वर्तमान समय में बच्चों पर पीयर प्रेशर

  केवल कृष्ण पनगोत्रा

पीयर प्रेशर (Peer Pressure) की अवधारणा नई नहीं है। देखा जाए तो यह धारणा सनातन है। जब से मनुष्य के सामाजिक विकास की प्रक्रिया शुरु हुई है, वह हमेशा से ही सीखता और प्रभावित होता आया है। कभी सहकर्मियों से, कभी सहपाठियों से, कभी समाज से, तो कभी विचार से।    कभी सकारात्मक तो कभी नकारात्मक प्रभावों ने मनुष्य के मानस को परिवर्तित किया है।
पीयर या पीर मूलत: अंग्रेजी शब्द  peer है, जिसका प्रमुख अर्थ ‘सहकर्मी’ यानि साथ काम करने वाला है। यहां से ही ‘सहकर्मी प्रभाव’ और ‘सहकर्मी समूह’ की एक बहुआयामी सामाजिक अवधारणा का जन्म हुआ।
वर्तमान समय में भागदौड़ जनित जीवन शैली एक अवश्यम्भावी दिशा बन चुकी है। मार्गदर्शन एवं परामर्श यानि Guidance and Counselling वर्तमान समय की भागदौड़ जनित जिंदगी का अनुसरणीय हिस्सा है। उसी हिस्से की एक कड़ी है-पीयर प्रेशर। वैसे तो पीयर प्रेशर संबंधित परामर्श किसी भी आयु वर्ग के मनुष्य को दिया जा सकता है किन्तु बच्चों और किशोरावस्था के विद्यार्थियों में इस विषय की महत्ता आज के समय में बहुत ही आवश्यक है।
बच्चे, विशेषत: किशोर और किशोरियां अपने दोस्तों या सहपाठियों से काफी जल्दी प्रभावित हो जाते हैं क्योंकि वे दोस्तों से अलग नहीं रहना चाहते और अपना मज़ाक भी नहीं बनाना चाहते हैं। किशोरावस्था में उत्सुक्ता की भावना प्रबल रहती है। कई बार उत्सुकता के कारण भी बच्चे दोस्तों से प्रभावित होने लगते हैं। अक्सर किशोरावस्था में बच्चे अपने दोस्तों, सहपाठियों को प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं। कभी-कभी सहकर्मी या सहपाठी प्रभाव सकारात्मक होता है तो कभी नकारात्मक।जब बच्चे के सहपाठी मित्र अच्छा करते हैं तो उत्सुकतावश वह भी उनका अनुसरण करता है।क्योंकि उसके दोस्त ऐसा कर रहे होते हैं. सहकर्मियों के दबाव के चलते बच्चे क्या-क्या सकारात्मक कर सकते हैं:
1. छात्र स्कूल जाने में लेट-लतीफी छोड़कर नियमित रहने की कोशिश करते हैं।

2. विद्यार्थियों का शैक्षणिक प्रदर्शन अच्छा हो जाता है।

3. शिक्षा प्राप्त करने की प्रेरणा मिलती है।

4. खेल, पाठयक्रम और स्कूल में अतिरिक्त गतिविधियों में भाग लेने में की प्रेरणा मिलती है।
मगर कभी कभी सहपाठी मित्रों का गलत प्रभाव भी पड़ सकता है जिसके कारण बच्चे गलत चीजों के शिकार हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में कई बार माता-पिता भी तनाववश बच्चों पर आक्रामक हो जाते हैं और अगर माता-पिता बच्चों पर ज़बरदस्ती करने की कोशिश करते हैं तो उसका उल्टा प्रतिकूल प्रभाव होता है और बच्चे भी आक्रामक हो जाते हैं या माता-पिता से अपनी बातें छुपाने लगते हैं और झूठ बोलना बच्चों की आदत बन जाती है।

*नकारात्मक पीयर प्रेशर से बचने के उपाय :

नकारात्मक पीयर प्रेशर से स्कूली छात्रों को कैसे बचाया जाए? यह चिंतन का विषय है। दरअसल गलती करना गलत नहीं है, गलत है गलतियों से कुछ भी नहीं सीखना।
इससे पहले कि हम बचाव के उपायों पर चर्चा करें, यह जान लेना जरूरी है कि सहपाठियों के दबाव के तहत होने वाली नकारात्मक गतिविधियां क्या हो सकती हैं।

1. धूम्रपान या तंबाकू खाने की आदत पड़ जाना।

2. 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में मदिरापान की आदत पड़ जाना।

3. ड्रग्स या मादक पदार्थों का उपभोग।

4. स्कूल या कक्षा से भाग जाने की बुरी आदत।

5. परीक्षा में नकल करना.

6. वयस्क संबंधों में शामिल होना।

7. वज़न कम करने या सेहत बनाने की दवाइयों का अनुचित तरीके से चोरी-छिपे सेवन करना.

8.  सौंदर्य और फैशन टिप्स के प्रति आकर्षित होना।

9. माता-पिता की जेब से चोरी पैसे निकालना। कई बच्चे घर से काफी जेबखर्च लाते हैं।
जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि गलतियाँ करना गलत नही है लेकिन गलातिओं से कुछ न सीखना बहुत गलत है। तो जानते हैं छात्रों के लिए पीयर प्रेशर से निपटने के तरीके:

1. इन्कार करना सीखें: 
कई बार सहपाठी ही आपको किसी ऐसी गतिविधि के लिए प्रेरित कर रहा होता है जो आपके लिए बिलकुल सही नहीं तो बीना डरे आप अपने मित्र को ऐसी गतिविधियों के लिए मना करना सीखें.

2. माता-पिता या टीचर से बात करें: 
यदि सहपाठियों द्वारा आप पर दबाव बनाया जाता है तो सबसे पहले स्कूल के प्रमुख परामर्शदाता या मुख्याध्यापक या फिर किसी भी शिक्षक से बात करें। घर में माता-पिता से भी बात करें।

3. सही दोस्तों का चुनाव करें:
स्कूल में मित्र बनाते समय अच्छे साथी चुनें। गलत साथियों का साथ आपकी जिंदगी की गाड़ी को गलत पटरी पर ले जाएगा। इसलिए अच्छे दोस्त चुनें।

*अभिभावकों के लिए कुछ जरूरी बातें:

वर्तमान समय में बच्चों के दिशाहीन होने की संभावना बहुत ही ज्यादा रहती है। इसलिए यह जरूरी है कि माता-पिता स्कूल से बात करें, अपने बच्चे से बात करें और उसे जीवन में सही निर्णय लेने में मदद करें। बच्चों को सबसे पहले परिवार के सहयोग की जरूरत होती है। किसी भी प्रकार का दबाव बच्चे को परिवार से दूर कर देता है और वह दोस्तों के बीच अपना मन लगाने लगता है। बस यहीं से शुरू होता है दोस्तों का दबाव। बच्चे खुद को परिवार से दूर रखने के लिए दोस्तों की बातें मानने लगते हैं। बच्चे से उसकी दिनचर्या, स्कूल और मित्रों के बारे में रोज़ पूछें जिससे वो आपसे अपने मन की बात बता सके। अपने बच्चे को बोलना भी सिखाएँ। उसे बताएं की उसे दोस्तों को खुश करने के लिए हर बात मानने की ज़रूरत नहीं है। वो अपने मन के अनुसार दोस्तों की बात मान सकता है या न भी कर सकता है।
अपने बच्चे को हमेशा यह विश्वास दिलाएँ की आप हमेशा उसके साथ हैं अर्थात आप उसे किसी भी परिस्थिति में आप अकेला नहीं छोड़ेंगे। ऐसा करने से वो अपनी बातों को आपसे नहीं छुपाएगा और उनका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा।•
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