आतुरता खोने लगता है, उस समय की भावनात्मक प्रतिक्रिया एक माँ की अपनी भाषा में ; “मेरा ९ साल का बेटा जब मेरे चुंबनों से परेशानी प्रदर्शित करने लगा और लोगों के सामने मेरा हाथ पकड़े रहना उसे नाग़वार लगने लगा, तो मेरा ह्रदय विदीर्ण हो गया ; मेरे पहले प्रेमी ने जब मुझे ठुकरा दिया था, उससे अधिक बुरा लगा था मुझे ।”
इतना अचानक यह सब होता है ! आप बच्चे के विश्व के सर्वस्व रहे होते हैं और एक क्षण में जैसे पिछले साल के खिलौने की तरह तुच्छ हो जाते हैं; तक़लीफ होती है । जैसे जैसे हमारे बच्चे बड़े होते रहते हैं, हम अन्दर ही अन्दर एक वास्तविक दुखदायी प्रक्रिया से गुजर रहे होते हैं । हर बार जब उनके कदम आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते होते हैं, हमें आनन्द और गर्व की अनुभूति होती है, पर हम अकबकानेवाली और पीड़ादायक अनुभूतियों से भी घिर जाया करते हैं । हममें से कुछ वञ्चित होने के एहसास से भर जाते हैं; यह चिन्ता हावी हो जाती है कि उनके बच्चों को अब उनकी कोई आवश्यकता नहीं होगी, वे तय नहीं कर पाते कि अब क्या किया जाए । प्राय: सभी स्वीकार करते हैं कि ऐसा लगता है कि हम एकाएक बूढ़े हो गए । ऐसे व्यक्ति को प्यार करने में, जिसके संबन्ध में आप जानते हों कि वह एक दिन आपको छोड़कर चला जाएगा, तीतापन और मिठास के गुण शामिल होते हैं । हम अपने बच्चों को केवल उनकी प्रस्थान की प्रस्तुति के लिए बड़ा करते हैं । हमारे बच्चे सदा के लिए हमारे बच्चे नहीं रहा करते, यद्यपि हम सदा के लिए माँ-बाप रह जाया करते हैं ।
यह याद रखना भी महत्वपूर्ण है कि हर बार जब भी आपका बच्चा कोई मील का पत्थर पार करता है, तो आप भी उसके साथ साथ आगे बढ़े होते हैं । ऐसे अवसरों पर आपको रुक कर कहना चाहिए ,देखो, हम दोनों कितनी दूर तक आ गए । अपने बच्चे के हर नए अध्याय में प्रवेश के साथ आपको अवसर मिलता है कि अपने जीवन के उन अंशों को पुन: हासिल कर लें, जो अपने मातृत्व-पितृत्व को समर्पित कर दिए थे । पर, यह तथ्य तो रह ही जाता है कि अनुपस्थिति हृदय को व्याकुल करती रहती है । “ — जूडिथ वायर्स्ट

Leave a Reply

%d bloggers like this: