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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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संजय शेखर

उसने कहा कि 55 किलोमीटर से राशन दूकान पर चावल लेने आता है तो मुझे विश्वास नहीं हुआ। फिर सुबह के सात बजे ही ओरछा स्थित सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दूकानों पर सैकड़ों अबूझमारियां आदिवासियों की कतार ने और भी आश्चर्य में डाल दिया। ठंड का मौसम होने की वजह से अभी सूरज भी नहीं निकला था। दूकानों में ताले लटक रहे थे लेकिन बाहर सैकड़ों मुड़िया-माड़िया आदिवासियों की कतार। हाथ में बोरिया और लाल कार्ड यह बताने के लिए काफी था की लोग राशन दूकान खूलने का इंतज़ार कर रहे हैं।

स्थानीय आदिवासी कल्याण आश्रम के बच्चों के साथ मैं नहीं होता तो शायद मैं भी इस दृश्य का गवाह नहीं बन पाता। लेकिन सुदूर नक्सल प्रभावित वनांचल क्षेत्रों में संचालित आदिवासी छात्रावास में बच्चे सुबह 5 बजे उठ जाते हैं। उठते ही सबसे पहले प्रार्थना होती है। फिर नित्य कर्म। स्नान और फिर सुबह की पढ़ाई। सो प्रार्थना सुनकर कई साल बाद, सुबह के पांच बजे ही उठ गया। बच्चो के साथ ही मैं भी छह बजे तक नहा-धोकर तैयार। फिर करता क्या? सो पूरी रात गुलज़ार रहनेवाले ओरछा के साप्ताहिक बाज़ार का रुख किया। ओरछा थाना से बाज़ार की तरफ घुसते ही दायें हाथ में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की एक दुकान है।

दूकान सिर्फ एक ही नहीं है। ओरछा साप्ताहिक बाज़ार के इर्द-गिर्द आगे-पीछे कुल दस हैं। ओरछा स्थित सभी दुकान किसी समय अबूझमाड़ के सुदूर ग्राम पंचायतों में हुआ करते थे,लेकिन नक्सली हिंसा की बढ़ती वारदातों और राशन सामग्री की लूटपाट की घटनाओं के बाद अबूझमाड़ के सभी 24 राशन दुकानों को ओरछा, नारायणपुर, कुरुषनार और सोनपुर में ही शिफ्ट कर दिया गया। फिर गरीब आदिवासी करते क्या। एक रुपए और दो रुपए प्रतिकिलो चावल का आकर्षण वे देख चुके है। 35 रुपए का चावल लाओ और एक महीने पूरे परिवार के साथ आराम से खाओ। यानी चाहकर भी लोग सार्वजनिक वितरण प्रणाली के इस लाभ से अपने-आप को अलग नहीं रख सकते सो उन्हें राशन लेने के लिए अब चालीस-पैतालिस ही नहीं बल्कि लंका नाम के ग्राम पंचायत से करीब 75 किलोमीटर की दूरी पैदल चलकर भी राशन लेने ओरछा आना पड़ता है।

अबूझमाड़ की ओरछा में संचालित दस दूकानों में से एक लंका ग्राम-पंचायत की दुकान भी है। ओरछा से लंका की दूरी करीब 75 किलोमीटर है जो इन्द्रावती नदी से लगा और महाराष्ट्र की सीमा से सटा, ओरछा ब्लाक का आखिरी गांव है।

इसके अलावे जो राशन दुकानें ओरछा में संचालित है उसमें ओरछा से डूंगा ग्राम पंचायत की दूरी करीब 60 किलोमीटर, पोचावाड़ा की दूरी करीब 55 किलोमीटर और थुलथुली ग्राम पंचायत की दूरी करीब 50 किलोमीटर है। अन्य ग्राम पंचायतो में आदेर, गोमागल, कोंडोली, पीडियाकोट, मुरुमबाड़ा और गुद्दारी शामिल है। इन पंचायतों में गुद्दारी ओरछा से करीब-करीब लगा गांव है जिसकी दूरी करीब आठ किलोमीटर है बाकी सभी गांवों की दूरी 20 किलोमीटर से ज्यादा ही है।

अबूझमाड़ की छह दुकानें अबूझमाड़ के दूसरे प्रवेशद्वार नारायणपुर से लगे कुकड़ाझोर में संचालित है। यहां भी गरीब 60-65 किलोमीटर से आदिवासियों को अपना राशन लेने आना होता है। कुकड़ाझोर में जिन-जिन ग्राम पंचायतों की राशन दुकानें संचालित है इसमें पदमकोट, कच्चापाल, इरकभट्टी और आंलबेड़ा ग्राम पंचायत भी शामिल हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार कोकड़ाझार से पदमकोट की दूरी करीब 62 किलोमीटर, कच्चापाल की दूरी 52 किलोमीटर, इरकभट्टी की दूरी 60 किलोमीटर और आंलबेरा की दूरी 32 किलोमीटर है। यहां संचालित अन्य दो दूकाने आकाबेड़ा और नेडनार है।

अबूझमाड़ के एक अन्य किनारे कुरुषनार में पीडीएस की तीन दुकानें हैं जो टूटाखार, कोहकामेटा और कुंदूला ग्राम पंचायतों के हैं जबकि गारपा और घमंडी ग्राम पंचायतों की दुकानें सोनपुर में संचालित हैं। इन दुकानों के माध्यम से प्रत्येक महीने अबूझमाड़ में 3400 क्विंटल चावल, 110 क्विंटल शक्कर, 179 क्विंटल नमक और 80 क्विंटल चना सहित केरोसीन अबूझमाड़िया आदिवासियों को प्रदान किया जाता है।

कुल मिलाकर पूरे अबूझमाड़ के आदिवासियों को नक्सली भय से राशन उनके गांव में नहीं मिल पाता बल्कि उन्हें राशन के चावल और नमक लेने के लिए मीलो पैदल चलकर ओरछा, नारायणपुर के कुकड़ाझोर और सोनपुर तक की दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। क्योकि अबूझमाड़ यानी दूनिया के लिए एक अबूझ पहेली बने और करीब 4000 वर्गकिलोमीटर में फैले इस क्षेत्र में परिवहन सुविधाओं की बात करना तो दूर अच्छी पगडंडिया भी विकसित नहीं हो पाई है। अबूझ यानी जिसे दुनिया जान न सके और माड़ यानी पहाड़ी यानी अबूझमाड़ ऐसे पहाड़ियों और सघन वनों का समूह है जो अबतक दुनिया से अनजान हैं। यहां स्वतंत्र भारत की कोई सरकार अबतक नहीं पहुंच पाई है और ना ही अबतक इस इलाके का राजस्व सर्वें ही हो पाया है। छत्तीसगढ़ की मौजूदा रमन सरकार ने अबूझमाड़ की अबूझ पहेली को सुलझाने के लिए नासा के माध्यम से पूरे इलाके का एरियल सर्वे कराया है। लेकिन आकाश से लिए गये तस्वीरों का मिलान कराकर अबूझमाड़ का नक्शा तैयार कर सके इसके लिए भू-अभिलेख विभाग के कर्मचारी अबूझमाड़ में घुस नहीं पा रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के डीजीपी अनिल एम नवानी के अनुसार स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार छत्तीसगढ़ की पुलिस और सीआरपीएफ के तीन हजार जवानों की संयुक्त टीम मार्च के दूसरे सप्ताह में अबूझमाड़ के कुछ इलाकों में घुसने में कामयाब रही है। अबूझमाड़ के घने जंगलों और पहाड़ियों से होकर सघन वनों की सीमा महाराष्ट्र के गढ़चिरौली, आन्ध्रप्रदेश के खम्मम और उड़ीसा के घने जंगलों तक पहुंचती है जिसकी वजह से मोटे तौर पर तीनों ही राज्यों के नक्सलियों के लिए सबसे सुरक्षित गढ़ बन जाता है अबूझमाड़। चुंकि पहले अबूझमाड़ में आमलोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध था लिहाजा नक्सिलयों के लिए पूर्ववर्ती मध्य प्रदेश सरकार का यह निर्णय एक बड़ी सुरक्षा की गारंटी की तरह था। लेकिन राज्य की मौजूदा रमन सरकार ने अबूझमाड़ में प्रवेश से प्रतिबंघ हटाकर नक्सलगढ़ को समाप्त करने की अपनी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है।

कुकड़ाझोर के रास्ते कोहकामेटा तक जाने में कुछ रास्ते जरुर आपको देखने मिल सकते हैं जिसपर साप्ताहिक बाज़ार के दिन स्वामी विवेकानंद आश्रम के टैक्टर जरुरी सामान लेकर, आश्रम के स्कूल तक चले जाते है, जान जोखिम में डालकर। क्योंकि सघन और दुरूह अबूझमाड़ के अरण्य में कब किस खाई में आपका टैक्टर गिर जाये कोई नहीं जानता और फिर ट्रैक्टर कहां तक जायेगा यह भी तय नहीं क्योकि सड़क तो है नहीं जिन पगडंडियों, नदी, नालो और पहाड़ की कंदराओं से टैक्टर दौड़ाई जाती है, वे रास्ते कब आगे स्टाप की तख्ती लगा दे कोई नहीं जानता। स्टाप की तख्ती कभी नदी में उफान आने से, कभी नाले के तेज बहने से, कभी पहाडों पर कटाव होने से या फिर नक्सलियों द्वारा पेड़ काटकर बंद कर देने से। पहले गांव में आश्रम द्वारा ही राशन की दूकानें भी संचालित थी लेकिन नक्सली वारदातों के बढ़ने के बाद अब वो दुकानें भी बंद हो चुकी है।

अबूझमाड़ के दूसरे प्रवेश द्वार ओरछा से गुद्दारी होते हुए डूंगा तक जानेवाला रास्ता तो और भी कठिन है। अबूझमाड़ से बाहरी दुनिया के लोगों के लिए इसे रास्ता कहना भी उचित नहीं होगा क्योकि गुद्दारी ग्राम-पंचायत के बाद तो महज कुछ निशान है जिसपर होकर इन्द्रावती के करीब-करीब किनारे स्थित डूंगा ग्राम पंचायत के लोग अपने नितांत ही जरुरत की चीजें खरीदने के लिए ओरछा तक पहूचते हैं, करीब साठ किलोमीटर की दूरी तय करके। डूंगा में एक आदिवासी छात्रावास भी संचालित है और वहां मध्याह्न भोजन भी बनता है। दिलचस्प यह कि यहां के शिक्षक और स्कूली बच्चे अपने कंघे और सिर पर पीडीएस का चावल और सब्जी लेकर जाने को मजबूर हैं क्योकि इसके सिवा दूसरा कोई विकल्प नहीं है। पक्के स्कूल को नक्सलियों ने नेस्तनाबूत कर दिया है। जर्जर हो चुके इस भवन में करीब 25-30 बच्चे पढ़ते हैं। स्कूल के करीब ही नक्सलियों का शहीद स्मारक बना है और स्कूल प्रांगण में वर्षों पूराना एक खंभा खड़ा है जो इस बात का प्रतीक है कि कभी यहां तिरंगा झंडा फहराया जाता था। लेकिन आश्चर्य है कि जिस स्कूल पर नक्सलियो का करीब-करीब पूरा कब्जा है, वहां के बच्चे भी ‘जन-गण-मन अधिनायक जय हे’ गाते हैं और बंदे मातरम उन्हें याद है। अबूझमाड़ एक नई करवट लेने को आतुर है।

अबूझमाड़ मुक्ति चाह रहा है। खासकर नई पीढ़ी। ओरछा, नारायणपुर और डूंगा के कई आदिवासी कल्याण आश्रम में घंटो रुककर अबूझमाड़ से निकलकर बाहर आये छात्र-छात्राओं से बात करने पर उनमें एक छटपटाहट महसूस की जा सकती है। इसे नक्सलियों को भी समझना पड़ेगा और सरकार को भी। क्यूंकि आप यह कहकर तो अपनी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश कर सकते हैं कि नक्सलियों की वजह से अबूझमाड़ के गांवों में राशन दूकाने संचालित नहीं है, निर्माण और विकास के काम नहीं हो पा रहे है लेकिन कोई इस सवाल का जवाब देगा कि अबूझमाड़ के किनारों पर स्थित स्कूल और आश्रमों में शिक्षक क्यो नहीं हैं? इन आश्रम, स्कूलों को माडल के रूप में विकसित क्यों नहीं किया जा सका? सामुदायिक स्वास्थ केन्द्रों में ताले लटकने के बजाये उसमें बेहतर स्वास्थ सुविधाएं सुनिश्चित क्यों नहीं की जा रही है ताकि अंदर से लोगों को लगे की अंदर की सरकार नहीं बाहर की सरकार ही उनका भला कर सकती है? जैसा कि पीडीएस को लेकर है। भोलेभाले आदिवासियों को अच्छे से पता है कि चावल और नमक बाहरी सरकार के मुख्यमंत्री भेज रहे हैं, जिसे मीलो पैदल जाकर लाने से अंदर सरकार के रहनुमा आदिवासियों को नहीं रोक सकते। रोकें तो विद्रोह भड़कने का डर है।

आदिवासी बच्चो की छटपटाहट तो देखिये। अबूझमाड़ का एक छात्र मडाराम नेताम डरते हुए भी बोल जाता है कि नक्सली और सरकार की लड़ाई में आखिर वह क्यो पिसे? उसे आक्रोश है कि पहले उसके परिजन इन्द्रवती नदी पार करके महज पन्द्रह किलोमीटर पैदल चलकर भैरमगढ़ से अपनी जरूरत की चीजें ले आते थे अब उन्हें 60 किलोमीटर पैदल चलकर ओरछा जाना पड़ता है। सवाल है आखिर क्यूं?

डूंगा आदिवासी आश्रम की कक्षा आठ में पढ़ रही मुनारी पोयाम और कुमारी फूलमति भास्कर पढ़ लिखकर तथाकथित क्रांति में शामिल नहीं होगी बल्कि सबकुछ ठीक रहा और अवसर मिला तो मैडम बनेगी। भले ही आंगनबाड़ी का ही मैडम क्यों न बनना पड़े। यह कोई कम बड़े बदलाब के संकेत नहीं है जरुरत है इन संकेतों को समझने और उसके अनुसार आचरण करने की। पीडीएस के एक आश्चर्यजनक सत्य ही पड़ताल करने मैं नक्सलियों के सबसे अभेद्य गढ़ और मुख्यालय कहे जानेवाले अबूझमाड़ में घुसने की दुस्साहस कर जाऊंगा, वह भी बिना नक्सलियों के बुलाबे के, इसका मुझे भी विश्वास नहीं था । लेकिन भोलेभाले आदिवासियों के साथ मैंने और मेरे सहयोगी संजीव सिन्हा ने यह कर लिया। कुछ डर की वजह से, कुछ रोमांच की वजह से और दुनिया से अनजान कुछ तथ्य को ढूंढ़ निकालने की जिजीविषा की वजह से।

लेकिन ओरछा से डूंगा तक की पैदल यात्रा, फिर नक्सलियों द्वारा पूरी रात की जांच पड़ताल, गुस्सा, भय और दूसरे दिन के शाम तक नक्सलियों के साये में करीब-करीब एक कैदी के रूप में रहने के अनुभव ने अबूझमाड़ को काफी करीब से देखने-समझने की दृष्टि दी, वही पचास-साठ किलोमीटर से सिर पर पीडीएस का चावल लेकर आनेवाले लोगों की आंखों की चमक और घर पहुंचने पर संतोष का भाव भावविह्वल कर देने के लिए काफी था। एक सुखद आश्चर्य यह भी कि अब अन्दरूनी इलाको के लोगों को जीने के लिए जानवरों के जहरीले सुखे मांस खाने की जरुरत नहीं पड़ती,पी डीएस का चावल लोगों की जरूरतों को पूरा कर देता है और इसका अबूझमाड़िया आदिवासियों के स्वास्थ पर सीधा-सीधा असर देखा जा सकता है।

सरकार चाहे तो अबूझमाड़ विकास प्राधिकरण और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से अबूझमाड़ के भोले-भाले और अभी भी करीब-करीब आदिम यूगीन सभ्यता में जी रहे आदिवासियों के जीवन में और खुशहाली ला सकती है। पीडीएस इसका सबसे बेहतरीन माध्यम बनेगा। वहां के लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुकानों के माध्यम से चावल और नमक के अतिरिक्त अन्य पौष्टिक खाद्यान्न, कपड़े, मच्छड़दानी, कृषि कार्य हेतु उन्नत बीज और अन्य जरुरी उपकरण उपलब्ध करा सकती है। इस कार्य से वर्षों से उपेक्षित रहे आदिवादियों के मन में सरकार के लिए विश्वास का भाव भी जागृत होगा और लोग अन्दर और बाहर की सरकार को लेकर और बेहतर तुलना करने की स्थिति में होंगे।

तुलना करने का वह भाव और प्रबल होगा जिसे पीडीएस ने अबूझमाड़िया आदिवासियों के बीच जागृत कर दिया है। 27 फरवरी को अबूझमाड़ के दर्जनभर गांव के अबूझमाड़िया आदिवासियों ने जनपद पंचायत कार्यालय पहुंचकर, कार्यालय का घेराव किया और प्रशासन से पीडीएस की दूकानें ओरछा, नारायणपुर, कोकड़ाझाड़ और सोनपुर में संचालित करने के बजाय संबंधित ग्राम पंचायत में ही संचालित करने की मांग की। नक्सलियों के गढ़ और मुख्यालय कहे जानेवाले अबूझमाड़ में यह एक नई क्रांति की दस्तक है। यह इस बात का प्रतीक है कि समामान्यतः सभी सरकारी योजनाओं का विरोध करनेवाले नक्सली, पीडीएस का विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं क्यूंकि पिछले करीब 40 साल से अबूझमाड़ के भोले-भाले आदिवासियों को क्रांति के नाम पर समाज की मुख्यधारा से अलग-थलग रखनेवाले नक्सली यदि आदिवासियों को पीडीएस का राशन लेने से रोकेंगे तो संभव है आदिवासी, नक्सलियों के खिलाफ ही विद्रोह कर देंगे। वास्तव में अबूझमाड की यात्रा और आदिवासी जन-जीवन को करीब से देख कर लगा कि देश का यह सबसे उपेक्षित इलाका भी करवट बदल रहा है किसी नये सबेरे की आस में.

(लेखक साधना न्यूज़ छत्तीसगढ़ के ब्यूरो प्रमुख हैं) 

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